fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

कैंडल मार्च

लालचन्द गुप्त ‘मंगल’
हिन्दी काव्य-गगन में प्रबन्ट्टाकाव्य, लम्बी कविता, गजल, नवगीत और मुक्तछंदी कविता के राष्टत्रीय हस्ताक्षर माट्टाव कौशिक द्वारा प्रणीत, ८६ कविताओं पर आट्टाृत उनकी ३०वीं कृति, ’कैंडल मार्च‘ मेरे सामने है। जीवन के विविट्टा रंगों और रसों से सराबोर इन कविताओं की पृष्ठभूमि मेंऋ प्रमुखतया, वर्तमान परिस्थितियों तथा सरोकारों की बेचैनी और व्यग्रता, अपनी सम्पूर्ण जटिलता के साथ, विद्यमान है। रचनाकार देख रहा है कि ’’उपभोक्तावादी अपसंस्कृति, भूमण्डलीकरण तथा बाजारवाद के प्रचार-प्रसार ने सामाजिक मूल्यों के सनातन ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। नैतिक मूल्य निरन्तर लुप्त होते जा रहे हैं। अराजकता तथा अनाचार अपने चरम पर हैं। अन्तरराष्टत्रीय आतंकवाद के अजगर ने सम्पूर्ण मानव-सभ्यता के सामने बडा-सा प्रश्नचिँ लगा दिया है। यही कारण है कि सभ्यता के आवरण में छिपे वर्तमान मनुष्य का असली चेहरा बेहद र्‍ूर और भयावह हो गया है। तभी तो आम आदमी की ’जन्दगी/बेबसी के कन्ट्टाों पर/सिर टिकाए उदास बैठी है/बीते लम्हों के कैदखाने में।‘ जहो नजर दौडाइए, ’मायूस लोगों का हुजूम‘ और ’मासूम बच्चों का हुजूम‘ दिखाई देगा। ’लोग इतने सहम गए हैं/कि अब/सब अन्ट्टोरों में छुपकर बैठे हैं/अब अन्ट्टोरों से प्यार है उनको।‘‘ यत्र-तत्र-सर्वत्र ऐसी मुर्दनी छाई हुई है कि ’’शोर के बावजूद/पत्थर के इन बुतों पर कोई शिकन ही नहीं‘‘ दिखाई देती। कुल मिलाकर, ’मातमी ट्टाुन बज रही है हर तरफ।‘
माट्टाव कौशिक की स्पष्ट मान्यता है कि ऐसी भयावह परिस्थितियों में सच्चे साहित्यकार का यह ट्टार्म बनता है कि वह जीवन के प्रति आस्था, जिजीविषा और संघर्षशीलता की मशाल जलाए, अपने आर्‍ोश को ठण्डा न होने दे और अन्याय तथा शोषण के विरु= लगातार आवाज बुलन्द करता रहे। बकौल कवि, यह सच है कि ’बेट्टाी-बेट्टााई लीक तोडकर/चलने वालों की किस्मत म/दुःख तो होंगे... लेकिन दुनिया ऐसे बागी और/विधेही लोगों के दम पर जन्दा है/...ऐसे लोगों के दम पर ही/कायनात कायम है अब तक/ऐसे लोगों के दम पर ही/ट्टारती का सीना चौडा है।‘‘ ट्टयान रखो, ’भीड में से जब भी/कोई इक्का-दुक्का आदमी/सभी कतारें तोडकर/अलग से चलने लगता है/ तो निरीह पगडंडी भी/राजमार्ग लगने लगती है।‘ ’वास्तव म/कोई भी काम/मुश्किल से अट्टिाक मुश्किल नहीं होता।‘ इसलिए ’काल के गाल में रहते हुए/अतिर्मलण करो काल का/यह ऐलान नहीं/फरमान है वक्त का।‘ अरे! ’कोई तो हो जो/ व्यवस्था के बिगडैल साण्ड के/सींगों में/विश्वास का फंदा डालकर/बीच चौराहे के/ट्टाराशायी कर दे उसे।‘ जिस दिन आपने यह चमत्कार कर दिखाया, विश्वास कीजिए, ’आने वाला कल भी अपना/कल से बेहतर होगा।‘ ’कैंडल मार्च‘ के पारायणोपरांत मैं सहमत ह माट्टाव कौशिक से कि ’घटाघोप अेट्टिायारे को चीरकर आस्था, विश्वास तथा संघर्षशीलता का उजास आपको भी इस कैंडल-मार्च में शामिल होने के लिए विवश करता रहेगा।‘
’साठे पर पाठे‘ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए माट्टाव कौशिक ने दर्जनाट्टिाक प्रेम-कविताऐ भी लिखी हैं। पूर्वदीप्ति शैली के माट्टयम से कौशिक जी अपनी प्रेमिका से सम्बोट्टिात हैं... ’इतने दिनों बाद भी/नहीं भूला ह/उस रेशमी हेसी की खनक।‘... ’हजारों झंझावातों में/अब तक भी सही सलामत‘ है तुम्हारी याद। ’पहले तुम आवाज लगाते थे मुझको/अब तुमको आवाज लगाता फिरता ह।‘ सचमुच ’तुम्हारी अनुपस्थिति में/बढ गया है/रात का विस्तार/विकराल हो गया है/दिन का दानव।‘ ’कभी-कभी सपना भी/सच्चाई जैसा लगने लगता है/प्यार तुम्हारा/मायावी-सा बनकर भी ठगने लगता हैं‘ ’इतने दिन के बाद/तुम्हें खत लिखता ह।‘ ’मुझे अपने ही दिल का/दूसरा हिस्सा समझ लेना।‘ ’आज तुम्हारे जन्मदिवस पर/अपना अगला जन्म/तुम्हें अर्पित करता ह।‘
माट्टाव कौशिक की हर रचना शिल्प-सि= होती है। यहो भी मुक्तछंद का समस्त रचना-विट्टाान, अपनी सवाङगीणता के साथ, विराजमान है। अपेक्षित सुर, लय, यति, गति के साथ बिम्ब, प्रतीक, रूपक, उत्प्रेक्षा, उपमा, मानवीकरण, पूर्वदीप्ति शैली और भावानुरूपिणी भाषा आदि ’कैंडल मार्च‘ की ज्वाला को और अट्टिाक उड्ढीप्त करने में सक्षम हैं। मुक्तछंदी काव्यट्टाारा में युगचेता कवि माट्टाव कौशिक की यह रचना सुबु= पाठकों का ट्टयान अवश्य आकृष्ट करेगी, ऐसा मेरा दृढ विश्वास है।
कैंडल मार्च/माट्टाव कौशिक/मुक्तछंदी कविता/२५० रुपये/यश पब्लिशर्स एण्ड डिस्टत्रीब्यूटर्स, दिल्ली-३२
१२१८/१३, अर्बल इस्टेट, कुरुक्षेत्र-१३६११८