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मोअन जो दडो की नर्तकी

रश्मि रमानी
मैंने
जब मोअन जो दडो की नर्तकी को याद किया
तो, सिन्धु नदी थिरक उठी।
एक बार फिर
उााल लहरें उठीं
नदी ने करवट लेना चाही
पर कमजोरी इतनी थी कि
दुर्बल काया पलट न सकी
पर
किनारे झूम उठे।
बरसों से समाधि में लीन
मोअन जो दडो का योगी
पता नहीं कब से चुप था
एक घघरू उसके पास से लुढका
कोसे की मधुर ध्वनि
वातावरण में गज गई
योगी के होंठ थरथराए
नर्तकी मुस्कुराई
पश्चिम दिशा के पैरों में
सूरज रचा गया महावर
मोअन जो दडो की मानिनी नर्तकी
फिर से घघरू बोध रही थी।