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परिचय-पत्र (बाल-कथा)

ताराचन्द मकसाने
भाग्यश्री आज स्कूल से आते ही अपने दादा के गले में झूल गई। दादाजी एकदम से हडबडा गए, हमेशा तो भाग्यश्री स्कूल से आने के बाद ’हाय दादू‘ कहकर भीतर अपने कमरे में चली जाती है पर आज तो गले में लिपट गई थी। दादाजी भाग्यश्री के असहज मिजाज को समझे, इससे पहले उसने अपने स्कूल बैग से एक आइडेंटिटी कार्ड निकाला और दादाजी के गले में डाल दिया और जोर से चिल्लाई -
’’दादू, ये आपका आई-कार्ड है, इसे मैंने बनाया है।‘‘
दादाजी प्लास्टिक के आवरण में रखे हरे रंग के छोटे-से कार्ड को ओखों के करीब ले जाकर उलट-पुलटकर देखने लगे। इट्टार भाग्यश्री अनवरत बोले जा रही थी -
’’दादू, आज से आप जब भी घर से बाहर जाऐगे, यह कार्ड अपने गले में पहनकर जाऐगे। इस पर मैंने अपने घर का पूरा पता, मम्मी-पापा और भैह्या का मोबाइल नम्बर लिख दिया है। यही नहीं, इस पर मैंने अपने फैमिली डॉक्टर का भी फोन नम्बर लिख दिया है। आपका फोटो मेरे पास नहीं है, पापा जब ऑफिस से आऐगे तब मैं उनसे आपकी ताजा फोटो लेकर इस पर चिपका दगी।‘‘
भाग्यश्री के ८२ वर्षीय दादाजी चुपचाप उसकी आदेशात्मक बातें सुन रहे थे। उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि भाग्यश्री अचानक यह सब क्या और क्यों कर रही है। निर्विकार भाव से कुर्सी पर बैठे हुए दादाजी ट्टाीरे से बोले*- ’’ये सब क्या है भागु...‘‘
’’अरे दादाजी, ये आपका आइडेन्टिटी कार्ड, मतलब परिचय पत्र है। ये आपकी सुरक्षा के लिए है।‘‘ भाग्यश्री ने कहा।
दादा और पोती की बातें सुनकर भाग्यश्री की मम्मी सुनीता किचन से बाहर आयी तो भाग्यश्री अपनी मम्मी की ओर मुखातिब होते हुए बोली - ’’मम्मी, आज हमारे स्कूल में एक विचित्र घटना घटी। जिसके कारण मुझे भी अपने दादू के लिए आइडेन्टिटी कार्ड बनाना पडा है। यह कार्ड मुझे हमारे क्लास टीचर ने दिया है।‘‘
’’स्कूल में क्या हुआ था बेटा?‘‘ सुनीता ने उत्साहित होते हुए पूछा।
’’मम्मी, आज दोपहर में लंच ब्रेक में स्कूल-गेट के बाहर एक दादाजी बैठे हुए थे। उन्हें अपने घर का पता याद नहीं आ रहा था, न ही वे अपने किसी रिश्तेदार का फोन नम्बर बता पा रहे थे। सब बच्चे उन्हें घेरकर खडे हो गए। वे सभी बच्चों को घूरकर देख रहे थे। वॉचमैन उनसे बार-बार कुछ पूछ रहा था पर उन्हें कुछ याद ही नहीं आ रहा था। वॉचमैन ने उन्हें खाने के लिए बिस्किट दिए और पानी पिलाया। गेट पर बच्चों की भीड देखकर मेरे क्लास टीचर विशाल सर वहो पहच गए। उन्होंने बच्चों की भीड को एक तरफ किया, फिर वे दादाजी के पास गए। उन्होंने वॉचमैन से एक कुर्सी मंगवाई और उस पर दादाजी को बडे प्रेम से बिठाया, फिर स्नेह से उनका हाथ अपने हाथ में लिया। विशाल सर उनसे ट्टाीरे-ट्टाीरे कुछ पूछने लगे मगर दादाजी कुछ बता नहीं पा रहे थे, उनके माथे पर पसीने की बदे छलक रही थी। विशाल सर ने उनकी जेबें भी टटोली, मगर उनके पास मोबाइल फोन नहीं मिला। न ही उनकी जेब में कोई विजिटिंग कार्ड या परिचय पत्र मिला, जिससे उनके बारे में कुछ पता चल सके।‘‘ भाग्यश्री उत्साहपूर्वक सारी घटना बता रही थी। अल्पविराम के बाद उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा - ’’दादाजी के पास किसी भी प्रकार की जानकारी न मिलने पर विशाल सर ने एक तरकीब आजमायी। उन्होंने सभी बच्चों को शांत किया और वे दादाजी के कान के पास जाकर जोर-जोर से लडके और लडकियों के नाम लेने लगे। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि विशाल सर ये क्या कर रहे हैं। हम सब बच्चे आश्चर्यचकित होकर उन्हें देख रहे थे। विशाल सर कभी जोर से मीना तो कभी मनीषा का नाम ले रहे थे, कभी दीपक तो कभी रोहित बोल रहे थे। दस-बारह लडके-लडकियों के नाम ले चुके थे, जब उन्होंने कविता का नाम लिया तो दादाजी जोर से बोले - ’’हो, कविता, कविता है मेरी पोती।‘‘
दादाजी की बात सुनकर विशाल सर के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई। वे गद्गद् हो उठे। उन्होंने तुरन्त मुझसे कहा - ’’भाग्यश्री, जल्दी से स्कूल में जाओ और माइक पर जाकर यह घोषणा करो कि कविता नाम की सभी लडकियो तुरन्त स्कूल के गेट पर पहच जाए।‘‘
इसके बाद विशाल सर ने बाकी सभी बच्चों को अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने के लिए कहा।
कुछ ही देर में स्कूल से कविता नाम की नौ लडकियो स्कूल के गेट पर पहच गई। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि विशाल सर ने उन्हें गेट पर क्यों बुलाया है। विशाल सर ने सभी लडकियों को दादाजी के सामने जाने के लिए कहा। वे जैसे ही दादाजी के सामने पहची, उनमें से कविता वर्मा नामक लडकी जोर से चिल्लाई - ’’दादू, आप यहो कैसे पहचे?‘‘
फिर वह विशाल सर की ओर मुडकर बोली, ’’सर ये तो मेरे दादाजी हैं।‘‘
कविता अपने दादाजी के पास जाकर बैठ गई, उसके दादाजी ने कविता के माथे को चूम लिया। दादाजी के नैनों से अश्रुट्टाारा बहने लगीं।
विशाल सर ने कविता और हम सभी को सम्बोट्टिात करते हुए कहा - ’’कविता, तुम दादाजी को अपने घर ले जाओ और सुनो, अपने पापा से कहना कि वे दादाजी के लिए एक आइडेंटिटी कार्ड बनावें ताकि अगर दादाजी अपने घर का पता आदि भूल जाऐ तो कोई उनकी सहायता कर सकता है या फोन द्वारा घर पर सूचना दे सकता है। बुजुर्ग लोगों की याददाश्त कमजोर हो जाती है। उन्हें घर का पता या मोबाइल नम्बर वगैरह याद नहीं रहते हैं। मेरे पास कुछ रिक्त आईकार्ड है, जिनके घर में दादा-दादी या नाना-नानी हैं, वे मुझसे कार्ड ले लें तथा उस पर उनके फोटो के अलावा अन्य जानकारी जैसे घर का पता, घर के सदस्यों के मोबाइल नम्बर, इमरजेंसी कॉन्टेक्ट नम्बर, फैमिली डॉक्टर का नम्बर आदि स्वच्छ अक्षरों में लिखें।‘‘
फिर भाग्यश्री अपनी मम्मी की ओर मुखातिब होते हुए बोली, ’’मम्मी, ये कार्ड मैंने अपने सर की सहायता से भरा है।‘‘ ’’भाग्यश्री, तुमने आज बहुत अच्छा काम किया है।‘‘ कहते हुए सुनीता ने अपनी लाडली बिटिया भाग्यश्री को अपनी ओर खींचकर अपने सीने से लगा लिया और अपनी गोद में बिठा दिया।
मम्मी की गोद में बैठे-बैठे भाग्यश्री ने पूछा - ’’मम्मी, बढती उम्र के साथ बूढे लोगों को भूलने की बीमारी क्यों हो जाती हैं।‘‘
भाग्यश्री के सिर पर हाथ फेरते हुए सुनीता ने कहा - ’’बेटा, जैसे-जैसे मनुष्य की उम्र बढती है उसकी स्मरण शक्ति ट्टाीरे-ट्टाीरे कम होने लगती है, यह बहुत ही स्वाभाविक है। यह समस्या जब ज्यादा बढ जाती है तो यह अल्जाइमर नामक बीमारी में बदल जाती है। अल्जाइमर बीमारी की पहचान हो जाने पर दवाइयों से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है, मगर यह एक ऐसी बीमारी है जिसका अभी तक कोई स्थाई इलाज उपलब्ट्टा नहीं हो पाया है। तुम्हारे दादाजी भी दवाइयो ले रहे हैं पर उम्र का तकाजा है, वे ८२ वर्ष के हो गए हैं। अब उन पर दवाइयो भी ज्यादा असर नहीं करती हैं। तभी तो हम, दादाजी का बहुत ट्टयान रखते हैं, इस आयु में हम इन्हें अकेले बाहर नहीं भेजते हैं। तुमने दादाजी का आइडेन्टिटी कार्ड बनाकर बहुत अच्छा काम किया है। अबर अगर वे गलती से भी घर के बाहर चले जाऐगे तो हमें ज्यादा चिंता नहीं होगी। आज मैं तुम्हारे पापा से कहगी कि वे दादाजी के लिए भी एक मोबाइल...‘‘
सुनीता अपनी बात समाप्त करे इसके पहले भाग्यश्री बोल पडी - ’’मम्मी, मुझे जोर से भूख लगी है, प्लीज कुछ खाने को दो ना, मैंने अभी स्कूल की यूनिफार्म भी नहीं बदली है।‘‘
कहते हुए भाग्यश्री अपने कमरे में चली गई और सुनीता गर्व से अपनी लाडली बिटिया को निहारती हुई किचन की ओर बढ गई।
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