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सांस्कृतिक संवर्दन में लोक साहित्य की भूमिका

अशोक कुमार गुप्ता
भारत विविट्टा लोक संस्कृतियों का देश है। यहो की संस्कृति को एक इकाई के रूप में नहीं देखा जा सकता बल्कि विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय से जाना जाता है। इसीलिए तो इस देश की प्रमुख विशेषता ’विविट्टाता में एकता‘ है। इस विशेषता को अक्षुण्ण बनाये रखने में शिष्ट साहित्य से इतर लोक साहित्य की प्रमुख भूमिका है। यह साहित्य संस्कृति को परिपक्व ही नहीं करता, बल्कि मानवीय मूल्यों का भी संव=र्न करता है। कहा जाता है कि, ’’अंट्टाकार है वहो, जहो आदित्य नहीं है। सूना है वह देश, जहो साहित्य नहीं है।।‘‘ व्यक्ति के जीवन के विकास के लिए साहित्य आवश्यक है, यह साहित्य यदि संरक्षित ’लोक साहित्य‘ हो तो कहना ही क्या? क्योंकि लोक साहित्य सांस्कृतिक संचेतना में अभिवृ= करता है। इस सम्बन्ट्टा में सत्यव्रत सिन्हा ’भोजपुरी लोकगाथा‘ पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, ’’वास्तव में हमारा लोक साहित्य संस्कृति की उच्चतम भावनाओं को अपनी अपरिष्कृत भाषा में संजोकर रखता है। हमारा ’लोक‘ पाश्चात्य देशों का ’फोक‘ नहीं है, अपितु देश की समूची संस्कृति एवं सभ्यता ही हमारी लोक संस्कृति एवं लोक सभ्यता है।‘‘
’लोक-साहित्य‘ लोक-वार्ता का ही एक अंग है। ट्टीारेन्ध् वर्मा द्वारा सम्पादित ’हिन्दी साहित्य कोश‘ भाग-१ में लोक साहित्य की व्याख्या करते हुए लिखा है - ’’लोक साहित्य शब्द ’लोक‘ और ’साहित्य‘ इन दो शब्दों से बना है, इसका वास्तविक अर्थ है लोक का साहित्य, लोक यहो अंग्रेजी के फोक ;थ्वसाद्ध शब्द का पर्यायवाची है। लोक साहित्य भी अंग्रेजी के फोक लिट्रेचर का अनुवाद है। फोक के पर्याय से लोक साहित्य के कई अर्थ हो सकते हैं। ;१द्ध उस लोक का साहित्य, जो सभ्यता की सीमाओं से बाहर है, सभ्य समाज में जिनकी गिनती नहीं, उनका साहित्य ;२द्ध जंगली जातियों का साहित्य। फोक शब्द के अन्तर्गत वे ही लोग आ सकते हैं, जो आदिम परम्परा को सुरक्षित रखे हुए हैं, क्योंकि लोक साहित्य का सम्बन्ट्टा फोक-लोर लिट्रेचर अथवा लोकवार्ता साहित्य से है। ;३द्ध लोक साहित्य ग्रामीण साहित्य है। ;४द्ध लोक साहित्य वह युग-युगीन साहित्य है, जो मौखिक परम्परा से प्राप्त होता है, जिसके रचयिता का पता नहीं, जिसे समस्त लोक अपनी कृति मानता है। ;५द्ध लोक साहित्य वह साहित्य है, जो लोक मनोरंजन के लिए लिखा गया हो, उस लोक के लिए जो विशेष पढा-लिखा नहीं। वास्तव में लोक साहित्य वह मौखिक अभिव्यक्ति है, जो भले ही किसी व्यक्ति ने गढी हो, पर आज जिसे सामान्य लोक समूह अपना ही मानता है और जिसमें लोक की युग-युगीन वाणी साट्टाना समाहित रहती है, जिसमें लोक मानस प्रतिबिम्बित रहता है।‘‘ उक्त व्याख्या से यह स्पष्ट है कि ’लोक साहित्य‘ जन साट्टाारण समाज द्वारा ही निर्मित है। ये लोग नगरों और गोवों में फैली हुई सम्पूर्ण जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आट्टाार पोथियो नहीं, बल्कि स्वयं के अनुभव हैं। इनके द्वारा निर्मित साहित्य वर्तमान साहित्य से भिन्न हैं। यह साहित्य किसी न किसी कल्याण या हित के लिए ही है, जैसा कि संस्कृत में उक्ति है - ’’हितेन सह सहितं तस्य भावः साहित्यः।‘‘ यह कहना उपयुक्त होगा कि सम्पूर्ण सार्थक अभिव्यक्ति चाहे वह लिखित हो या मौखिक - साहित्य के अन्तर्गत ही आती है। यद्यपि लोक साहित्य आज के लिखित साहित्य से इतर है, क्योंकि लोक साहित्य परम्परित रूप में अक्षुण्ण चला आता है और वह लिपिब= नहीं होता है, वह अट्टिाकतर मौखिक ही होता है। जो पीढी दर पीढी आगे बढता रहता है। यद्यपि हर पीढी उनमें समयानुकूल, आवश्यकतानुसार सुट्टाार कर लेती है और कुछ नई बातें भी क्षेपक के रूप में जोड देती हैं।
लोक साहित्य की सीमा निट्टाार्रित करते हुए सत्येन्ध् ’लोक साहित्य विज्ञान‘ पुस्तक में लिखते ह - ’’लोक साहित्य के अन्तर्गत वह समस्त बोली या भाषागत अभिव्यक्ति आती है जिसमें ;अद्ध आदिम मानव के अवशेष उपलब्ट्टा हों, ;आद्ध परम्परागत मौखिक र्मअ से उपलब्ट्टा बोली या भाषागत अभिव्यक्ति हो, जिसे किसी की कृति न कहा जा सके, जिसे श्रुति माना जाता हो और जो लोक मानस की प्रवृा में समायी हुई हो। ;इद्ध किन्तु वह कृतित्व लोकमानस के सामान्य तवों से युक्त हो उसके किसी व्यक्तित्व के साथ सम्ब= रखते हुए भी लोक उसे अपने ही व्यक्तित्व की कृति स्वीकार करें।‘‘ लोक साहित्य लोक मानस की उदाा भावनाओं से परिपूर्ण होता है। उसमें स्वच्छन्दता के साथ ही एक भव्य विशालता होती है। इस सम्बन्ट्टा में शकुन्तला वर्मा लिखती हैं - ’’वह साम्प्रदायिकता से मुक्त है। उसमें राम-कृष्ण, शिव-विष्णु, निर्गुण-सगुण आदि सभी समभाव से पूज्य हो। वह सबको एक ही भाव से देखता है। उसका किसी से कौर वैर नहीं, कोई विरोट्टा नहीं। वह ’मानव‘ को जानता है, उसे ही पढता है और उसे ही छूता है। वह मानवीयता का पुजारी है, मानवीय संवेदनशीलता पर उसकी आस्था है और इसलिए जीवन की रसमय व्याख्या कर सकने में वह समर्थ है। वह उसी में संतुष्ट है। वह जनता जनार्दन है।‘‘ इसी जनता जनार्दन से प्राप्त लोक साहित्य जो हमारी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाता है। इस साहित्य में लोकगीत, लोककथाऐ, लोकनाट्य, लोकोक्तियो, पहेलियो, मुहावरे आदि प्रमुख रूप से आते हैं।
हिन्दी में लोक साहित्य पर सबसे पहला प्रयास मन्नन द्विवेदी का था, जिन्होंने ’सरवरिया‘ नामक गोरखपुर जिले के गीतों का एक छोटा-सा संग्रह सन् १९१३ में प्रकाशित कराया। इसके पश्चात् पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने गोव-गोव घूमकर बहुत से गीत एकत्रित किये। जिनमें ’कविता कौमदी‘, ’हमारा ग्राम साहित्य‘ और ’मारवाडी‘ विशेष उल्लेखनीय हैं। सन् १९४२ के बाद लोक साहित्य के क्षेत्र में काफी अच्छा कार्य हुआ। इस कार्य हेतु राहुल सांकृत्यायन, वासुदेवशरण अग्रवाल, बनारसीदास चतुर्वेदी, कृष्णानंद गुप्त, सत्येन्ध्, श्याम परमार, कृष्णदेव उपाट्टयाय, चिंतामणि उपाट्टयाय, कृष्णलाल हंस, त्रिलोचन पांडेय, शंकरलाल यादव, तेजनारायण लाल, चन्ध् गंट्टार्व, मोहनसिंह, दुर्गाशंकर प्रसाद आदि विद्वानों ने लोक साहित्य शोट्टा व संकलन का कार्य किया है। इसके साथ ही अनेक संस्थाओं की स्थापना हुई जो वर्तमान में लोक साहित्य पर अनेक कार्य कर रही हैं।
’लोकगीत‘ सांस्कृतिक संव=र्न का प्रमुख तव है। जीवन में न जाने कितने प्रसंग आते हैं, जब हमारी करुणा जागती है। करुणा का ही एक चित्र देखकर तो आदिकवि की काव्यट्टाारा बह निकलीं। ऐसे ही वियोग, प्रियजन की मृत्यु, वैट्टाव्य, बेटी की विदा आदि अनेक लोकगीत सुने जा सकते हैं, इसी तरह पुत्र-जन्म, पुत्र-विवाह, कृषि सम्पन्नता, दाम्पत्य सुख, वैभव विलास आदि सुख के प्रसंगों में इन लोकगीतों में बट्टााये गीत गाये जाते हैं, जो अपने बडों एवं पूर्वजों का सम्मान लिये रहते हैं। जिसकी एक झलक ध्ष्टव्य है - ’’पहलो बट्टाायो, ससुर घर आयो, सासू ने नोत जिमायो, बट्टाायो मेरे अंगने में आयो। ...पूरो बट्टाायो राजा घर आयो, रानी ने नोत जिमायो, बट्टाायो मेरे अंगने में आयो।‘‘ ये इस बात का प्रतीक है कि कोई भी पारिवारिक कार्य पूर्वजों के आशीर्वाद एवं परिवारजनों के सहयोग के बिना पूरे नहीं हो सकते हैं, इसी तरह कभी-कभी निर्वेद की स्थिति में मनुष्य संसार के कोलाहल से दूर हटना चाहता है, माया से बचना चाहता है तब ये लोकगीत दार्शनिक हो उठते हैं। कभी-कभी दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से त्रस्त होकर देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं और तब भजन प्रार्थना के बोल उनके मुख से फूट उठते हैं, जैसे - ’’कुछ करि लै ट्टारम जासौं तिरि रे/पोच पेड गंगाजी में लगाये तौ बिनु विरछन कछु रंग रे/तिर रे माया के लोभी तिर रे।‘‘ कभी श्रम की थकान दूर करने के निमिा ही हल चलाते किसान और चक्की पीसती स्त्रियो गीत गुनगुनाती हैं। कभी प्रकृति की मनोरम छटा को देखकर चैत, सावन, फागुन आदि उोजक महीनों में वे चैता, कजली, विरहा, होली के गीत गाकर अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करते हैं, तो कभी-कभी ये लोक गीत ’अतिथि देवो भवः‘ का भाव व्यक्त करते हुए अतिथि का इस रूप में आदर-सत्कार करते हैं - ’’चरखी चल रही बड कै नीचे, रसै पीजा लांगूरिया।‘‘ इन लोकगीतों से हमारी संस्कृति और संस्कार प्रकट होते हैं जैसा कि शकुन्तला वर्मा लिखती हैं - ’’इन लोकगीतों में वर्ण्य विषय के संदर्भ में स्वाभाविक रूप से कहीं आदिम विश्वास, टोने-टोटके इत्यादि का उल्लेख मिलता है तो कहीं जातीय विशेषताऐ और मानव मन की विभिन्न प्रवृायो परिलक्षित होती हैं, कभी उनके रीति-रिवाज, रहन-सहन का चित्रण होता है तो कहीं संस्कृति और संस्कार सामने आते हैं।‘‘ ये लोकगीत विषयों के अनुरूप होते हैं और उनकी तर्ज भी बेट्टा जाती है। जैसे - ढोला, आल्हा, साके, पेवारा, भोर आदि के गीत विशेष उल्लेखनीय हैं। लोक साहित्य का एक और प्रमुख तव है ’लोक कथाऐ‘। अक्सर बच्चे अपनी मो, बुआ, दादी-दादा से कहानियो सुनना पसन्द करते हैं। ये बच्चे ’मो कह एक कहानी, जिसमें हो एक राजा एक रानी‘ कहकर अपनी मनपसन्द कहानी भी सुना करते थे। इन कथाओं में हमारी संस्कृति परिलक्षित होती ही है साथ ही इसका लक्ष्य नैतिक उपदेश देने का भी रहता है। ला फाउण्टेन अंग्रेजी विचारक ने भी ऐसा ही लिखा है - ष्थ्ंइसमे पद ेववजी ंतम दवज ूींज जीमल ंचचमंतए वनत उवतंसपेजे ंतम उपबम ंदक ेनबी ेउंसस कममतण् ॅम लूंद ंज ेमतउवने इनज ूम हसंकसल जनतद जव उवतंस जंसमतेकण् ।दक ेव ंउनेमक ूम समंतदण्ष् ये लोककथाऐ हमारे रीति-रिवाज रहन-सहन, सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखती है। जैसा कि श्रीमती आर्चर ’लोक साहित्य विज्ञान‘ पुस्तक में लिखती हैं - ’’लककथाऐ जातीय ज्ञान को सुरक्षित रखती हैं तथा जातीय रीति-रिवाज को व्यवहार योग्य ठहराती हैं। वे स्तर और मूल्य निट्टाार्रित करती हैं और आत्मविश्वास भरती हैं। लोककथाऐ शक्ति का भण्डार है, जिनसे कि जातीय जीवन सशक्त रहता है।‘‘ ये लोककथाऐ विविट्टाता भी लिये रहती हैं, कहीं उपदेशात्मक, कहीं ट्टाार्मिकता तो कहीं बच्चों को प्रिय लगने वाली पशु-पक्षियों की विशेष कहानी। जैसे - ’’एक पुत्र परदेश जाते समय अपनी मो को दूट्टा से भरा कटोरा दे जाता है और कह जाता है कि जब दूट्टा का कटोरा रिक्त हो जाये तो समझ लेना कि मैं संकट में ह।‘‘ इसी तरह एक कहानी में तुलसी के बिरवे के मुरझाने से पत्नी समझ लेती है कि उसका सौभाग्य-सिन्दूर पछ गया है। इन कहानियों में पशु-पक्षियों द्वारा सतर्क करने का भाव भी दृष्टिगत होता है। हमारी इन लोक कथाओं में बच्चों को उपदेश दिया जाता है कि शेर को सवा शेर अवश्य मिलता है और कोई न कोई व्यक्ति संकट में आपकी अवश्य मदद करता है। ये लोक कथाऐ परोपकार के महव को भी प्रतिपादित करती हैं, इसके साथ ही इनके मूल में मंगलकामना भी रहती है। अक्सर ये लोक कथाऐ सुखांत ही होती हैं और अन्त में कहा जाता है - ’’भगवान ने जैसे उसके दिन फिराये, वैसे सबके फेरें।‘‘ यह एक आशीर्वादात्मक वाक्य है जिसमें विश्व कल्याण का भाव निहित है। ये लोक कथाऐ आज भी प्रचलित हैं।
लोक साहित्य की एक और प्रमुख विट्टाा है ’लोक नाट्य‘। इसका कथानक प्रायः पुराण या ऐतिहासिकता लिये रहता है और उसमें कल्पना का अट्टिाकाट्टिाक समावेश होता है। हिन्दी नाटक की परम्परा का मूल स्रोत यह जननाटक ही होता था, जो स्वांग आदि नाम से अपने प्राचीन रूप में विद्यमान था। इन लोक नाट्यों में संवाद प्रायः गीतों में ही रहते थे और वाद्य-संगीत व समूह-नृत्य इनकी प्रमुख विशेषताऐ होती थीं। ये लोग नाट्य भी किसी न किसी संस्कृति के परिचायक थे साथ ही उपदेशात्मक एवं नीतिपरक थे। भारतीय लोक नाट्यों के अनेक स्वरूप विभिन्न प्रांतों में प्रचलित हैं जैसे - रामलीला, रासलीला, स्वांग, नौटंकी, भाण, चमरवा, केहरवा, गवरी, भेवाई, कीर्तन, तमाशा, बहुरूपिया, यक्ष गान आदि उल्लेखनीय हैं।
’लोकोक्ति‘ भी लोक साहित्य की एक प्रमुख विट्टाा है। किसी भी प्रकार की कही गई उक्ति जो लोकमानस के लोकवाणी द्वारा निकली हो, वह लोकोक्ति है। लोकोक्ति में ’गागर में सागर‘ भरने की प्रवृा है। ये लोकोक्तियो सार्वभौमिकता लिये रहती हैं। यथा - ’जिसकी लाठी उसकी भैंस‘ ये कहावतें नीति-विषयक भी होती हैं तो व्यंग्यात्मक भी। जैसे - ’सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का।‘ एवं ’उल्टा चोर कोतवाल को डोटे।‘ आदि उल्लेखनीय है।
’पहेलियो‘ भी लोक साहित्य की एक प्रमुख विट्टाा है। इसमें एक छोटे से उार के लिये या अर्थ को समझने के लिये शब्द विस्तार खूब होता है। यद्यपि इस विट्टाा ने भी हमारी संस्कृति को खूब विकसित किया है। जैसे हमारी संस्कृति में पत्नी पति का नाम नहीं लेती है, परन्तु उसके पति का नाम ’कपूर‘ है और उसकी सास उस बहू से वणिक की दुकान से कपूर लाने का आदेश देती है। बहू सास की आज्ञा पाकर वणिक के पास इस तरह मोग करती है - ’संख से उज्ज्वल जोत है, आवे बास सुबास/ऐ बनिया मोहे तौल दे, लेन पठायो सास।‘ उक्त पंक्तियों से वणिक समझ जाता है कि बहू कपूर मोग रही है और वह कपूर तौल देता है। इसी तरह कुछ पहेलियो*सामाजिक सम्बन्ट्टाों को भी अभिव्यक्त करती हैं, जैसे - ’बीनन हारी बीन कपास, तेरी मेरी एकहि सास‘। यह पहेली ननदोई एवं सलहज के सम्बन्ट्टाों को प्रकट करती है। इन पहेलियों में एक मिठास भी है और कभी-कभी तो उार बताने पर पहेलीकार पुरस्कार स्वरूप कुछ देने की भी बात कहता है, जैसे - ’आंकड बेलूं सांकड बेलूं, कडी-कडी में रस या पहेली को फल बता दै, रुपया दगो दस।‘ अर्थात् ’जलेबी‘ जो सकड की तरह अकडी एवं अनेक कडयों से जुडी हुई है और प्रत्येक कडी रस से सराबोर है। वास्तव में ये पहेलियो व्यक्ति के दिल और दिमाग को परिपुष्ट करती हैं, साथ ही ये लोक साहित्य की निट्टिा हैं तथा इनमें भारतीय संस्कृति के अनेक तत्व छिपे हुए हैं।
’मुहावरे‘ भी लोक साहित्य की एक विट्टाा है। ये भाषा की खूबसूरती, प्रांजलता, अभिव्यंजना, ट्टाारावाहिकता लिये रहते हैं। कहावतों की भोति ये भी विभिन्न विषयक होते हैं, जो हमारी सांस्कृतिक चेतना का संव=र्न करते हैं। इसी के साथ ही सामाजिक प्रथाओं का चित्रण भी करते हैं तो कहीं नियति, भाग्य व कर्म सम्बन्ट्टाी भी होते हैं, जिनमें कहीं आशा, कहीं निराशा, कहीं तटस्थता दृष्टिगत होती है, जैसे - हाय-हाय करना, गले लगाना, बोछे खिलना आदि उल्लेखनीय हैं।
स्पष्ट है कि सांस्कृतिक संव=र्न में लोक साहित्य की प्रमुख भूमिका है। इस साहित्य ने संस्कृति को बढावा तो दिया ही, साथ ही हिन्दी भाषा को नई अभिव्यक्ति भी प्रदान की है।
एम.एस.जे. राजकीय स्नातकोार महाविद्यालय, भरतपुर ;राज.द्ध, मो. ९४१४७२६१११