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दायित्व

कीर्ति शर्मा
आज फिर बाजिी किसी बात पर मो पर बरस रहे थे। ट्टाीरे-ट्टाीरे तेज होती उनकी आवाज मेरे कानों में पड रही थी - ’’घर में इतना कितना काम है जो तुम मेरे दो कपडे इस्त्री नहीं कर सकती, दो-दो बहुऐ हैं, फिर भी तुम इतनी व्यस्त रहती हो कि तुम्हें मेरा, मेरी आवश्यकताओं का जरा भी ख्याल नहीं है।‘‘
मैं अपने कमरे से बाहर आया, देखा मो बाजिी को एक तरफ ले जाकर समझा रही थी, ’’आपको यह क्या हो गया है? बात-बात पर गुस्सा, छोटी-सी बात पर झझला जाते हो, राई का पहाड बनाते देर तक नहीं लगाते। अभी किए देती ह इस्त्री।‘‘
’’रहने दोऋ मैं ऐसे ही पहन लगा।‘‘ बाजिी मो के हाथों से सलवटों भरे कपडे लेते हुए बोले। उन कपडों को पहन तेज कदमों से छत की ओर चले गए।
मैंने मो से पूछा, ’’मो, क्या बात है?‘‘
मो कुछ न बोली अपना काम करने लगी। मैं ऑफिस जाने की जल्दी में था, इन बातों पर ट्टयान न देते हुए तैयार होकर ऑफिस चला गया, लेकिन दिमाग के किसी कोने में वे बातें घूम रही थी कि हमेशा शान्त, ट्टाीर-गम्भीर पर फिर भी हेसमुख, उत्साहित रहने वाले बाजिी को क्या हो गया है। वे मो पर इस कदर क्यों बरस पडे जो तेज आवाज में बात तक नहीं करते थे।
अभी पिछले रविवार दोपहर की बात है। सब बच्चे खेल रहे थे, फिर भी बाजिी गुस्सा हो गए। अपनी बहुओं को बेटा कहकर पुकारने वाले बाजिी पहली बार उन पर झल्ला उठे। माट्टाुरी जो घर की बडी बहू है, उसे कहने लगे, ’’बहू बच्चों का हुडदंग कैसे सुहाता है, इन्हें चुप नहीं करवा सकती?‘‘ माट्टाुरी ट्टाीरे से बोली, ’’बाजिी बच्चे तो आराम से खेल रहे हैं।‘‘
सचमुच सभी बच्चे आराम से अपना खेल, खेल रहे थे। बाजिी ने प्रतिउार देते हुए कहा, ’’हो-हो मैं सठिया गया ह न, मैं झूठ बोल रहा ह। ठीक है, करने दो शोर मत समझाओ, तुम्हारे अपने बच्चे हैं। मेरी बात कोई क्यों सुनेगा।‘‘
माट्टाुरी अवाक रह गई। शादी को १६ साल होने को हैं। बाजिी ने कभी इस कदर बात नहीं की, पिता से बढकर स्नेह दिया। प्रत्येक जरूरत का ख्याल रखते हुए किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने दी। सोचते हुए वह गर्दन झुकाए एक तरफ चली गई।
आज मेरा मन खिन्न था। घर का माहौल बदलता जा रहा था। हर एक की छोटी-बडी गलतियों पर प्यार से समझाने वाले, घर की सुख-शान्ति के प्रणेता बाजिी इस अशान्ति के कारण बनते जा रहे थे।
शाम को घर आया। अपने कमरे में ऑफिस का कुछ काम निपटाने लगा। माट्टाुरी आई और बोली, ’’सुनो, बाजिी खाना नहीं खा रहे। आप जाकर कहिए न।‘‘
मैं तडप उठा। बच्चों की तरह रूठना, ये क्या हो गया? खाना नहीं खा रहे? मैं उठा। हजार ख्यालों से जूझता हुआ छत पर गया। बाजिी चारपाई पर लेटे आसमान की ओर देखे जा रहे थे।
मैं पास ही कुर्सी लेकर बैठ गया। उनका हाथ अपने हाथों में लेकर ट्टाीरे से बोला, ’’बाजिी क्या बात है, क्या तबीयत ठीक नहीं है?‘‘
वे अपना हाथ छुडाते हुए रुओसे से बोले, ’’क्यों! क्या हुआ मेरी तबीयत को? मैं ठीक ह।‘‘
’’तो फिर चलिए, खाना खा लीजिए।‘‘ मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
’’मुझे भूख नहीं है।‘‘ कहते हुए बाजिी ने करवट बदली और मह फेर लिया।
अब क्या करूे, क्या कह, कैसे मनाे? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। बरसों से बाजिी से बहुत कम बात होती थी। किन्हीं आवश्यक बातों पर ही इकद्दे बैठ बातें करते या खाने की टेबल पर साथ बैठ खाना खाते। मैं बडा बेटा ह। बाजिी के सामने ज्यादा बोलने, हेसी-मजाक करने का संकोच शुरू से ही था, फिर भी मैंने कहा, ’’भूख तो मुझे भी कम है, आप ही तो कहा करते हैं कि खाने के समय भूख चाहे थोडी हो, कुछ तो खा ही लेना चाहिए।‘‘ बाजिी कुछ न बोले।
मेरा मन सिकुडता जा रहा था, अब क्या करूे? अजीब सी घुटन, उलझन मन को जकडती जा रही थी। मैंने खडे होते हुए कहा, ’’हम दोनों का खाना यहीं ले आता ह। यहीं खुली हवा में बैठकर साथ-साथ खाना खाऐगे।‘‘
बाजिी कुछ कहते। मैं तुरन्त वहो से चल पडा कि कहीं वे फिर से इंकार न कर दें, अगर कर दी तो क्या जवाब दगा।
मन में विचारों की आवाजाही ने विराम न लिया कि अगर खाना परोसकर ले आया और बाजिी ने नहीं खाया, थाली सरका दी तो! बात और बढ जाएगी, फिर किस तरह सेभलेगी।
आज उनके इस कदर खाना न खाने से महसूस हो रहा था कि जब बच्चे रूठ जाते हैं, खाना नहीं खाते तो माता-पिता पर क्या बीतती है।
मो, माट्टाुरी, शीला शीघ्रता से मेरी ओर बढ गई। जैसे किसी बडी समस्या का समाट्टाान कर आया ह। आशा भरी निगाहों से देखती तीनों लगभग एक साथ बोल पडी, ’’बाजिी ने क्या कहा?‘‘ मैं हेसकर बोला, ’’कुछ नहीं। ऐसा करो मेरा और बाजिी का खाना छत पर ले आओ। हम दोनों वही साथ बैठ कर खाऐगे।‘‘
वे एक दूजे की तरफ देखने लगीं कि क्या हमसे कोई भूल हो गई पर अट्टिाक देर न करते हुए मो ने दो थालियों में खाना परोस दिया। माट्टाुरी पानी भरा जग, गिलास लिए साथ चल पडी।
खाना मेज पर रखा, शीला ने कुर्सियो पास लाकर रख दी।
मैंने ट्टाीरे से बाजिी से कहा, ’’बाजिी आइए, खाना खा लीजिए।‘‘
बाजिी उठे, ट्टाीरे से आ कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे की मासूमियत मेरे मन को घायल कर गई। जैसे आज पिता मैं और वे मेरे बच्चे हैं। बचपन में न जाने कितनी बार उन्होंने गोद में बिठाकर मुझे खाना खिलाया, रूठे-मचले हुए को तरह-तरह से मनाया, हेसाया। कई बार बहुत मनाने पर ही मानता, लेकिन आज बाजिी मेरे एक बार कहने पर मान गए।
मेरा मन पिघलता जा रहा था। उनके चेहरे को देखते हुए बहुत-सी बातें पढने, समझने की कोशिश कर रहा था। बाजिी खाना शुरू कर चुके थे, पास ही मो खडी थीं, उनके पीछे माट्टाुरी।
’’तुम क्या सोचने लगे वीजू? साथ-साथ खाने का कहकर अब किस सोच में खो गए?‘‘
मैं चौंक पडा, मेरी ओखें भर आइङ। खाना तो हमेशा बाजिी के साथ एक टेबल पर ही खाते हैं पर आज, आज कुछ नया-सा अपनापन लग रहा था। मेरे बाजिी तो वही हैं, बदले कहो हैं? मैं खाना खाने लगा। भोजन का एक-एक निवाला स्वादिष्ट लग रहा था।
बाजिी बोले, ’’माट्टाुरी बेटा! जाओ तुम सब भी खाना खा लो।‘‘ वह कुछ न बोली।
मो खुश थी, ’’और कुछ ला?‘‘ पूछते हुए समीप आई। मैं हेसकर बोला, ’’बस मो! आपने पहले से ही थाली में इतना कुछ ला दिया है। अब आप सब खाना खा लीजिए।‘‘ मो, माट्टाुरी नीचे चले गए। उनके चेहरे पर खुशी, सुकून के मिलेजुले भाव थे।
मैं चुपचाप खाना खाते हुए बीच-बीच में बाजिी का चेहरा देख लेता, सादगी भरा भावपूर्ण चेहरा।
हमेशा हर एक की सुनने, मदद करने वाले बाजिी बिना खाना खाए यहो आकर कैसे सो गए! पिछले कुछ महीनों से इतने चिडचिडे कैसे हो गए? मन अनेक सवालों से घिरा था।
’’वीजू तू और कुछ लेगा? तेरी मो को आवाज लगाे!‘‘
’’नहीं बाजिी! बस खा चुका।‘‘
बाजिी बोले, ’’वीजू आज मुझे रिटायर हुए पूरा एक साल हो गया। रिटायर होकर आदमी क्या अपने व्यस्त जीवन से भी रिटायर हो जाता है?‘‘
मेरे दिलों दिमाग में हजारों घंटियो बज उठीं, उनमें ट्टवनि दर्द की थी, जिसे सहना असहनीय था। बाजिी के चन्द वाक्य सीने को चीर पीडा से भर गए, छोड गए दर्द की गज भरी एक टीस।
’’आप क्या सोचते हैं? लम्बे समय तक काम ही काम करना उसके बाद रिटायर होना तो सुकून देता है। आराम के दिन होते हैं। आपने बहुत काम किया, मेहनत की, अब इस भागदौड से परे आराम से रहें। यही अर्थ है सर्विस से रिटायर होने का।‘‘
बाजिी बात काटते हुए बोले, ’’नहीं वीजू, रिटायर होने का अर्थ है रात दिन काम में लगे रहने के बाद अचानक जीवन में ठहराव आ जाना। लम्बे समय से व्यस्त रहने, काम करते रहने के बाद आया ये ठहराव तोडकर रख देता है। य लगता है आदमी जैसे अकेलेपन से घिर गया हो।‘‘
अब अहसास हो रहा था बाजिी की पिछले महीनों की चिडचिडाहट, झझलाहट का। वे सीने में इस कदर नीरसता लिए जीए जा रहे हैं। किसी ने न देखा। आज अगर उन्होंने खाना खा लिया होता तो मैं यह मर्म जान ही न पाता। बाजिी शांत भाव से अपने मन की व्यथा अपने बेटे को बताए जा रहे हैं। यह बेटा पहले क्यों नहीं जान पाया, कभी पूछा तक नहीं। कभी इस बात का अहसास तक न लिया कि अब दिन भर बाजिी अकेले कैसे रहते होंगे। सबको अपना-अपना काम करते देख वे स्वयं को अकेला महसूस करते होंगे, बाहर भी कहो और कितना जाऐ
बाजिी बोले जा रहे थे पर मेरे कान जैसे बन्द हो गए। अपने ही ख्यालों की मोटी परत कानों को अवरु= कर रही थी कि मुझे अपनी जिम्मेदारी का भान क्यों नहीं था।
मो-बाप को बच्चों की हर एक आवश्यकता, प्रत्येक बात का पहले से ही ख्याल होता है, उनके भविष्य तक के सपने बुनकर उन्हें सुनहरे भविष्य की राह देना चाहते हैं, उनकी कामयाबी में स्वयं भी तपस्यारत रहते हैं, जबकि वह अपने बाजिी की उलझन न पढ पाया, खोया रहा अपने कामों में, पर अब ऐसा नहीं होगा। वह बाजिी कर हर पल महका देगा।
’’वीजू तुम जानते हो आदमी जब काम में लगा रहता है तो उसमें आत्मविश्वास बना रहता है। व्यस्तता उसे आत्मबल प्रदान करती है। आराम तो एक प्रकार की सजा है, यातना है जो जीवन के मार्ग को अवरु= कर देती है। दिलो-दिमाग में कुण्ठा भर देती है। जीवन जीने की दिशा जहो खो सी जाती है। वहीं मन को खिन्न करते हुए रात-दिन के समय को अव्यवस्थित कर देती है।‘‘
मैं ट्टाीरे से बोला, ’’हो बाजिी! आप सच कहते हैं‘‘ मन ही मन संकल्प लेते हुए सोचने लगा, ’’अब ऐसा नहीं होगा।‘‘
’’बाजिी कल मैं और मो भी आफ साथ मॉनिङग वॉक के लिए चलेंगे।‘‘ मैंने संकल्पित भाव से कहा।
’’तुम और तुम्हारी मो?‘‘ बाजिी आश्चर्य से बोले। ’’तुम सात बजे उठते हो, तुम्हारी मो पूजा-अर्चना में व्यस्त रहती है।‘‘
’’मैं जल्दी उठ जाया करूेगा, मो पूजा-अर्चना आगे-पीछे कर लेंगी। इस बहाने हमारी सेहत भी अच्छी रहेगी।‘‘
वे बहुत खुश हुए, हेसते हुए बोले, ’’अब तुम आराम करो, दिनभर की व्यस्तता से थक जाते हो।‘‘ फिर थोडा रुककर बोले, ’’सुबह जल्दी भी तो उठना है।‘‘ वे हेस पडे।
मैं नीचे की ओर चल पडा। कुछ पल पास बैठने, उनके पलों, भावनाओं में शामिल होने पर इतनी खुशी मिली है अगर हर पल उनका ख्याल रखगा तो न जाने कितनी खुशी मिलेगी।
मो छत पर जाने की तैयारी में थी, माट्टाुरी कमरे में जा चुकी थी।
’’मो! सवेरे हम दोनों बाजिी के साथ मॉनिङग वॉक पर चलेंगे।‘‘ मैंने मो को रोकते हुए कहा।
’’मैं! मैं कैसे जा पाेगी।‘‘ वे कुछ कहतीं कि मैं बोल पडा। ’’मो कभी-कभी अपनी दिनचर्या, अपने आपको बदलना भी पडता है, मैं भी तो सात बजे उठता ह, कल से जल्दी उठगा। आप भी अपनी पूजा-अर्चना का समय आगे-पीछे तय कर लेना। बाजिी के अकेलेपन को दूर कर उन्हें खुश रखना है।‘‘
मैंने मो को पास बिठाकर मो को पूरी बात बताई।
’’मो, आप चलेंगी न?‘‘
’’हो, हो ठीक है, चलेंगे।‘‘ वे हेसते हुए बोलीं।
हम तीनों खुली साफ-सुथरी सडक पर ट्टाीरे-ट्टाीरे समान चाल से चले जा रहे थे। बाजिी छोटे-छोटे किस्से सुनाए जा रहे थे। सुबह की ठण्डी हवा, मो बाजिी का साथ, ये सैर बहुत सुखद थी। आगे पार्क में बैच पर जा बैठे। बाजिी के मित्रगण जो नित्य यहो मिलते हैं, कह उठे ’’अरे यार, आज तो भाभी जी, विजय ने मोर्चा मार लिया। घुमाई पर आए हैं।‘‘
मैं बोल पडा, ’’चाचा जी, अब रोज आया करेंगे।‘‘
ऑफिस जाते हुए मैं बहुत खुश था, गुनगुनाता जा रहा था। अपनों के साथ बोटे खुशी के पल कितने सुखद होते हैं, फिर क्यों आज का आदमी अपनों से कटने लगा है, रिश्तों की मिठास, उनकी अहमियत छूटती जा रही है। तभी तो उसका जीवन मशीनी और शुष्क बन गया है, हर पल भागदौड। गर इस भागदौड को थोडा विराम देकर अपने आस-पास के रिश्तों को महव दें, उन्हें सजीव कर दें तो वह अनुभूति छूटती मिठास पुनः लौटा लाए। मैंने थोडी नींद ही तो खोई, मो के थोडे फेरबदल से हमने अपनी सेहत, बाजिी का सान्निट्टय पाया।
आगे देखा तो वही इमारत जिस पर ऑफिस आते-जाते नजर जाती है, दोस्तों की ऑफिस से आते वक्त गाडयो रुकती हैं पर उसने कभी गौर नहीं किया। आज उस पर लगा बोर्ड सुहाना लग रहा था।
’’कोशिश हमारी, मुस्कान आपकी‘‘, यह था मुस्कान भवन, जहो हर वर्ग का रिटायर कर्मचारी इसका सदस्य बन सकता था। इसमें क्या कार्यर्मस थे, क्या कुछ होता था, इस बात की जानकारी मुझे नहीं थी पर बाजिी की व्यस्तता और खुशियों की चाबी मुझे मिल गई थी। सोचा आज ऑफिस से घर जाते वक्त पूरी जानकारी लगा।
ऑफिस से लौटते समय उस भवन के अन्दर गया, देखा अत्यन्त सुन्दर वातावरण था। पहले एक छोटा हॉल जिसमें एक तरफ काउन्टर लगा था, जहो एक भध् पुरुष बैठे थे। दूसरी तरफ दीवार के सहारे सोफे लगे थे, जहो दो-तीन व्यक्ति परस्पर ट्टाीरे-ट्टाीरे बतिया रहे थे।
उन भध् पुरुष ने मेरे मुखातिब होते हुए पूछा, ’’कहो बेटा! किसी से मिलने आए हो?‘‘
मैंने जवाब दिया, ’’नहीं सर, मुझे अपने बाजिी के लिए यहो की जानकारी लेनी है।‘‘
वे खुश होते हुए बोले, ’’अच्छा, तो हमारे परिवार में एक सदस्य और जुडेगा। बहुत अच्छा आओ, पहले तुम्हें परिसर दिखाते हैं।‘‘
उन्होंने एक सज्जन को आवाज लगाते हुए कहा, ’’विनायक जी, इन्हें पूरा परिसर दिखाते हुए जानकारी दीजिए।‘‘
मैं साथ चल पडा। पूरा परिसर घूम-घूम कर देखा। इतनी विविट्टाता विद्यमान थी कि एक बारगी मन वहीं रम सा गया। इस विशाल परिसर के बडे-बडे कमरों में शास्त्रीय संगीत, वाद्ययंत्र से लेकर लाइब्रेरी तकऋ कारीगरी के विविट्टा कायोङ की मोहकता यहो देखने को मिली। परिसर के केन्ध् में सुन्दर बगीचा जहो भोति-भोति के खिले फूल उसकी शोभा में चार चोद लगा रहे थे। यहो का खुशनुमा वातावरण देख मैं भाव-विभोर हो गया।
यहो आकर बाजिी अपनी हर इच्छा पूरी कर सकेंगे, जिन्हें अपने जीवन की व्यस्तता के चलते पूरा न कर पाए। अब उन्हें सकारात्मक व्यस्तता मिलेगी, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा।
विनायक जी बोले, ’’इसके अतिरिक्त जो समाजसेवा करना चाहे तो उन सब कायोङ के कई ग्रुप बने हुए हैं, जो उत्साह के साथ सर्यह हैं। यहो बहुत कुछ र्याङत्मक कार्यर्मै होते हैं। जब इतने अनुभवी लोग इकद्दे होंगे तो सकारात्मक वातावरण, समाज के लिए कुछ कर गुजरने की राह तो खुलेगी ही।‘‘
विनायक जी की मट्टाुर स्नेह भरी आवाज में इतनी रोचक जानकारियो सुनकर मेरा मन उछलने लगा।
घर पहच अपना कुछ काम निपटाकर सीट्टो बाजिी के पास गया। बाजिी बच्चों के साथ बतिया रहे थे।
’’आओ वीजू बैठो।‘‘
मैंने खुशी भरे लब्जों में कहा, ’’बाजिी कल सवेरे तैयार हो जाना। आपको मेरे साथ चलना है।‘‘
’’कहो? कुछ तो बताओ।‘‘
’’नहीं बाजिी, कल खुद ही देख लेना।‘‘
दूसरे दिन बाजिी के साथ मैं मुस्कान भवन में था।
’’ये तुम कहो ले आए? यहो का नाम, चर्चा तो मैंने भी सुन रखी है पर...।‘‘ बाजिी आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ उस भवन की ओर देखते हुए कहने लगे।
’’पहले इस भवन को पूरा जान तो लीजिए।‘‘ मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
बाजिी को विनायक जी से मिलवाते हुए कहा, ’’ये मेरे बाजिी हैं। आप इन्हें परिसर दिखाइये। तब तक मैं ऑफिस हो आता ह।‘‘
मैं सोच रहा था बाजिी यहो का वातावरण देख बहुत प्रभावित होंगे। मेरे लिए ऑफिस में समय काटना मुश्किल हो गया।
ऑफिस से लौटा तो देखा बाजिी लाइब्रेरी में अपनी पसन्द की तीन-चार किताबें सामने रखे एक किताब पढने में खोए थे।
मैंने ट्टाीरे से पास जाकर कहा, ’’बाजिी घर चलें?‘‘
’’अरे रुको, किताब पढ तो लेने दो।‘‘
मैं वहीं बैठ गया। थोडा रुककर बोला, ’’बाजिी, चाहो तो किताब लाइब्रेरी से इश्यू करवाकर ले चलते हैं।‘‘
’’तुम ऑफिस से जल्दी क्यों आ गए? मैं खुद ही घर आ जाता।‘‘
’’आपको यहो कैसा लगा?‘‘
’’अरे, यहो तो मेरे परिचित कई मित्र भी हैं। जम कर बातें होंगी।‘‘
’’वीजू तुम घर जाओ, मैं आ जाेगा। मैंने यहो अपना नाम पंजीकृत करवा लिया है, इसकी फीस कल दे देंगे। अब तो मुझे काम ही काम है। ये सभी पुस्तकें पढ सकगा। समयाभाव के कारण जिन्हें पढ पाने की हसरत मन में ही रह गई थी।‘‘ बाजिी अपनी व्यस्तता प्रकट करते हुए बोले।
’’ठीक है बाजिी, फिर मैं चलता ह।‘‘ कहते हुए मैं घर की ओर चल पडा।
बाजिी मॉनिङग वॉक से आते ही जल्दी-जल्दी तैयार होते पहले की तरह चिडचिडे न थे, न ही किसी बात पर झल्लाते, गुस्सा करते। अब उनकी जिन्दगी को कोई मकसद मिल गया था। जीवन अब अवरु= न होकर अविरल बहने वाली शीतल ट्टाारा बन चुका था। वे यंगमैन की तरह मुझसे पहले तैयार हो जाते, मो से बतियाते जाते। कहते, ’’जल्दी करो, खाना टिफिन में पैक कर दो। वहीं साथ बैठकर खाऐगे। आज वहो बहुत काम है।‘‘ थोडा रुक कर फिर कहते, ’’कल पश्चिमी कॉलोनी की समस्याओं की रिपोर्ट तैयार की थी। वहो के लगभग आठ रिटायर्ड कर्मचारी ’मुस्कान भवन‘ के सदस्य हैं। वे वहो की समस्याओं के प्रति सजग हैं। हम सब मिलकर ट्टाीरे-ट्टाीरे सुट्टाार लाने की कोशिश करेंगे।‘‘ जब तक घर से मुस्कान भवन के लिए रवाना नहीं होते, तब तक ’’वीणा तुम्हें पता है‘‘ ये-वो जाने क्या-क्या बताते रहते। मो हामी भरती सुनती रहती। माट्टाुरी, शीला, बच्चे सब बाजिी की इस पुनः लौट आई खुशमिजाजी से खुश थे।
थोडी सी समझदारी से घर का वातावरण जहो बिगडने से बच गया, वहीं बाजिी का जीवन कुंठित होते-होते रह गया।
’’अरे वीजू, तू क्या कर रहा है? मुझे देर हो रही है। जल्दी आ, वहो सब मेरी राह देख रहे होंगे।‘‘
’’बस, अभी आया।‘‘ पलभर बाद मैं उनके सामने था।
’’चल भई, जल्दी कर।‘‘
मैंने गाडी निकाली। गाडी अब सडक पर दौड रही थी। बाजिी मुस्कान भवन के किस्से सुनाते हुए हेसे जा रहे थे। मैं उनकी बातों से ज्यादा उनकी हेसी में खोया था। जब वे जोर से ठहाका लगाते तो मेरा ट्टयान बेटता और मैं उनके ठहाकों में शामिल हो जाता।
’’लो भई, आ गई मेरी मंजिल।‘‘ कहते हुए बाजिी गाडी से उतरे और मुस्कान भवन की सीढया एक उछलते-कूदते बच्चे की तरह चढने लगे। वे अन्दर जा चुके थे। मैं अपने ऑफिस की ओर चल पडा। आज मैं अपना दायित्व निभाते हुए अपार खुशियों का मालिक था।
द्वारा ः भवानीशंकर व्यास, नंदा कॉलोनी, वार्ड नं. दो, नोहर ;हनुमानगढद्ध, मो. ७२३०८०५९१३