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हिन्दी भक्तिकालीन काव्य में मानव मूल्य

सोनाली निनामा
जीवन की श्रेष्ठता बनाये रखने के लिए जिन मूल्यों, मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है, उन्हीं को मानव मूल्य कहते हैं। ये मूल्य ही आचार संहिता है, इन्हीं को नीति भी कहा गया है। यदि ये कुछ नीतियो, मर्यादाऐ, व्यवस्थाऐ अनुशासन न होते, तो मानव समाज कभी सभ्य नहीं बन पाता। सभ्यता का मूल ये नीतियो ही हैं। इन्हीं पर संस्कृति का भव्य प्रासाद टिका हुआ है।
मानव मूल्य हमारी संस्कृति, परम्पराओं, रीति-रिवाजों, सामाजिक विश्वासों, मान्यताओंे और आदशोङ का निचोड होते हैं। हमारे देश में प्राचीन काल से आट्टाुनिक काल तक ’सत्यम् शिवम् सुन्दरम्‘, ’परहित सरिस ट्टार्म नहि भाई पर पीडा सम नहि अट्टामाई‘, ’अतिथि देवो भवः‘, ’आत्मवत् सर्व भूतेषु‘, ’वसुट्टौव कुटुम्बकम्‘ तथा ’परोपकाराय सतां विभूतयः‘। जैसे वाक्य सामाजिक जीवन के प्रेरक रहे हैं। सत्य, अहिंसा, परोपकार, सहिष्णुता, नैतिकता, ईमानदारी, सेवा, सदाचार आदि को मानव मूल्य के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है।
साहित्य में मानव-मूल्य सर्वोपरि है, क्योंकि साहित्यकार अपने युग, परिवेश एवं देश के प्रति सचेत होकर मूल्याभिव्यक्ति करता है। प्रत्येक साहित्यकार पर तत्कालीन परिवेश और मान्यताओं का प्रभाव पडता है, जिसका प्रतिबिम्ब उसके साहित्य में दृष्टिगत होता है। इतर शब्दों में यदि साहित्य का स्रष्टा मानव है तो मानव का चित्रण करना ही साहित्य का उड्ढेश्य है इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है। साहित्य के द्वारा ही मानव-मूल्यों को अभिव्यक्ति मिलती है। साहित्य का मानव जीवन से चिरंतन एवं घनिष्ठ सम्बन्ट्टा है। यह सम्बन्ट्टा हिन्दी साहित्य में भी देखा जा सकता है।
भक्तिकालीन कवियों ने मानव-मूल्यों की स्थापना के लिए कटिब= होकर काव्य-प्रणयन किया। इन कवियों में मुख्य रूप से कबीर, दादू, नानक, रविदास, जायसी, सूरदास, तुलसीदास, मीरा, रसखान का स्थान प्रमुख हैं। ये कवि तत्कालीन जनता से प्रत्यक्ष रूप से जुडे रहते हैं तथा सभी ने अपने काव्य में मानवीय गुणों का समावेश किया है। ’’भक्ति साहित्य में भारतीय संस्कृति और आचार-विचार की पूर्णतः रक्षा हुई है। भक्ति-काव्य जहो उच्चतम ट्टार्म की व्याख्या करता है, वहो उसमें उच्च कोटि के काव्य के दर्शन होते हैं, इसकी आत्मा भक्ति है, इसका जीवन स्रोत रस है, उसका शरीर मानवीय है। रस की दृष्टि से भी यह साहित्य श्रेष्ठ है। यह साहित्य एक साथ क्तदय, मन और आत्मा की प्यास को तृप्त करता है।‘‘२ भक्तिकालीन कवियों के काव्य में मानव मूल्य अट्टिाक प्रतिष्ठित हुए हैं। इन मूल्यों में है - ईश्वर भक्ति, गुरु-महिमा, भक्ति-भावना, सत्संग, सत्य, अहिंसा, प्रेम, अहंकार-त्याग, आडम्बर-विरोट्टा, समन्वय -भावना आदि को श्रेष्ठ माना है।
भक्तिकालीन कवियों की ईश्वर में अटूट आस्था थी। किसी ने ईश्वर को निर्गुण माना तो किसी ने सगुण। सभी का उड्ढेश्य एक ही था - ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करना। संत कवि निर्गुण ईश्वर में विश्वास रखते हैं। कबीर के ईश्वर घट-घट व्यापी हैं, उसे बाहर ढढना व्यर्थ है -
कस्तूरी कुण्डलि बसै मृग ढूढै बन मांहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।।३
तुलसी ईश्वर के सगुण रूप में पक्षट्टार हैं। यह सृष्टि ईश्वर पर ही अवलम्बित है, इसलिए उसका नाम अवश्य जपना चाहिए अन्यथा इस भवसागर को पार करना मुश्किल होगा -
राम कहतु चलु, राम कहतु चलु, राम कहतु चलु भाई रे।
नाहि तौ भव बेगारि महं परिहै, छूटत अति कठिनाई रे।।४
कवियों की दृष्टि में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ेचा है। गुरु का आदर सभी को करना चाहिए क्योंकि गुरु ही ईश्वर से मिलवाने का एकमात्र माट्टयम है, इसलिए गुरु नाम स्मरण को मानव मूल्य के अन्तर्गत स्वीकार किया गया है। कबीर ने भी गुरु को गोविन्द से श्रेष्ठ बताया है -
गुरु गोविन्द दोउ खडे काके लागूं पांए।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताए।।५
भक्तिकालीन कवियों में भक्ति-भावना कूट-कूट कर भरी है। उनके लिए भक्ति के समक्ष मोक्ष भी तुच्छ है। भगवान की भक्ति एवं प्रेम का उड्ढेश्य ही उसकी निकटता प्राप्त करके उसमें रमण करना तथा उनकी लीलाओं में अपने आपको लीन करना है। कबीर ने भक्ति को मुक्ति का एकमात्र साट्टान माना है। संसार के दुःख-शमन का साट्टान प्रभु भक्ति ही है, वे कहते हैं*-
भाव भगति बिसबास बिन, कटै न सोसै मूल। कहै कबीर हरि भगति बिन, मुकति नहीं रे मूल।।६
तुलसीदास जी ने भक्ति के विषय में लिखा है -
भगति करत बिनु जनत प्रयासा।
संसृजि मूल अविद्या नासा।।७
भक्तिकालीन कवियों ने सत्संगति पर बहुत बल दिया है। मनुष्य जैसी संगति में बैठता है, उस पर वैसा ही प्रभाव पडता है। यदि वह अच्छी संगति में बैठेगा तो उस पर अच्छा प्रभाव पडेगा और यदि बुरी संगति में बैठेगा तो बुरा प्रभाव पडेगा। इसलिए कबीर कहते हैं, सत्संगति से सुबु= प्राप्त होती है -
कबीरा संगति साट्टा की, बेगि करीजै जाई। छुरमति दूर गंवाइसी, देसी सुमति बताई।।घ् सूरदास कहते हैं सज्जनों के सान्निट्टय में सांसारिक दुःख नष्ट हो जाते हैं -
संगति रहैं साट्टाु की अनुदित भव दुःख दूरि नसावत्। सूरदास संगति करि तिनकी जे हरि सूरति करावत्।।९
सत्संग के माट्टयम से सत्य का ज्ञान होता है। सत्य सर्वकालिक एवं सार्वदेशिक मानव मूल्य है, इसलिए भक्तिकालीन कवि निरन्तर सत्य की खोज में लगे रहते हैं, यथार्थ वचन को सत्य कहते हैं। तुलसीदास जी ने सत्य को ट्टार्म कहा है -
ट्टारमु न दूसर सत्य समाना।१०
सत्य ही सम्पूर्ण पुण्यों का फल है -
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए।
वेद पुरान विदित मनु गाए।।११
रहीम कहते हैं सज्जन लोग अपने प्राणों की आहुति देकर भी सत्य की रक्षा करते हैं -
रहिमन पर उपकार के, करत न पारै बीच। मांस दियो सिवि भूप ने, दीनो हाड दट्टाीच।।१२
सत्य के प्रति आस्था होने पर मानव के क्तदय में अहिंसा के भाव जागृत होने लगते हैं। अहिंसा रूपी मानव मूल्य का वास होने पर व्यक्ति परोपकारी बनता है। किसी भी प्राणी को पीडा न पहचाना अहिंसा है। शास्त्रों में अहिंसा को परम ट्टार्म कहा गया है। भक्तिकालीन काव्य में अहिंसा की अभिव्यक्ति हुई है। कबीर कहते हैं, बल प्रयोग कर जीव वट्टा करना हिंसा है। ईश्वर भी हिंसा का हिसाब मोगते हैं -
जोरी किया जुलम है, मांगै न्याब खुदाइ।
खालिक दरि खूनी खडा, मार मुहे मुहि खाई।।१३
तुलसीदास कहते हैं -
परमट्टार्म श्रुति विदित अहिंसा।।१४
भक्तिकालीन कवियों ने प्रेम को मानव मूल्य के रूप में स्वीकार करते हुए प्रेम को ईश्वर माना है। सत्य अहिंसा आदि मूल्यों को अपनाने के बाद मानव क्तदय में प्रेम का संचरण होता है। लौकिक ट्टारातल पर यह प्रेम दो आत्माओं का मिलन भी माना जा सकता है। यथा प्रेम के अनेक रूपों का वर्णन करने में कवि सफल हुए हैं।
सन्त काव्य म मुख्यतः अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना हुई, जिसे रहस्यवाद की संज्ञा दी गई है। प्रेम का मार्ग अति कठिन है। यह बाडी में भी नहीं उगता है न हाट में बिकता है। इसको चाहने वाले को शीश तक कटवाना पडता है -
प्रेम न बाडी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ लै जाए।।१५
सूफी मत में प्रेम ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र साट्टान है। यह प्रेम इश्कमिजाजी से इश्कहकीकी की ओर उन्मुख होता है। सूफियों ने ईश्वर की नारी के रूप में और साट्टाक की पुरुष के रूप में कल्पना की है। प्रेम मार्ग अति जटिल है, इसी जटिलता का परिचय देते हुए जायसी कहते हैं -
सखी एक तेइ खेल न जाना।
भै अचेत मनि-हार गेवाना।।१६
सूरदास प्रेम की अलौकिकता के प्रतिपक्षी हैं। उन्होंने “ाृंगार रस की विश्वव्यापक भावभूमि को भक्त की उच्चतम भव्यता प्रदान करके उसे उज्ज्वल रस की संज्ञा से विभूषित किया है। उनके शैशव का प्रेम यौवन के माट्टाुर्य रस में परिणत हो गया है। वे कहते हैं*- प्रेम प्रेम ते होई, प्रेम ते पारहिं पाइए।
प्रेम बन्ट्टयो संसार, प्रेम पर परमारथ लहिए।। एकै निश्चय प्रेम को, जीवन मुक्ति रसाल। सांचो निश्चय प्रेम को, जहिरै मिले गोपाल।।१७
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मानव मूल्य हमारे जीवन का आट्टाार स्तम्भ हैं। आज समाज को सुसंस्कारित करने की महती आवश्यकता है। इससे एक ओर देश तो दूसरी ओर मानवता का भविष्य उज्ज्वल हो सकेगा, क्योंकि मानव मूल्य ही हमारे सामाजिक जीवन का प्राणतव हैं। इन मूल्यों तथा विविट्टाता के कारण ही हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल को स्वर्ण युग कहा जाता है।
संदर्भ सूची ः
१. मानव मूल्य और साहित्य - डॉ. ट्टार्मवीर भारती, पृ. १०
२. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृायो - डॉ. शिवकुमार शर्मा, पृ. ११५
३. कबीर ग्रंथावली - डॉ. श्यामसुन्दर दास, पृ. ६४
४. तुलसी काव्य - सं. डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, पृ. १८७
५. संत सुट्टाासार - सं. वियोगी हरि, पृ. १२०
६. कबीर ग्रंथावली - डॉ. श्यामसुन्दर दास, पृ. ४७
७. रामचरितमानस - तुलसीदास ७, ११९, १४
८. कबीर ग्रंथावली - डॉ. श्यामसुन्दर दास, पृ. ३८
९. सूरसागर भाग-१, सं. नंददुलारे वाजपेयी, पृ. १४४
१०. रामचरितमानस - तुलसीदास २,९५,३
११. रामचरितमानस - तुलसीदास २,९५,३
१२. रहीम रत्नावली - सं. मायाशंकर याज्ञिक, पृ. ३९
१३. कबीर ग्रंथावली - सं. माताप्रसाद गुप्त, पृ. १८४
१४. रामचरितमानस - तुलसीदास ७,१२१,११
१५. कबीर ग्रंथावली - डॉ. श्यामसुन्दर दास, पृ. ५५
१६. जायसी ग्रंथावली - आचार्य रामचन्ध् शुक्ल, पृ. २२
१७. सूरसागर भाग-२ - सं. नंददुलारे वाजपेयी, पृ. ९५७
१६५, पाटनीपुरा, लालापुरा, इंदौर-४५२०११ ;म.प्र.द्ध, मो. ०९६९१११४७९९