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संकल्प

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी
संकल्प
यदि संकल्प बसे हो मन में,
कुछ न विवशताऐ करती हैं।
हर पल पराट्टाीन बनने से,
प्रगति मार्ग अवरु= हुआ है।
घायल प्राणों के पंछी को,
अवनति ने हर बार छला है।
क्षमताऐ यदि साथ निरन्तर,
हानि न बाट्टााऐ करती हैं।
अग्नि मार्ग पर चलने वाला
सोना बन कर निखर गया है।
पग उसके जिस ओर पडे हों
रश्मि जाल सा बिखर गया है।
वरण सदा ऐसे साट्टान का,
सब अभिलाषाऐ करती हैं।
मानवता का राग सुनाये,
वंशी अपनी बन हर्षाये।
पतझर की गहरी छाया को,
वासन्ती बन दूर भगाये।
उसकी ही अभिव्यक्ति सदा से
सारी भाषाऐ करती हैं।