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दक्षिण एवं मध्य भारत की यात्रा

योगेश कुमार मिश्र ’योगी‘
प्रकृति ईश्वर के द्वारा प्रदा उसकी सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से प्रथमोत्थक प्रथम एक है। वास्तव में तो सभी इसी में जीते, जनमते व मरते हैं, उसके बाद आता है समाज। समाज में व्यक्ति अच्छा-बुरा, रस-रंग इसी से सीखता व जीता है। वास्तव में देखा जाए तो मनुष्य, जीव-जन्तु, जल-वनस्पति, पौट्टो आदि का लालन-पालन प्रकृति अर्थात् जिसका दूसरा स्वरूप मातृभूमि है, जो करती है। वस्तुतः उदाहरण है कि माता केवल उदर में व कुछ समय के लिए दुग्ट्टा से और रूट्टिार से पालती है जबकि प्रकृति ;मातृभूमिद्ध अंतिम श्वास तक ही पालती है, अतः माता से बढकर प्रकृति मातृभूमि है।
हमारी यात्रा का प्रारम्भ कलिंग एक्सप्रेस से पुरी के लिए ट्टाौलपुर जंक्शन से होता है। रेलमार्ग में यात्रा के बीच में वर्षा (तु में हो रही स्निग्ट्टा बरसती भूमिका बडा मनमोहक व मनोरम दृश्य तैयार करती है। वास्तव में घने व गहरे बीहड नदी, झरने, कृषि सम्पन्न भूमि आदि जो मन को भौतिक शांति न करके एक परम आनन्द की अनुभूति का आभास कराती है। जो कि केवल इसी का इसी में होकर होने का भाव उत्पन्न करती है। मैं प्रारम्भिक जीवन से परिव्राजक रहा ह, अतः मेरे पिर सदैव उसका आशीर्वाद रहा है।
पुरी ः नियत समय पर भगवान जगन्नाथ की पावन पवित्र ट्टारा में मनोभाव से प्रवेश होने का अथोहत सौभाग्य प्राप्त होता है। अपनी यात्रिक दैनिक र्या्ओं के बाद भगवान जगन्नाथ के दर्शनार्थ प्रस्थान होता ह। बडे मनोभाव से श्रीकृष्ण, सुभध, बलराम की काष्ठ देवमयी प्रतिमाओं के दर्शन होते ही उसके उपरान्त मंदिर परिसर के भोजनालय के प्रभाग रूप में जाने का अवसर प्राप्त होता है। बडे जहो लाख व्यक्ति एक साथ भगवान की रसोई का दाल-भात का प्रसाद ग्रहण करते हैं। वहो सम्पूर्ण प्रसाद अन्नपूर्णा प्रसादालय में मिड्डी के व विशु= ट्टाातु से निर्मित पात्रों में ही भोजन तैयार होता है। जो पूर्ण प्राकृतिक चिकित्सा का पालन किया जाता है, जो कि अपनी समृ= व प्रकृति का अभिन्न अंग है। सूर्य मंदिर कोणार्क ः सूर्य मंदिर कोणार्क एक विचित्र, रोचक व अपनी आभा से समुध् सागर के किनारे एक अलौकिक आनन्द की अनुभूति कराता है। जब सूर्य की किरणें उस अखण्ड गुम्बज पर पडती है तो ज्यों लगता है कि स्वयं सूर्य भगवान अपने रथ पर आरूढ होकर ट्टारती पर आ रहे हों या उतर रहे हों। सूर्य मंदिर एक ही प्रकार के पत्थर से निर्मित रथ के आकार का भव्य मंदिर है। जहो एक तरफ सागर है तो दूसरी ओर कलिंग प्रदेश वर्तमान में ओडसा राज्य।
तिरूपति ः तिरूपति भगवान व्यंकटेश्वर ;विष्णुद्ध का मंदिर है जो तिरूमाला पर्वत “ाृंखला पर अवस्थित है। मूल मंदिर स्वर्ण परतों से ढका हुआ है। मंदिर में भक्तों के द्वारा स्वर्णादिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दान से यह प्रसि= है। यहो भक्त अपने कल्याण हेतु महिलाऐ, पुरुष, बालक, वृ=जन अति श्र=ा भाव से मुंडन करवाते हैं। आप तिरूपति के लिए संयान ;रेलद्ध मोटरयान, वायुयान आदि से यात्रा कर पहच सकते हैं।
इसी मार्ग में प्राकृतिक वातावरण व वनों आदि का मोहक दृश्य मिलता है जिससे वहो की स्थानीय कृषि, नारियल व केलिवन भी बहुत मात्रा में दिख रहे होते हैं। कृषि के बारे में देखा जाए तो अगस्त-सितम्बर का समय ट्टाान रोपण का समय है। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अभी भी वहो गो आट्टाारित कृषि है। वास्तव में कहा जाए तो दक्षिण भारतीय कई मायनों तक भारतीय संस्कृति के रक्षक व वाहक हैं। वहो लोगों में अभी तक अतिथि के आदर का भाव प्रदीप्त हुआ दिखाई देता रहता है।
मार्ग में विजयवाडा के बारे में जानकारी मिली कि यह उस सभ्य साम्राज्य का केन्ध् रहा है जो कि विजयनगर साम्राज्य का केन्ध् हुआ करता था। जो कि ज्ञान-विज्ञान और बु=-कौशल के लिए जाना पहचाना जाता है। विजयनगर में अवस्थित अर्थात् विजयवाडा नगर के मट्टय से तुंगभध नदी अपने अथाह निरन्तर प्रवाह के साथ अपनी गति से बढती जा रही है। अब विजयवाडा एक डमजतवचवसपजंद ब्पजल ;महानगरद्ध के रूप में विकसित हो चुका है। विजयवाडा के आम पापड जिन्हें डंदहव श्रमससल कहते हैं, वह देश-विदेश तक बहुत प्रसि= है।
मदुरै ः मदुरै एक आट्टयात्मिक नगर के रूप में जाना जाता है। साथ ही हस्तनिर्मित वस्त्र भ्ंदकसववउ के लिए भी प्रसि= है। मदुरै की लुंगी, ट्टाोती व साडयो विशु= सूती होने के लिए सम्पूर्ण जगत में जानी जाती हैं। साथ ही माता मीनाक्षी अर्थात् अम्मा मीनाक्षी का मंदिर चार विशाल मंदिर और चार नौ मंजिलों के गोपुरों में भी इस स्थान की सुन्दरता बढ जाती है। मीनाक्षी मंदिर का अंदर का स्थान बहुत ही विशाल व खुला हुआ है। अम्मा मीनाक्षी मंदिर के मट्टय में स्थित गर्भ गृह में विराजती हैं और उन्हें कुमकुम और वस्त्रम का प्रसाद चढाया जाता है। मंदिर के चारों ओर प्रशासन की चौकसी व्यवस्था है।
रामेश्वरम् ः रामेश्वरम् का नाम आते ही मन में एकाएक ही भगवान शिव का ट्टयान आता है और मन आत्मा और तन भक्ति के भावों से हिलोरे लेने लगता है। मदुरै से रामेश्वरम् की यात्रा रेल से आरम्भ होती है। रात्रि को पहचने के बाद रामेश्वरम् मंदिर के उारी गोपुरम के पास आवास की व्यवस्था एक यात्री विश्रामालय में होती है। वहो केवल दो दिन रुकने का सौभाग्य प्राप्त होता है। सुबह जल्दी तैयार होकर मंदिर के मुख्य द्वार के सामने ही रामेश्वर सरोवर ठंल व ठमदहंस में सभी ओर श्र=ालु पूजा-अर्चना के उपरान्त उसमें स्नान करते हैं। उसके बाद मंदिर परिर्माक में स्थापित २२ तीथोङ के नाम पर कुऐ हैं जहो स्नान करना पडता है तथा उनका शुल्क ३५ रुपये तय है। स्नान के पश्चात् वस्त्र आदि बदलकर मंदिर के गर्भगृह हेतु चल पडते हैं। वहो कुछ पूजा-अर्चना और कुछ देवी- देवता के दर्शनार्थ तय शुल्क देकर आप दर्शन कर सकते हैं। वहो भीड न होने पर दर्शन १.३० घण्टे में व अत्यट्टिाक भीड होने पर २-३ घण्टे में आप गर्भगृह में विराजमान भगवान रामेश्वरम के दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकते हैं, साथ ही आप वहो पुजारी को १०० रुपये की भेंट देकर दर्शन का लाभ प्राप्त करके अपने जीवन को सुरगम्य आनन्द की अनुभूति प्राप्त करा सकते हैं। दर्शन के उपरान्त आप मंदिर के आस-पास भोजनालय में कम राशि में स्थानीय और गुजराती, मारवाडी, राजस्थानी आदि नाम से भोजन की श्रेणियों का आनन्द प्राप्त कर उदर की क्षुट्टाा को शांत कर सकते हैं। अपने आवास पर आने के बाद कुछ समय की विश्रान्ति लेने के बाद रामेश्वरम् के आस-पास के ट्टाार्मिक व पर्यटक केन्ध् देखने की योजना बनती है तो वहो के आस-पास के कुण्ड के दर्शन करने के पश्चात् ट्टानुषकोडी सबसे पहले जाने का निश्चय हुआ। ट्टानुषकोडी रामेश्वरम का सबसे पुराना गोव था और रामेश्वरम का सबसे बडा मत्स्य केन्ध् था, किन्तु कोई ३-४ दशक पूर्व आये एक भयंकर तूफान से वह गोव नष्ट हो गया। अब वहो केवल आपको पुराने खण्डहर व घर दिख सकते हैं और कुछ लोग वहो झोंपडी बनाकर रह रहे हैं और ट्टानुषकोडी आने वाले पर्यटक को सामुध्कि सामग्री बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। ट्टानुषकोडी दो समुधें का संगम स्थल है और कुछ दूरी पर श्रीलंका की सीमाऐ प्रारम्भ हो जाती हैं। आप उसे देखने के लिए स्टीमर या नाव का उपयोग कर वहो जाकर उसे देख सकते ह। ट्टानुषकोडी के किनारे उस सामुध्कि संगम को देखने का एक अद्भुत पूर्ण अनुभव व आनन्द प्राप्त होता है। वहो के शांत वातावरण में गर्जन होता हिन्द महासागर तो दूसरी ओर एकदम सरोवर की भोति शांत पडी हुई बंगाल की खडी ;गंगासागरद्ध। यह देखकर ऐसा लगता है कि प्रकृति ने भी यह संगम इसलिए तैयार किया है कि लोग भी यह देख सकें, समझ सकें कि सभी को मिलकर साथ चलना चाहिये। सभी एक-दूसरे से जुडे रहें। खैर इस अद्भुत संगम के दृश्य का लाभ लेने के पश्चात विभीषण के मंदिर के दर्शनार्थ प्रस्थान हुआ। यह ट्टानुषकेाडी से आते समय ३ कि.मी. की दूरी पर है। यह बंगाल की खाडी की ओर है, इसके बारे में कहा जाता है कि यह स्थान बहुत ही निर्णायक रूप में था। यहो भगवान मर्यादा पुरुषोाम श्रीराम ने विभीषण को लंका का राजा नियुक्त किया और उनका यहीं पर राज्याभिषेक किया था और यहो उन्हें राजदण्ड प्रदान किया था। इसके दर्शन के बाद रामेश्वरम के मट्टय स्थित भारत के महान वैज्ञानिक, पूर्व राष्टत्र्पति व शिक्षाविद् डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के घर को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। उनका घर कोई २०ग४० के आस-पास भूमि सीमांकन में स्थित है जो कि भ्वनेम व ज्ञंसंउ उसका नामकरण किया गया है। उसे उनकी स्मृति म्यूजियम के तौर पर प्रथम मंजिल बनाई गई है और दूसरी मंजिल पर ट्टाार्मिक व प्रसाट्टानिक सामग्री का विर्यन केन्ध् है जो कि इससे होने वाली आमदनी से इसकी साज-सम्भाल की जाती हैं। वहो से मैंने भी एक दक्षिण मूर्ति शंख लिया और उसे निहारते हुए वापस अपने आश्रय स्थल पर आ पहचे। वहो कुछ देर ठहरने के बाद भोजन आदि लेने के उपरान्त रेलवे स्टेशन ;संयान स्थानकद्ध पर संयान ;रेलद्ध से मदुरै पहचता ह। उसके पश्चात् रेल से ही कन्याकुमारी के लिए प्रस्थान करता ह। पूरा डेढ दिन चलने के बाद कन्याकुमारी के संयान स्थानक पर संयान रुकती है। वहो से यात्री मो कन्याकुमारी के दर्शन करते हैं। माता कन्याकुमारी को माता पार्वती के ब्र॰चर्य रूप में देखा जाता है, जो शिव की साट्टाना में लीन है। माता कन्याकुमारी के मंदिर प्रांगण में उनकी स्मृति के रूप में उनकी चरणपादुका के चिँ अवशेष हैं। उनके दर्शन के पश्चात् विवेकानन्द स्मारक शिला के दर्शन के लिए निकल पडते हैं। विवेकानन्द, वही विवेकानन्द हैं जिन्होंने समुचित विश्व में हिन्दुत्व के ट्टवज को लहराया था, जो उनके अंतिम समय में ट्टयान के साट्टाना केन्ध् के रूप में रही है। स्टीमर के द्वारा आप वहो पहच कर उनके ग्रेनाइट के स्मारक भवन को देख सकते हैं। कन्याकुमारी से मदुरै और मदुरै से तिरूअनन्तपुरम् हेतु प्रस्थान किया। तिरूअनन्तपुरम् में भगवान पद्मनाभ का भव्य मंदिर है। पद्मनाभ भगवान विष्णु के अवतार हैं व उनकी शयन मुध में पैर दबाती हुई काले रंग की एक पत्थर से निर्मित मूर्ति है। भगवान पद्मनाभ भव्य विगृह में अवस्थित व विराजमान हैं। इस मंदिर के बारे में कई पौराणिक किंवदंतियो हैं। मंदिर में आप केवल एक लुंगी लगाकर ही प्रवेश कर दर्शन कर सकते हैं और अन्य कोई भी सामग्री साथ में नहीं ले जा सकते हैं। भगवान का शयन मुध में दर्शन आपको मनोहर रूप में आनंदित करता है। उसके बाद पुनः मदुरै आकर वहो से दांती ;महाराष्टत्र्द्ध की ओर फिर अहमदनगर और उससे शिरडी की ओर जाना होता है। वहो से बस स्थानक ;ठने ैजंदकद्ध पर रुकने के बाद अपनी दैनिक र्या।ओं से निवृा के उपरान्त बस स्टेण्ड के पीछे मंदिर टत्र्स्ट की पास व्यवस्था हेतु केन्ध् स्थापित है, जिससे आप पास प्राप्त कर सकते हैं। कुछ दूरी पर मंदिर के परिसर की शुरुआत हो जाती है। मंदिर टत्र्स्ट के आवास व्यवस्था से आवास कक्ष की चाबी कुछ नियमावली पूरी करने के बाद बहुत ही न्यूनतम शुल्क में एक अच्छी व व्यवस्थित व्यवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। वहो दो दिन रुकने का अवसर प्राप्त होता है। उसमें प्रथम दिन हम कुछ देर आवास में विश्राम के उपरान्त मंदिर के दर्शनार्थ प्रस्थान करते हैं। कोई तीन घण्टे की प्रतीक्षा पंक्ति में लगने के बाद संाईनाथ की प्रतिमा के दर्शन का लाभ प्राप्त होता है। मंदिर टत्र्स्ट श्र=ालुओं की आवश्यकता की पूर्ति हेतु व्यवस्था की बहुत ही कौशल्यता को लिए रखता है। मंदिर में ५०० मीटर की दूरी पर सांई भोजन प्रसादालय का भोजन ग्रहण कक्ष है। जिसमें ५००० की संख्या एक साथ में भोजन प्राप्त करती हैं। वह भी निःशुल्क रूप से उपलब्ट्टा है और मंदिर के आस-पास बहुत-सी प्रसाद व अन्य सामग्री विर्य केन्ध् हैं। यहो यात्री वाहन के द्वारा शनि सिगनापुर के लिये चल पडते हैं। मार्ग में रुककर रसपान करने की इच्छा होती है तो वहो लकडी के कोल्हू और बैल से निकाला गया रस पीकर आनन्द की अनुभूति होती है और फिर चल देते हैं। कुछ समय के बाद मंदिर के बाहर आकर वहो की पूजा-सामग्री खरीद कर मंदिर में प्रवेश करते हैं। वहो प्रतीक्षा पंक्ति में प्रतीक्षा करने के बाद कोई १.४५ घण्टे में दर्शन लाभ होने का सौभाग्य मिलता है। मंदिर एक चबूतरेनुमा पर एक काले पत्थर के रूप में खुले आसमान पर शनि जी विराजते हैं। वहो अन्दर सरसों, तिल का तेल चढाते हैं और अपनी-अपनी मनोकामना की पूर्ण प्राप्ति की कामना करते हैं। शनि शिगनापुर से वापस शिरडी आकर वहो से मंदिरों के शहर नासिक की यात्रा एक निजी कार द्वारा प्रारम्भ हो जाती है। इस मार्ग में बहुत ही मनोहर व आनंदित कर देने वाली प्राकृतिक छटाओं को देखने का अवसर प्राप्त हो जाता है। नासिक के अंगूर और अनार सम्पूर्ण देश में बहुत ही प्रसि= है। नासिक पहचने पर रामघाट पर पांच दिवस के लिए आवास हेतु एक लॉज लेने के बाद वहो सामान रखने के बाद ही रामघाट व गोदावरी नदी को देखने के बाद महाविभूत भगवान शिव कपालेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन हेतु चल देते हैं। वहो से पुष्प, दुग्ट्टा और पूजन सामग्री लेकर उनके दर्शन करके अपने आवास की ओर लौट आते हैं। उसके बाद आवास व्यवस्था उपलब्ट्टा होने के बाद वहो पंचवटी में उन वटवृक्षों को देखने का अवसर प्राप्त होता है जहो कभी भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और सीता जी के साथ ठहरे थे, जो कि आमने-सामने विशाल रूप में अपनी छत्र-छाया में लोगों को अभी भी आश्रय देते हुए एक सुखद अनुभव का लाभ दे रहे हैं। इस विषय में ऐसा कहा जाता है कि यहो प्रभु ने अपने वनवास काल में कुछ समय के लिए अपनी आश्रय स्थली के रूप में चुना था। तब से ये भारतीय समाज के लिए एक पूज्य व तीर्थस्थल के रूप में स्थापित है। इसके अगले दिन भगवान त्र्यम्बकेश्वर के दर्शन लाभ लेने का अवसर प्राप्त होता है जो कि बस के द्वारा कोई पौन घण्टे की यात्रा के उपरान्त आप वहो पहच सकते हैं। कोई तीन घण्टे पंक्ति में इंतजार करने के उपरान्त भगवान त्र्यम्बकेश्वर के रूप का दर्शन करने का लाभ प्राप्त हुआ। भगवान एक काले पत्थर के मंदिर में एक गर्भगृह में कुण्ड के अंदर तीन भागों में एक ही चर्‍ीय कुण्ड के तीन प्रकार ब्र॰ा, विष्णु और स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं। उसके दर्शन उपरान्त उनके पीछे अवस्थित पर्वतीय लघु “ाृंखला को देखने पर मन बहुत अट्टिाक रूप से प्रफुल्लित होता है। जैसे लगता है कि प्रकृति भगवान की सेवा में यह दृश्य स्थापित करती हैं। उस पहाडी से लगता है कि छोटी-छोटी बारीक फुहारों के अलावा पहाडी में हरीतिमा के बीच गिरते झरने और उनको छूते बादल के ट्टाुंट्टा में बहुत ही अविस्मरणीय यात्रा का न भूलने योग्य सुखद रूप से भर देती है। वहो से आने के उपरान्त रेलमार्ग से अपने गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान होता ह। मार्ग में कई प्राकृतिक छटाऐ मन को मनभावन युक्त कर प्रफुल्लित कर देती है और यात्रा की थकान को भी दूर करने में अपना योगदान प्रदान करती हैं।
मट्टय भारत और दक्षिण भारत की यात्रा के उपरान्त वास्तव में ऐसा लगता है कि विभिन्नता होने के बाद भी, खान-पान, रहन-सहन, बोली-भाषा व कार्य प=ति अलग होने के बाद भी वह एकता में विविट्टाता के रूप में हैं।
संयोजक ः अ.भा.सा. परिषद्, ट्टाौलपुर, मो. ९६३६२८७२२३