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निराला की कविताओं में विवेकानन्द का भाववाद

राजेन्ध् परदेसी
रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय आट्टयात्मिकता का उत्थान किया। इन्होंने एक ओर राष्टत्रीयता का प्रचार किया तथा दूसरी ओर ट्टार्म के सच्चे स्वरूप को व्यवहारिक रूप में उपन्यस्त किया। इनके गहन चिंतन और आट्टयात्मिकता की हिन्दी साहित्य पर गहरी छाप है।
विचारात्मक और रचनात्मक साहित्य के निर्माता सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के गद्य-पद्य को पढने से मालूम होता है कि रामकृष्ण और विवेकानन्द का प्रभाव उन पर बहुत गहरा रहा है। अपने आरम्भकाल में निराला विवेकानन्द के भाववाद से अट्टिाक प्रभावित रहे। निराला ने उसी प्रभाव में जीवन और समाज लक्ष्यी समस्याओं की व्याख्या कर अपने भाववादी चिंतन को इंसानियत में कार्यशील किया। सन् १९२२ ई. में निराला कलकाा स्थित रामकृष्ण मिशन से प्रकाशित होने वाले ’समन्वय‘ नामक पत्र में नौकरी करते थे। निराला का व्यक्तित्व बडा महनीय था। विवेकानन्द और निराला में अद्भुत साम्य देखने को मिलता है। दोनों में एक भव्य गरिमा, अथाह शक्ति, वीरवान भाव, निडरता, निर्भयता, सौंदर्य और अद्भुत निष्ठा है।
विवेकानन्द और निराला भारतीय संस्कृति के अनन्य प्रस्तोता रहे हैं। भारतीय ट्टार्म और संस्कृति के उत्थान में दोनों की बहुत बडी भूमिका रही है। भारतवासियों में आत्म-गौरव की भावना को प्रेरित करने वाले स्वामी विवेकानन्द का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय जनता का ट्टार्म पर से विश्वास उठता जा रहा था। हताशा और निराशा से घिरी हुई जनता दिनों-दिन अंट्टाकार के गर्त में डूब रही थी। हिन्दू संस्कृति का अद्यःपतन हो रहा था। रविबााबू ने उचित ही कहा है कि ’यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को पढना चाहिए।‘ क्योंकि अभिनव भारत को जो कुछ कहना था, वह विवेकानन्द के मुख से उद्गीर्ण हुआ। अभिनव भारत को जिस दिशा की ओर जाना था, उसका स्पष्ट संकेत विवेकानन्द ने किया। इस सम्बन्ट्टा में रामट्टाारी सिंह दिनकर के उद्गार उल्लेखनीय हैं - ’’विवेकानन्द वह सेतु है, जिस पर प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते हैं। विवेकानन्द वह समुध् है, जिसमें ट्टार्म और राजनीति, राष्टत्रीयता और अन्तर्राष्टत्रीयता तथा उपनिषद् और विज्ञान, सब-के-सब समाहित होते हैं।‘‘
हिन्दी साहित्य के युग-प्रवर्तक कलाकार महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला‘ का युग भी वही है, जो स्वामी विवेकानन्द के समय रहा है। निराला आट्टाुनिक हिन्दी के पहले और अब तक के सम्भवतः अन्तिम सम्पूर्ण कवि है। तुलसीदास के बाद निराला ही वह कवि है, जिसके काव्य से समय का सत्य अपनी सम्पूर्णता में बोलता हुआ सुनाई देता है। जन-जागरण सम्बन्ट्टाी गीतों की भरमार निराला काव्य की प्रट्टाान भावाभिव्यक्ति है। वह पौरुष का, पुरुषार्थ का, मानव की महिमा का कवि है। मानवता विजयिनी हो, सदैव उसकी यह कामना रही है - ’अभी न होगा मेरा अन्त‘ का र्‍ान्ति मूलक आहृान निराला की जिजीविषा और पौरुष-शक्ति का हमें परिचय देता है। इससे जीवन विमुख जनता के क्तदय में आन्तरिक शक्तियो जाग्रत हो उठी। वे नवजागरण काल के कवि हैं। नवजागरण के सभी कवियों ने भारत को पराट्टाीनता के बंट्टान से मुक्त होने की कामना की है। निराला काव्य में राष्टत्रीय भावना का ट्टारातल बडा विस्तृत और बहिरंगी है। निराला ने अनेकानेक गीतों में भारत गौरव गान, सरस्वती वंदना, मो भारती का स्मरण कर जातीय जीवन में उोजना के प्राण फके हैं। भारतीय जनमानस में उद्बोट्टान का संचार करते हुए कवि अपने प्रबन्ट्टा काव्य ’तुलसीदास‘ में जागरण का संदेश देते हुए आहृान करते हैं। स्वयं अपने संदेश को वैतालिक बनाकर मुखर किया। ’’जीवन की दृष्टि से निराला जी दुर्लभ सीप में पले सुडौल मोती नहीं है, जिसे अपनी महार्थता का साथ देने के लिए स्वर्ण और प्रतिष्ठा के लिए अलंकार का रूप चाहिए। वे तो अनगढ पारस के भारी शिलाखण्ड हैं। न मुकुट में जडकर कोई उसकी गुरुता सम्भाल सकता है और न पदत्राण बनाकर कोई उसका भार उठा सकता है। यह वहो है, जहो उसका स्पर्श सुलभ है। यद्यपि स्पर्श करने वाले में मानवता के लौह-परमाणु है तो किसी और से भी स्पर्श करने पर, वह स्वर्ण बन जाएगा। पारस की अमूल्यता दूसरों का मूल्य बढाने में है। उसके मूल्य में न कोई जोड सकता है और न घटा सकता है।
जागो आया प्रभात,
बीती वह, बीती अन्ट्टारात।
अद्वैत भावना निराला साहित्य की अन्तर्वस्तु में प्रट्टाान रूप से पाई गई है। परिमल, अनामिका, गीतिका, अर्चना, बेला एवं ’अणिमा‘ इत्यादि में निराला की अद्वैत भावना को देखा जा सकता है। निराला का ख्यातनाम गीत ’तुम तुंग “ाृंग हिमालय और मैं चंचल गीत सुर सरिता‘ इसी भावभूमि की अभिव्यक्ति करता है।
हर पराट्टाीन देश में राष्टत्रीय भावना का उदय पुनरुत्थान- भावना से होता है। अंग्रेजी साम्राज्य ने भारतीयों के आत्म-गौरव को कुचलने के लिए हर तरह की कोशिश की। उनको बर्बर और असभ्य कहा। उनकी सांस्कृतिक परम्परा को तुच्छ ठहराया। यहो तक कि उन्होंने भारतवासियों को अकर्मण्य, परलोक की चिंता करने वाले तथा सैनिक भाव से हीन बताया। अंग्रेजों ने हर तरह भारत के इतिहास को विकृत करने की कोशिश की। विवेकानन्द और निराला ने भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का शंखनाद किया। विवेकानन्द ने देश-विदेश में सैकडों भाषण दिये। वेदांत, संस्कृति और ट्टार्म का प्रचार-प्रसार किया। भारत उत्थान का बीडा उठाते हुए देशवासियों में जड शुष्क वृायो उखाड फेंकने का आहृान करते हुए सिंहनाद किया कि, ’’आगामी पचास वर्ष के लिए जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराट्टय देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ट्टयान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवता को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौडें और जिस विराट देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे, तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे, अन्यथा नहीं।‘‘ वेदांती निराला स्वयं सदाशिव थे और राष्टत्र्भक्ति की चेतना ईश्वर भक्ति की अपेक्षा उनमें अट्टिाक थी। इसीलिए कवि ईश्वर की स्तुति न करके भारत के प्रभात सूर्य के अस्त होने पर विषादमय शब्दों में कहता है -
’’भारत के नभ का प्रभापूर्ण
शीतलच्छाया सांस्कृतिक सूर्य
अस्तमित आज रे - तमस्तूर्य दिकमंगल
उर के आसन पर शिरस्त्राण
शासन करते हैं मुसलमान,
है र्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल।‘‘
निराला कृत ’तुलसीदास‘ प्रबन्ट्टा काव्य की इन पंक्तियों में अतीत भारत के उज्ज्वल इतिहास के साथ वर्तमान भारत पर तमस की भोति छा गये अंग्रेजी साम्राज्य को लेकर कवि क्तदय विषाद में डूब जाता है। निराला ने यहो पर भारतीय संस्कृति की चेतना के क्तास का चित्रण करते हुए पुनरुत्थान का संदेश दिया है। निराला विवेकानन्द के स्वर में स्वर पिरोते हुए भारतीय जनमानस को समस्त बंट्टानों से मुक्त होने के लिए ’सत्य का मिहिर द्वार‘ देखने एवं उद्घाटित करने की घोषणा करते हैं -
करना होगा यह तिमिर पार
देखना सत्य का मिहिर द्वार
बहना, जीवन के प्रखर ज्वर में निश्चय
लडना विरोट्टा से द्वन्द्व समय
रह सत्यमार्ग पर स्थिर निर्भर।
राष्टत्रीयता के उन्नयन की चेतना एवं नव-निर्वाण की भावना ही तो निराला के काव्य स्वर को नया मोड प्रदान करती है। उसमें जीवन का सर्वाट्टिाक वैविट्टय नजर आया है -
देश-काल के शर से बिंट्टाकर
यह जागा कवि अशेष-छबिट्टार।।
निराला के मन में सांस्कृतिक उत्थान के साथ-साथ देशभक्ति का भाव गहन रूप में मौजूद था। अपनी कविता ’जन्मभूमि‘ में उनके क्तदय की तन्मयता देखें - ’जन्मभूमि मेरी है जगन्महारानी‘। निराला के काव्य को जहो एक ओर उन्हें विश्व कवि रवीन्ध्नाथ के साहित्य ने नई गीतात्मकता की प्रेरणा दी, वहो स्वामी विवेकानन्द के दार्शनिक चिंतन ने उनकी कविता में एक गाम्भीर्य और गहनता प्रदान की, एक सच्ची मानवीय दृष्टि दी और इस प्रकार उन्हें जीवन में करुणा का आभास हुआ। उनकी अनेक कविताओं में यही मानवीय करुणा उभरकर आयी है। निराला में परम्परा का गौरव बोट्टा सबसे अट्टिाकाट्टिाक पाया जाता है। ’छत्रपति शिवाजी का पत्र‘ मुगलों के जयसिंहों के लिए नहीं, परन्तु अंग्रेजी साम्राज्य के आट्टाुनिक जयसिंहों के लिए स्पष्ट परिलक्षित होता है -
एकिभूत शक्तियों से एक हो परिवार
फैले समवेदना
व्यक्ति का खिंचाव यदि जातिगत हो जाए,
देखो परिणाम फिर
स्थिर न रहेंगे पैर,
पस्त हौंसला होगा,
ट्टवस्त होगा साम्राज्य।
विवेकानन्द की हिन्दू पुनरुत्थान की भावना भारत के सांस्कृतिक पनर्जागरण में है, जिसका निराला ने यहो स्पष्ट प्रतिनिट्टिात्व किया है। विवेकानन्द के ही ’ठिो जागो और ट्टयेय प्राप्ति तक लगे रहो‘ की भावना का प्रतिबिम्ब निराला की ’जागो फिर एक बार‘ कविता है। प्रस्तुत उद्बोट्टानात्मक कविता में निराला ने सांस्कृतिक परम्परा की दुहाई देकर आत्म-गौरव और उद्बोट्टान का भाव जगाया है। एक अकालिया सवा लाख के बराबर होता है। सिक्खों के शौर्य का कीर्तिगान कवि मुक्तकंठ से गाता है -
शेरों की मोद में
आया है आज स्यार
’जागो फिर एक बार‘।
’जागो फिर एक बार‘ का र्‍ांति मूलक आहृान करने वाला कवि भारतीयों की महानता में दृढ विश्वास रखता है।
मुक्त हो सदा ही तुम
बाट्टाा-विहीन बंट्टा छंद ज्यों।
तुम हो महान,
तुम सदा हो महान,
है नश्वर यह दीन भाव।
निराला की ख्यातनाम कविता ’भारति, जय, विजय करे‘ तथा ’वर दे! वीणावादिनी, वर दे!‘ भारतीय अस्मिता को ही उजागर करती है। ’रामकृष्ण विवेकानन्द के कारण उन पर शाक्तोपासना का भी प्रभाव था। ’आवाहन‘ कविता में उन्होंने कहा -
सामान सभी तैयार,
कितने ही हैं असुर,
चाहिए कितने तुझको हार?
कर मेखला-मुंड-मालाओं से,
बन मन अभिरामा -
एक बार बस और नाच तू श्यामा।
इन कविताओं का प्रेरणास्रोत भी विवेकानन्द की पौरुष- प्रट्टाान वाणी ही है। उनकी अंग्रेजी कविता ’टू दी एवेकेंड इंडिया‘ से, जिसमें उन्होंने कहा था - ’वन्स मोर एवेक!‘ वस्तुतः विवेकानन्द की भोति निराला में भी भारतीय मूल्य चेतना निरन्तर जाग्रत रहती है। उन्होंने वीरता को सदा एक नैतिक आट्टाार प्रदान किया है।
विवेकानन्द की आट्टयात्मिक साट्टाना और निराला की काव्य साट्टाना ने राष्टत्रीयता को उोजित करते हुए नई पीढी के लोगों में भारत के प्रति भक्ति जगाई। उसके अतीत के प्रति गौरव एवं उसके भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न की। विवेकानन्द के उद्गारों से लोगों में आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के भाव जगे हैं। निराला ने भी अपने सम-सामयिक भारत को उन्हीं उद्गारों से उद्बोट्टिात किया। निराला बहुमुखी विशाल साहित्य के प्रणेता थे। दार्शनिकता के पुट ने उनकी काव्य साट्टाना को अट्टिाक गहन-गम्भीर बना दिया है। अद्वैतवाद ने निराला चिंतन का मार्ग प्रशस्त किया। वैदान्ती अद्वैतवाद ही निराला के जीवन एवं ’तुलसीदास‘ काव्य का एकमात्र दर्शन है। निराला जी की दार्शनिक पृष्ठभूमि पर श्री ट्टानंजय वर्मा ने लिखा है कि, ’’रामकृष्ण परमहंस भाव-साट्टाना और विवेकानन्द का वैदान्ती अद्वैतवाद दोनों मानों मिलकर निराला में एकाकार हो गये हैं।‘‘ कवि कुलगुरु बसन्त के अग्रदूत को कोटि-कोटि वंदन -
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल बसन्त -
अभी न होगा मेरा अन्त।