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कवि-निकष : सवाई सिंह शेखावत

राजेंद्र कुमार सिंघवी
गद्य कवीनां निकषं वदंति।‘ - उक्त सूक्ति भारतीय वा-्मय में कवियों की कसौटी तय करती है और गद्य को कवि का निकष प्रमाणित करती है। सवाई सिंह शेखावत सुपरिचित कवि हैं। कवि की अन्तट्टाार्रा सदैव संवेदना के ट्टारातल पर गतिमान होती है, परन्तु जब वह वैचारिक दृष्टि से रचनाट्टार्मिता का मूल्यांकन करता है, तब रचनाकार के सामर्थ्य, अंतर्वस्तु और शिल्प की सजगता को भी उसी अनुरूप पहचान लेता है। ’कवि-निकष‘ कृति में लेखक की वैचारिक दृष्टि भावात्मक गहराई से प्रकट हुई है, यह प्रशंसनीय है।
’कवि-निकष‘ में व्यक्त विचार विविट्टा शीर्षकों में वर्गीकृत हैं। ’शब्दगंट्टा‘ में लेखकीय दृष्टि के साथ चिंतन का प्रवाह सहज रूप में स्फुटित हैं तो ’सोचते हुए‘ शीर्षक में संगृहीत विचार गंभीर अट्टययन का सार प्रतीत होते हैं। ’सृजन-सहयात्री‘, ’किताबों के बहाने‘ और ’टिप्पणियो‘ में समकालीन रचनात्मक वातावरण, सृजन-दृष्टि आदि पर विचार हैं, वहीं ’शेष-स्मृति‘ में दिवंगत रचनाकारों को श्र=ा-सुमन अर्पित किए हैं। ये समीक्षाऐ, आलोचनाऐ अथवा टिप्पणियो तनिक भी शुष्क नहीं, सम्भवतः एक कवि का गद्यकार होना बडा कारण है। यहो चित्रात्मकता, माट्टाुर्य और सरसता पाठकों को आकर्षित करने का सामर्थ्य रखती हैं।
’लाइलून की किताब‘ शीर्षक आलेख में उन्होंने अपने कवित्व के अंकुरण, विकास और परिष्कार की घटनाओं का उल्लेख किया है। ’कविताऐ शब्दगंट्टाों का पीछा करते मिलीं‘ में लेखक ने स्वयं की रचना-प्रर्याण को सार्थक सि= करते हुए लिखा - ’’कवित्व मेरा संरचनात्मक सच है, जो मेरे कवि होने को उजागर करता है। कवि ह तो कविताऐ लिखगा ही। ठीक जैसे जुलाहा कपडा बुनता है, कुम्हार मिड्डी के बर्तन बनाता है और (तु आने पर वृक्ष फलते हैं।‘‘ शब्दगंट्टा खंड में ही ’ईश्वर के होने को लेकर‘ पर भारतीय और पाश्चात्य दृष्टि से सकारात्मक चिंतन किया है और खुले मन से भारतीय चिंतन दृष्टि का समर्थन भी किया है।
शेखावत की निगाह साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर ’नीर-क्षीर विवेक‘ की रही है। किसी विचारट्टाारा के वे अंट्टा-समर्थक नहीं हैं। ’सोचते हुए‘ खंड में उनकी यह दृष्टि अट्टिाक स्पष्ट होती है। ’ट्टाार्मिक वाम की दरकार और माक्र्सवादी प्रेत‘ आलेख में सुट्टाा चौट्टारी की टिप्पणी को रेखांकित करते हुए उद्ट्टाृत किया कि यह वामपंथ ही है जो ट्टार्म की कब्र खोदता है। ट्टार्म के नाम पर पोप द्वारा जो घृणित अनाचार किया गया उससे आजिज आकर कार्लमाक्र्स ने ट्टार्म को अफीम क्या कहा, अवसरवादी वाम बु=जीवियों को जैसे अपनी सेकुलर छवि चमकाने का आसान नुस्खा उपलब्ट्टा हो गया। इसी तरह ’वैदिक शिक्षा के बारह सूत्र‘ का विवेचन लेखक की गंभीर अट्टययनशीलता के प्रमाण हैं। साहित्य की प्रयोजनशीलता, बाजारवाद के परिदृश्य में भारतीय ग्राम्य संस्कृति और तुलसीदास के चिंतन का रेखांकन भी पठनीय है।
समकालीन रचनाकार साथियों और उनकी रचनाओं पर उदार दृष्टि से विचार किया है, जहो आलोचनात्मक पक्ष कम, स्नेह अट्टिाक प्रकट हुआ है। हसन जमाल, गोविन्द माथुर, कृष्ण कल्पित, विनोद पदरज और अजन्ता देव की काव्यात्मक प्रतिभा की मुक्तकंठ से प्रशंसा उनकी रचनात्मक प्रतिभा के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने वाली है। इसी तरह कलाविद् डॉ. राजेश व्यास की पुस्तक ’रंगनाद‘, कथाकार सत्यनारायण की ’यायावर की डायरी‘, कवि गोविन्द माथुर की कृति ’नमक की तरह‘, हरीश करमचंदाणी की रचना ’अंतहीन सिरा उम्मीद का‘, कृष्ण कल्पित का ’कविता रहस्य‘, रमेश खत्री की ’घर की तलाश‘ तथा बहादुर पटेल की पुस्तक ’सारा नमक वहीं से आता है‘ की समीक्षाऐ अपेक्षित मानकों पर खरी उतरती हैं, जो कि समीक्षाकार की समालोचनात्मक प्रतिभा का प्रकटीकरण है।
कवि-निकष/आलोचना/सवाई सिंह शेखावत/मोनिका प्रकाशन, प्रतापनगर, जयपुर/प्रथम संस्करण २०१८/ मूल्य ४०० रुपये।
विमर्श के आयाम ः विमला सिंहल
एक समर्थ आलोचक अपने निकट विद्यमान रचनात्मक प्रवाह से प्रभावित होता है, स्वयं उसमें से गुजरता है और उसके सार-बोट्टा को आने वाली पीढयों के लिए परोसता भी है। विमला सिंहल का आलोचनात्मक निबन्ट्टा-संग्रह ’विमर्श के आयाम‘ में संकलित निबन्ट्टा लेखिका के भारतीय मन का सहज प्रस्फुटन है, जो समकालीन रचना-जगत में अभिव्यक्त हुआ। लेखिका की दृष्टि उन लेखकों पर अट्टिाक ठहरीं, जहो भारतीय परम्परा का सांस्कृतिक पक्ष विशेष उजागर हुआ।
पुस्तक में संगृहीत २३ निबन्ट्टा वर्गीकरण से वंचित हैं, परन्तु तीन प्रकार के निबन्ट्टा वैचारिक चिंतन की दृष्टि से समाहित हैं। प्रथम प्रकार के वे निबंट्टा हैं, जहो भारतीय वा-्मय, संस्कृति की ट्टाारा का मूल्यांकन है, द्वितीय में उन रचनाओं का मूल्यांकन है, जिनसे भारतीयों में राष्टत्रीयता की भावना का संचार हुआ और उन समर्थ रचनाकारों की विराट दृष्टि का परिचय भी प्रकट हुआ। शेष में समसामयिक आलेख, जो मीडिया, विमर्श अथवा राजनैतिक दिशाबोट्टा से युक्त हैं। भारतीय कला और साहित्य में काव्यशास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हुए ’रैंसम और भारतीय अलंकार-शास्त्र‘ की तुलना की है। लेखिका ने स्पष्ट किया कि रैंसम को ’नयी समीक्षा‘ का जनक बताना और भारतीय अलंकार-शास्त्र को देहवादी बताकर उपेक्षा करना कहो तक उचित है? ’संस्कृत भाषा और सांस्कृतिक मिथक‘, ’मार्कण्डेय पुराण में भारत‘ और ’कृष्णभक्ति काव्य की प्रासंगिकता‘ आलेख में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की गहनता से पडताल की गई है। ’आर्ष नारी चिंतन की प्रासंगिकता‘ में भारतीय नारी के उदाा मूल्यों की विवेचना महान् गौरव की अभिव्यक्ति है।
हिन्दी साहित्य में राष्टत्रीयता की अभिव्यक्ति आलोचना के क्षेत्र में उपेक्षित रही, परन्तु ’पृथ्वीराज रासो का राष्टत्रीय स्वर‘, ’निराला और हिन्दुत्व‘ आलेख में राष्टत्र्बोट्टा का स्वर प्रकट हुआ है। ’प्रगतिवाद ः राष्टत्रीय संदर्भ‘ में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय जडों को छद्म विमशोङ के बहाने से खत्म नहीं किया जा सकता। भारतीय मानस मूढ अथवा अज्ञानी नहीं, अन्ततः भारतीयता के विरोट्टिायों को पहचान ही लेती है। प्रगतिवादी साहित्यकारों ने सांस्कृतिक ट्टारोहर और राष्टत्रीय भाव बोट्टा का चाहे जितना उपहास किया, पर वे स्वयं कटघरे में रहे।
निराला, अज्ञेय, कुबेरनाथ, मृदुला सिन्हा, कन्हैयालाल सेठिया की प्रतिभा का मूल्यांकन उनके रचना-संसार के आलोक में विविट्टा आलेखों में किया गया है, परन्तु ललित निबन्ट्टाों के मूल्यांकन में लेखिका की गंभीर आलोचनात्मक दृष्टि दिखाई पडती है। ’कुबेरनाथ राय के ललित निबन्ट्टाों की सांस्कृतिक चेतना‘, ’रसट्टार्मा ललित निबन्ट्टाकार‘, ’समकालीन ललित निबन्ट्टा ः एक विहंगम दृष्टि‘ बहुत ही रोचक और पठनीय हैं।
विमशोङ से परे कुछ अन्य विषय जैसे इलेक्टत्रेनिक मीडिया, प्रचार तंत्र आदि ने साहित्यिक कलात्मकता को प्रभावित किया है। लेखकीय दृष्टि ने इन विषयों पर भी गंभीरता से विवेचन किया है और हिन्दी के भाषायी प्रवाह में योगदान को रेखांकित किया है। संकलित आलेखों में संदर्भ सामग्री की प्रामाणिकता और तटस्थ मूल्यांकन दृष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
विमर्श के आयाम/निबन्ट्टा/डॉ. विमला सिंहल/मोनिका प्रकाशन, प्रतापनगर, जयपुर/प्रथम संस्करण २०१८/ मूल्य ३९० रुपये।
संत दादूदयाल ः जीवन और साहित्य - नवीन नंदवाना
संतकाव्य ने हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल को अपनी लोकवाणी से भारतीय आट्टयात्मिक प्रवाह का चिंतन प्रदान किया, वह अतुल्य है। ’स्वर्ण-युग‘ के निर्माण में इन कवियों का प्रखर-स्वर अपनी अलग आभा के साथ विद्यमान है। कबीर, दादू, रैदास, सुन्दरदास सहित अनेक संत-कवियों की विशिष्टता यह है कि ये जन-मन की वाणी थे, उन्हीं के ट्टारातल से निकले और उन्हीं को जीवन-पथ सुझाया। इसीलिए वे कालजयी हुए। ’संत दादूदयाल ः जीवन और साहित्य‘ पुस्तक में संत कवि दादू के जीवन-परिचय, र्यांकलाप, उपदेश के साथ उनकी वाणी का साहित्यिक गरिमा की दृष्टि से मूल्यांकन किया गया है। पुस्तक के आरम्भ में लेखक ने हिन्दी साहित्य की पूर्व मट्टयकालीन ट्टाारा, राजनैतिक परिदृश्य, सांस्कृतिक परिस्थितियों आदि का परिचय करवाते हुए उन कारकों का वर्णन किया, जिससे यह ’स्वर्ण-युग‘ बना। संत, सूफी, राम एवं कृष्ण काव्यट्टाारा के माट्टयम से भारत की सम्पूर्ण जन अभिव्यक्ति किस तरह भक्तिरस में डूब गई, इसका विवेचन अनेक विद्वानों के उ=रणों के साथ किया गया है।
मट्टयकालीन साहित्यिक पृष्ठभूमि में दादू के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचयात्मक विवरण देते हुए तथ्यों की प्रामाणिकता का विशेष ट्टयान रखा गया है, जो आवश्यक भी है। दादूवाणी के प्रकाशक ग्रंथों पर आलोचकों की टिप्पणियो यथास्थान दी गई है, इससे कृतित्व के सम्यक मूल्यांकन में पारदर्शित प्रतिबिम्बित होती है।
यह सर्वविदित है कि दादूदयाल का अट्टयात्म-चिंतन उदार दृष्टि सम्पन्न और मानवता के उद्घोष का समर्थक रहा। उनकी वाणी में ट्टार्म का र्याषत्मक पक्ष और प्रतिर्या्त्मक पक्ष समान रूप से उजागर हुआ। कबीर की भोति उनका जोर सदाचार, मनः परिष्करण, अहिंसात्मक दृष्टि और निष्काम कर्म पर बल देना रहा, वहीं ट्टाार्मिक आडम्बरों पर चोट कर, अंट्टाविश्वासों के विरु= मुखर स्वर ने प्रतिर्याकत्मक पक्ष को भी संतुलित भाव से रखा, परिणामस्वरूप प्रासंगिकता चिरकाल तक बनी रही। लेखक ने दादू के साहित्य का मूल्यांकन इसी दृष्टि से किया है।
इसके अतिरिक्त दादू की लोकवाणी में रचना, लोक के साथ गहरा सम्बन्ट्टा, लोकभाषा को महव आदि का पक्ष विवेचित हुआ है, जिससे यह प्रकट होता है कि लेखक की समालोचना दृष्टि में यह भाव रहा है कि दादूदयाल का लोकमत में अपार विश्वास था, इसीलिए उनकी वाणी जनप्रिय बन सकी। यह सर्वविदित है कि राजस्थान में संत-साहित्य की अपार सम्पदा बिखरी पडी है, जिन पर विशद् शोट्टा की आवश्यकता है। नवीन नंदवाना की यह पुस्तक उन शोट्टाार्थियों के लिए अवश्य ही प्रेरणा का स्रोत बनेंगी, जो संत साहित्य को नवीन दृष्टि से देखना चाहते हैं। संतों का जीवन, रचनाकर्म और सामाजिक सरोकारों का विवेचन भावी पीढी के लिए पथ-प्रदर्शक होता है। इस दृष्टि से यह पुस्तक स्वागत योग्य है। तथ्यों की प्रामाणिकता, आलोचकों की टिप्पणियों और लेखक की भाषायी अभिव्यक्ति से पुस्तक रोचक बन गई है।
संत दादूदयाल ः जीवन और साहित्य/आलोचना/डॉ. नवीन नंदवाना/मलिक एण्ड कम्पनी, चौडा रास्ता, जयपुर-३/प्रथम संस्करण २०१८/मूल्य ३५० रुपये
एफ. ६-७, रजत विहार, निम्बाहेडा, जिला चिाौडगढ ;राज.द्ध ३१२६०१, मो. ९८२८६०८२७०