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राम की शक्ति पूजा - आज के संदर्भ में

ममता खांडल
समय नित परिवर्तनशील है। परिवर्तन के हर मोड पर समय की ट्टाारा किसी न किसी विचारट्टाारा के द्वारा संचालित रही है, फिर वह चाहे ट्टाार्मिक हो, आर्थिक या राजनैतिक। लेकिन आज हम समय की जिस सभ्यता में जी रहे हैं, उस पर ना ट्टार्म का कोई अंकुश बचा है, न इतिहास और ना किसी विचारट्टाारा का। ’’यह एक निरंकुश सभ्यता है, जिसमें जिंदगी का कोई परम्परागत और आट्टाुनिक आदर्श सुरक्षित नहीं है। जिंदगी की बाहरी जरूरतें आंतरिक जरूरतों पर इस कदर हावी है कि मनुष्य का भाव जगत् सिकुडने लगा है। अतीत आट्टाुनिकता का पीछा करते-करते टूट गया। आट्टाुनिकता अतीत और खुद को तोडते-तोडते टूट गई। जो आट्टाुनिकता तोडते हुए आई थी, वह खुद टूट गई।‘‘१ यह टूटा हुआ अतीत और टूटी हुई आट्टाुनिकता को हमने नाम दे दिया उार-आट्टाुनिकता।
कविता हमारे समाज का एक पूर्ण संसार है। वह हमारे समाज उसके संसार का एक मूल्य है। ’’कविता मनुष्य की सांस्कृतिक मातृभाषा है। अभी मनुष्य बचा है, इसलिए कविता बची हुई है।‘‘२ और कविता इसलिए बची हुई है कि सभ्यता जितनी भी निरंकुश हो जाए, वह मनुष्य के बुनियादी सौंदर्यबोट्टा और संवेदना को कभी मिटा नहीं सकती। आज सभ्यता जिस अंट्टाी दौड में दौड रही है, वहो सभी मानवीय उपलब्ट्टिायो उजड रही हैं। कवि अपने समय और समय की चीजों की ओखों में ओखें डालकर ही समय और इन चीजों के पार के संसार को पकडता है। निराला ने अपनी प्रखर दृष्टि से समय के पार देखा और ’राम की शक्ति-पूजा‘ में जीवन संजीवनी भरी। ’राम की शक्ति-पूजा‘ व्यक्ति की, जाति की, समाज की, देश की इच्छाशक्ति के उद्बोट्टान की कविता है।
आज के संस्कृतिविहीन, संवेदनशून्य समय में राम की शक्ति पूजा आस्था, विश्वास, ट्टार्म, संस्कृति, संवेदनशीलता से हमें भर देती है। वह हमें एक परम्परा से जोडती है, हमें एक परम्परा देती है, जिसका आज सर्वथा एक बहुत बडा अभाव आ गया है।
निराला की सृजन का आट्टाार वेदना रही है। नैतिक सांस्कृतिक पराजय की वेदना। कविता का आरम्भ भी इसी निराशा के अंट्टाकार के अनुभव से ही होता है*-
’रवि हुआ अस्त ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
रह गया राम रावण का अपराजेय समर।‘
यह है यु= दिन की शाम है... यह एक अवसाद की शाम भी है, नितांत श्लथ और हताश। दिनभर यु= में रावण का राम पर भारी दबाव रहा, लेकिन राम यहो पराजय से दुःखी नहीं है। वे वास्तव में स्तब्ट्टा हैं, सन्न हैं। क्योंकि यह लडाई उनके और रावण के बीच हुई ही नहीं, रावण लडा ही नहीं, फिर भी वे रावण से हार गये। हुआ यह कि महाशक्ति रावण को अपने अंक में वैसे ही खुलेआम लिये थी, जैसे - चन्ध्मा अपने अंक में कलंक लिए आकाश में चौडे घूमता है। राम के सारे ज्योतिर्मय, सि= अस्त्र महाशक्ति के प्रताप से बुझ-बुझकर आकाश में लीन हो गए। इतना ही नहीं, शक्ति ने अपनी दृष्टि से राम के हाथ बोट्टा दिए। प्रत्यंचा पर तीर चढाना तक उनके लिए असम्भव हो गया। वे यह देखकर चकित और आहत थे कि महाशक्ति न्याय, सत्य, सदाचार का साथ न देकर अन्यायी और अत्याचारी असुर का साथ दे रही हैं - ’अन्याय जिट्टार है शक्ति उट्टार!‘ राम की यह पीडा व्यक्तिगत नहीं है, नैतिक और मानवीय है।
कोई भी रचना हो वह इतिहास या पुराण से जन्म लेती जरूर है, लेकिन वह लिखी अपने समय की प्रेरणा से ही जाती है। ’’जब यह कविता रची गयी थी, तब प्रथम विश्वयु= हो चुका था, जो अपने पीछे आर्थिक, सांस्कृतिक, मानवीय विभीषिकाऐ छोड गया था और तब तक दूसरे विश्वयु= की विषाक्त हवाऐ चलने लगी थी। इट्टार देश स्वाट्टाीनता की लडाई में चौतरफा व्यस्त था। अग्निपथ पर गोट्टाी-युग की पैदल यात्रा थी। सामने आततायी साम्राज्यवादी था - दुर्ट्टार्ष शक्ति से लैस। जयशंकर प्रसाद ने उसकी अपरिमित शक्ति को ’अराति सैन्य सिंट्टाु‘ कहा था। सशस्त्र र्‍ांतिकारियों में जबरदस्त राष्टत्र् प्रेम और चूडांत उत्सर्ग की भावना थी। उनमें निष्ठा, साहस, कौशल किसी बात की कमी न थी, फिर भी उनके शस्त्र साम्राज्यवादी सिंट्टाु में बुझ-बुझकर लीन हो रहे थे। शताब्दियों से पराट्टाीन निश्शस्त्र देश को पूरे साहस और संकल्प से प्रतिरोट्टा करना था।‘‘३ ’’ऐसे में निराला को स्वामी विवेकानन्द का यह उड्ढेश्य वाक्य बडा अनुकूल जान पडता है, जहो वे मानव को संदेश देते हैं कि जागो, उठो और तब तक सतत् रूप से जागते रहो जब तक कि अपने महत् उड्ढेश्य को नहीं पा जाते हो।‘‘४
लेकिन आज उपनिवेशवाद, बाजारवाद और संचार र्‍ान्ति ने सांस्कृतिक आर्मनण के नए-नए दरवाजे खोलकर संस्कृति का अर्थ ही बदल दिया है। ’’आज हमारा समय जिन नई सांस्कृतिक ओट्टिायों और पतझड से घिरा है, यह अहसास एक संर्‍ामक रोग की तरह फैल रहा है कि टूट रहे पाों को न चुनकर तेज हवाओं के साथ बहो, अन्यथा पिछड जाओगे।‘‘५ हालोकि सांस्कृतिक उपनिवेशन का सिलसिला नवजागरण काल से ही शुरू हो चुका था, जब भारतीय सुट्टाारवाद सार्वभौमिक श्रेष्ठता की पश्चिमी ट्टाारणा से आतंकित था। मैकाले ने १८३५ में सिर्फ भाषा ही नहीं, अभिरुचि और विचार के स्तर पर भी अंंग्रेजी की दिशा रख दी थी। उसने राष्टत्रीय संस्कृति पर पश्चिम के प्रभुत्व का रास्ता खोल दिया था। लेकिन तब पश्चिमी साम्राज्यवादी संस्कृति विफल हो गई थी, क्योंकि हमारे पास सांस्कृतिक आत्मविश्वास था, लेकिन अब स्थिति भिन्न है। एक सांस्कृतिक प्रस्थान साफ दिखाई देता है। सांस्कृतिक निर्माण की ताकत जनता के हाथ से निकल कर संस्कृति उद्योगक के हाथ में चली गई है। जनता सिर्फ सम्मोहित और पदार्‍ांत है। आज जीवन संशय ग्रस्त, आत्मबल खण्डित और व्यक्तित्व में विश्वास का बिखराव भर गया है। राम के व्यक्तित्व में भी शंका, विघटन और बिखराव भर गये हैं, वह हताश होकर ’श्लघ‘ बन रहा है।
’’अपनी जीवन यात्रा में न जाने कितनी बार मानव टूटता बिखरता और कुण्ठाग्रस्त हो अंट्टाकार से घिर जाता है।‘‘६ यह जानते हुए कि यह मानसिक भयावह अवस्था स्थायी नहीं है, मनुष्य उसमें टूटता है, बिखरता है और उसका अंत भी हो जाता है। सांस्कृतिक हीन परिवेश की भयावहता और उसमें व्यक्ति की मानसिक उथल-पुथल आज बिल्कुल वैसी ही है, जैसी राम की थी*-
है अमानिशा, उगलता गगन घन अंट्टाकार,
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ट्टा है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुट्टिा विशाल
भूट्टार ज्यों ट्टयान-मग्न, केवल जलती मशाल
राम के इस प्रकार टूटने, बिखरने में आज के व्यक्ति का चित्र भी प्रस्तुत हो रहा है, जो अपने संकल्प-विकल्क में कई बार डगमगाता है और अपनी सारी चेष्टाओं और उपर्म् के बावजूद असफल हो जाता है। आज मनुष्य की मानसिक दशा बार-बार टूटने के कारण बिखर गई है और दुःख की बात यह है कि राम की तरह उसके पास जाम्बवान या हनुमान भी नहीं है। शायद तभी निराला ने राम को ’शक्ति पूजा‘ में प्रस्तुत करके उन्हें एक सहज, साट्टाारण, सामान्य मानव की समतल भूमि पर खडा किया है ताकि हर युग की मानवता का वह प्रतिनिट्टिात्व कर सके। तभी तो ’राम की शक्ति पूजा‘ का कथानक सीता के हरण ;समस्याद्ध से आरम्भ होता है। कविता का प्रारम्भ राम के पराजय बोट्टा के चित्र से होता है, लेकिन इस पराजय बोट्टा में पराजय की स्वीकृति नहीं है बल्कि निराला राम के माट्टयम से मानवीय विजय, आशा और विश्वास को प्रस्तुत करना चाहते हैं। तभी तो विजय के पूर्व के संघर्ष को अट्टिाक मनोवैज्ञानिक बनाया है। ’शक्ति पूजा‘, संघर्ष, आपदा, विपदा और अन्याय, अत्याचार के विरु= मनुष्य की विजय की कहानी है, जो मनुष्य टूटे हुए विश्वास और बिखरी हुई आस्थाओं को पुनः संयोजित करके प्राप्त करता है। मशाल का जलना राम का रावण के अंट्टाकार से संघर्ष हेतु तत्पर और सन्न= हो जाना नहीं है बल्कि आज के मनुष्य का आज की सांस्कृतिक विहीनता के रावण के अंट्टाकार से संघर्ष हेतु तत्पर और सन्न= हो जाना है और उसका कोपना उसका संशय - ’’रह-रह उठता जगजीवन में रावण ;सांस्कृतिक अंट्टाकारद्ध जयमय।‘‘ यह हंस की स्थिति ही युग मानवता के संकल्प, विकल्प और जय-पराजय का चित्र है। निराला के राम कोप-कोपकर भी उस अंट्टाकार से संघर्ष करते हैं। ’अप्रतिहत अंबुट्टिा‘ भी राम के विशाल, अपराजित व्यक्तित्व का द्योतक है। अपनी क्षमता में राम ;सामान्य व्यक्तिद्ध सागर के समान अजेय है, किन्तु उस अजेयता को चुनौती देने वाली दूसरी शक्ति मानो उन्हें झकझोर दे रही है। ’गरज रहा‘ व्यक्तित्व की विवशता है, झझलाहट है। राम इसे समझकर अपने खण्डित विश्वास को संचित करते हैं, यही व्यक्ति की आत्म चेतना है, ;उठो जागो और तब तक जागते रहो जब तक कि तुम अपने उड्ढेश्य को प्राप्त नहीं कर लेतेद्ध। कवि कहता है समय बदलता है, युग और उसकी विचारट्टााराऐ भी नित परिवर्तनशील है, लेकिन मनुष्य का अपने पर विश्वास अखंड है। वह कभी नहीं बदलना चाहिए। यही उसका सफलता की एकमात्र कुंजी है। तभी सांस्कृतिक विहीनता के रावण का जयमय समाप्त हो सकेगा।
निराला आगे कहते हैं कि बदलाव का रास्ता महज आर्‍ोश से प्राप्त नहीं किया जा सकता। र्‍ोट्टा से विनाश होता है, निर्माण नहीं। अतएव उसका शमन करके रचनात्मकता को ही प्रश्रय देना पडता है। र्‍ोट्टा का शमन बु= के बल पर होता है और बु= पूर्णता का प्रतीक है।
विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोट्टा।
झुक जाएगा कवि निश्चय होगा दूर रोट्टा।।
’र्‍ोट्टा के कपि‘ के झुकने के बाद ही विवेक और विश्वास पनपता है, जो व्यक्ति की स्थायी निट्टिा बनकर उसे सफलता की ओर ले जाकर उसे लक्ष्य की प्राप्ति कराता है।
’राम की शक्ति पूजा‘ मानव के नैराश्य से जनित संशय से लेकर उसके पुरुषार्थ का अन्वेषण करते हुए विश्वास के अर्जन और व्यक्तित्व के परिमार्जन की कथा है, जिसमें हर व्यक्ति अपने बिखराव का रूप देखकर विश्वासों के संयोजन की आशा और बल को प्राप्त कर सकता है।
जब मनुष्य वर्तमान से बुरी तरह परास्त हो जाता है तो वह थोडा-सा विश्राम करके अपना, अपने व्यक्तित्व का विश्लेषण करता है, यह मानव की स्वाभाविक वृा है।
याद आया उपवन विदेह का -
प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
’’फिर विश्व-विजय-भावना क्तदय में आयी भर,
वे आये याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत।।‘‘
निराला ने राम के द्वारा व्यक्ति को स्वयं पर विश्वास करने और अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने का मार्ग दिखाया है। इसी आत्म-ज्योति की लौ को प्रज्जवलित करने के लिए निराला जामवंत के द्वारा एक नई गरिमा और विश्वास प्रस्तुत करते हैं -
आराट्टान का दृढ आराट्टान से दो उार
तुम करो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
जामवंत का यह जागरण संदेश केवल शाब्दिक उद्बोट्टान नहीं है। इसमें विश्वास की शक्ति और तपस्या का बल है। यह आत्मशक्ति की ऐसी दीप्ति है, जो प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान रहती है। लेकिन वह जीवन की आपाट्टाापी में भूल जाता है, भ्रमित हो जाता है अथवा ’रावणत्व‘ के उत्थान के साथ सुप्त हो जाता है।
निराला ने इसी कारण बडे मनोयोग से राम के चरित्र बिन्दुओं को संगठित किया था। टूटना, बिखरना मनुष्य का स्वभाव है लेकिन लक्ष्य प्राप्ति के लिए शक्ति के जामवंत को अपने अंदर ढढना होगा। लेकिन आज की अंट्टाी भाग-दौड में भागते मनुष्य के पास समय नहीं है। निराला कहते हैं, आत्मचेतना के ’विभीषण‘ और आस्था के जामवंत को जगाने के लिए ’कुछ देर बैठकर‘ एकाग्र होकर, मन के बिखराव को संयोजित करना होगा। लेकिन तपस्या की चरम परिणति पर जाकर पुनः नैराश्य का साक्षात्कार भी हो सकता है*-
ट्टिाक जीवन जो पाता ही आया है विरोट्टा
ट्टिाक साट्टान जिसके लिए सदा ही किए शोट्टा
मनुष्य प्रश्न करता है क्या यही मानव जीवन का र्मर है? तपस्या के उपरान्त भी बाट्टााऐ और फिर उन्हें पार करने का अनवरत प्रयास, लेकिन कैसे यह सम्भव हो सकेगा। निराला समाट्टाान बताते हैं, त्याग और बलिदान के द्वारा -
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता ह देकर माता एक नयन।।
त्याग का यह बल अमिट है और तपस्या की यह परिणति ही उसकी सीमा है, इसी कारण -
कोपा ब्र॰ाण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय
साट्टाु-साट्टाु साट्टाक ट्टाीर, ट्टार्म-ट्टान ट्टान्य राम
मनुष्य के त्याग की तत्परता ही उसके जीवन और कर्म की सफलता है। त्याग की इसी तत्परता के कारण ही ’राम‘ को विजयी होने का वरदान मिलता है और उनका व्यक्तित्व बदलकर ’नवीन‘ बन जाता है।
यही मानव जीवन की परिभाषा है, जो राम के माट्टयम से निराला प्रस्तुत करते हैं। राम का पराजय बोट्टा और विजय की आकांक्षा ही जीवन जगत के संघर्ष की कहानी है। पराजय की भूमि पर विजय की दृढता और विश्वास ही उसे सफल बनाती है। राम, निराला और सम्पूर्ण मानवता इसे भोगती है। हर युग में राम ;मनुष्यद्ध ’रावणत्व‘ ;जीवन का अंट्टाकार पक्षद्ध का विनाश करने के लिए तत्पर होता है, विरोट्टा सहन करता है, टूटता है, बिखरता है किन्तु आत्म-संयोजन और संकल्प से विश्वास का बल और शक्ति ;दुर्गाद्ध की प्राप्ति करके त्याग और परामर्श के द्वारा उसका विनाश भी कर पाता है। जीवन का यही र्मर मानव की कहानी है, जिसमें उत्थान के लिए पतन को पहचानना, उसे समझना और उसमें से कल्याण का रास्ता खोजना ही कर्म की चेतना है, जो मायूस राम को जामवंत देदी हैं। मनुष्य अपने विवेक से उसे तलाश कर सकता है और स्वयं को विश्वमानव की चेतना का रूप दे सकता है, क्योंकि पाप के बीच से ही पुण्य का अर्जन होता है।
जीवन मूल्यों की सांस्कृतिक ट्टारोहर है आत्मविश्वास और इसे आत्म-साक्षात्कार ;साट्टान के शोट्टाद्ध के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। आज समय के पास विज्ञान है, टेक्नोलॉजी है, व्यापार है, उद्योग है, बाजार है, ट्टान है, नहीं है तो परम्परा से प्राप्त आत्मविश्वास। जिसे वह संस्कृतिहीनता के उद्योग की कठपुतली बनता हुआ शनैः शनैः खोता जा रहा है। मनुष्य लम्बी उडाने भरता हुआ भले ही मंगल ग्रह से आगे तक की यात्रा कर ले किन्तु प्राण वायु के लिए उसे ट्टारती के वृक्षों पर आश्रित होना ही पडेगा और पेडों को जीवित रखने के लिए मिड्डी को अच्छा बनाए रखना होगा। कहने का तात्पर्य है कि यह ट्टारती की मिड्डी उसका अपना आत्मविश्वास है, जो उसे संघर्षरत, जीवित रखने के लिए नित प्राणवायु देती रहती है और उसे जीवन संघर्ष से विजयी बनाती है। अतः इस सांस्कृतिक उत्थान पतन के संशयग्रस्त युग में मन का आत्मविश्वास ही उसमें स्वयं का बोट्टा करा सकता है और आने वाले समय को दिशा दे सकता है।
संदर्भ ः
१. संस्कृति की उारकथा - शंभुनाथ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, २०००, पृ. ८०
२. वही।
३. कवि परम्परा ः तुलसी से त्रिलोचन - प्रभाकर श्रोत्रिय, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, २००६, पृ. ८३
४. स्वामी विवेकानन्द ः चरित, उाष्ठ्त, जाग्रत, प्राप्त वारान्नि
५. संस्कृति की उारकथा - शंभुनाथ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, २०००, पृ. १७८
६. निराला काव्य में मानवीय येतना - डॉ. रमेश दा मिश्र, के.एल. पचौरी प्रकाशन, दिल्ली, १९९४, पृ. १३५-१३६