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भाखा के भेद में कवि

सुशोभित शक्तावत
पूर में बही छतरियो
जो मेंह की ढाल थीं
मेंह के भीतर ही बना लेती हैं घर
कटहल के लदे-झुके गाछ
छींक भर तुहिन के नहान में।
पर अपना कहो पे ठौर
पाखी का नीड पोख भर
उडान की अपठित स्वरलिपि में
दाडिम का उस ललाई में
भोर का नभ जिससे लजाता है
तृण का पवन के परस में।
पर अपना कहो वे ठौर
कागद गंध के वन में रहता है
धान की लहर में भिनसार।
बैंजनी की धूजती लपट में रहता है धनक
एकादशी के शयन में देव।
पर अपना कहो पे ठौर
देह बसी है रुधिर के राग में
भाखा के भेद में कवि
सुख की परतीत में मृत्यु
बरगद के कोटर में बसता है ब्र॰ा का मन
जहो चींटियों के अन्न का कोठार।
पर अपना कहीं ना ठौर।