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क्यों नहीं हो पाया हिन्दी का मानकीकरण*

देवर्षि कलानाथ शास्त्री
हिन्दी वर्तनी के मानकीकरण का इतिहास एक सदी पार कर चुका है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ से हिन्दी के विद्वान् ऐसे प्रश्नों से जूझ रहे थे कि ’राम ने‘ लिखें या राम ने, उसने लिखें या उस ने। पत्रकारिता ने उस समय इस बिन्दु को एक अभियान बना दिया था। कुछ विद्वान् कुछ ठोस तकोङ पर विभक्ति-चिँों को सटाकर लिखने के पक्षट्टार थे, जिनमें प्रसि= पत्रकार देउसकर और विद्वान् गोविन्दनारायण मिश्र प्रमुख थे। इन्हें ’सटा‘ कहा जाने लगा था, अन्य हटाकर लिखने के पक्षट्टार थे जिन्हें ’हटा‘ या ’बटा‘ कहा जाता था। अब चलन ने यह स्थापित कर दिया है कि संज्ञाओं से तो विभक्ति चिँ हटाकर लिखे जाऐ और सर्वनामों से सटाकर। सभी विद्वान्, प्रेस, पत्र-पत्रिकाऐ इसे मानक मान रहे हैं पर यह भी बहुमत मानक ही है, सर्वसम्मत नहीं। ’कल्याण‘ आदि कुछ पत्र पहले से ही सभी में विभक्ति चिँ सटाकर लिखते रहे हैं, अब भी वैसा ही कर रहे हैं।
हिंदी को हिन्दी लिखो या हिंदी, अंतःकरण या अन्तःकरण, द्वार लिखो, या ’द्वार‘, ’निर्णय लिये गये‘ या ’लिए गए‘ - इन पर भी सर्वसम्मति नहीं हो पाई है। वैसे उसकी अनिवार्यता भी क्या है? दोनों रूप चलते रहें तो बहुत बडा खतरा है क्या? फिर भी छात्रों के लिए, टाइपिस्टों के लिए, प्रूफशोट्टाकों के लिए कभी-कभी इस बात की आवश्यकता महसूस होती है कि ’एक मानक‘ का सि=ान्त बतलाया जा सके। केन्धीय हिन्दी निदेशालय ने ऐसा प्रयत्न किया भी है जिसका अट्टिाकांशतः अनुसरण हो रहा है, पर पूर्णतः नहीं। कुछ बिन्दु नमूने के रूप में प्रस्तुत हैं।
निदेश जारी हुए - वैसे हिन्दी में संस्कृनिष्ठ शब्दों को किस प्रकार लिखा जाए, उसका व्याकरणसम्मत रूप क्या है, विभक्तियों को सटाकर लिखा जाए या हटा कर, ऐसे जो प्रश्न २०वीं सदी के प्रारम्भ से हिन्दी के विद्वानों को झकझोरते रहे हैं, उन पर अनेक ग्रंथ लिखे भी जा चुके हैं। विद्वत्समितियों ने सर्वसम्मति के प्रयास भी किये हैं। लिपि सुट्टाार तथा वर्तनी की एकरूपता के लिए लखन में विद्वानों की समितियों ने ;उार प्रदेश सरकार के तवावट्टाान मेंद्ध बहुत पहले से विचार किया है। शिक्षा मंत्रालय के तवावट्टाान में विशेषज्ञ समितियों ने भी इन प्रश्नों पर विचार किया, जिसके फलस्वरूप केन्धीय हिन्दी निदेशालय ने इस पर एक निदेशावली निकाली। उन सबके सारे इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं। सर्वप्रथम सन् १९०५ में नागरी प्रचारिणी सभा ने विद्वानों को इसी प्रकार के मानकीकरण के लिए एकत्र किया था, १९४७, १९५३ व १९५७ में उार प्रदेश ने, फिर १९६२ में भारत सरकार ने।
विमर्श का इतिहास ः हिन्दी व्याकरण के मानक स्वरूप की कमी भी बहुत पहले से विद्वानों को अखर रही थी। इसी दृष्टि से पं. कामता प्रसाद गुरु से नागरी प्रचारिणी सभा ने हिन्दी का व्याकरण लिखवाया था, जो मिस्टर केन्लॉग के अंग्रेजी में लिखे हिन्दी व्याकरण से प्रभावित था। वह बहुत श्रम से लिखा गया था और एक समिति की मुहर भी उस पर लग गई थी। किन्तु उसकी अनेक खामियो वषोङ तक उसी प्रकार बताई जाती रहीं, जिस प्रकार नागरी प्रचारिणी के ’बृहत् हिन्दी शब्द सागर‘ की। पं. किशोरीदास वाजपेयी उसके आलोचकों में प्रमुख थे। वाजपेयी जी की उद्भट प्रतिभा, पैनी समीक्षा दृष्टि और हिन्दी की आत्मा की पहचान बहुत से विद्वानों को प्रभावित कर गई थी। इनमें पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, राहुल सांकृत्यायन, डॉ. अमरनाथ झा आदि अनेक मूर्ट्टान्य विचारक थे। नागरी प्रचारिणी सभा ने वाजपेयी जी से हिन्दी के चलन और व्याकरण की शु= को देखते हुए हिन्दी के सही रूप पर व्याकरण लिखवाया, जिसके फलस्वरूप ’हिन्दी शब्दानुशासन‘ प्रकाशित हुआ। स्वयं वाजपेयी जी ने एक छोटी पुस्तक ’हिन्दी शब्द मीमांसा‘ प्रकाशित कराई थी, जिसमें व्याकरण की गुत्थियों के अलावा ऐसे चुटीले प्रश्नों पर विवेचन भी था कि ’चाहिये‘ सही है या चाहिए। दुहरा सही है या दोहरा। ’आपकी इच्छानुसार‘ सही है या ’आफ इच्छानुसार‘। उनकी दृष्टि संतुलित थी। हिन्दी के चलन को उन्होंने सर्वाट्टिाक महव दिया था और ओख मींचकर संस्कृत व्याकरण की लकीर पीटने का विरोट्टा किया था। संस्कृत वाले ’लोक एकत्रित हुए‘ जैसे वाक्यों को अशु= कहते थे, ’एकत्र हुए‘ लिखते थे। वाजपेयी जी ने एकत्रित को ’तत्रत्य‘ की तरह व्याकरण से सही माना और हिन्दी के चलन के मुताबिक बतलाया। वे हिन्दी के चलन के हिसाब से उपरोक्त को भी सही मानते हैं जैसे कि ’उपरांत‘ सही है। चलन के नाम पर ही उन्होंने ’संसद सदस्य‘ को ठीक माना था जबकि संस्कृत समास के हिसाब से ’संसत् सदस्य‘ होना चाहिए। जिस प्रकार मनोकामना और मूसलाट्टाार शब्द हिन्दी के चलन में सही हैं ;संस्कृत के हिसाब से मनःकामना और मूसलट्टाारद्ध। उसी प्रकार चार सूत्री कार्यर्मब ;चतुःसूत्री नहींद्ध गौसेवा, नेतानिवास ;नेतृनिवास नहींद्ध इकतरफा, पचमेल, अठपहलू आदि हिन्दी की प्रकृति ने अपना लिए हैं। उनके अनुसार तुम विद्वान होओ यही आशीर्वाद देना उचित है, ’तुम विद्वान, हो‘ का अर्थ दूसरा होता है। कपडे ट्टाोओ क्यों सही है और लडकियो गई थीं में अनुस्वार केवल थी में क्यों पर्याप्त है, इन सबमें उन्होंने तर्कपूर्ण प=ति बतलाते हुए अच्छा विवेचन किया था। उनका कहना था कि ’मुझे किताबें नहीं पढनीं‘ में नी के पिर अनुस्वार होना जरूरी है किन्तु, मुझे किताबें पढनी थीं में थीं के पिर अनुस्वार पर्याप्त है क्योंकि सहायक र्यािओं में अन्तिम स्वर पर अनुस्वार बहुत्व का सूचक हो जाता है। उन्होंने ही गये, चाहिये व आये आदि में ये को गलत बताकर ए को सही बताया था जैसे ग्रंथ लिए, किताबें लीं, बातें कीं ;करीं नहींद्ध इन सबमें ई ही र्यां पद का अंग होता है यी नहीं। श्रुतिमूलकता के आट्टाार पर ऐसे स्थानों में स्वर की वर्तनी को ही केन्ध् सरकार ने भी मानक माना है। भाषण देना ’स्पीच डिलिवर‘ करने की अंग्रेजी नकल पर चला है किन्तु वाजपेयी जी ने तो भाषण देना को सही करार दिया था। क्योंकि भाषण करने का मतलब होता है बातचीत करना और भाषण देना का मतलब है अनौपचारिक स्पीच देना। वे तो ’ट्टान्यवाद देना‘ को भी चलन के कारण सही बतलाते हैं। ठीक भी है, चलन पर गहरी दृष्टि रखते हुए ही व्याकरण लिखा जा सकता है। उसमें बडी बारीकी से यह विचार करना होता है कि कौन सा चलन और किस प्रकार का चलन प्रामाणिक माना जाए। उसमें केवल यही कसौटी रखी जानी चाहिए कि कोई शब्द व्याकरण से अशु= है किन्तु चलन में है तो वह अवश्य मान्य माना जाएगा बशर्ते व्याकरणसम्मत शु= रूप चलन में बिल्कुल न रहा हो। इसमें केवल ऐसे ही अपवाद रह सकते हैं जैसे उपर्युक्त भी चल रहा है, जो संस्कृतनिष्ठ शब्द के रूप में सही है किन्तु उपरोक्त भी तद्भव शब्द के रूप में सही है।
वाजपेयी जी की पैनी दृष्टि से विभक्तियों को सटाकर लिखने की बजाय हटाकर लिखने का मार्ग ही उपयुक्त पाया था। उनके सभी तकोङ को परवर्ती पीढी ने भी मान्यता दी और भारत सरकार ने भी। पर उनका भी एक प्रयोग चलन और विद्वत्-समाज द्वारा नहीं अपनाया जा सका। वह था ’होगा‘, ’चलेगा‘ आदि में ’गा‘ को अलग लिखना। तर्क की दृष्टि से तो यही सही था कि रहा है, गया था आदि में है, था आदि काल सूचक परसगोङ को जैसे अलग लिखा जाता है वैसे भविष्य सूचक गा को भी अलग ही लिखा जाए। ’जाए गा‘ आदि में ऐसा लिखना ही पडता है, किन्तु चलन ने होगा, होगी आदि को एक साथ लिखना ही स्वीकार किया। हमारे ट्टयान में उनकी केवल एक यही बात नहीं अपनाई गई, बाकी सभी सटीक बैठी हैं। आशय यह कि उनका मार्ग भी पूर्णतः सर्वसम्मत नहीं हो पाया, चाहे उसके अट्टिाकांश बिन्दु चलन ने अपना लिये हों।
समस्याऐ ः इस सबके बाद केन्धीय हिन्दी निदेशालय ने मानक वर्तनी पर एक अनुदेशावली निकाली, जिससे यह प्रत्याशा थी कि वह पूरे देश में सर्वसम्मत हो सकेगी और अट्टिाकांशतः ऐसा हुआ भी। किन्तु उसके भी दो तीन बिन्दु ऐसे अटपटे से रहे, जिन्हें चलन ने स्वीकार नहीं किया। शेष बिन्दु पूर्णतः सटीक थे और उन्हें सर्वत्र सभी ने अपनाया भी है। इस प्रसंग में दो बातें उल्लेखनीय हैं। एक तो भारत सरकार ने विद्या, बु=, विद्वान इन शब्दों के तीनों संयुक्ताक्षरों में द्य, =, द्व को मानक लिपि से बाहर और संस्कृत के चलन के मानते हुए यह फतवा दे दिया था कि इनमें द् को हलंत करके ही संयुक्ताक्षर लिखा जाए जैसे विद्या, बुद्ट्टिा, विद्वान आदि। ’खडी पाई वाले अक्षरों में खडी पाई हटाकर संयुक्ताक्षर बनाया जाऐ किन्तु जहो खडी पाई नहीं है, उन अक्षरों में हलंत लगाकर ही संयुक्ताक्षर बनाया जाए‘, इस सि=ान्त के हिसाब से तो यह प्रर्यात सही थी किन्तु हिन्दी में द्य, =, द्व ये अक्षर इतने अट्टिाक आते हैं कि ’उसके द्वारा‘, द्वंद्व आदि शब्दों में हलंत लिखना कितना अटपटा लगता है, यह आप स्वयं देख सकते हैं। ’द्वारा‘ शब्द तो इन दिनों सरकारी इबारतों में बहुत आने लगा है। इसलिए सरकारी अनुदेशों के बावजूद ये संयुक्ताक्षर चलते रहे, हलन्त लगाकर लिखने की बात चलन ने नहीं मानी। उस समय ये संयुक्ताक्षर हिन्दी टाइपराइटर के कुंजी पटल में नहीं थे। शायद भारत सरकार के हलन्त लगाकर लिखने के अनुदेश का यह भी एक कारण रहा हो किन्तु बाद में इन्हें कुंजी पटल में लेना पडा। अच्छा हो अब सरकारी अनुदेशों में भी ऐसा परिवर्तन कर दिया जाए। आज इन्हें त्र, ज्ञ और श्र की तरह अलग से संयुक्ताक्षर मानने में न तो कोई असुविट्टाा है न अनौचित्य। इससे सुविट्टाा ही बढेगी। १९५७ के लखन सम्मेलन में भी विद्वानों ने द्य आदि अक्षरों को अलग से उसी प्रकार लिखे जाने का विकल्प स्वीकृत किया था। चलन ने उस पर अब मुहर भी लगा दी है।
इसी प्रकार का एक अनुदेश था पंचमाक्षर के संयोग से संयुक्ताक्षर बनाने की बजाय अनुस्वार लगाना। हिंदी, संपादक आदि में अनुस्वार लगाकर लिखने का उनका यह निर्णय चलन ने नहीं माना। हिन्दी, नन्दन, सम्पादक, अन्त, केन्ध् सबमें आट्टाा न और आट्टाा म लिखा जा रहा है। इसका कारण हिन्दी की प्रकृति ही है। गंगा, चंचल, घंटा आदि में आट्टाा - ;ग*ाद्ध, फ्ा ;चफ्चलद्ध, ण ;घण्टाद्ध लिखने का चलन तो संस्कृत में ही है। अतः हिन्दी ने इन पंचमाक्षरों को अनुस्वार के रूप में ही अपनाया है किन्तु आट्टो न और आट्टो म से लिखने का चलन हिन्दी में उसका अपना है। इसलिए उसे नकारना सम्भव नहीं रहा। एक ही सि=ान्त सर्वत्र लागू करने के लिहाज से चाहे वह सही बैठता हो। वैसे एक ही लाठी से सारी भैंसे नहीं होकी जा सकतीं। चलन अपवाद ज्यादा कर देता है। पं. किशोरीदास वाजपेयी ने तो विस्तार से यह प्रतिपादित किया था कि नन्दन, सम्पादन आदि में आट्टाा न और म लिखना ही हिन्दी के हिसाब से ठीक है जबकि गंगा, चंचल, घंटा आदि में अनुस्वार लिखना। शायद इसीलिए केन्धीय हिन्दी निदेशालय के लिपि मानकीकरण अनुदेशों का यह बिन्दु चल नहीं पाया। वह अपने आपको केंधीय हिंदी निदेशालय अवश्य लिखता रहा पर लोग केन्ध्, हिन्दी, अन्त, सम्पादक ही लिख रहे हैं। अच्छा हो इसमें भी परिवर्तन कर दिया जाए, जिससे यह कहा जा सके कि अब एक ऐसा मानकीकरण हो गया है जो सर्वसम्मत है।