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इस शहर में तुम्हें याद कर

उमेश कुमार चौरसिया
विश्व के अलग-अलग देशों में कविता के शुरुआत को लेकर कई प्रकार की विविट्टाताऐ हैं। भारतीय साहित्य जगत में यह मान्यता है कि कविता का जन्म महर्षि वाल्मीकि के समय से हुआ। कहते हैं कि जब वे नदी के किनारे र्‍ौंच पक्षी के प्रेमानन्दित जोडे को निहार रहे थे तभी एक व्याट्टा ने नर र्‍ौंच पक्षी को अपने बाण से मार दिया। यह देख मादा र्‍ौंच मार्मिक विलाप करने लगी। इससे व्यथित महर्षि वाल्मीकि के मुख से अनायास ही यह श्लोक फूट गया - ’मां निषाद प्रतिष्ठांत्वमगमः शाश्वतीः समाः, यत्र्ौंकचमिथुनादेकम् अवट्टाीः काममोहितम्।‘ महर्षि वाल्मीकि ने यह संसार का सर्वप्रथम छंदब= संस्कृत श्लोक उच्चारित किया इसीलिए उन्हें प्राचीन कवि अर्थात् आदिकवि कहा जाता है। तब से लेकर आट्टाुनिक कहे जाने वाले इस युग तक साहित्य की इस सर्वाट्टिाक लोकप्रिय और प्रचलित विट्टाा कविता के शिल्प, भाषा और विषय-वस्तु में अनेक परिवर्तन आये हैं। आट्टाुनिक कविता कही जाने वाली नयी विट्टाा में भी जाने कितने समझे-अनसमझे स्वरूप दिखाई दे रहे हैं। कुछ भी लिख देने को क्या हम कविता कहें? कवि बनने की होड में कविता बदरंग होती दिख रही है। कभी तो लगता है कि कोई कविता लिख ही क्य रहा है।
कविता की पहचान के प्रति अनेक शंकाऐ होने पर भी अनेक सुट्टिा कवियों की लेखनी से प्रवाहित काव्य-प्रवाह मन को सुकून दे रहा है, पाठक को आकर्षित कर रहा है, उनकी कविताऐ लोकप्रियता के नये आयाम स्थापित कर रही हैं। ऐसे ही कवि हैं वीरभध् कार्कीढोली। वे मूलतः नेपाली में लिखते हैं और हाल ही में उनका काव्य-संग्रह आया है ’इस शहर में तुम्हें याद कर‘। संग्रह की कविताओं का हिन्दी अनुवाद खडकराज गिरी ने किया है। यहो भी कवि कहता है ’अनुभव करता ह आजकल कविता चुभती है, कविता से आनन्द मिला हो ऐसा नहीं लगता आजकल‘ और यह भी कि ’वे जब-तब, जहो-तहो उगने वाली कविताऐ, कविताऐ हैं क्या वसुंट्टारा‘, ’कविता मेरी ओखों में आकृति है एक समय की वही कविता है।‘ कविता में संवेदना न हो, दर्द न हो, प्रेम न हो, सच्चाई न हो और आनन्द देने का भाव न हो, जो कविता पाठक के मन को सुकून न दे सके उसे कविता कहेंगे क्या
समय के सच को कहते हुए विषमताओंे के प्रति सावचेत करना भी काव्यट्टार्म है। कवि कहते हैं ’आकाश भी स्वच्छ नहीं है आजकल दिन भी तो दिन की तरह नहीं है, उजाले में भी लोग क्यों सो रहे हैं अेट्टोरे में क्यों घबराते हुए जाग रहे हैं।‘ मन को केपा देने वाली भयावह परिस्थिति से चिंतित कवि कह उठता है ’हत्याऐ हो रही हैं दया और प्रेम की, असत्य के बाजार से नामोनिशान मिट रहा है सत्य का।‘ ऐसे वाताावरण में शिखर पर पहच जाने पर लोग मार्ग प्रशस्त करने वाले को भूल जाते हैं, नैया पार हो जाने पर खिवैया को भूल जाते हैं। इसीलिए यह तो पूछना ही पडेगा कि ’य तो तुम्हारी उडान से संतुष्ट नहीं ह मैं, उडने से पहले तुम्हारी आतुरता देखकर पूछना ही भूल गया ह - ऐसी उडान के लिए पंख किसने दिये तुम्हें? क्यों दिये?‘ तब विवश कवि और क्या कहे - ’समझ न सके तुम भी दिल को पिघलाने वाला गीत, गा नहीं पाेगा, सुनना चाहते हो तो आग के ही गा सकगा नदी किनारे गीत।‘ परदेश में जाकर रहने से आये परिवर्तन की कठोरता और कटुता से बेचैन हुआ कविमन चीख पडता है ’कैक्टस मुल्क में, मैं कैक्टस बनकर जी नहीं सकता, नहीं चाहिए ऐसा परिवर्तन, लौटा दो मुझे अपना मन, क्तदय, मेरी कोमलता मेरी अक्षु और मेरा दर्द भी‘ और एक अनुभूति यह भी कि ’इन गलियों के मन्दिरों में ट्टार्महीन लोगों की भीड लगती है।‘ एकाकीपन का अहसास भी दिल को कचोटता रहता है ’दिन के साथ परास्त होकर जब आ पहचता ह बन्द किवाड पर शाम को दस्तक देता ह दरवाजे पर, अन्दर नहीं है कोई, ट्टाकेलकर दरवाजा जाता ह अन्दर तब बंदी हो जाता ह फिर मैं अपने कमरे में ही।‘
भेडों के झुण्ड सी भीड हर कहीं, कभी भी निकल पडती है हाथों में झण्डे या डण्डे लिये एक अस्पष्ट, अनसमझे लक्ष्य की ओर। इसी को इंगित करती पंक्तियो देखिये, ’जुलूस, खुद इन्हें मालूम नहीं कहो जा रहे हैं, और कहो पहचकर किस ओर मुडना है, जमीं पर नहीं ओखें सिर्फ आकाश को देखकर चल रहे हैं, पर इन जुलूसों का लक्ष्य तो आकाश नहीं।‘ हम सभी कहते हैं कि पति और पत्नी जीवन की गाडी के दो पहिए हैं, एक डगमगा जाए तो दूसरा टूटकर गिर सकता है। भारतीय दाम्पत्य में आजीवन साथ निभाने की निश्चिंतता में कहीं समझौते, समन्वय का सहारा होता है। तभी तो कवि ने भी कहा, ’तुम गंगा पवित्र विशाल, बहो बहती रहो जैसे भी जहो भी, पर मुझे भी अपने साथ सेतु बनकर जीने का अट्टिाकार दो।‘ रचनाकार सदैव सकारात्मक दृष्टि रखता है तभी तो कहता है कि ’जिस घटा को तुम कहते हो अब छेटेगी, मैं उसी घटा को देखकर कहता ह अब बरसेगी।‘
संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए लगा कि ये ऐसे कवि की वेदना है जो विवश है अनुपयुक्त परिवेश से, चाहकर भी विरोट्टा के स्वर लिख नहीं पाता, बिगडती विकराल होती परिस्थितियों को ठीक करने की क्षमता और साहस नहीं है जिसमें, दर्द की कराह और सच कहने का गांभीर्य तो है पर सुनने-समझने वाला कोई दिखता नहीं, यहो-वहो भीड तो बहुत है किन्तु आत्मीय भाव नहीं है, व्यवस्था के विरोट्टा में दौडते लोग तो हैं पर उनके पास स्पष्ट लक्ष्य नहीं, रात के अेट्टिायारे में वंचितों की खुशियो जलाने वाले ही दिन में संरक्षक बन बैठे हैं, तडपती-पिघलती सडकों को सिर्फ देखने के लिए अभिशप्त हैं पर्वत, सर्जन करने की ललक का साथ नहीं दे रहे शब्द, ईश्वरविहीन होती जा रही इस ईश्वरीय दुनिया में मन के भीतर और बाहर आग ही आग है और इसी आग में झुलसने को मजबूर है मानवता।
इस संग्रह की कविताऐ भीतर और बाहर का सारा बोझ ढोने की चाहत लिए प्रेम और सुकून का मार्ग तलाशती दिखती है। सुख, दुःख, संघर्ष, सौंदर्य, संस्कार, संस्कृति, साा और समाज, शोषक और शोषित, प्यार और विरह, प्रकृति और विकृति सभी पर दृष्टि डालते हुए जीवन में आनन्द भर देने वाले शब्दों को कह पाने की चाहत रखती हैं। इसीलिये ये कविताऐ अपने पाठक से मुखर होकर संवाद भी करती दिखती ह। भाषा और शिल्प सहज बोट्टागम्य है। मन से मन तक प्रवाहित होने वाली कविताऐ नकारात्मक वातावरण से कहीं सकारात्मकता की ओर ले जाने का सार्थक प्रयास करती हैं।
काव्य-संग्रह - इस शहर में तुम्हें याद कर/वीरभध् कार्कीढोली/राजकमल/पृ.१२८/मूल्य ३०० रुपये
तस्वीर का दूसरा रुख
हर युग में समय के साथ कई परिवर्तन होते हैं और इन बदलावों की झलक हमें मिलती हैं रचनाकारों की कृतियों में। लेखक अपनी संवेदनात्मक दृष्टि से समाज को जैसा अनुभव करते हैं, वैसा ही दृश्य उनकी रचनाओं में दिखाई पडता है। समकालीन कथाऐ इसका सबसे प्रभावी माट्टयम है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों के कथानक में रची-बसी सामाजिक परिवेश की सौंट्टाी गंट्टा, व्याप्त रूढयों को इंगित करता कटाक्ष, मानवीय प्रवृायों की विषमताऐ और इन सबमें प्रत्यक्ष होता समय का सत्य। ये ही वे विशेषताऐ हैं जिनसे प्रेमचन्द एक महान् कथाकार की प्रसि= हासिल करते हैं। केवल काल्पनिक घटनार्मए कहानियों को रोचक तो बना सकते हैं लेकिन वे पाठक पर दूरगामी प्रभाव नहीं बना पाते। समय का सच और परिवेश का यथार्थ चित्रण ही कहानी को लोकप्रिय बनाता है।
आशा शर्मा के सद्यः प्रकाशित प्रथम कथा संग्रह ’तस्वीर का दूसरा रुख‘ की बारह कहानियों में आट्टाुनिक समाज के अनेक प्रतिबिम्बों की झलक दिखाई पडती है। अपने आस-पास की परिस्थितियों से प्रेरित अनुभूतियो मन को स्पंदन देती हैं और उनमें बसी कथाकारा के आदर्शोन्मुखी भाव की सकारात्मकता राहत देती महसूस होती है। ये कहानियो जीवन की सार्थकता के प्रति सावचेत करती हैं।
वर्तमान युग अंतरजाल के विशाल कैनवास और फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर जैसे सहज उपलब्ट्टा सूचना संसाट्टानों में पूरी तरह लिप्त हो गया प्रतीत होता है। ऐसे में अट्टिाकांश रचनाकारों की लेखनी ने भी इसे अपने कथ्य में उकेरने का प्रयत्न किया है। संग्रह की पहली कहानी ’फेसबुक ”ेंड्स‘ में आभासी दुनिया के मकडजाल और वास्तविक संसार के परस्पर सामंजस्य की पैरवी की गई है। कठिन समय में रोहन की मो की सहायता वे फेसबुक ”ेंड्स ही करते हैं, जिन्हें वह निरर्थक समझती थी। हालोकि ऐसी स्थितियो कहीं अपवाद स्वरूप ही दिखती होंगी, अन्यथा सोशल वेबसाइट्स ने तो समाज के प्रत्येक वर्ग में संवादहीनता और संवेदनहीनता का चिंतनीय वातावरण बना डालने में कोई कसर नहीं छोडी है। इन आट्टाुनिक सूचना साट्टानों के प्रति लेखिका का सकारात्मक नजरिया सुखद है। अन्य कई कहानियों में भी लेखिका की यह दृष्टि स्पष्ट दिखती है। स्वार्थ के चलते रिश्तों की परिभाषाऐ और स्वरूप किस प्रकार बदल जाते हैं, उसका एक उदाहरण है ’अपने-अपने स्वार्थ‘। एक ओर अपने परिचित के पोते को अपने पोते की तरह लाड-प्यार देने की वृ= दम्पा की ललक, वहीं दूसरी ओर उस लडके के मन में वृ= दम्पा के प्रति लगाव नहीं होने पर भी अपने रहने-खाने आदि सुविट्टााओं के लोभ में उनसे भावनात्मक खिलवाड।
आज का साहित्य जगत भी छल, झूठ, कपट इत्यादि प्रपंचों से बच नहीं पाया है। कहानी ’गॉड फादर‘ में नवोदित रचनाकारों द्वारा यथाशीघ्र प्रसि= पाने की लालसा और महचाकांक्षा के चलते अन्य व्यक्तियों को सीढी बनाकर उपयोग करना फिर दूट्टा में पडी मक्खी की तरह उन्हें अपने जीवन से निकाल बाहर फैंकने की कुत्सित प्रवृा का भावपूर्ण चित्रण किया गया है। दूसरी ओर ’तीसरा बेटा‘ में वृ=ाश्रम में रह रहे परिवार से परित्यक्त बुजुर्ग ठाकुर साहब और उनकी मनपूर्वक सेवा करते हुए उन्हें अपने घर ले आने वाले युवक राजीव के अनकहे रिश्ते की महक मन को गहरा सुकून देती है। दिखावे से भरे इस समय में भौतिक चाहतों के वशीभूत परिवारों की अपेक्षाऐ और आवश्यकताऐ बढ गयी हैं। इनकी पूर्ति के लिये पति-पत्नी दोनों में उत्साह भी है, ललक भी है और अन्य लोगों से प्रतिस्पट्टाार् भी है। ऐसे में वे जानबूझकर चादर से अपने पैर बाहर निकाले दे रहे हैं। इस आपा-ट्टाापी और दौड-भाग के बीच परिवार के बुजुर्ग उनके साथ रहने के बजाय अपनी अलग दुनिया में जीने को विवश हैं। शीर्षक कथा ’तस्वीर का दूसरा रुख‘ ऐसे ही वातावरण से उपजे सास-बहू के रिश्ते के रूखेपन को व्यक्त करती हैं। बहू रिया को ससुराल में अपने स्वप्न बिखरते दिखते हैं इसलिए उसमें सास के प्रति सदैव चिडचिडापन रहता है, किन्तु दूसरी ओर ऐसी परिस्थितियों में भी कथाकारा ने ’अंग्रेजी बोलने वाली बहू‘ की पढी-लिखी नायिका को भौतिक युग की रीत से परे, गंभीर रोग से ग्रसित अपने श्वसुर दीनानाथ जी की तन-मन से सेवा करने वाली आत्मीय बहू के रूप में प्रदर्शित कर समाज को सार्थक संदेश दिया है।
नयी सोच के शब्द से जुडी ’सेरोगेट मदर‘ में भावनाओं का उतार-चढाव और सुखात्मक अन्त अच्छा लगता है। जन्मदात्री मो के भावनात्मक संताप और ममता के भाव को रोके रखने की मजबूरी मन को छू लेती है। ’हरियाली‘ संस्थागत भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए शब्द-दर-शब्द वर्तमान का सजीव चित्र खींचती है। स्त्री-पुरुष सम्बन्ट्टाों में दाम्पत्य और आत्मसम्मान के बीच अपने वजूद की तलाश को दर्शाती है ’कहानी दर कहानी‘। भारतीय जीवन संस्कार में रमा पारिवारिक समन्वय चिंतन भी यहो दिखाई देता है। ’मन का कोना‘, ’जरूरी तो नहीं‘, ’बैलेंस शीट‘ और ’लाल गमछा‘ भी परिवेश की कटुता में सकारात्मक पहलू तलाशने वाली कहानियो हैं। कहानियों की विषय-वस्तु, भाव-भाषा, शब्द प्रवाह सरल और बोट्टागम्य है। पारिवारिक और व्यावसायिक सम्बन्ट्टाों के माट्टाुर्य में कहीं आट्टाुनिकता के कारण आ गए स्वार्थ और संकीर्णता के प्रति सावचेत करते हुए ये कहानियो भारतीय जीवन मूल्यों की सार्थकता की ओर ले जाती हैं। मुझे लगता है कि यही इस कथा संग्रह की सफलता भी है। नकारात्मक पहलू को गहरे शब्दों में व्यक्त कर पाठक को उद्वेलित करने वाली कथाऐ शायद रोचकता का लक्ष्य हासिल कर लेती होंगी, किन्तु साहित्य सर्जन का ट्टयेय यह नहीं है। सर्जक की रचना पाठक को मानवीय और सामाजिक दुष्प्रवृायों के प्रति सजग करते हुए उनसे बचने को प्रेरित कर सके यही रचनाट्टार्म है।
कथा-संग्रह - तस्वीर का दूसरा रुख/आशा शर्मा/ बोट्टिा प्रकाशन/पृष्ठ ९६/मूल्य २०० रुपये।
बी-१०४, राट्टाा विहार, हरिभा उपाट्टयाय नगर-मुख्य, अजमेर-३०५००४ ;राज.द्ध, मो. ९८२९४८२६०१