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लघुकथा का स्वरूप-शैली एवं शिल्प से

किशनलाल शर्मा
लघुकथा का इतिहास बहुत पुराना है। छोटी-छोटी कथाऐ/कहानी हर युग में लिखी गई हैं। पूर्व में लिखी गई लघुकथाओंे को, चाहे कालखण्ड कोई रहा हो, लघुकथा नाम नहीं दिया गया। उन्हें जातक कथा, बोट्टा कथा, लोक कथा, नीति कथा, मार्मिक कथा, प्रेरक प्रसंग, दृष्टांत आदि नामों से ही जाना जाता है। जातक कथाऐ, कथा सरित् सागर, पंचतन्त्र, हितोपदेश आदि पौराणिक ग्रंथ लघुकथाओं की मूल्यवान ट्टारोहर है।
’’लघुकथा शब्द का नामकरण बु=नाथ झा ’कैरव‘ ने सन् १९४२ में किया। इससे पूर्व की लघुआकारीय रचनाओं को न तो लघुकथा नाम से जाना जाता था और ना ही लघु कहानी नाम से सम्बोट्टिात किया जाता था।‘‘१ और फिर लघु आकार की रचनाओं को लघुकथा नाम से जाना जाने लगा।
लघुकथा है क्या
’’पर पीडा की पीडा से उत्पन्न अनुभूति जब दिल के तारों को झंझोडती है तब वही अनुभूति लघुकथा को जन्म देती है।‘‘२ दूसरे शब्दों में लघुकथा लेखक के भोगे हुए क्षण की मार्मिक अभिव्यक्ति है।३
लघुकथा आज हिन्दी साहित्य की लोकप्रिय विट्टाा बन चुकी है। पाठक कोई भी पत्रिका हाथ में ले, वह सबसे पहले उसमें से लघुकथा को पढना पसन्द करता है, ऐसा क्यों
’’वैज्ञानिक प्रगति ने जीवन को इतना अट्टिाक गतिशील बना दिया है कि वह अत्यट्टिाक संघर्ष एवं व्यस्तता के घटाघोप से आच्छन्न है-ढका, पूर्णावृत है। फलतः उसकी अभिव्यक्ति अंकुरित होकर संक्षिप्तता की ओर सतत अग्रसर है।४
’’इस संक्षिप्तता का एक कारण और हो सकता है - जीवन की भागदौड और आपाट्टाापी में समय का अभाव।५ जीवनयापन करने के लिए इतनी भागदौड है कि आदमी का जीवन अतिव्यस्त हो गया है और उसके पास समय का नितान्त अभाव है। इसके अलावा एक सबसे बडा कारण और है, टी.वी. और इन्टरनेट। टी.वी. और इन्टरनेट ने भी पठन-पाठन के प्रति रुचि कम की है। आज लोग पढने से ज्यादा टी.वी. या इन्टरनेट देखना पसन्द करते हैं। ये तीनों कारण लघुकथा के लिये वरदान सि= हो रहे हैं। समयाभाव के कारण पाठक लम्बी कहानी/उपन्यास नहीं पढना चाहता। वह छोटी-छोटी सारगर्भित रचनाऐ पढना चाहता है। उसकी इस इच्छा की पूर्ति लघुकथाकार कर रहे हैं। ज्यों-ज्यों भविष्य में मानव जीवन संघर्षपूर्ण होता जायेगा, लघुकथा की लोकप्रियता बढती जायेगी।
केशव प्रसाद वर्मा के शब्दों में शैली के दो प्रकार हैं - प्रसाद शैली और समास शैली। प्रसाद शैली में अतिसाट्टाारण ढंग से सहज-सुगम भाषा में छोटे-छोटे वाक्यों को एक साथ सजाकर रखा जाता है। इससे मानसिक चंचलता और उद्विग्नता की वह वाणी मिलती है, जो पाठक के मर्म को छूकर गुदगुदा देती है। यही शैली लघुकथा के लिये उपयुक्त होती है। समास शैली द्वारा कठिन शब्दों में मिश्र एवं जटिल वाक्यों से भाषा तो दुरूह होती ही है, लेखक के भाव एवं विचार वाग्जाल में उलझकर कौडी के तीन हो जाते हैं। अतः यह लघुकथा के लिये उपयोगी नहीं हो सकती।
लघुकथा का शिल्प ः ’’किसी रचना को प्रस्तुत करने के ढंग अथवा तकनीक के लिये शिल्प का प्रयोग किया जाता है, शिल्प वह कारीगरी है जो रचनाकार की सूझबूझ से मूार् होती है।६ कोई भी लघुकथा तभी लघुकथा मानी जायेगी, जब उसमें लघुकथा के तव मौजूद हों।
लघुकथा का स्वरूप बनाये रखने के लिये लघुकथा में प्रमुखतः निम्न गुण/विशेषताओं का होना अति आवश्यक है।
कथानक ः यह लघुकथा की आट्टाारशिला है। इसमें जीवन का कोई एक अविस्मरणीय क्षण, र्या कलाप या मार्मिक विचार बीज रूप में होता है, जिसको कथाकार सजग कल्पना से रोचक बनाकर लघुकथा का रूप देता है।७
संक्षिप्तता ः यह लघुकथा की आत्मा है, जो कथाकार के शिल्प विट्टाान को सरल बनाती है। लघुकथा ने अपनी लघुता के कारण ही अपनी संज्ञा ग्रहण की है। इसकी यह लघुता उसके कथानक के सहारे लाई जा सकती है। इसके संवाद, अर्न्तद्वन्द्व, वर्णन एवं कथ्य अल्प होकर भी कथा का रूप ग्रहण किये रहते हैं।८
लघुकथा की शब्द सीमा निट्टाार्रित नहीं है। यह रचनाकार पर निर्भर है कि वह कितने कम से कम शब्दों में लघुकथा लिख सकता है।
संवेदनशीलता ः आकार में लघु होते हुए भी भाव इसमें ऐसे व्यंग्यात्मक ढंग से अभिव्यक्त होते हैं, जो पाठक के मर्म को छेद देते हैं। इस तथ्य का निर्वाह केवल कथ्य में संवेदन को केन्ध् बिन्दु मानकर ही किया जा सकता है। यह संवेदन लघुकथा की प्राणवायु है।९
सम्प्रेषणीयता ः दिल से निकली अपनी बात में ज्यादा असर होता है। लेखक अपनी क्षमता अनुसार अपनी बात को पाठक के क्तदय तक पहचाने का प्रयास करता है। यह सम्प्रेषणीयता ही लघुकथा की जान है। यही गुण पाठक को विचार मग्न कर देता है। अब चाहे वह गुलाब की खुशबू का अहसास हो अथवा उसके कोटे की चुभन का।१०
स्वाभाविकता / सत्यता ः लघुकथा में बनावटीपन को कोई स्थान नहीं है।११ कपोल कल्पना कथा शिल्प को बिगाडकर रख देती है। किसी क्षणिक सत्य का उद्घाटन ही कथा को प्राणबल प्रदान करता है, जिससे लघुकथा सर्वग्राह्म बन जाती है।१२
गम्भीरता ः कथावस्तु की गम्भीरता से ही लघुकथा वजनदार बन पाती है। लघुकथा की गम्भीरता से ही गागर में सागर भरने की कला समाहित होती है।१३
बोट्टागम्यता / रोचकता ः लघुकथा ऐसी होनी चाहिए जो प्रथम वाक्य से ही पाठक को बोट्टा ले। पाठक लघुकथा पढते समय उसमें ख जाये और उस कथा को अपनी समझकर उसके साथ-साथ आगे बढने लगे। घटना प्रवाह के साथ पाठक की उत्सुकता, लघुकथा को रोचक बनाती है।१४
मौलिकता ः मौलिकता ही लघुकथा को श्रेष्ठता प्रदान करती है।१५ लेखक को मौलिक लेखन ही करना चाहिये। मौलिक लघुकथाऐ ही पाठक द्वारा पसन्द की जाती हैं।
उड्ढेश्य ः लघुकथा का मूल उड्ढेश्य पाठक के मन को झकझोरना तो होता ही है, किन्तु उसके क्तदय की उदाा अनुभूतियों को जाग्रत करना भी है। इसके लिये उसमें घटना को स्थान न देकर परिस्थितियों का ही परिचित्रण होना चाहिये।१६
चरम स्थिति ः यह लघुकथा के कथ्य का वह स्थल है, जहो पहच कर पाठक के मन की कौतूहलता पराकाष्ठा को छू लेती है।१७
व्यंग्यात्मकता ः लघुकथा में अगर दाल में नमक के बराबर व्यंग्य का पुट डाल दिया जाए, तो लघुकथा में जान पड जाती हैं। व्यंग्य एक ऐसा बाण है, जो हमारे समाज की विध्ूपताओं, शोषण, अन्याय, विसंगतियों, पीडा, आतंक, अत्याचार, भ्रष्टाचार, ट्टार्मान्ट्टाता आदि ज्वलंत मुड्ढों पर प्रहार करने में सक्षम है। इसलिये जहो तक सम्भव हो लघुकथा को हल्के-फुल्के व्यंग्य से सशक्त करना ही चाहिये।१८
शीर्षक ः लघुकथा का यह एक ऐसा गुम्बज है, जिसके अवलोकन मात्र से ही उसके प्रति आकर्षण हो जाता है। अतः शीर्षक कथ्य की भाषानुकूल, सरल, भावपूर्ण, संक्षिप्त एवं प्रतीकात्मक होना चाहिये, जिससे लघुकथा के उड्ढेश्य की झलक मिल जाये।१९
वर्तमान में जो लघुकथाऐ लिखी जा रही हैं, उनमें शैली एवं शिल्प का ट्टयान रखा जा रहा है। परन्तु यह कोई ऐसा व्याकरण नहीं है, जिससे बेट्टाकर ही कथाकार को अपनी लघुकथा की रचना करनी चाहिये। यह जरूर है कि यदि कथाकार शैली एवं शिल्प को ट्टयान में रखे, तो लघुकथा सार्थक होगी। उसका स्वरूप बना रहेगा और वह पाठक पर अपना प्रभाव छोडने में पूर्णतया सक्षम होगी।
सन्दर्भ ः
१. लघुकथा-शैली एवं शिल्प ;आलेखद्ध। केशव प्रसाद वर्मा - सानुबन्ट्टा, जुलाई १९९४ का अंक, पृष्ठ ५८;४,५द्ध, ५९;६,७,८,९,१२द्ध, ६२;१६,१७,१९द्ध।
२. लघुकथा लेखन सार्थक पहल है। ;आलेखद्ध मोह. मुइनुड्ढीन अतहर - मुखौटों के पार ;लघुकथा संग्रहद्ध, प्रथम संस्करण २०१३, पृष्ठ १२ ;१०,११,१३द्ध, १३;१४,१५,१८द्ध।
३. हिन्दी लघुकथा-एक वर्गीकरण ;आलेखद्ध। डॉ. रामकुमार घोटड-लहर और लहर ;लघुकथा संकलनद्ध, सम्पादन अंजीम अंजुम, प्रथम संस्करण, पृष्ठ १०;१द्ध।
४. दो शब्द ;आलेखद्ध डॉ. स्वर्ण किरन - दृष्टि ;लघुकथा संग्रहद्ध, मोह. मुइनुड्ढीन अतहर - प्रथम संस्करण २००९, पृष्ठ ५;३द्ध।
५. लघुकथा-आज की आवश्यकता ;आलेखद्ध। डॉ. मोह. मुइनुड्ढीन अतहर - दृष्टि ;लघुकथा संग्रहद्ध, डॉ. मोह. मुइनुड्ढीन अतहर, प्रथम संस्करण २००९, पृष्ठ ९;२द्ध।