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अश्र्वत्थ के मिस....

गोपालजी गुप्त
भारतीय संस्कृति अनादिकाल से वन, वृक्ष, वनस्पति आदि से जुडी रही है। अरण्य हमारी विराट् सांस्कृतिक चेतना की उत्स-भूमि रही। इसी से भारतीय संस्कृति को अरण्य संस्कृति कहा गया, क्योंकि हमारा प्राथमिक चिंतन अरण्य में ही उपजा। वनाश्रमों में ही मनुष्य विकास पर अग्रसित हुआ, सत्य का साक्षात्कार कर वेद वा-्मयादि रचे। चार पुरुषाथोङ का निट्टाार्रण किया, तपोवनों में संतुलित हो जीवन की पूर्णता प्राप्त की। वस्तुतः समस्त संस्कारों का उद्गम केन्ध् भी अरण्य, वन, तपोवन आश्रम ही रहे हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार वनस्पति तथा मनुष्यों का चिरन्तन सम्बन्ट्टा है, दोनेां के विकास हेतु जल तथा ट्टाूप अपरिहार्य है, वृ= हेतु ट्टाूप तथा पोषण हेतु जलरूपी स्नेह। मनुष्य को गुरु, पिता, भ्रातादि का अवलम्ब चाहिए जो उसे अनुशासित करे वरनावह कद में छोटा रह जायेगा तो वृक्ष को ट्टाूप चाहिए अन्यथा वह अविकसित रह जायेगा, मुरझा जायेगा। यही साम्यता वृक्ष तथा मनुष्य को एकसूत्र में आब= करती है। प्रत्येक मानव-संस्कृति जीवन-तरु की बात करती है, क्योंकि संस्कृति की निरन्तरता वृक्ष की निरन्तरता से तुली होती है।
भारतीय पौराणिक-ट्टाार्मिक ग्रंथों में वृक्षों को देवता कहा गया है जिसमें अ“वत्थ ;पीपलद्ध को विशिष्ट बताया गया है। तैारीय संहिता में अ“वत्थ अत्यन्त पवित्र वृक्ष कहा गया है। पद्मपुराण में इसे वृक्षराज कहा गया है तथा इसके मूल में ब्र॰ा, त्वचा में विष्णु, शाखा में शिव तथा पत्रों में देवगणों का वास बताया गया है।१ स्कन्दपुराण में भी ऐसा ही उल्लेख है।२ कठोपनिषद् में इसका मूल तव विशु= ब्र॰ कहा गया है।३ इस तरह पीपल के वृक्ष को
१. मूले ब्र॰ा त्वचा विष्णुः शाखायां तु शंकरं पत्रे पत्रे देवानां वृक्षराजे नमो*स्तुते।
२. मूले विष्णुः स्थितो नित्यं स्कन्ट्टो केशव एव च। नारायणस्तु शाखासु पत्रेषु भगवान हरिः। ;स्कन्द पुराण/नागरखण्ड/२४७/४१-४२द्ध
३. ट्टिर्वमूलो*वाक्शाख एषो*“वत्थः सनातनः। तदेव शुर्ंद तद्ब्र॰ तदेवामृतमुच्यते।। ;कठोपनिषद् २/३२/१द्ध
विशिष्ट महव मिला है। वस्तुतः इसका आट्टयात्मिक, सांस्कृतिक महव होने के साथ इसमें निहित वैज्ञानिक तथा औषट्टाीय गुण इसे विशिष्टता प्रदान करते हैं। मुण्डकोपनिषद्१ में शरीर को पीपल का वृक्ष तथा जीवात्मा और परमात्मा को दो मित्र पक्षी कहा गया है जो सदैव साथ-साथ रहते हैं। उनमें से एक पक्षी ;जीवात्माद्ध कर्मानुसार प्रारब्ट्टा से प्राप्त पीपल वृक्ष के फल को खाता है जबकि दूसरा ;परमात्माद्ध नीरव हो साक्षी भाव से फल न खाते हुए अवस्थान करता है।
वनस्पति शास्त्र में इसे सेर्‍ेडफीगटत्री नाम मिला है किन्तु साहित्य तथा विभिन्न क्षेत्रीय अंचलों में इसे सामान्तया पीपल, पिप्पल, चैत्यवृक्ष, याज्ञिय, क्षीरध्ुम, बोट्टिातरु, चलपत्र वृक्ष, गजासन, नागबन्ट्टाु, महाध्ुम, देवात्मा, गजभक्षक, पीपर, ट्टानुवृक्ष, अरली, देवसदन, वासुदेव वृक्ष आदि नामों से जाना जाता है। संस्कृत में इसे अ“वत्थ कहा जाता है, जिसका अर्थ है अक्षय काल की परम्परा से इतर, ’“वत्थ‘ का अर्थ होता है ’कल तक रहने वाला‘।
हिमालय के उच्च शिखरों को छोडकर सर्वत्र उपलब्ट्टा पीपल न केवल वैष्णव परम्परा में ही वरन् जैन, बौ= परम्पराओं में आस्था का प्रतीक है। बोट्टागया में, उरुबेला के निकट, निरंजना नदी तट पर अ“वत्थ वृक्ष तले ही सि=ार्थ गौतम बु= बने तथा सम्यक सम्बोट्टिा प्राप्त की थी। वैसे यह वृक्ष पूरे भारत में पूजनीय है। यद्यपि (ग्वेद२ में किसी भी वृक्ष को काटने की निन्दा है तथापि पीपल वृक्ष को काटने से लोग न केवल बचते १. द्वा सुपर्गा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यन“चन्नन्यो अभिचाकशीति।। ;३.१.१द्ध
२. मा काकम्बीर मुद्वृहो वनस्पतिमशस्तीर्वि हि नीनशः। मोत सूरी अह एवा वन ग्रीवा आदथते वेः।। ;६.४८.१७द्ध
हैं, बल्कि इसकी पावनता को ट्टयान में रखकर काटने से भयभीत भी होते हैं/डरते हैं। लोग इसके पाों पर राम नाम लिखते हैं, महिलाओं के बीच उनकी मनौतियों, उत्सव की स्मृतियों को जागृत करने वाला यह जीवन्त अभिभावक है। इसके नीचे आते ही महिलाऐ विनीत, सरल हो अपनी मनोकामनाऐ व्यक्त करती हैं। पद्मपुराणानुसार इस वृक्ष में समस्त तीथोङ तथा पितरों का भी वास होता है, इसके तले मुण्डन संस्कार भी होते हैं। इसकी छोव में साट्टाु-फकीर ट्टाूनी रमाते हैं। कुछ महिलाऐ इस पर ट्टाागा बोट्टा कर सिन्दूर लगा पूजती थी है। इसे सत्य, ब्र॰ का प्रतीक मान इसके छोव में ग्राम्य पंचायतें भी होती हैं, क्योंकि इसके तले असत्य भाषण पाप माना जाता है। शनिवार को लोग इसकी जड के पास दीये जलाते हैं।
यह वृक्ष दुर्निवार है अर्थात् किसी को रोपे जाने की बाट नहीं देखता, कहीं भी स्वतः उग जाता है। खण्डहरों, मकान की सन्ट्टिायों, वृक्ष की खोखलों, पत्थरों तक भी जम जाता है। खाद-पानी न मिले, मौसम कैसा भी हो इसे चिन्ता नहीं। पक्षी इसका गोदा खा जहो बीट गिरा दे वहीं जड जमा लेता है, फिर फैलने लगता है। चाहे जितनी बार नोचें पर हार नहीं मानता, पराजित होना यह जानता ही नहीं, क्योंकि इसमें असीम जिजीविषा जो होती है - जीवन के प्रति अटूट आस्था।
इसकी पायो मनहर होती हैं। पान के आकार की चौडी नुकीली। पतझड में यह पूर्ण नग्न दिगम्बर हो जाता है। शीघ्र शाखों पर लाल रंग की कोपलें निकलती हैं जो प्रतिदिन रंग बदलती हैं। गुलाबी, तांबई, हरा, पीला, मटमैला ठीक जीवन की भोति। नवपल्लव हिलते ही रहते हैं, चाहे हवा चले या नहीं जो पताकाओं की तरह प्रतीत होती हैं। भयंकर उमस में भी डोलती रहती है। कुछ दिनों में ही टहनियों के सिरे पर ठूंसे निकलती हैं जिन पर गोल-गोल फल निकलते हैं, वे भी शीघ्र ही तंबई रंग के हो जाते हैं। इसे ही ;गोदाद्ध पक्षी चाव से खाते हैं तथा इसी के बीट ;बीज सेद्ध नए वृक्ष आते हैं। इस वृक्ष की छाया वातानुकूलित होती है। ग्रीष्म में शीतल, शीतल में गर्म। केवल यही वृक्ष है जो चौबीसों घण्टे प्राणवायु ;व्गलहमदद्ध प्रदान करता है।
जहो इस वृक्ष से वातानुकूलित छाया मिलती है, वहीं इस वृक्ष से भय भी उत्पन्न होता है। मृतक के दाह- संस्कार के पश्चात् इस वृक्ष पर एक घट भी बोट्टाते हैं, जिसे जीवन घट कहा जाता है। इस घट से ही वृक्ष पर अंतिम शु= तक ;दसवो तकद्ध जल की बदें टपकती रहती हैं तथा वृक्ष का सिंचन करती हैं। ;पीपल को ट्टार्मशास्त्रों में निरन्तरता का प्रतीक माना जाता है तथा मान्यता है कि जीवन घट की रिसती बदों से जीवन की निरन्तरता बनी रहेगी। इसी से इस वृक्ष का एक नाम जीवनतरु भी हैद्ध। अन्य शब्दों में कहा जाए तो अ“वत्थ हर्ष-विषाद, राग-विराग, जीवन-मृत्यु सभी का विस्तारक हैं। एक ओर जहो यह सत्य का आश्वासन देता है वहीं दूसरी ओर भय का प्रसार भी करता है। इसी कारण यह एकाकी, विरागी, निःसंग है और इसके खोखले तनों में विषट्टार भी बसेरा करते देखे जाते हैं तथा लोककथाओं में इस वृक्ष पर भूतों, प्रेतों, पिशाचों का वास भी माना जाता है।
अ“वत्थ के औषट्टाीय गुण भी इसे विशिष्ट महवपूर्ण बनाते हैं। इसकी शाखा, जड, छाल, पो, फल सभी के औषट्टाीय प्रयोग हैं, जो अनेक व्याट्टिायों के निराकरण में प्रयुक्त होते हैं। इस वृक्ष में कीटाणुओं, पर्यावरण- प्रदूषकों को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। यह परिवेश शोट्टाक है। रात में पक्षियों का बसेरा, सुबह उनकी चहचहाहट, दोपहर का सन्नाटा, निशा की भयावहता, प्रातः-सांय की हलचल, निष्पन्दता, वसन्त का प्यार-दुलार, पतझड की मार, शीत का कुहरा, निदग्ट्टा की स्निग्ट्टाता, पावस का हर्ष, शरद की चन्ध् ज्योत्सना, सब कुछ सहते-भोगते हुए यह मनुष्य को जीवन का बोट्टा ज्ञान कराता है। सम्भवतः यही कारण है कि जीवन यज्ञ के अप्रतिम पुरोट्टाा, यशोदानंदन श्रीकृष्ण ने गीता ;१०/२६द्ध में इसे अपना स्वरूप-विग्रह घोषित करते हुए पार्थ से कहा है - अ“वत्थः सर्ववृक्षाणाम्।
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