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कारू का खजाना

रेवती रमण शर्मा
कुछ भी तो नहीं है

पास मेरे

कुछ देने या

छुपा कर रखने के लिये।

सब कुछ खुला है

बस्ता, किताब और जेब

खुला है हर दिन की तरह

घर का दरवाजा।

घर में घुस आया था

एक पिल्ला

न जाने कहो भाग निकला

आता था एक बेघर बुजुर्ग

काफी समय से

दिख नहीं रहा है

अर्से से आ नहीं रही

पिड्ढी चिडयाऐ चौक में।