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वासन्ती-मुस्कान

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी
वासन्ती-मुस्कान
वासन्ती मुस्कान लुटाता
फिर वसन्त आया।
पीले फूलों की चूनर से
ट्टारा हुई सज्जित।
हरा-हरा लहंगा पहिने
लगती है जो शोभित।
हरसिंगार फूल का अर्पण
करता है पाया।
ट्टाूप देखकर लिपट गए हैं
हिम के बिन्दु अनोखे।
आत्मसात् होकर जिसमें
हो गये कनक हैं चोखे।
हिमवसना है ओझल
रवि ने अपने स्वर में गाया।
मन में रागों का है निर्झर,
मरु भी लगता उर्वर,
भ्रमरों की पायल को पहिने,
प्रकृति सुन्दरी के स्वर।
बर्फीला आतंक घिरा था
ओझल होता पाया।
सृजन स्वयं लग रहा लुभावन
ट्टाूप-हास है पावन।
जिसकी सेंक वरद है हरपल
परस रहा मनभावन।
क्तततंत्री की रागिनियों को
कण-कण ने दुहराया।