fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

चिठ्ठी-पत्री

सम्पादक जी,
हर अंक की तरह मधुमती‘ का अक्टूबर २०१८ अंक भी प्रभावी है। कलानाथ शास्त्री का भाषा-चिंतन हर बार की तरह जानकारीपरक है। सम्पादकीय में रचना प्रर्यान के सोपानों पर विचार भी सुन्दर लगे। अम्बिका दा, राम जैसवाल व राजकुमार कुम्भज की कविताऐ अच्छी लगीं। पूर्णिमा जायसवाल व सैयद मुनव्वर अली की गजलों म कुछ चमकदार शेर पढने को मिले। कहानियो भी स्तरीय हैं। बट्टााई, श्रेष्ठ सम्पादन के लिए।
- दिनेश सिंदल, जोट्टापुर
’मट्टाुमती‘ का हर अंक उत्कृष्ट होता है, परन्तु अक्टूबर २०१८ का अंक संग्रहणीय, रोचक एवं पठनीय अंक बन पडा है। इसका आवरण-चित्र चिा को आकर्षित करता है। कहानी ’परछाई‘ पढकर भावुक हो गया। शब्दों का चयन, भाषा की कसावट और वाक्यों का एक-दूसरे से सरलतापूर्वक जुडते जाना प्रशंसनीय है। प्रस्तुत कहानी पाठक को आद्योपांत पढने के लिए बाट्टय करती है। अद्भुत कथानक है, इस कहानी का। इस हेतु कहानी की लेखिका ममता पानेरी को बट्टााई। आने वाले समय में ममता जी आसमान में काफी ेचे तक उडान भरेंगी।
- रघुराज सिंह कर्मयोगी, कोटा
शास्त्रों के अनुसार ट्टार्मसाट्टाना किंवा कर्मसाट्टाना ’शास्त्रमत‘ है, किन्तु यह लोकसमर्थित होनी चाहिए। लोक-मर्यादा और लोकशासन के लिए लोकमत आवश्यक है। इससे ही सम्बन्ट्टिात लोकसाहित्य पर ’मट्टाुमती‘ के अक्टूबर २०१८ के अंक में श्रीभगवान सिंह ने ’साहित्य बनाम लोकसाहित्य‘ शीर्षक से बहुत ही उपयुक्त एवं विशद विवेचन प्रस्तुत किया है, एतदर्थ लेखक महोदय ट्टान्यवाद के योग्य हैं। कलानाथ जी का ’भाषा-चिंतन‘ पर जो शु=तापरक चिंतन प्रस्तुत किया जा रहा है, एक स्तुत्य प्रयास है। इससे त्रुटियों का संशोट्टान होकर परिमार्जित रचनाऐ सम्मुख आ सकेंगी। सम्पादकीय के अन्तर्गत ’अर्जन-सर्जन और विसर्जन‘ का काव्यहेतुओं से सुष्ठु सामंजस्य स्थापित करना बहुत अच्छा लगा। आचार्य रूध्ट प्रतिभा के स्थान पर ’शक्ति‘ को काव्य का प्रट्टाान हेतु मानते हैं। एकाग्रचिा होने पर अथोङ का अनेक प्रकार से विस्फुरण होता है तथा कमनीय पद स्वयं कवि के सामने प्रतिभासित होते हैं। जिसके द्वारा यह अपूर्ण घटना घटित होती है, उसी का नाम शक्ति है। काव्य मीमांसाकार राजशेखर भी इस शक्ति को ही अट्टिाक महव देते हैं।
- गोपीनाथ पारीक ’गोपेश‘, जयपुर
’मट्टाुमती‘ का अक्टूबर २०१८ अंक मिला। बहुत ही अच्छा लगा, पूरा पढे बिना नहीं छोड पाई। सभी कहानियो, कविताऐ, आलेख बहुत ही उच्च कोटि के हैं। तत्पुरुष जी का सम्पादकीय रचना की कवि के मन से पाठक या श्रोता तक की यात्रा को बहुत स्पष्ट करता है, वहीं हेमन्त शेष जी की कृष्ण बलदेव वैद की बातचीत युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित करती है। पूरा अंक बहुत ही उत्कृष्ट बन पडा है। पत्रिका की छपाई व गेट-अप भी सुन्दर है, सम्पादक जी व सम्पादन मण्डल की पूरी टीम को बट्टाई।
- पूर्णिमा जायसवाल, जोधपुर