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कृष्णा जाखड जागतिक-चेतना मीरां

कृष्णा जाखड
खडे हमारे समाज में पोच सदी पूर्व एक अबोट्टा मासूम बच्चे ने जन्म लिया। मगर ठीक आज ही की तरह उसे जन्मते ही लडकी कहा गया, बच्चा नहीं। उसी लडकी ने सलाखों से निर्मित बर्बर सामंती साा या व्यवस्था से अकेले ही लगभग चालीस वर्ष तक अपनी जागतिक चेतना से लोहा लिया। निर्भय मीरो का साहस क्या सिर्फ अपने स्वयं की मुक्ति के लिए था? नहीं, मीरो अपने लिए नहीं लड रही थी। वह तो मानव की व्यक्ति-चेतना को जगाना चाहती थी। इस सामंती व्यवस्था की जकडनों को तोडकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की चाह रखती थी। मीरो के इसी साहस को आलोचक जीवनसिंह ने इस प्रकार व्यक्त किया है - ’’वे अपने राजसी वैभव के प्रति उदासीन ही नहीं रहती, वरन उसके भीतर की कुटिलताओं और शूध्ताओं का बार-बार उल्लेख इसीलिये करती हैं कि लोग सामंतवादी व्यवस्था की उन सीमाओं और वास्तविकताओं को अच्छी तरह जानें, जो उनकी व्यक्ति-स्वाट्टाीनता को अपने अनुसार नियंत्रित करती हैं, चूंकि हमारे परिवेश में आज तक भी हमारी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक स्थितियों में सामंतवादी जकडन मौजूद है तो हम आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि पोच शताब्दियों पूर्व वाले घोर सामंती समाज में मीरो की कैसी हालत रही होगी‘‘ ;मीरा ः एक मूल्यांकन, सं. अरुण चतुर्वेदी, पृ. १०५द्ध
मीरो अगर स्वयं के लिए या भक्ति के लिए संघर्ष कर रही होती है तो यह सब इतना मुश्किल न था। राजपरिवारों में वह पहली स्त्री नहीं थी जो भक्ति में लीन रहना चाहती थी। राजपरिवार के लिए तो यह अच्छा ही होता कि सांगा की सबसे बडी बहू होते हुए
भी वह महल के किसी एक कोने में बैठकर कृष्ण की भक्ति करती और साा में कहीं हस्तक्षेप नहीं करती। मीरो महज भक्ति कवयित्री नहीं है। मीरो ने सामंती मानसिक जकडन के विरु= वैयक्तिक स्वातंत्र्य प्रेमी कृष्ण को ही आराट्टय क्यों चुना, यह भी विचारणीय है। मीरो के इस विधेह को दबाना या मीरो की आवाज को बंद करना सामंती परिवार के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था, मगर मीरो की जो वैयक्तिक चेतना थी उसको खत्म करना मुश्किल था। इसी कारण बडी साजिश या षड्यंत्र से मीरो को भक्त-कवयित्री सि= कर दिया गया और पूरा विधेह, जीवन-संघर्ष, व्यक्तिचेतना की लडाई, स्त्रीमुक्ति का आगाज - सभी उस षड्यंत्र के नीचे दबा दिए गए। मीरो को साा से कोई सरोकार नहीं, सुख-सुविट्टााओं का कोई लालच नहीं, उसे तो व्यक्ति-स्वातंत्र्य के आगे सारे सुख फीके लगते हैं। व्यक्ति स्वतंत्रता के लिए वह साा को सीट्टो ललकारती है - ’’राणाजी थे क्यांने राखो म्हां सूं बैर?/थे तो म्हाने इसडा लागो ज्यूं ब्रिच्छन में कैर।‘‘
मीरो की जागतिक चेतना मेवाड की रियासती चौहड्ढियों में कैद नहीं रह सकी। यदि वह केवल भक्त होती तो ऐसा होना मुश्किल नहीं था। मगर वह मात्र भक्त नहीं हो सकती। मीरो ने इसी वैयक्तिक चेतना को आलोचक माट्टाव हाडा भी स्वीकार करते हैं - ’’मीरो की कविता में वैयक्तिक जीवन बहुत मुखर है, इस गंभीर विचार- विमर्श की जरूरत है। यदि मीरो केवल भक्त है, तो फिर उसकी कविता में उसका वैयक्तिक जीवन मुखर और पारदर्शी नहीं होना चाहिए‘‘ ;मीरा ः एक मूल्यांकन, सं. अरुण चतुर्वेदी, पृ. ५१द्ध।
मीरो ने ऐसे जीवन का चुनाव आनन-फानन में तो नहीं किया होगा? यह गहन चिंतन के बाद लिए गए निर्णय का ही परिणाम है कि जब एक बार इस रास्ते पर कदम रख दिया तो पूरे जीवन अपने अस्तित्व के लिए लडी। आत्मविश्वासरूपी कृष्ण-कवच को ट्टाारण किए मीरो ने कह दिया - ’सिसोद्यौ रूठ्यो म्लारो कांई कर लेसी।‘ मीरो के इस आत्मविश्वासरूपी कवच के लिए आलोचक बच्चन सिंह कहते हैं - ’’इस विश्वास-रूपी रक्षा कवच के कारण राणा उसे मार नहीं सके। उसकी स्पष्ट घोषणा थी कि ’लोक लाज कुल की मरजाद यामें एक न राखगी।‘ आगे चलकर उन्होंने और भी स्पष्ट कर दिया है - ’वरजी मैं काहू की न रह।‘ इसी को कहते हैं वास्तविक जिंदगी को जीना। मीरो ने यह निर्णय स्वयं लिया और उसी को जीया भी‘‘ ;हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, पृ. १३४द्ध।
’लोकलाज कुल की मरजाद यामें एक न राखूंगी‘ यह कह देने की हिम्मत रखने वाली मीरो ने दासता की बेडयों को तोडने के लिए बाह्म आडम्बरों का सहारा लिया होगा, यह विचारणीय है। भगवा-वस्त्र, माला, खडताल ट्टाारण करने वाली मीरो की छवि का निर्माण भी एक सामंती साजिश ही रही होगी। जो मीरो बडी सहजता से कह जाती है - ’’स्वाग भाग देवी के सारै, तो क्यूं दिां विट्टावा घरां तुम्हारै‘‘/’’गिरट्टार गास्यां, सती न होस्यां।‘‘ वह मीरो तात्कालिक समय में सामान्य स्त्री या भक्त स्त्री तो नह ही होगी। मीरो उस समय में सामाजिक और ट्टाार्मिक ही नहीं, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी बहुत मजबूत व्यक्तित्व की ट्टानी भी रही होगी। मीरो का स्वतंत्र व्यक्तित्व एक उच्च मुकाम तक पहचा होगा, नहीं तो साा के सामने इस तरह चुनौती बनकर न खडी हुई होती। मीरो के इसी स्वतंत्र व्यक्तित्व को आलोचक माट्टाव हाडा भी स्वीकार करते हैं - ’’मीरो जीवन विरत संत-भक्त और जोगन नहीं थी, वह प्रेम दीवानी और पगली नहीं थी और वह वंचित-पीडत, उपेक्षित और असहाय स्त्री भी नहीं थी। वह एक आत्मसचेत, स्वावलम्बी और स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली सामंती स्त्री थी‘‘ ;मीरो का जीवन और समाज ः पचरंग चोला पहर सखी री, माट्टाव हाडा, पृ. ९द्ध।
मीरो की जागतिक चेतना केवल स्त्री के लिए ही प्रेरणा नहीं है, हर एक उस सामान्य व्यक्ति के लिए भी है जो आज के लोकतांत्रिक युग में मुक्तिकामी है। मीरो ने सहारे नहीं ढढे। उसे पता था कि इस दुनिया में उसका साथ देने वाला कोई नहीं, तभी तो वह कह पाई - ’म्हारै तो गिरट्टार गोपाल, दूसरो न कोई।‘ / ’सगो सनेही मेरो न कोई, बैरी सकल जहान।‘
कृष्णरूपी प्रेम-डोर के सहारे वह अपने अस्तित्व को पहचानती है। अपने वजूद को पहचान लेने वाला व्यक्ति मर तो नहीं सकता और मीरो इसका सबसे बडा उदाहरण है। इतने वषोङ में मीरो के यथार्थ को, संघर्ष को जडता-रूढी को तोडने के लिए किए गए प्रयासों को खत्म करने के लिए कितनी कोशिश की गई, मगर आज भी वह जिंदा है। हर एक जागतिक चेतना में मीरो है, हर एक स्त्री अस्तित्व में मीरो है। वह स्त्री मुक्ति का आगाज, प्रेरणा की एक लौ, आजादी की एक चिंगारी है - जो आज भी निरन्तर है। मीरो की कविता हमारे सामने, विशेषकर स्त्री के सामने दोनों हाथ फैलाकर मुक्तिमार्ग इंगित कर रही है - ’’वस्तुतः मीरो की कविता प्रतिबंट्टाों के साये में जीवन जीने वाली, मनुष्यता के अट्टिाकार से वंचित स्त्री-जाति की मुक्ति का घोषणापत्र है, जिसमें स्वतंत्रता, समता, न्याय, सम्मान, स्वाभिमान, सपनों, वाणी और भाषा के लिए गहरी बेचैनी और छटपटाहट मौजूद है‘‘ ;आशीष त्रिपाठी, मीरा ः एक मूल्यांकन, सं. अरुण चतुर्वेदी, पृ. १४९द्ध।
मीरो के जीवन पर जितने मिथक गढे गए उनमें एक उनकी मृत्यु का भी रहा। तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों के कारण मीरो ने मेवाड-मेडता छोडा। मीरो की मेवाड से शुरू हुई यात्रा गुजरात ;द्वारकाद्ध तक चलती रही। मीरो की यात्रा पलायन नहीं थी और न ही कोई ट्टाार्मिक रही होगी। मीरो का पूरा व्यक्तित्व इस बात का गवाह है कि वह तत्कालीन समय की एक महवपूर्ण सामाजिक-उत्प्रेरक रही और समाज जिससे प्रेरणा लेता है, साा उस व्यक्ति की चेतना से हमेशा डरती है। तथ्यों के आट्टाार पर मीरो जब १५३७ ईस्वी में द्वारका पहची तब तक अपने ही जैसे कई प्रगतिशील विचार वाले व्यक्तियों से मिली होगी। अपने पूर्ण परिपक्व व्यक्तित्व के साथ मीरो गुजरात में लम्बी अवट्टिा तक रही और इस दौरान वह गुजरात की लोकसंस्कृति में गहरे तक रच-बस गई। मीरो की कुछ रचनाओं का गुजराती में लिखा जाना भी इसी कारण रहा होगा। मीरो ने मेवाड तो बहुत पहले छोड दिया। १५३५ से पहले ही, क्योंकि गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह का आर्‍मण और चिाौड का दूसरा शाका प्रसि= है, उस समय मीरो चिाौड में नहीं थी। मीरो मेडता भी अट्टिाक समय तक नहीं रह सकी, क्यकि १५३६ ईस्वी में मालदेव का मेडता पर आर्ममण हुआ, उसके बाद मेडता कई दिनों तक अस्त-व्यस्तता को झेलता रहा। इसी कुछ समय में मीरो ने अपना पीहर- ससुराल त्यागा। यह पीहर-ससुराल मीरो को जीवन के अंतिम समय तक याद आते रहे। मीरो भी एक सामान्य मानव ही तो थी। वह अपनी पुरानी स्मृतियों से कभी विचलित तो हुई ही होगी। स्मृतियों की बेचैनी मीरो की कविता में भी उतर आई - ’’आंबा पाक्या, कलहर कैरी, निंबूडा म्हारे देस।/उदेपुर रा राणा किण विट्टा छोड्यो दस/मेवाडी राणा कुण पर छोड्यो देस‘‘ ;मीरो पदावलीद्ध।
मीरो की यह तडप अपनों के लिए, अपनी ट्टारती के लिए है। मगर वह सम्भल जाती है और सोवरे का सहारा अवलम्ब बन जाता है - ’’गिरट्टार ट्टाणी, कडूंबो गिरट्टार, मात पिता सुत भाई/थे थारे म्हे म्हारे हो राणाजी, यौं कहे मीरो बाई।‘‘
कृष्ण रूपी प्राणतव मीरो के साथ हमेशा रहा। हर छोटी-बडी घटना या विचलन वह इसी प्राणतव के सहारे सुलझाती या झेलती चलती चली गई। फिर हम कैसे मान सकते हैं कि ऐसा निडर-साहसी व्यक्ति कृष्ण की मूर्ति में समा गया या फिर जीवित जल- समाट्टिा में लीन हो गया। जिन ब्रा॰णों पर मीरो को वापस मेवाड लाने का दायित्व था, उन्होंने ही राजदंड के भय से या लोक निंदा भय के कारण यह मिथ फैलाया होगा कि मीरो कृष्ण की मूर्ति में समा गई। गुजरात से मेवाड तक इस मिथ ने ऐसा काम किया कि आज भी हमारे स्कूल-कॉलेजों में मीरो की मृत्यु को हम इसी प्रकार व्याख्यायित करते हैं। मीरो से बेहद प्रेम करने वाले लोक ने उन ब्रा॰णों से एकबार भी नहीं पूछा कि ऐसा कैसे हो सकता है? जो मीरो चिाौड में सामंती तलवार के नीचे नहीं डरी या मरने का भाव एकबार भी उसके मन में नहीं आया, वह भाव अपने कृष्ण रूपी विश्वास के साथ होते हुए कैसे आ गया? लोक ने सवाल नहीं किए और अपनी र्‍ांतिचेाा को मरने से पन्ध्ह-सोलह वर्ष पहले ही मरा हुआ मान बैठा। चमत्कारों को आज भी हमारा समाज सौ फीसदी सत्य मान लेता है तो उस समय ऐसा मानना कोई बडी बात नहीं थी।
तानसेन, बीरबल, अकबर आदि से मीरो की भेंट जरूर हुई होगी। प्रगतिशील विचारों के लोग समकालीन होते हुए भी न मिलें, थोडा अटपटा लगता है। उस समय की जनश्रुतियों के हिसाब से मीरो इन सबसे मिली थी और उसने आमेर-मथुरा की यात्रा भी की थी। आमेर के राजा मानसिंह से भी मीरो की मुलाकात हुई होगी। यात्रामय जीवन की कठिनाइयों के कारण अट्टिाक नहीं, तब भी साठ-पैंसठ वर्ष की सामान्य अवस्था तक तो मीरो जीवित रही ही होगी - ’’अट्टिाकांश पारम्परिक स्रोतों के अनुसार मीरो की मृत्यु पैंसठ-सडसठ वर्ष में हुई इसलिए इस हिसाब से १४९८ ईस्वी के आसपास जन्म लेने वाली मीरो का निट्टान १५६३-१५६५ ईस्वी में हुआ होगा‘‘ ;पचरंग चोला पहन सखी, माट्टाव हाडा, पृ. ४५द्ध।
औसत दर्जे से विचार करें तो मीरो कृष्ण भक्त थी, परन्तु कृष्ण मीरो का आराट्टय था या आदर्श? दोनों में वैचारिक समानता कहो मिलती है? दोनों अपने-अपने समय के विधेही, र्‍ांतिचेाा, प्रगतिशील वैचारिक प्रतिभाऐ थीं। जो मरकर भी अमर है। ऐसी जागतिक चेतनाओं की आज भी उतनी ही जरूरत है।
प्रयास भवन, ताजूशाह तकिये के सामने, ट्टार्मस्तूप, चूरू-३३१००१ ;राज.द्ध, मो. ७५९७३९६७२५