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युवाओं में संस्कार

बसन्ती पंवार
गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ-गढ काढे खोट।
भीतर हाथ संभारि दे, बाहर बाहे चोट।।
एक कुम्हार कुछ मिड्डी लेता है। उसमें जल डालता है। उसके पश्चात उसे रौंदता है। रौंदने के बाद चाक पर रखकर उससे एक घडा बनाता है। घडा बनाने के पश्चात उसे पकाता है। पकाने के पश्चात लेकर आता है और कहता है कि यह पात्र हो गया है।
आज संख्यात्मक दृष्टि से तो लोगों की संख्या बहुत है, लेकिन जैसे लोग चाहिए वैसे नहीं मिलते। आज के समय में पात्र बालक नहीं, युवा नहीं, राज्यकर्ता नहीं। यदि पात्र युवा बालक होते, तो पारिवारिक समस्याऐ नहीं होती। पात्र राज्यकर्ता होते तो, राज्य में भ्रष्टाचार, बेइमानी, जमाखोरी, रिश्वतखोरी आदि का बोलबाला नहीं होता।
जिस प्रकार कुम्हार मिड्डी लेकर र्मजब= प्रर्याल से ट्टाीरे-ट्टाीरे पात्र बनाता है, उस प्रर्या का नाम संस्कार है और ये संस्कार अगली पौट्टा को राह दिखाने का सशक्त साट्टान है।
संस्कारों के जल से सिंचित होकर, अनुशासन में ढलकर, व्यवहारिक जीवन की परीक्षा में उाीर्ण होकर, परिस्थिति की भड्डी में तपकर, युवा जब योग्य बनकर निकलेगा तब एक सुन्दर, सुघड, मजबूत युवा पात्र का निर्माण होगा। जैसे सोना अग्नि में तपकर कुन्दन बनता है, उसी प्रकार वह दैदीप्यमान होगा।
जब संस्कार प्रर्याप में स्वयं पात्र बनता है, उसमें यह पात्रता, क्षमता भी आ जाती है कि वह दूसरों को भी पात्र बना सकता है। उसमें नपा-तुला संतुलन आ जाता हैऋ नियंत्रण आ जाता है, कुशलता आ जाती है, सभ्यता आ जाती है और वो संस्कारवान युवा बनकर दूसरों को भी संस्कारित करने में अपना योगदान देने लगता है।
जिस जीवन में ज्ञान की गरिमा होती है, दर्शन की दिव्यता होती है तथा चरित्र की शीतल चोदनी होती है, वही जीवन सूर्य के प्रकाश की भोति जगमगाता रहता है। जो स्वयं भी आलोकित होता है और फिर र्मिशः पहले अपने परिवार, समाज, राज्य, देश एवं फिर विश्व को भी आलोकित करता है।
हमारे देश के युवा उन्नति के पथ पर अग्रसर हों तथा उनमें शिक्षा के साथ-साथ ऐसे संस्कार उत्पन्न हों, जिससे वे परिवार से लेकर विश्व तक की सेवा, मनोयोग से कर सकें।
आज शक्ति और संसाट्टान हासिल करने की अंट्टाी दौड में दीर्घकालिक मानव मूल्य प्रायः सभी देशों में पीछे छूट गए हैं। चारों ओर से श्र=ा पर, आस्था पर, संस्कारों पर प्रहार हो रहे हैं। बु=विलासी तकोङ के आट्टाार पर विकास की दिशा बताकर, आस्था पर चोट की जा रही है। दकियानूसी या परम्परावादी कहकर समाज को हतोत्साहित किया जा रहा है। मशीनी संस्कृति पनप गई है। मानवीय संस्कृति को पाश्चात्य विचार खोखला कर रहे हैं। परिवारों में विघटन, संवेदनहीनता, सवादहीनता बढ रही है। व्यक्तिगत सुखोपभोग की लिप्सा के कारण बुजुगोङ की उपेक्षा हो रही है, जिसके कारण वृ=ाश्रमों की संस्कृति पनप रही है।
आज चारों ओर हिंसा, अशांति, आतंकवाद, लूटपाट, चोरी, बलात्कार और भोगवादी संस्कृति से मानव जीवन त्रस्त है। बेरोजगारी बढ रही है, जिसके आगोश में पढे-लिखे बेरोजगार हैं। आवश्यकताऐ, इच्छाऐ धेपदी के चीर-सी असीमित होती जा रही हैं, जिनकी पूर्ति येन-केन-प्रकारेण किसी भी स्थिति में पूरी करने की चाहत युवाओं को गुमराह करती जा रही है। र्‍ोट्टा अपनी सीमाऐ लोघ रहा है। मर्यादाऐ शर्मसार हो रही है। आज शिक्षा तो है, पर ट्टार्म नहीं है। जब ट्टार्म का पालन नहीं होता, तभी अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार आदि की बेलें पल्लवित होती हैं और जीवन मूल्य होसिए पर खडे नजर आते हैं।
रवीन्ध्नाथ टैगोर ने कहा था, ’’हम युवाओं के मस्तिष्क में सूचनाऐ उंडेल रहे हैं और जीवन मूल्यों, अनुभवों व अट्टयात्म की अवहेलना कर रहे हैं।‘‘
इस प्रकार हम देखते हैं कि आज की शिक्षा संस्कारों का पाठ पढाने में अक्षम होती जा रही है। परिणाम यह हो रहा है कि युवा वर्ग, बडों का सम्मान करना भूलता जा रहा है। वे न तो बडों का सम्मान कर पाते हैं, न ही अपने से छोटों को समुचित स्नेह दे पाते हैं। आज औपचारिक शिक्षा का स्तर जितना बढा है, उतना ही उसमें अन्तर्द्वन्द्व बढ गया है। इसका कारण सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियो हैं, जो महंगाई, बेरोजगारी, समाज में अपने आपको प्रतिष्ठित करना आदि है। इसलिए भी युवा सामाजिक दायित्व पूरी तरह नहीं निभा पाते।
माता-पिता द्वारा दी गई नैतिक सीख उन्हें व्यर्थ प्रतीत होती है। कुंठा और संशय बढ जाने से वे कोई निर्णय नहीं कर पाते और उनके कदम गलत राह की ओर बढ जाते हैं। वे विट्टवंस की बात सोचते हैं। शिक्षित युवा जब द्वन्द्व से तनाव, तनाव से कुंठा व दुश्चिन्ता की स्थिति में पहचता है, तब वह पूर्णतः व्यवस्थित, पूर्ण नियोजित तरीके से आतंकवादी विचारों को इस प्रकार मूार् रूप देता है कि ये गतिविट्टिायो मनुष्य की सेाच से परे होकर, समाज को विट्टवंस की ओर ले जाती हैं। युवाओं में नशे की प्रवृा, लूटपाट, डकैती, हत्याऐ आदि के मूल में कहीं न कहीं रातों-रात ट्टानी बनने की लालसा होती हैं।
आज फैशन और फिजूलखर्ची की दुनिया है। श्रम और ट्टान का दुरुपयोग हो रहा है। ऐसे में रातों-रात ट्टानवान बनने की इच्छा हथेली पर वृक्ष लगाने के समान है। संचार के साट्टानों में ध्ुतगति से हुई र्‍ांति प्राचीन शिक्षा प=ति के समक्ष चुनौती बन गई है। मोबाइल, टी.वी., कम्प्यूटर के सामने घंटों बैठे रहने वाले अकर्मण्य, थुलथुले या कमजोर बच्चे श्रम की महाा को विस्मृत करते जा रहे हैं। उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड रहा है। हमारे घरों में पश्चिमी चकाचौंट्टा और आपाजनक नजारे प्रस्तुत हो रहे हैं, जो बच्चों से उनका बचपन छीनकर उन्हें मानसिक रूप से युवा बना रहे हैं, जिसके कारण उनमें मानसिक व शारीरिक बीमारियो घर करती जा रही हैं, साथ ही वे संसाट्टानों के गुलाम बनते जा रहे हैं। ऐसे युवा आगे जाकर समाज और देश का क्या नेतृत्व करेंगे? इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। ये ऐसे पराभूत लोग होंगे, जिनमें न तो कोई मानवीय ष्मिा होगी और न संवेदना की तरलता। न इनमें कोई मौलिकता होगी और न ही हाथ से काम करने की क्षमता। इसके लिए आवश्यक है - सूचना प्रौद्योगिकी और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बनाकर चलना। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। यही जीवन को गतिशील बनाता है। अतः स्वागत योग्य है लेकिन यह उड्ढेश्यमूलक होना चाहिए।
वर्तमान में स्त्रियो असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु घर से बाहर काम करती हैं। बच्चे नौकर या आया के भरोसे हो जाते हैं, जो उसकी शारीरिक आवश्यकताऐ तो पूरी करते हैं, मो की ममता की पूर्ति नहीं। स्त्री के अभाव में घर, घर नहीं एक ट्टार्मशाला बनकर रह जाता है। इसका कारण है - बिखरते परिवार। संयुक्त परिवार में बालक को दादा-दादी, चाचा-चाची आदि के साथ रहना होता है। इन रिश्तों के साथ उसे मो की कमी महसूस नहीं होती।
आज हम बडों की कध् नहीं कर रहे हैं। उनको वो सम्मान नहीं दे रहे हैं, जिसके हकदार वो हैं। हम अपने पैरों पर खडे हुए नहीं कि मो-बाप बोझ लगने लगते हैं। हमें न जाने क्यों लगता है कि अगर वो हमारे साथ रहेंगे तो हमारी आजादी में खलल डालेंगे, फिर उनकी रोक-टोक, बीमारी आदि में सेवा से बचने के लिए उन्हें वृ=ाश्रम भेज देते हैं। लेकिन हमारे मो-बाप ने हमें पाल-पोस कर बडा करने की बजाय समस्याओं से बचने के लिए हमें अनाथालय भेज दिया होता तो? आज का हर युवा यही प्रश्न स्वयं से करे तो संयुक्त परिवार में रहने से उनकी आट्टाी से अट्टिाक समस्याओं का समाट्टाान हो सकता है तथा उनके बच्चे भी बुजुगोङ के सान्निट्टय में पलकर नैतिक संस्कारों से ओतप्रोत हो सकते हैं।
वैश्वीकरण और प्रतियोगिताओं की दौड के इस युग में जहो तकनीकी शिक्षा नितान्त आवश्यक है, वहीं ऐसी शिक्षा की भी आवश्यकता है, जो एक अच्छे संस्कारवान मानव का, अच्छे नागरिक का, अच्छे समाज का निर्माण करे। जो स्वयं अनुशासित हो। शिक्षकों, अभिभावकों, परिजनों को चाहिए कि वे व्यक्तिगत रूप सेऋ अनेक व्यक्तिगत उदाहरणों के माट्टयम से आत्मा की पवित्रता, करुणा, दया, प्रेम, त्याग, भाईचारा, सच्चाई, ईमानदारी आदि की भावनाऐ, युवाओं में जाग्रत करें।
शिक्षा जीवन का वह संस्कार है, जो युवाओं को आदर्श की ओर ले जाता है। आदर्श, सभ्यता, अनुशासन, विनम्रता आदि शिक्षा की सुन्दरता है। यह जीवन का पवित्र संस्कार है, जो सभी को सर्वप्रथम मो के द्वारा, फिर पारिवारिक परिवेश एवं गुरु द्वारा प्राप्त होता है, जो सभी को मानवतावादी सि=ान्तों पर चलना सिखाता है। र्काव्य, नैतिकता, उदारता, सेवा त्याग और समर्पण आदि सब शिक्षा के संस्कारों का परिणाम है।
आज की युवा पीढी पर यह आरोप निराट्टाार नहीं है कि वे उच्छृंखल और अनुशासनहीन हो रहे हैं। ऐसा क्यों है? कोई भी बालक जन्म से न अच्छा होता है और न ही बुरा। उसका मस्तिष्क कोरे कागज के समान होता है, जिस पर इबारत लिखने का दायित्व माता-पिता, परिवार, परिवेश, शिक्षक आदि को जाता है और यह दायित्व सर्वप्रथम परिवार को निभाना होता है। जिस परिवार का वातावरण अच्छा होता है, बालकों को अच्छे संस्कार मिल जाते हैं। उनकी जडें मन रूपी भूमि में गहराई तक उतर कर सुसंस्कृत युवा रूपी फल प्रदान करती है।
शिक्षक व छात्र के मट्टय अंतःर्याव, मानसिक एवं भावात्मक दोनों स्तरों पर होनी चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से परीक्षोन्मुखी प=ति बनकर रह गई है। यह बौ=क पक्ष पर तो बल देती है, किन्तु समान महव के भावात्मतक पक्ष की उपेक्षा कर देती है। तभी तो ऐसे युवा तैयार हो रहे हैं, जो बौ=क दृष्टि से तो दैत्याकार हैं, परन्तु भावात्मक दृष्टि से बौने हैं। शिक्षित युवा वर्ग में बढ रही आस्थाहीनता, बेचैनी, आर्‍ोश, निराशा आदि इसी असंतुलन का परिणाम है। इसके लिए आवश्यक है - युवाओं की सर्जनात्मकता एवं संवेदनशीलता का विकास।
किसी को भी कुछ सिखाना निस्संदेह एक कठोर परिश्रम है, परन्तु जीवन जीने की कला सिखा देना, अपने आप में बहुत ही महवपूर्ण बात है। मानसिक विकास के लिए मन का एकाग्र होना आवश्यक है। युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहना चाहिए, अट्टिाकारों के प्रति नहीं, क्योंकि कर्तव्य से बढकर कोई अट्टिाकार नहीं होता। कर्तव्य और कर्म ही हमारी पूजा है।
हमारी संस्कृति ’विश्व बंट्टाुत्व और वसुट्टौव कुटुम्बकम्‘ की भावना की प्रतीक है। परन्तु बदलते वातावरण को देखते हुए हमको यह चिन्ता होती है कि हम अपनी संतानों को संस्कारित कैसे करें? उनमें आदर्श संस्कारों का बीजारोपण कैसे करें? हम आज अपनी संतानों को शिक्षित तो कर रहें, पर संस्कारित नहीं।
एक तरफ हम ट्टार्म-ट्टाार्मिकता, राष्टत्र् और राष्टत्रीयता की बात करते हैं। दूसरी ओर हमारे व्यवहारिक जीवन में ट्टार्म और राष्टत्र् के लिए दस मिनट भी नहीं है। हमारी समस्त चेतना पैसों के लिए गिरवी रखी हुई है।
आज प्रत्येक विद्यार्थी को ट्टार्म के आट्टाारभूत तव अवश्यमेव पढाये जाने चाहिए। जिन्होंने उन उच्च तवों को अपने आचरण में उतारा और उन्हें दिग्दिर्शित किया है, ऐसे अपने महान पूर्वजों के जीवन चरित्र उन्हें पढाए जाने चाहिए। प्राथमिक यौगिक र्या ओं के द्वारा उन्हें मनः संयम का ज्ञान दिया जाना चाहिए। साथ ही दैनिक जीवन के तथ्य कि वे जीवन की सभी परीक्षाऐ उाीर्ण कर सकें, सब संकटों से जूझ सकें। परिस्थितियों के सामने हार मानकर बैठे नहीं, उनका सामना करें। भावावेश में आकर आत्महत्या जैसे कदम न उठाऐ। न ही किसी नशे का सहारा लें, बल्कि हर मुश्किल परिस्थिति का मुस्कुराते हुए सामना करने को तत्पर रहें। उत्कृष्ट र्काव्य क्षमता सर्वोपरि है। बालक की ग्रहणशील आयु में उसके मन पर सतत् संस्कारों से यह सत्य अंकित कर दना चाहिए कि र्काव्य सर्वोपरि है।
युवा मन बडा भावुक होता है। वह एक ऐसे साथी की तलाश में रहता है, जो उसकी मनोदशा को बिना कहे समझे, उसे प्यार, अपनत्व, सहारा दे। परिवार के लोग युवाओं के साथ मित्रता का व्यवहार रखते हुए, उसकी मनोदशा का सम्मान करें। दोस्ती से बढकर कोई ऐसा रिश्ता नहीं होता, जिससे सभी मन की बातें कही जा सके। अतः हर गलती से दूर रखने के लिए उन्हें विश्वास में लेकर समझाऐ। भावात्मक स्तर पर उन्हें प्यार दें। उनका मनोविज्ञान समझकर, उनके साथ ऐसा आचरण किया जाए, जिससे वह अपनों को, अपने बेहद करीब समझें।
आज की आपाट्टाापी की जिंदगी में संवादहीनता बढ रही है। बातचीत का सारा समय टी.वी. और मोबाइल ने अपने नाम करवा लिया है। सुख-दुःख बोटने का समय ही किसके पास है। अतः संवाद बनाए रखने का प्रयास करते हुए, उनके विचारों को सही दिशा में मोडने का प्रयास करें। अच्छा साहित्य लिखने व पढने के लिए प्रेरित करें। संवेगों को संतुलित करने का अभ्यास करवाया जाए। स्वाट्टयाय, जिजीविषा, विनम्र व्यवहार और मन की कोमलता, किसी भी हथियार से अट्टिाक शक्तिशाली होते हैं।
युवाओं में वाणी के संस्कार की नींव प्रारम्भ से ही डाली जानी चाहिए। आज घर-बाहर, जहो भी देखें, वाणी के कारण अर्थ का अनर्थ हो रहा है। र्‍ोट्टा वाणी को काबू में रहने नहीं देता, जिसके कारण हर जगह वैमनस्यपूर्ण वातावरण नजर आता है। मार-काट, लडाई-झगडे आदि सभी र्‍ोट्टा की ही संतानें हैं। इस सम्बन्ट्टा में रहीम जी ने बहुत सुन्दर दोहा कहा है -
रहिमन जिव्हा बावरी, कही गई सरग पाताल।
आपहु कहि भीतर गई, जूती खात कपाल।।
इसलिए कहा गया है -
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय।।
अतः वाणी की मट्टाुरता से मनुष्य में विनम्रता, शिष्टता, सक्तदयता आदि सद्गुणों का उदय होता है।
शरीर संस्कार ठीक हो, अर्थात् शरीर की आदतें ठीक हों। शरीर स्फूर्तिवान, स्वस्थ, सशक्त, सजग हो, क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। आशीर्वाद स्वरूप जब बुजुगोङ द्वारा मस्तिष्क को सस्नेह स्पर्श किया जाता है, तो एक असीम स्नेह आनन्द की अनुभूति होती है। स्पर्श की भाषा शाब्दिक नहीं होतीऋ न इसका ट्टवनि प्रन्यास है, न ये कानों से सुनी जाती है, न इसका सस्वर उच्चारण होता है। किन्तु इसका अनुभव, अहसास होता है उसे, जिसे स्पर्श किया जाता है। यह अहसास व्यक्ति में असीम जिार् का, ष्मिा का संचरण करता है।
आत्मविश्वासऋ आपसी संवाद, स्नेह से परिपूर्ण, पारिवारिक वातावरण, संयुक्त परिवार, मित्रतापूर्ण व्यवहार, स्वयं अनुशासन, नियंत्रित आजादी, सही गलत के चुनाव की क्षमता, अच्छे कायोङ के लिए प्रोत्साहित करना व करने पर उनकी पीठ थपथपाना, शाबासी देना, उनके दोषों को न तो नजरअंदाज करना और न ही हर समय हर किसी के सामने उजागर करना इत्यादि बातों का ट्टयान रखते हुए, हम युवाओं को भटकने से रोक सकते हैं।
भविष्य की नींव आज का युवा है। बदलते सांस्कृतिक परिवेश, मानसिक परेशानियो, बढता प्रतियोगी वातावरण, युवाओं को दिग्भ्रमित, दिशाहीन बना रहा है। ऐसे वातावरण में संस्कार ही एक ऐसी मशाल है, जो युवाओं को इन भ्रमित परिस्थितियों में रास्ता दिखा सकती है। संस्कारों की सुरभि से सुगन्ट्टिात हो, तपते तन रूपी मरुप्रदेश को महका सकते हैं।
युवाओं के जिार्वान कंट्टाों पर भविष्य का भार है। आज प्रतिस्पट्टाार्, सूचना एवं संचार र्‍ान्ति का युग है। जीवन स्वयं संघषोङ की परीक्षा है। सफलता के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण होना अत्यन्त आवश्यक है। नकारात्मक दृष्टिकोण जिार् को समाप्त कर देते हैं।
युवाओं के समूह में विराट स्वरूप का बोट्टा होता है, जो सृष्टि के पोच तवों में छुपा है - समुध् में तूफान, वायु में ओट्टाी, अग्नि में दावानल/तेज, मिड्डी में सहनशीलता एवं आकाश में विशालता। सभी कुछ है, युवाओं के अन्दर। आवश्यकता है, इन्हें इन शक्तियों को पहचानने की, इनका सदुपयोग करने की। इन्हें परिवार, समाज एवं राष्टत्र् को अपने होने का प्रमाण देना होगा। सब पवन-पुत्रों को बल और शक्ति का स्मरण कराना होगा।
पवन तनय बल पवन समाना।
का चुप साट्टिा रहो बलवाना।।
इसी प्रकार इनके पास शक्तियो भी असीम हैं - संगठनशक्ति, सहनशक्ति, योगशक्ति, कुण्डलिनीशक्ति, आकर्षणशक्ति, संकल्पशक्ति, शब्दशक्ति, कल्पनाशक्ति आदि। बस आवश्यकता है, इन्हें पहचानने एवं इनका उपयोग करने की।
भारतीय संस्कृति का लक्ष्य - कीचड से कमल की ओर, विरोट्टा से विवेक की ओर, पदार्थ से परमार्थ की ओर जाना है। यहो की संस्कृति अट्टयात्ममूलक है। इसमें उदााता, सहिष्णुता और उदाा विचारों तथा शाश्वत जीवन मूल्यों के दर्शन होते हैं। भारत की महानता का श्रेय इस देश की संस्कृति को ही जाता है।
युवाओं के भीतर जो दुर्बल विचार हैं, उन्हें जड से उखाड फेंकना होगा। दृढ संकल्पों से त्याज्य चीजों, विचारों को छोडकर संस्कारवान जीवन की ओर अग्रसर होना होगा। हजार बार फिसलने पर भी हिम्मत नहीं हारनी है। विजयश्री, निश्चित रूप से उनका वरण करेगी। किसी ने कहा है -
लक्ष्य न ओझल होने पाए
कदम मिलाकर चल
सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी
आज नहीं तो कल.....।