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याद नहीं वे दिन आते

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी
याद अगर यदि कुछ आता है
तो वाणी के वज्र तुम्हारे।
आहत करके क्तदय सुकोमल
घात किये हैं न्यारे-न्यारे।
दृग में काले बादल छाकर
सुख सपनों के भवन ढहाते।
पूजा अर्चन की थाली को
खंडित है तुमने कर डाला।
बु=-विवेक स्वयं का तुमने
नादानी में है हर डाला।
मन्द मन्द मलयानिल वाले
सुरभित झोंके हैं कतराते।
फूलों की बरसात हुई तो
तुमने शूलों को बरसाया।
मृदुता ने पत्थर को पाकर
अपना राग विहाग सुनाया।
पहिले के संवाद नहीं वो
रसमयता को जो बरसाते।