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रोशनी की गजल

श्यामसुन्दर भारती
अपने सद्यः प्रकाशित गजल संग्रह ’रोशनी की गजल‘ लेकर लब्ट्टाप्रतिष्ठित गजलकार दिनेश हमारे सामने हैं। दिनेश की गजलों पर बात करना इसलिए भी अच्छा लगता है कि उनके कहने का लहजा कुछ हटकर है। अगर मैं यह कह कि गजल को बाजारू प्रलोभनों और सस्ती लोकप्रियता के लोभ से बचाकर उसे यथार्थ और विश्वसनीयता के ट्टारातल पर स्थापित करने की जड्ढोजहद इन गजलों को वैशिष्ट्य और यकताई अता करती है, तो कोई ज्यादती नहीं होगी। यह कि ये गजलें किसी समसामयिक वाद, ट्टाारा या तात्कालिक आंदोलन से शाणित-प्रभावित होकर अपने हथियार-औजार तेज नहीं करती, वरन् जीवन के यथार्थ और उसके नशेबो-फराज में इजाफा भी यकीनन हो जाता है। यानी ये गजलें जनजीवन की वास्तविक कठिनाइयों में गहरे उतर कर उन कार्य-कारण तथ्यों की जडों को तलाशती प्रतीत होती हैं। यही कारण है कि इनके अश्आर मन की गहराई तक उतरते हैं। एक शेर देखिए*-
गर रहगा तो रहगा रोशनी के साथ मैं
सूर्य का ये दंभ संट्टया के बिछौने तक गया
कोई दंभ सर्वकालिक नहीं रहता, फिर चाहे वह सूर्य जैसे चमकते नक्षत्र का ही क्यों न हो। जो उदय होगा वह अस्त भी होगा। यह प्रकृति का अटल सत्य भी है और नियम भी और अगर तुलना करें तो यही मानव जीवन का सत्य भी है। उजाले का वैभव बहुत देर तक नहीं रहता। रोशनी के साथ ही रहगा यह भ्रम अन्ततः टूटता है, टूटता ही है। असल में दिनेश की गजलें इंसान और इंसानियत की पुरजोर हिमायत करती हैं। यही बात इन गजलों का आत्म-तव है। यह मात्र संयोग नहीं समझना चाहिए कि आज के त्रासद और भयावह समय में ये गजलें हर उस विचार का प्रतिरोट्टा और प्रतिकार करती हैं, जो मनुष्य और मानवता के मुखालिफ खडी हैं। इतना ही नहीं, अपने वर्तमान से जूझते-टकराते हुए भी शायर मनुष्य और मनुष्यता के लिए अनिवार्य प्यार-मुहब्बत की बात करता है तो सिर्फ इसलिए कि वह शिफा जीवन की प्राणवायु है। सम्भवतः प्रेम ही वह शक्ति है, जो जीवन को उसकी विषम परिस्थिति से उबार सकता है -
आदमी है तो प्यार हो जाना
जंदगी का “श्रृंगार” हो जाना
प्यार के दय्तरों की तरह
हम थे पूजा घरों की तरह
नाम तेरे ये जन्दगी निकली
फिर मेरे लब से शायरी निकली
दिनेश की गजलों बाबत नूर मुहम्मद ’नूर‘ का यह बयान कि - ’मनुष्य और उसके सम्पूर्ण जीवन का एक समग्र पर्यावरण इन गजलों में मौजूद है। प्रकृति बार-बार इनमें नमूदार होती है।‘ इसी र्मज में स्वयं दिनेश सिंदल का कथन - ’अब गजल का स्वरूप साफ हो गया है। इसमें समकालीन कविता के जटिल विषयों को अपनी सांकेतिकता, प्रभावोत्पादकता, भाषा की सरलता ने सहज बना दिया है। हिन्दी और उर्दू की काव्य-संस्कृतियों के मिलने पर जिस एक नयी भाषा का निर्माण हुआ है, नयी संवेदना का निर्माण हुआ है, या य कि मानव संवेदना का विस्तार हुआ है, वही भाषा, वही संवेदना गजल की भाषा बनी।‘ इन सब स्थापनाओं-प्रस्थापनाओं का लब्बोलुबाब यह है कि आज की गजल अपने एक अर्थ में हरिण के बच्चे के क्तदय की चीख से निकली कराह की तरह घोर त्रासद परिस्थितियों वाले समय के क्तदय की करुण कराह है। दिनेश की गजलें और शे‘र इसके जामिन हैं -
रोजगारी दय्तरों में अर्जयो पहने हुए
ये युवा नंगा खडा है डिग्रियो पहने हुए
तेरी सूखी रोटी से ही बनते हैं
उनके छप्पन भोग कभी तुमने सोचा
साथ सबके ह पर सवाली ह
इस व्यवस्था पे एक गाली ह
सफर क्या कर सकेगा वो भला फिर आस्मानों का
अगर पिंजरे में पंछी कोई दाना ढढ लेता है
दिनेश की गजलों के गुलदस्ते में रंग-बिरंगे फूल ही नहीं, गुदगुदी की चुभन पोवों तक ही नहीं, बल्कि दिलों तक को बींट्टाने वाले जहरीले कोटे भी हैं, और यही विविट्टाता, यही यकताई, यही विशेषता इन गजलों की ताकत है।
रोशनी की गजल ;गजल संग्रहद्ध/दिनेश सिंदल/ झिलमिल प्रकाशन, जोट्टापुर ;राज.द्ध/मूल्य २०० रुपये
गौरी
’साहित्य समाज का दर्पण है‘, इस उक्ति या स्थापना को अगर परखना हो तो हमें उस साहित्य से गुजरना होगा, जो विशेषकर सामाजिक सत्य को केन्ध् में रखकर रचा गया हो। तो क्या सामाजिक सत्य से परे भी कोई साहित्य होता है? होता है। मनोरंजन और काल्पनिक जासूसी उपन्यास ऐसे ही होते हैं, लेकिन इनसे विपरीत उड्ढेश्यपरक सृजन का अपना महव होता है, जो लक्ष्य के अनुसार सृजित किया जाता है। अन्य विट्टााओं की अपेक्षा उपन्यास इस हेतु अट्टिाक कारगर होते हैं। फिर चाहे वह समस्या राजनैतिक हो, ट्टाार्मिक हो या सामाजिक हो। उपन्यास विट्टाा अपने विस्तृत फलक पर इसका सांगोपांग वर्णन और सटीक विश्लेषण करने की क्षमता रखती है।
और असंगत मान्यताओं-रिवाजों को हमारे सामने बहुत साफगोई और ईमानदारी के साथ रखता है। उपन्यास की नायिका गौरी के बहाने मुस्लिम समाज की वास्तविक तस्वीर को इतनी सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया गया है, कि इसके लिए लेखक के साहस और उसकी ईमानदारी की प्रशंसा की जानी चाहिए।
य्लेप पर अमीर अहमद ’सुमन‘ की यह टीप कि ’आज का दौर एक अजीब अवस्था से गुजर रहा है। चारों ओर अट्टाकचरा ज्ञान, भ्रांतियों की भरमार, सामाजिक व ट्टाार्मिक सरोकारों का व्यापारीकरण, भौतिकता का बढता प्रभाव, कुल मिलाकर आज समाज, मानवता, ईमान-ट्टार्म, सेवा, नैतिकता, सभी के मानदण्ड बदल गए हैं। इन सब बातों से मुसलमान तथा मुसलमानों की बस्तियो, उनकी संस्थाऐ भी अछूती नहीं हैं। कुछ लोग मात्र दाढी रखकर अपने आपको मुल्ला या मौलवी घोषित करा लेते हैं। ये छद्म ज्ञानी लोग इस्लाम और मुसलमान दोनों के लिए हानिकारक सि= हो रहे हैं। यही लोग झाड-फक, डोरे गण्डों की आड में आर्थिक शोषण तो करते ही हैं, साथ ही महिलाओं के देह शोषण का भी ये कारण बनते हैं।‘
उपन्यास के आद्योपांत सुमन की यह टीप अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है। हसीन खां व गौरी की दोस्ती बचपन, बल्कि बालपन से है। वह उसके साथ विवाह करना चाहती है, पर संजोग या कहें दुर्योग कुछ ऐसा बनता है कि हसीन खां के हाथों किसी की हत्या हो जाती है। नतीजन उसे जेल जाना पडता है। यहो से कहानी नया मोड लेती है।
असल में उपन्यास की सारी घटनाऐ तो बहाना हैं। वास्तव में लेखक सम्भवतः काल्पनिक या मिश्रित कथानक के माट्टयम से जो बात कहना चाहता है, वही मुख्य है। एक जगह लेखक ने लिखा है - ’नारी बाबा आदम के बाऐ हिस्से की टेढी ह्यी से पैदा हुई। टेढी ह्यी की उपमा से क्या अर्थ निकलता है? नारी को कोई अट्टिाकार नहीं है तलाक देने का। नारी तो पुरुष के साथ नत्थी है। अगर तलाक देने का कारण पत्नी पर शंका है, तो शंका का कोई उपचार नहीं है। बस तीन बार तलाक कह दिया, तलाक हो गया। फिर शंका का समाट्टाान हो जाए तब भी पत्नी वापस नहीं आ सकती, क्योंकि पुनः विवाह से पहले हलाला जरूरी है। यानी पत्नी को पुनः पत्नी बनाने के लिए भी सजा पत्नी को ही हलाला के रूप में।‘ इस तरह लेखक ने अपने कथानक में मुस्लिम समाज में नारी की तीन तलाक को लेकर इस दयनीय स्थिति का बहुत खुलकर खुलासा किया है और इस तरह लेखक ने नारी का जीवन एक अभिशाप रूप बताया है।
लेखक ने ट्टार्म के नाम पर ठगी के ट्टांट्टो को भी उजागर किया है। मुल्ला जब यह कहता है - ’जब मैं जवान हुआ मस्जिद में मुल्ला बना और गण्डे ताबीज करता रहा। ऐसे आदमियों के पास महिलाऐ ही अट्टिाक आती हैं, जिनकी शादी नहीं होती, या संतान नहीं होती या आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती। ऐसी महिलाऐ जल्द समर्पण करती हैं। इसका लाभ मैंने खूब उठाया।‘ इसी तरह आतंकवाद पर लेखक ने लिखा है - ’आतंकवाद फैल रहा है, जिसका सम्बन्ट्टा किसी ट्टार्म से नहीं है।‘
प्रस्तुत उपन्यास का कलेवर बहुत विस्तृत है और लेखक ने अपने समाज में फैली बुराइयों को बहुत बेबाकी के साथ रेखांकित किया है, बल्कि विश्लेषण भी किया है।
गौरी ;उपन्यासद्ध/साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर/ संस्कारण २०१८/मूल्य ४५० रुपये
’परमानंदम्‘, फतहसागर, जोट्टापुर ;राज.द्ध, मो. ९४१४४७४७८९