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वार्ता का विवेक

बी.एल. आच्छा
लेखक का रचना संसार भले ही शब्दों में उतरकर प्रकाशित हो जाता हो पर बहुत कुछ छूटा रह जाता है। असल में परा-पश्यन्ती-मट्टयमा-वैखरी वाणी की अपनी भूमिकाऐ हैं, लेखक चाहकर भी परावाणी को वैखरी में हू-ब-हू तब्दील नहीं कर पाता। कई बार रचना की अर्थच्छायाऐ पाठक से दूरी बनाए रखती हैं और उनके उार लेखक से ही प्राप्त होते हैं। ऐसे में साक्षात्कार के सवाल लेखक को उकसाते हैं, उलझाते हैं और वह सब कहने को मजबूर करते हैं, जो रचनाओं में बसा है।
’वार्ता का विवेक‘ इस दृष्टि से काफी असरकारक और सार्थक संग्रह है, साक्षात्कारों का। राकेश शर्मा ने रचनाकारों के रचना संसार से अंतरंग होकर सवाल किये हैं, जो साहित्य के साथ सांस्कृतिक परिदृश्य और रचनाकारों के निजी वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हैं।
इन ख्यातनाम रचनाकारों में हमेशा देश का सांस्कृतिक कालमान और हजारों साल की शब्द-यात्रा की निरन्तरता का स्वर सुना जा सकता है। रमेशचन्ध् शाह ने वैदिक वाणी से लेकर गोट्टाी, अरविन्द के रास्ते गुजरते हुए अपने समकाल को तरजीह दी है - ’काल जो अविच्छिन्न हैं, अटूट “ाृंखला है। सबसे महवपूर्ण है तो वर्तमान का क्षण ही है, वर्तमान के क्षण में ही अतीत और भविष्य मिलते हैं।‘ वेदों की जीवन विट्टाायक वाणी के साथ देव-मूर्तियों में वे सौंदर्य दृष्टि और ट्टार्म भावना का मेल देखते हैं, पर ’गोबर गणेश‘ उपन्यास की रचना भी करते हैं।
नरेन्ध् कोहली ने पौराणिक संदभोङ को समकालीनता के साथ जोडकर सांस्कृतिक और सामयिक दृष्टि को उकेरा है। राम, युट्टिाष्ठिर, कृष्ण, विवेकानन्द आदि को उपन्यासों के कथानक बनाने वाले कोहली जी कहते हैं - ’’पश्चिम का बल बाहर की तरफ है, भौतिक संसार पर अट्टिाक रहा है, हमारा भीतर की तरफ रहा है, जिसकी निरर्थकता को पहचानकर हम भीतर की ओर मुडे हैं।‘‘ कृष्णदा पालीवाल की मान्यता है कि राहुल सांकृत्यायन और रामविलास शर्मा भारतीय अस्मिता के प्रचेता हैं। रामविलास शर्मा ने तो माक्र्सवादी चिंतन की तमाम ट्टााराओं का साहित्य में भारतीयकरण किया है। जातीय कवि में वे तुलसीदास को शीर्षस्थ मानते हैं और भारतीय अस्मिता के लिए विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस के परिप्रेक्ष्य में निराला जी का आख्यान करते हैं। कृष्णदा पालीवाल ने पश्चिमी काव्यशास्त्र के साथ भारतीय काव्यशास्त्र को रखते हुए कहा है कि अनेकार्थकता, लालित्य बोट्टा, टेक्स्ट और इंटरटेक्स्ट, थ्योरी ऑफ डिस्कोर्स, रोमांटिक चेतना, टत्र्ेडिशन, पोस्ट मॉडर्निज्म आदि को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखना हो तो रस और वर्‍ोक्ति सि=ान्त, षड्रसवाद, नागेश भड्ड और मल्लिनाथ की टीकाओं, कालिदास के पुराणमित्येव न साट्टाु सवङ, शब्दार्थ के वर्व्याऔपार आचार्य रामचन्ध् शुक्ल की क्तदयवाद से इतर बौ=क व्याख्याओं तक जाना होगा।
प्रेमचन्द साहित्य के गवेषक और आख्याता कमलकिशोर गोयनका की मान्यता है कि साहित्यकार प्रकृति से ही प्रगतिशील होता है। प्रेमचन्द असल में न तो माक्र्सवाद से जुडे हैं, न विचारट्टाारा से। वे तो भारतीयता के बडे लेखक थे। वे पुरातन भारतीय मूल्यों के साथ पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान की स्वीकृति के बावजूद, पश्चिमीकरण के बजाय गोट्टाी के हिन्द स्वराज के हिमायती थे। विजय बहादुर सिंह ने आर्य समाजी उत्थान को प्रगतिशील ही माना है, एक तरह का वामपंथ। पर निष्कर्ष यह भी है कि माक्र्सवाद एक औद्योगिक सभ्यता का चिंतन है।
सूर्यप्रसाद दीक्षित का अकादमिक संसार बहुत उजला है। छायावादी कविता के सौंदर्य विट्टाान पर उनका शोट्टाकार्य बहुत चर्चित रहा। हिन्दी में रोजगार की दृष्टि से प्रयोजनमूलक हिन्दी के लेखन के साथ विश्वविद्यालयीन पाठ्यर्मोंर में नियोजन के लिए कार्य किया। भाषा प्रौद्योगिकी और उसकी विश्वस्तरीय उपयोगिता को प्रबन्ट्टान के आयाम दिए। देवेन्ध् दीपक पुनर्मूल्यांकन को साहित्य की अनिवार्य प्रर्याआ मानते हैं। पाठक वर्ग में साहित्यिक सम्भावना को जगाने के लिए वे उनके स्तर तक जाने की वकालत करते हैं, तो व्यावसायिक युवाओं की पठनशीलता को केवल गंभीर साहित्य तक सीमित नहीं करते। आजादी के आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में वे कहते हैं कि त्याग की हवन-संस्कृति अब भवन-संस्कृति में बदल गई है।
बालकवि बैरागी से साक्षात्कार इस पुस्तक की उपलब्ट्टिा है। अभावों की खुरदरी जमीन पर साहित्य का यह प्रवाह कैसे बह निकला, पूरी व्यथा कथा का फलित बहुत यशस्वी है, जिसमें लोक साहित्य-सी सरसता है, राष्टत्रीय जागरण के आह्वान में, दीप की सी त्यागमय उज्ज्वलता है। राजनीति के शीर्ष पर मर्यादाओं के मूल्य हैं।
ललित निबन्ट्टाकार श्यामसुन्दर दुबे मानते हैं कि कविता में लय के अभाव से विचारों का बोझ बढा है। समय के संर्ममण ने समाज में संवेदना की हानि की है तो कविता की भी हानि हुई है। आट्टाुनिक तकनीक ने लोक का विलोपन किया है। इसी से बोली, वेशभूषा, खान-पान, तीज-त्यौहार, कला-संदर्भ सभी को द्वेषता से लोक अनुभव कर रहा है। भाषाविज्ञानी एवं कवि जयकुमार जलज ने बचपन की स्मृतियों में लोक जीवन और साहित्यिक रचनाओं के आस्वादन की स्मतियों के साथ उच्च शिक्षाकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वैभव को उकेरा है। निराला जी, डॉ. रामकुमार वर्मा, महादेवी, पुरुषोामदास टंडन, ट्टार्मवीर भारती जैसी हस्तियों के साथ उनकी स्मृतियो और साहित्यिक परिदृश्य प्रभावी हैं।
’नई ट्टाारा‘ के सम्पादक शिवनारायण का मानना है कि प्रतिरोट्टा साहित्यिक पत्रकारिता का मूलमंत्र है। वे मानते हैं कि हिन्दी ने वैश्विक स्तर पर हजारों भाषाओं के बीच जो पहचान बनाई हैं, वह साा के कारण नहीं बल्कि लचीली बनावट और प्रयोग में सामासिक उदारता के कारण। ’तार सप्तक‘ के कवि राजकुमार कुम्भज ने कविता में संवेदना के पक्ष को केवल जोडने तक नहीं बल्कि मुक्त करने की अंतरंगता के साथ लक्षित किया है। वे मानते हैं कि कविता में भी कुछ शीर्ष हम कह नहीं पाते तो गद्य के पास जाना पडता है। कविता के बाजारीकरण, विचारट्टााराऐ और कविता में विचार, आपातकालीन परिदृश्य, पजीवाद और वामपंथ, अज्ञेय और प्रयोग, जैसे अनेक विषयों की उनकी मंत्रणाऐ उनके वक्तव्यों में स्पष्ट हुई हैं।
दरअसल साक्षात्कारों के ये मर्म सामाजिक परिदृश्य में साहित्य की स्थिति को ही रेखांकित नहीं करते बल्कि विवादों-संवादों के साथ ऐतिहासिक सृजन, विवादों के मत-मतान्तर, विचारट्टााराओं की उखाड- पछाड, संवेदनाओं की साहित्यिक रचना प्रर्याा, विट्टााओं के वैशिष्ट्य और रचनागत बदलाव, रचनाकारों के बचपन के परिदृश्य, मौलिक सृजन की अवट्टाारणा, समकालीन जीवन में साहित्य की स्थिति, साहित्य को जीवन-संवादी और लोक-सम्प्रेषी बनाने की जरूरत, तकनीक के विकास में लोक-सम्पदा की स्थिति, अकादमिक परिदृश्य जैसे अनेक पक्षों को विभिन्न अक्षों के साथ सामने लाते हैं।
’वार्ता का विवेक‘/राकेश शर्मा/भावना प्रकाशन, १०९-ए, पटपडगंज, दिल्ली/प्रथम संस्करण २०१८/ मूल्य ५०० रुपये
३६, क्लीमेन्ट्स रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे, पुरुषवाकम्, चैन्नई ;तमिलनाउुद्ध-६००००७, मो. ९४२५०८३३३५