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भारतवर्ष की आत्मा का प्रतिफलहै रामायण

नरेन्द्र मिश्र
महर्षि वाल्मीकि का जीवन बुरे कर्म त्याग कर सत्कर्म और भक्ति-भाव की राह पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है। इसी महान संदेश को वाल्मीकि जयंती पर लोगों तक प्रसारित किया जाता है। महर्षि वाल्मीकि का जीवन चरित्र दृढ इच्छाशक्ति और अटल निश्चय का सुंदर मिश्रण है। एक साट्टाारण व्यक्ति से महाकाव्य रामायण की रचना करने वाले परमज्ञानी तपस्वी वाल्मीकि बनने तक का सफर अत्यन्त प्रेरणादायक है। जीवन में किए गए सत्कर्म और पापकर्म का फल प्राणी को स्वयं ही भुगतना पडता है। जन्म और लालन-पालन कहो होगा यह मनुष्य क स्वयं के हाथ में नहीं है। ज्ञानदर्शन हो जाने पर गृहस्थ त्याग कर ट्टार्म के मार्ग पर आ जाने से रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं तो एक आम इंसान भी त्याग के बल पर अच्छा कर्मयोगी बन सकता है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी का जीवन बहुत प्रेरणादायक है।
महर्षि वाल्मीकि आदिकवि के नाम से प्रसि= है। उन्हें यह उपाट्टिा सर्वप्रथम श्लोक निर्माण करने पर दी गई थी। वाल्मीकि जयंती हिन्दू पंचांग अनुसार आश्विन माह की पूर्णिमा के दिन बडे ट्टाूम-ट्टााम से मनाई जाती है। उार भारतीय वाल्मीकि जयंती को ’प्रकट दिवस‘ रूप में मनाते हैं। माना जाता है कि वाल्मीकि जी महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र प्रचेता की संतान थे। उनकी माता का नाम चार्षणी पिता का नाम वरुण और भाई का नाम भृगु था। वे नागा प्रजाति में जन्मे थे, बचपन में उन्हें एक भील शिकारी चुरा ले गया था, जिस कारण उनका लालन-पालन भील प्रजाति में हुआ। इसी कारण उन्होंने भीलों की परम्परा को अपनाया और आजीविका के लिए शिकारी बन गए। रत्नाकर अर्थात् वाल्मीकि एक चतुर व बु=मान बालक था और जल्दी ही ट्टानुर्विद्या में प्रवीण होकर शिकार करना सीख लिया। जब वाल्मीकि युवा हो गए तब उनका विवाह उसी समुदाय की एक भीलनी से कर दिया गया। विवाह बाद वे कई संतानों के पिता बने और उन्हीं के भरण-पोषण के लिए अत्यन्त चिंतित रहने लगे। एक दिन रत्नाकर सडक के किनारे अत्यन्त चिंताग्रस्त मुध में बैठा था। उसी समय नारद मुनि उट्टार से निकले। उनके हाथ में एक सुन्दर वीणा थी। वीणा बजाते हुए वे ईश्वर की प्रार्थना करते जा रहे थे। नारद जी कोई साट्टाारण पुरुष नहीं थे। वे तो देवर्षि थे। उन्होंने ट्टारती, आकाश एवं पाताल तीनों लोकों का विचरण किया था। अचानक उनकी दृष्टि रत्नाकर पर पडी। उसके चेहरे पर व्यथा व चिंता के लक्षण स्पष्ट दिख रहे थे। नारद जी की करुणामयी वाणी सुनकर रत्नाकर को कुछ सांत्वना मिली। उनके मुख मण्डल पर एक दिव्य तेज व सौंदर्य था। नारद मुनि ने बीच में रुककर उससे पूछा - ’’तुम्हारे जीवन का क्या उपयेाग होना चाहिए? इस पर तनिक विचार करो।‘‘ ’’मैं क्या कर सकता ह महाराज? मेरा एक बडा परिवार है, जिसमें मेरे वृ= माता-पिता, पत्नी और बच्चे हैं। वे सब मुझ पर ही आश्रित हैं। मुझे उनके लिए भोजन और कपडा जुटाना पडता है। मुझे केवल शिकार करना ही आता है। इसके अतिरिक्त में कुछ नहीं कर सकता।‘‘ रत्नाकर ने उार दिया।
नारद जी ने रत्नाकर से कहा, ’’तुम राम नाम का जाप करो। इससे तुम्हारे जीवन का विकास होगा तथा नर से नारायण बनने का यही मार्ग है। इसी में तुम्हारे जीवन की सार्थकता है।‘‘ ;आदिकवि वाल्मीकि- डॉ. राट्टाावल्लभ त्रिपाठी, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, कनाट सर्कस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -२०१४, पृ. ७-८द्ध। नारद जी के कहने पर वे तमसा नदी के तट पर ’राम-राम‘ नाम के स्थान पर भूलवश ’मरा-मरा‘ का जप करते हुए तपस्या में लीन हो गए। उसकी ओखें बंद थीं और पूरा ट्टयान भगवान के नाम के उच्चारण पर केन्ध्ति रहता था। ट्टाीरे-ट्टाीरे वह अपना अस्तित्व भूल गया। इसी प्रकार ट्टयानावस्था में दिन, महीने और अनेक वर्ष बीत गये। उसके चारों ओर दीमकों ने बांबी ;घरद्ध बना ली, जिसके कारण कोई उसे देख नहीं सकता था। कुछ वषोङ के पश्चात नारद मुनि फिर वहो आए। वे जानते थे कि बांबी के नीचे रत्नाकर ही है। उन्होंने सावट्टाानी से बांबी को साफ किया। रत्नाकर को आस-पास की कोई सुट्टा नहीं थी और वह अपनी तपस्या में खोया रहा। जब नारद जी ने उसके कान में राम नाम का उच्चारण किया, तब कहीं उसने अपनी ओखें खोलीं और सामने नारद जी को पाया। नारद जी उसे उठाकर ट्टाीरे-ट्टाीरे उसके शरीर पर हाथ फेरने लगे। अब रत्नाकर में स्फूर्ति आई। उसने फिर नारद जी के चरण स्पर्श किये। मुनि ने उसे गले लगा लिया और कहा - ’’रत्नाकर, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता ह। भगवान तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुए। आज से तुम श्रेष्ठ ब्र॰र्षि हुए। चकि बांबी ;वाल्मीकिद्ध से तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है इसलिए तुम वाल्मीकि के नाम से प्रसि= पाओगे।‘‘ यह सुनकर रत्नाकर की ओखों से भावपूर्ण ओसू बहने लगे। वह बोला - ’’महाराज, यह सब आपकी ही कृपा है। अच्छे लोगों की संगति से ही मनुष्य पिर उठता है।‘‘ ;महर्षि वाल्मीकि, संकलित, सुरुचि प्रकाशन, केशवकुंज, झण्डेवाला, नई दिल्ली-११००५५, प्रथम संस्करण, जनवरी-२०१८, पृ.९-१०द्ध। नारद जी ने उसे आशीर्वाद दिया और अपने रास्ते चले गये।
वाल्मीकि ने गंगा नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया। उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैलने लगी। एक दिन श्रीरामचन्ध् जी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ आश्रम में आए। वाल्मीकि जी के शिष्यों ने स्वागत सत्कार किया। कुछ विश्राम के पश्चात् श्रीरामचन्ध् जी ने (षि वाल्मीकि को अपनी कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि वे वन में इसलिए आए हैं ताकि अपने पिता की प्रतिज्ञा को पूरा कर सकें। यह सुनकर वाल्मीकि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा - ’’श्रीराम, आप जैसा सत्यवान ट्टारती पर दूसरा कोई नहीं है। अपने पिता का वचन पूरा करने के लिए आपने राजसिंहासन त्याग दिया और वन में आ गए। आप सामान्य मनुष्य नहीं, सर्वशक्तिमान हैं। आफ नाम में इतनी शक्ति है कि उसने मुझ जैसे एक तुच्छ शिकारी को ब्र॰र्षि बना दिया। आपकी करुणा व दयालुता अथाह है।‘‘ ;महर्षि वाल्मीकि, संकलित, सुरुचि प्रकाशन, केशवकुंज, झण्डेवाला, नई दिल्ली-११००५५, प्रथम संस्करण, जनवरी-२०१८, पृ. १०-११द्ध
एक दिन नारद मुनि वाल्मीकि के आश्रम में आए। तब उन्होंने देवर्षि नारद से कहा - ’’महामना, आप तीनों लोकों में विचरण करते हैं। अतः कृपया बताऐ कि पृथ्वी पर सर्वगुण सम्पन्न कौन है? ऐसा कौन व्यक्ति है जो हमेशा सत्य बोलता हो, ट्टाीर-वीर हो? जो प्रत्येक जीव का कल्याण चाहता हो और सभी उससे प्रेम करते हों? ऐसा कौन व्यक्ति है जिसके वचनों एवं कमोङ की देवता भी प्रशंसा करते हैं? संसार में सबसे सज्जन, सद्गुणी पुरुष और सबसे श्रेष्ठ नायक कौन है?‘‘ वाल्मीकि के प्रश्नों के उार में नारद जी ने केवल राम का नाम लिया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार राम ने राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जन्म लिया, किस प्रकार राजा जनक की पुत्री सीता से उसका विवाह हुआ और कैसे वह पिता की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए १४ वर्ष के वनवास पर सहर्ष चले गये। उन्होंने वाल्मीकि को विस्तारपूर्वक बताया कि किस प्रकार रावण ने सीता का हरण किया, किस प्रकार रावण का राम द्वारा वट्टा हुआ, कैसे श्रीराम सीता तथा लक्ष्मण सहित अयोट्टया लौटे और अंत में उनका राजतिलक हुआ।
नारद जी के जाने के कुछ समय बाद वाल्मीकि गंगा स्नान के लिए निकले। उनका एक शिष्य भारद्वाज उनके वस्त्र लेकर उनके साथ गया। तमसा नदी किनारे तपस्या करने हेतु जब वाल्मीकि पहचे तब उन्होंने देखा कि सारस पक्षी का एक जोडा प्रेमालाप में मग्न था। तभी एक शिकारी पारट्टिा ने पक्षी पर बाण चलाकर उसकी हत्या कर दी। इस मार्मिक दृश्य को देखकर (षिवर वाल्मीकि का क्तदय करुणा से भर गया। उन्होंने चारों ओर देखा कि पक्षी को मारने वाला कौन है। पास ही उन्हें एक शिकारी दिखाई दिया, जिसने उस पक्षी को मारा था। यह देखकर उनकी वाणी श्राप के रूप में फूट पडी, ’’क्योंकि तुमने सुखी आनन्दमग्न युगल में से एक पक्षी का वट्टा किया है, इसलिए तुम भी अट्टिाक दिन जीवित नहीं बचोगे।‘‘ यह वाक्य महर्षि वाल्मीकि के मुख से संस्कृत के श्लोक के रूप में निकला -
’’मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः। यत्र्ौंहचमिथुनादेकम् अवट्टाीः काममोहितम्।।‘‘ अर्थात् अरे बहेलिये, तूने काममोहित मैथुनरत सारस पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं होगी। जब वह अपनी वाणी से निकले श्लोक के बारे में गहराई से विचार कर रहे थे, उसी समय सृष्टि के रचयिता ब्र॰ा जी वहो प्रकट हुए और बोले*- ’’हे महर्षि! जो श्लोक तुम्हारी वाणी से निकला, उसकी प्रेरणा मैंने ही दी थी। नारद जी ने तुम्हें रामायण की कथा सुनाई है। अब तुम श्लोक के रूप में ’रामायण‘ की रचना करोगे। जो कुछ घटित हुआ है, उसे तुम स्वयं अपनी ओखों से देखोगे और आगे के बारे में जो कुछ तुम कहोगे, वह भी सत्य होगा। तुम्हारे सारे वचन सत्य होंगे।‘‘ ब्र॰ा जी ने आगे कहा - ’’जब तक संसार में नदियो, पर्वत, वन रहेंगे, लोग ’रामायण‘ का पठन-पाठन करते रहेंगे।‘‘ ;महर्षि वाल्मीकि, संकलित, सुरुचि प्रकाशन, केशवकुंज, झण्डेवाला, नई दिल्ली-११००५५, प्रथम संस्करण, जनवरी, २०१८, पृ. १३द्ध (षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण एक ऐसा महाकाव्य है जो हमें प्रभु श्रीराम के जीवनकाल का परिचय करवाता है जो उनके सत्यनिष्ठ, पिता प्रेम और उनका कर्तव्यपालन और अपने माता तथा भाई- बंट्टाुओं के प्रति प्रेम-वात्सल्य से रू-ब-रू करवाकर सत्य और न्याय ट्टार्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
वाल्मीकि (षि वैदिक काल के महान (षि बताए जाते हैं। ट्टाार्मिक ग्रंथ और पुराण अनुसार वाल्मीकि ने कठोर तप अनुष्ठान सि= करके महर्षि पद प्राप्त किया था। परमपिता ब्र॰ा जी की प्रेरणा और आशीर्वाद पाकर वाल्मीकि (षि ने भगवान श्री राम के जीवन चरित्र पर आट्टाारित महाकाव्य रामायण की रचना की थी। ऐतिहासिक तथ्यों के आट्टाार पर आदिकाव्य श्रीमद् वाल्मीकि रामायण जगत का सर्वप्रथम काव्य था। महर्षि वाल्मीकि ने महाकाव्य रामायण की रचना संस्कृत भाषा में की थी।
महर्षि वाल्मीकि स्वयं रामायण काल के थे और वे भगवान राम से मिले थे, इसीलिए बहुत लोग वाल्मीकि रामायण को ही सटीक मानते हैं। इस महाकाव्य में कुल मिलाकर चौबीस हजार श्लोक का निर्माण किया गया है। श्री राम के त्यागने के बाद महर्षि वाल्मीकि ने ही मो सीता को अपने आश्रम में स्थान देकर उनकी रक्षा की थी। (षि वाल्मीकि ने श्री राम और देवी सीता के दो तेजस्वी पुत्रों लव और कुश को ज्ञान प्रदान किया था। लव कुश द्वारा गायी गई रामायण से सभी लोग अभिभूत थे, स्वयं श्री राम भी दोनों बालकों की कथा सुनकर धिवत हो गए थे और उन्हें सीता जी के कष्टों से बडा दुःख हुआ था। वे सोचने लगे कि सीता जी को दुःख के अलावा और कुछ नहीं प्राप्त हुआ। सीता जी की त्याग और तपस्या से सभी लोग अभिभूत थे। यही कारण है कि सीता जी का चरित्र रामायण में आदर्श भारतीय नारी के चरित्र के समान आख्यायित है। सारस पक्षी के वट्टा पर जो श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से निकला था वह परमपिता ब्र॰ा की प्रेरणा से निकला था, उसी के बाद उन्होंने रामायण की रचना की थी। महर्षि वाल्मीकि खगोल विद्या और ज्योतिष शास्त्र के प्रकाण्ड पंडित थे। विष्णुट्टार्मोार पुराण के अनुसार त्रेता युग में जन्मे महर्षि वाल्मीकि ने ही कलयुग में गोस्वामी तुलसीदास जी के रूप में जन्म लिया और रामचरितमानस की रचना की। अपने महाकाव्य ’रामायण‘ में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चन्ध् तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड पंडित थे। अपने वनवास काल के मट्टय ’राम‘ वाल्मीकि आश्रम में भी गए थे। इसका प्रमाण मानसकार तुलसीदास जी के यहो भी मिलता है -
देखत बन सर सैल सुहाए। वाल्मीक आश्रम प्रभु आए।। जब ’राम‘ ने अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर दिया तब महर्षि वाल्मीकि जी ने ही सीता को आश्रय दिया था। उपर्युक्त उ=रणों से सि= है कि वाल्मीकि ’राम‘ के समकालीन थे तथा उनके जीवन में घटित प्रत्येक घटनाओं का पूर्णरूपेण ज्ञान वाल्मीकि (षि को था। उन्होंने ’राम‘ के चरित्र को इतना महान समझा कि उनके चरित्र को आट्टाार मानकर अपने महाकाव्य ’रामायण‘ की रचना की। यद्यपि वेद या वैदिक साहित्य की रचना रामायण से पहले हो चुकी थी, पर लौकिक संस्कृत या लोकभाषा में रची गई पहली कृति होने से रामायण को आदिकाव्य कहा गया। हरिवंशपुरायण में बताया गया है कि वाल्मीकि ने रामायण लिखी, उसके पहले राम की कहानी सूतों, चारणों या कुशीलवों के द्वारा गायी जाती रही। वाल्मीकि ने लोकभाषा के रूप में देश के अलग-अलग अंचलों में गायी जाने वाली आख्यान की एक बडी ट्टारोहर को इस प्रकार का सुसम्ब= साहित्यिक रूप दे दिया कि वह अमर हो गई। वाल्मीकि ने अपनी रचना को रामायण के अतिरिक्त काव्य, गीत, आख्यान तथा संहिता - इन चार नामों से भी वर्णित किया है।
वाल्मीकि की रचना में ही इस काव्य को चतुविङशतिसाहस्री संहिता कहा गया है, अर्थात् इस काव्य में २४००० श्लोक हैं। यह भी कहा गा है कि ये २४००० श्लोक पोच सौ वगोङ तथा सात काण्डों में निब= है। रामायण के सात काण्डों के नाम हैं - बालकाण्ड, अयोट्टयाकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किंट्टााकाण्ड, सुंदरकाण्ड, यु=काण्ड तथा उारकाण्ड। प्रत्येक काण्ड कई सगोङ में विभाजित है। बालकाण्ड में राम के जन्म से विवाह तक की कथा है। अयोट्टयाकाण्ड में राम के वनवास का वृाांत है। अरण्यकाण्ड में दंडकारण्य में राम, सीता और लक्ष्मण का निवास, शुर्पणखा प्रसंग, खर-दूषण आदि का वट्टा, सीता का अपहरण तथा राम का विलाप - ये सारी घटनाऐ चित्रित हैं। किष्किंट्टााकाण्ड में राम-सुग्रीव का मिलन, बालिवट्टा तथा हनुमान आदि का सीता की खोज में जाना वर्णित है। सुंदरकाण्ड में हनुमान का लंका में पहचना और सीता से उनकी भेंट तथा लंकादहन का वर्णन है। यु=काण्ड में राम और रावण की सेनाओं के बीच यु= का विस्तृत वर्णन है, जो रावण के वट्टा के साथ समाप्त होता है। उारकाण्ड में रामराज्य के वर्णन के साथ अनेक आख्यान संग्रहीत हैं।
रामायण के आख्यान-रामायण के बालकाण्ड तथा उारकाण्ड में विशेष रूप से कतिपय प्राचीन कथाऐ संग्रहीत हैं। बालकाण्ड में (ष्यशृंग, वसिष्ठ, विश्वामित्र, मेनका, रम्भा, वामनावतार, गंगावतार तथा समुध्मंथन के आख्यान हैं। उारकाण्ड में ययाति, नहुष, वृत्रासुरवट्टा, अगस्त्य तथा बुट्टा और इला की कथाऐ दी गई हैं। रामायण में मुख्य रूप से तीन प्रकार के आख्यान मिलते हैं - ;१द्ध रामायण के पात्रों तथा कथावस्तु से जुडे आख्यान जैसे - श्रवण कुमार कथा, विश्वामित्र- वशिष्ठ के आख्यान, अगस्त्य की कथा व शरभंग (षि की कथा ;२द्ध मुख्य कथा से असम्ब= पर किसी पात्र द्वारा वार्तालाप में सुनाये गये आख्यान। विश्वामित्र राम को मिथिला ले जाते समय बातचीत के र्म् में इस प्रकार के अनेक आख्यान सुनाते हैं ;३द्ध स्वतंत्र पौराणिक आख्यान।
राम को मर्यादा पुरुषोाम के रूप में भारतीय परम्परा में पहली बार वाल्मीकि की रचना ने ही स्थापित किया। वाल्मीकि के ही शब्दों में राम के चरित्र में ’समुध् के समान गांभीर्य और हिमालय के समान ट्टौर्य‘ है। सहिष्णुता, परदुःखकातरता, स्नेह, त्याग और शौर्य के गुणों का अनूठा प्रतिमान राम के चरित्र के द्वारा आदिकवि ने रच दिया है। ऐसे गुणों के कारण ही मनुष्य का व्यक्तित्व दुर्लभ भव्यता से सम्पन्न बनता है। राम के लिए सत्य ही कहा गया है - ’’राम सामने से गुजर जाये, तो कोई भी व्यक्ति उनके पिर से ओखें और मन को हटा नहीं पाता था, यहो तक कि वे निकल जाते तब भी लोगों की ओखें और मन उन्हीं पर लगे रह जाते।‘‘ संकट के क्षणों में अटूट ट्टौर्य और विवेक का प्रदर्शन राम करते हैं। राज्याभिषेक का समाचार सुनकर उनके चिा में कोई विकार नहीं आया। थोडी देर बाद ही उन्हें पता चला कि उन्हें राजपद नहीं, वनवास दिया गया है, तो इससे उन्हें रंचमात्र भी क्लेश नहीं हुआ।
राम यदि पुरुष के दिव्य गुणों के उज्ज्वल प्रतीक हैं, तो हनुमान मनुष्य की समग्र मानसिक और भौतिक क्षमता के। मात्र बल और परार्म् का ही नहीं, मनुष्य के सम्पूर्ण विवेक का भी उनमें परिपाक हुआ है। सुग्रीव ने उनकी प्रशंसा में ठीक ही कहा है -
त्यय्येव हनुमन्नस्ति बलं बु=ः परार्मःु। देश्कालानुवृाश्च नयश्च नयपण्डित।।
मानव स्वभाव की दुर्बलता का भी चित्रण आदिकवि करते हैं, पर यह दिखाने के लिए कि आदर्श मनुष्य अपनी दुर्बलताओं से किस प्रकार संघर्ष करते हैं और उन पर विजय पाते हैं। रवीन्ध्नाथ टैगोर के शब्दों में - ’’यदि कवि वाल्मीकि मनुष्य के चरित्र का वर्णन न कर देवचरित्र का वर्णन करते, तो अवश्य ही रामायण का गौरव कम हो जाता, उसे काव्य की दृष्टि से क्षतिग्रस्त होना पडता। राम के मनुष्य होने से ही रामचरित्र की इतनी महिमा है। रामायण में देवता ने पदच्युत होकर अपने को मनुष्य नहीं बनाया, मनुष्य ही अपने गुणों के कारण देवता बन गया है।‘‘ मानव स्वभाव की सूक्ष्मताऐ और जटिलताऐ उनके काव्य में विषद् रूप से अंकित हैं। वनवास के समय सीता राम के साथ चलना चाहती है, राम उन्हें वन की भीषणता से डराकर रोकना चाहते हैं। सीता उत्साह के साथ कहती है - ’’त्वया सह गमिष्यामि मृदुनन्ती कुशकण्टकान्।‘‘ मैं तुम्हारे रास्ते के कुश-कोटे रौंदती हुई तुम्हारे साथ चलगी। ;संस्कृत साहित्य का अभिनव इतिहास - डॉ. राट्टाावल्लभ त्रिपाठी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण- २००१, पृ. ६७द्ध पति के प्रति अनन्य विश्वास, आस्था और निष्ठा सीता के चरित्र में कूट-कूट कर भरी हुई है। भारतीय नारी की तेजस्विता और तपोवृा का अनुपम उदाहरण सीता के चरित्र के द्वारा वाल्मीकि ने स्थापित किया है। सीता की एक झलक देखकर ही हनुमान कह उठते हैं -
इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा।
रावण नातिवर्तेत वेलामिव महोदट्टोः।।
न हि शक्यः स दुष्टात्मा मनसापि हिमैथिलीम्। प्रट्टार्षयितुमप्राप्तां दीप्तामग्निशिखामिव।।
यह विशाल नयनों वाली सीता अपने ही तेज से रक्षित है। जिस तरह सागर अपने तट को नहीं लोघ सकता, उसी तरह रावण इसकी मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकता। जैसे जलती अग्निशिखा को छूने की कल्पना कोई नहीं कर सकता, उसी तरह वह दुष्ट मन से भी इसे स्पर्श नहीं कर सकता।
कैकेयी गंभीर और मनस्विनी नारी है, पर हर नारी के भीतर अपने बेटे को आगे बढाने की कामना छिपी रहती है, मंथरा उसकी कामना को आग की तरह सुलगा देती है। जो कैकेयी राम के राज्याभिषेक का समाचार मंथरा के मुख से सुनकर प्रसन्नता से खिल उठती है और मंथरा जब इस बात पर चिढ जाती हैतो उसे बुरा-भला सुनाकर उसकी बहुत निंदा करती है, वहीं कैकेयी कुछ ही क्षणों में मंथरा के बहकावे में इस तरह आ जाती है कि वही मंथरा उसे परम बु=मान, सुंदर और प्रिय लगने लगती है तथा वह जी भरकर मंथरा की प्रशंसा करती है। इस प्रशंसा को अतिरंजित और हास्यास्पद बनाकर वाल्मीकि ने मानव-मन की विचित्र गति पर सूक्ष्म व्यंग्य किया है। परिस्थिति के बीच प्रतिक्षण परिवर्तित होती मानव-मन की दशाओं के बहुत सूक्ष्म चित्र वाल्मीकि ने उकेरे हैं। कामी और वृ= दशरथ अपनी तरुणी भार्या को मनाने और रिझाने की चेष्टाऐ कर रहे हैं, वे अपने मन में यह भी समझते हैं कि वे अनुचित मार्ग पर चल रहे हैं। अपने आपको मोह से रोक न पाने की परिणति को भी वो जान रहे हैं। अपने आपसे हार कर वे राम से कहते हैं - ’’राम, मैं कैकेयी के वरदान से मोहित ह। तुम मुझे कारागार में डाल दो और स्वयं राजा बन जाओ।‘‘ इससे विचित्र बात क्या हो सकती है कि एक सम्राट् अपने पुत्र से स्वयं को कारावास में डालकर राजा बन जाने का अनुरोट्टा करे। फिर अंततः कोई गति न देखकर दशरथ क्षणिक आश्वासन से मन को भरमाया रखना चाहते हैं -
अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा।
एकाहदर्शनेनापि साट्टाु तावच्चराम्यहम्।।
;संस्कृत साहित्य का अभिनव इतिहास - डॉ. राट्टाावल्लभ त्रिपाठी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण-२००१, पृ. ६८द्ध
हे पुत्र, आज की इस रात में मत जाओ। एक दिन तुम्हें और देख ल तो मेरा मन लगा रहेगा।
भरत के चरित्र को तो वाल्मीकि ने अपनी लेखनी से अमर बना ही दिया है। भरत त्याग, विनय और स्नेह के मूर्तिमान रूप हैं। वाल्मीकि ने अपने चरित्रों के उपस्थापन में मनुष्य की गरिमा की रक्षा की है। उनका प्रत्येक चरित्र मानवीय गुणों से युक्त है। रावण का चरित्र तो उसके पांडित्य, शूरता, कुलीनता, बु=माा और अग्रता में अप्रतिम है। वाल्मीकि ने उसके चरित्र के कृष्णपक्ष को भी चित्रित किया है और उज्ज्वल पक्ष को भी। रावण की मनस्विता और तेज अदम्य है।
रामायण का प्रट्टाान रस करुण है। इस महाकाव्य का उद्भव ही करुणा की वृा से हुआ है। वाल्मीकि स्वयं कहते हैं कि उनके भीतर का शोक, श्लोक के रूप में परिणत हो गया है -
सो*नुव्याहरमाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः। शोकार्तस्य प्रवृाो में श्लोको भवतुनान्यथा।।
रामायण में आद्यंत करुणा की स्रोतस्विनी प्रवहमान है। इस करुण रस की विशेषता मनुष्य जीवन के अटूट संघर्ष और संकट के क्षणों की अनुभूति में है। मनुष्य अपने जीवन के घात-प्रतिघात, नियति के थपेडों और दूसरों के द्वारा किये जाने वाले उत्पीडन से किस प्रकार जूझता और अंत में अपने संघर्ष के द्वारा उबरता है, यह कवि की सच्ची मानवीय संवेदना के साथ रामायण में पदे-पदे अनुभव करते हैं। छोटी- छोटी घटनाओं या कथा प्रसंगों के माट्टयम से वाल्मीकि जीवन में निहित करुणा को उजागर कर देते हैं।
रामायण का आदर्श तथा संदेश-वाल्मीकि ने समाज में व्याप्त विकृतियों और दुर्बलताओं को गहराई से पहचाना तथा उनका चित्रण भी किया है। पर वे हमें राम, हनुमान, भरत जैसे महान चरित्रों के द्वारा यह बताते हैं कि इन बुराइयों से कैसे बचा जाए। राजाओं और क्षत्रिय समाज की विलासिता का यथार्थ चित्रण उन्होंने दशरथ, सुग्रीव और रावण के अन्तःपुर के वर्णन में किया है। रावण का चरित्र ही शासक की निरंकुशता और ऐश्वर्य के मद का साकार रूप है। सामंतीय समाज के इस प्रकार के अट्टाःपतन की प्रतिर्याक में वाल्मीकि ने राम के जैसे महान मर्यादा पुरुषोाम का चरित्र उपस्थित किया। रामायण जीवन में सतत् सत्कर्म की प्रेरणा देता है। मनुष्यों को अपने पिर आने वाले संकट और दुःख को सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि ये संकट और दुःख सदा रहने वाले नहीं हैं। उनके कारण कर्म से विरत् होकर संसार का त्याग करने का विचार नहीं करना चाहिए। राम ने अपने जीवन में कितने दुःख सहे। रामायण के सारे पात्र जीवन में हताशा और अनास्था के क्षणों से उबर कर सत्संकल्प और कर्म का वरण करते हैं। हनुमान सीता को खोजते-खोजते थककर चूर हो जाते हैं। सीता नहीं मिलती, तो वे विरक्त होकर संन्यासी हो जाने का विचार करने लगते हैं। पर अंत में वे यही सोचते हैं कि अपने र्काव्य में उत्साह के साथ लगे रहना ही उचित होगा, अंत में कभी न कभी सफलता मिलेगी ही।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः।।
इस प्रकार रामायण के सारे पात्र अस्तित्व के गहरे संकट और अवसाद के क्षणों में आस्था की खोज करते हैं। चिरसंचित अनुभव के रूप में उनका निष्कर्ष यही है -
कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति माम्। एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि।।
लोक में प्रचलित यह गाथा ही मुझे कल्याणपरक प्रतीत होती है कि मनुष्य जीवित रहे, तो सौ वषोङ की प्रतीक्षा के बाद भी उसे अंततः आनन्द मिलेगा ही। जीवन मनुष्य के लिए वरदान है, अभिशाप नहीं। अतः अपने आपमें विश्वास रखकर कर्म करना जीवन है। क्षेमेन्ध् के अनुसार वाल्मीकि कवियों में उसी तरह प्रथम हैं, जिस प्रकार वणोङ में ओंकार - ’’ओंकार इव वर्णानां कवीनां प्रथमो मुनिः।‘‘
महाकवि रवीन्ध्नाथ टैगोर के अनुसार रामायण में भारतवर्ष की आत्मा झलकती है। उनके अनुसार रामायण के द्वारा भारतवर्ष का सच्चा स्वरूप हम जान सकते हैं। वे कहते हैं - ’’रामायण में केवल कवि का ही परिचय नहीं है, भारतवर्ष का परिचय प्राप्त होता है। इस रामायण की कथा से भारतवर्ष के क्या बालक, क्या वृ=, क्या स्त्रियो सबको केवल शिक्षा ही नहीं मिलती है, शिक्षा के साथ-साथ उन्हें आनन्द भी मिलता है। भारतवासियों ने रामायण को शिरोट्टाार्य ही नहीं माना है, उन्होंने उसको अपने क्तदय सिंहासन पर स्थापित किया है।‘‘ ;संस्कृत साहित्य का अभिनव इतिहास - डॉ. राट्टाावल्लभ त्रिपाठी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण- २००१, पृ. ६८द्ध। (षि वाल्मीकि की कहानी बडी अनूठी तथा अर्थपूर्ण है। नारद मुनि के सम्फ व प्रेरणा से वे सामान्य जन ’रत्नाकर‘ से एक महान (षि, संत व योगी बने और विश्व प्रसि= महाकाव्य ’रामायण‘ की रचना की। रामायण नर से नारायण बनने का आख्यान है। इसका संदेश स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति अपनी साट्टाना, तपस्या और कर्म से देवत्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
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