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दो शब्द

श्रीभगवान सैनी
कई बार ऐसा होता है कि आप उसकी कल्पना नहीं कर पाते और वह हो जाता है। ऐसा कि उसके बारे में किसी को कोई भान नहीं होता। ऐसा ही आज नृसिंह के साथ हो गया। हमेशा शांत रहने वाला नृसिंह आज जैसे ही ऑफिस में दूसरी मंजिल पर जाकर रूम नम्बर १४ में घुसा तो वहो की हालत देखते ही उसकी भौंहों पर बल पड गए। उसकी मेज और कुर्सी वहो से नदारद थी। ऐसा कैसे हो गया? इतनी हिमाकत किसकी हुई कि इस अभिशप्त कमरे से उसकी सीट हटा दी गई? इस कमरे में किसी को अपनी सीट स्थाई रखने की लालसा नहीं थी। कच्चे कलेजे वाले तो इस कमरे में घुसने से भी डरते थे। फिर ऐसा कैसे हो गया? उसने मन ही मन अपने से खुंदक रखने वालों को याद किया। कौन हो सकता है...? शायद राजू...? नहीं उसकी इतनी कहो चलती है, तो फिर साू...? नहीं उसकी अफसर मानता नहीं है, तब फिर कौन हो सकता है...? नृसिंह ने अपनी सीट की जगह वाली खिडकी खोली, वहो से झोकने पर हनुमान मंदिर के दर्शन होते हैं, गुम्बद पर लहराती लाल ट्टवजा पर विराजित पहाड लिए हनुमान जी की तस्वीर की तरफ हाथ जोडकर ओखें मद प्रभु स्मरण कर अपनी सीट पर बैठना नृसिंह का नित्यकर्म था, पर आज सीट ही दिखलाई नहीं दी तो नित्यकर्म में भी व्यवट्टाान उत्पन्न हो गया था। नृसिंह ने प्रभु स्मरण किया और फिर सोचने लगा कि ऐसा हुआ कैसे...! अचानक उसे स्मरण हो आया कि हो न हो इसके पीछे सादाणी का फितूर है। उसके स्वभाव में ही यह शामिल है कि किसी दूसरे को किस प्रकार पीडा पहचाई जाए। संस्थापन का वरिष्ठ अट्टिाकारी होने के कारण कार्यालय की व्यवस्थाओं में उसका सीट्टाा दखल होता है और अट्टिाकारी भी उसकी बात को मानते हैं, हो न हो यह उसी की करतूत है। नहीं तो नृसिंह की किसी से क्या खुंदक हो सकती थी
पर कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसकी किसी को कोई कल्पना नहीं होती है। इस कार्यालय में समस्त कार्य आंकडों से सम्बन्ट्टिात होने के कारण सारे कार्मिक जोड-बाकी, गुणा-भाग में फेसे रहते हैं और आंकडों में उलझे हुए सामान्य जीवन के हेसी-खुशी के पलों से उन्हें दूर तक वास्ता नहीं रहता है। ऐसे में भी नृसिंह कुछ न कुछ हेसी-ठिठोली के पल तलाश ही लेता है। अब इसी कमरे को ले लीजिए। इस कमरे को अभिशप्त ऐसे ही नहीं कहा जा रहा है, इन्हीं आंकडों के अकूत दबाव को न झेल सकने वाले तीन कार्मिकों की मृत्यु हो चुकी थी और संयोग से तीनों ही इसी कमरा नम्बर १४ में बैठते थे। बस इसी कारण से इस कमरे के साथ अभिशप्त होने का ठप्पा लग गया और कमजोर दिल के कार्मिक इस कमरे से घबराने लगे। किन्तु नृसिंह इससे कभी विचलित नहीं हुआ। उसके लिए तो यह कमरा सबसे सुकूनदायक था। खिडकी के ठीक पीछे हनुमान मंदिर उसे ऐसा लगता था जैसे हनुमान जी हर वक्त उसके पीछे सहायता को तैयार खडे हैं। अन्य साथियों को भी उसका सम्बल रहता था। पूजा-पाठी होने के कारण वह सभी साथियों में नकारात्मक भावों को हटाकर सकारात्मक सोच पैदा करने में सफल रहता था, किन्तु आज जो यह घटना घटित हुई इसके बारे में तो कभी किसी ने सोचा भी नहीं था।
खिडकी से हनुमान जी को हाथ जोडकर बिना किसी से कुछ बोले नृसिंह सीट्टो अट्टिाकारी के चैम्बर में जा घुसा और अट्टिाकारी से अपनी सीट कमरा नम्बर १४ से हटवाने का कारण जानना चाहा। इस पर अट्टिाकारी ने कहा कि कौनसी सीट कहो लगवानी है, यह मेरा काम है। आपको सिर्फ अपना काम करना है, आपकी सीट रूम नम्बर १२ में लगवाई है। अतः आप जाओ और जहो आपकी सीट लगाई है, वहो पर काम करो। नृसिंह अट्टिाकारी के चैम्बर से निकल आया और दूसरी मंजिल पर रूम नम्बर १२ में घुसा। पर वहो पर उसकी सीट कहीं नजर नहीं आई। वह बाहर गैलेरी में आकर खडा हो गया। गैलेरी में उसकी मेज और कुर्सी बेतरतीब ढंग से रखे थे। उन्हें वहो पर लावारिस हालत में देखकर नृसिंह अपने आपे में नहीं रहा। वह तेज-तेज कदमों से सीढयो उतरकर ट्टाडट्टाडाता हुआ अट्टिाकारी के चैम्बर में फिर से घुस गया और तेज आवाज में अट्टिाकारी को उलाहना देते हुए बोला - ’’कहो की है आपने मेरे बैठने की व्यवस्था...? मेरी मेज कुर्सी तो गैलेरी में पडी है...?‘‘
’’तो क्या हुआ, रूम नम्बर १२ में डलवा लो।‘‘
’’कहो डलवाे... रूम नम्बर १२ में तो सारी जगह बुक है? आपको मेरे रूम नम्बर १४ में उस खिडकी के पास बैठने से क्या तकलीफ थी? वहो पर भी मैं अपना काम पूरी लगन और निष्ठा से कर रहा था, फिर किसी चाटुकार के कहने पर आपने मेरा स्थान परिवर्तन क्यों किया?‘‘ नृसिंह आवेश में भुनभुनाकर बोला।
’’आई से यू गेट आटि?‘‘ अट्टिाकारी की त्यौरियो चढ गई और गुस्से से भुनभुनाते हुए उसने नृसिंह को चैम्बर से बाहर निकलने को कहा।
’’चला जाेगा, मुझे भी कोई शौक नहीं है आफ पास आने का? किन्तु यह तो बतलाइये कि मेरी सीट कहो पर है?‘‘ नृसिंह जरा तेज आवाज में बोला।
’’आवाज नीचे, तुम निकलो यहो से, समझते क्या हो अपने आपको? मुझमें दिमाग नहीं है जो मैं किसी चाटुकार के बहकावे में आ जाेगा? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसा बोलने की..?‘‘ अट्टिाकारी गुस्से में तमतमा उठा और उसके साथ ही उसने मेज पर लगे घंटी के बटन को दबा दिया। तेज आवाज सुनकर चपरासी पहले से ही बाहर मुस्तैद था। वह तुरन्त भीतर आया और नृसिंह को लेकर चैम्बर से बाहर निकल गया। बाहर स्टाफ के कई साथी भीतर हुए वार्तालाप को लेकर आशंकित थे। वो नृसिंह के पीछे- पीछे दूसरी मंजिल पर चले आए। नृसिंह गैलेरी में ही अपनी सीट को व्यवस्थित कर बैठ गया और अनमने ढंग से अपने काम की फाइलों को पलटने लगा। साथी उसके इर्द-गिर्द मंडराने लगे और भीतर हुई बातों के बारे में जानने की कोशिश करने लगे, किन्तु नृसिंह मौन हो गया। उसने सिर्फ इतना ही कहा कि ’’कुछ नहीं, अपनी सीट के बारे में पूछा था, अट्टिाकारी ने कहा कि जहो व्यवस्था की है, वहीं बैठो, तो फिर कहो बैठ..? सीट तो यहो गैलेरी में पडी है। अपना क्या है, राज का काम करना है, यहीं पर बैठकर कर लगा। इस नीरस और बोर ऑफिस में और ट्टारा ही क्या है? रूम नम्बर १४ की उस सीट से मेरा लगाव इतना ही था कि मंदिर के दर्शन हो जाते थे और मैं प्रभु की कृपा महसूस करता हुआ अपना काम शांति के साथ सम्पादित कर लेता था। पर कोई बात नहीं, मेरा ईश्वर तो मेरे मन में है। कहीं पर बैठाऐ काम तो करना ही है। यहो पर गैलेरी में कोन मेरे ओहदे पर फर्क पडेगा और कौन-सी मेरी सैलेरी कम हो जाएगी?‘‘ नृसिंह ने जैसे हालात से समझौते करते हुए कह दिया। पर मन में कसक तो थी ही। साथी भी कुछ खिन्न मन से अपनी-अपनी सीटों पर चले गए और अपने रोजमर्रा के कामों में मशगूल हो गए। पर कभी-कभी ऐसा ही होता है कि जिस बात को आप भूलना चाहते हैं, वहीं मह फाडे सब कुछ निगलने के लिए आफ सामने आकर खडी हो जाती हैं। ऐसा ही आज हुआ। इसकी भी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। पर कभी-कभी ऐसा ही होता है, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं करता।
संस्थापन शाखा से राजू आदेश लेकर आया और नृसिंह के हाथ में थमा दिया। आदेश में लिखा था कि नृसिंह को अपने वर्तमान कार्य से तुरन्त प्रभाव से हटाया जाता है, वे अपना कार्यभार सहकर्मी सुरेश को सौंपकर दूसरी शाखा के प्रभारी का कार्यभार ग्रहण करेंगे और दूसरी शाखा के प्रभारी को नृसिंह की शाखा में सुरेश का कार्यभार सौंपा जाता है। वो अपना कार्यभार नृसिंह को सौंप कर नवीन कार्यभार तुरन्त प्रभाव से ग्रहण करेंगे। नृसिंह अपना कार्यभार सुरेश को सौंपकर जैसे ही निवृा हुआ, राजू एक नोटिस लिए तैयार मिला। नृसिंह ने नोटबुक में हस्ताक्षर कर नोटिस लिया और पढने लगा। लिखा था - ’’अद्योहस्ताक्षरकर्ता द्वारा आज आपकी सीट का निरीक्षण किया गया। निरीक्षण में पाया कि आपने पन्ध्ह फाइलें पेन्डिंग रखी हैं, जिनका निस्तारण किया जाना था। यह कृत्य राजकार्य के प्रति आपकी घोर लापरवाही का द्योतक है। नोटिस प्राप्ति के तीन दिवस में संतोषप्रद जवाब नहीं दिए जाने पर आफ विरु= अनुशासनात्मक कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।‘‘
क्या होता है, कि कभी-कभी कुछ ऐसा ही होता है, जो मनुष्य की कल्पनाशक्ति से बहुत दूर की बात होती है। आज ठीक वैसा ही हुआ। नृसिंह पिछले दस दिनों से पीएल छुड्डियों पर चल रहा था और अपने अवकाश के दिन में भी उसने ऑफिस आकर बकाया कार्य की फाइलों का निस्तारण किया था। जिन फाइलों के पेन्डिंग होने का आरोप-पत्र उसे थमाया गया था, उनके निस्तरण में अभी एक माह से अट्टिाक का समय शेष था। इस आरोप-पत्र में कोई दम नहीं था। इसका तो उसके पास माकूल जवाब है। नृसिंह ने नोटिस को तहकर अपनी जेब में रखा और दूसरी शाखा में नवीन कार्यभार ग्रहण करने चला गया।
दूसरी शाखा का प्रभार अभी उसने ठीक तरह से सम्भाला भी नहीं था कि राजू एक और नोटिस लेकर उपस्थित हो गया। नोटिस में आरोप था कि ’’आपकी शाखा की मोनिटरिंग ठीक ढंग से नहीं की जा रही है, कई प्रकार की सूचनाऐ समय पर अद्योहस्ताक्षरकर्ता तक नहीं पहचाई जाती, जिससे कार्यालय के कायोङ की गति बाट्टिात हो रही है। इसकी समस्त जिम्मेदारी आपकी है। कारण स्पष्ट करते हुए नोटिस का जवाब तीन दिवस में अद्योहस्ताक्षरकर्ता के समक्ष प्रस्तुत करें अन्यथा आफ विरु= अनुशासनात्मक कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।‘‘
नृसिंह ने उस नोटिस को भी अपनी जेब के हवाले कर दिया। तीन दिन का वक्त अभी उसके पास था। तैंतीस साल की नौकरी में उसने कभी ऐसा अवसर पैदा नहीं होने दिया कि कोई अट्टिाकारी उसको आवंटित कार्य समय पर सम्पादित न करने के बदले नोटिस थमाए। उसकी कर्तव्यनिष्ठा पर किसी भी सहकर्मी को किसी प्रकार का संदेह नहीं था। पर आज जब अट्टिाकारी ने ऐसे निराट्टाार आरोप-पत्र थमाए तो नृसिंह के साथ-साथ उसके सहकर्मी भी आश्चर्यचकित रह गए। बात घूमते-घूमते यूनियन के अट्टयक्ष तक पहच गई। यूनियन अट्टयक्ष अट्टिाकारी और कर्मचारी के बीच सेतु की तरह होता है। वह इस मामले को निपटाने के लिए अट्टिाकारी के पास अपना शिष्टमण्डल लेकर उपस्थित हो गया। अट्टिाकारी ने कहा कि, ’’कोई बात नहीं, मैंने जो नोटिस दिए हैं, उनका जवाब दिलवाओ, संतोषप्रद हुआ तो नोटिस अपने आप दाखिल दय्तर हो जाऐगे।‘‘
यह कोई मामला रफा-दफा करने की बात तो नहीं हुई पर एक आशा थी कि चलो अट्टिाकारी ने अपनी हुकूमत दिखलाते हुए आवेश में नोटिस दिए हैं, इनके जवाब मिलने पर नोटिस अपने आप मिथ्या साबित हो जाऐगे। पर कहा न कि कभी-कभी कुछ ऐसा ही घटता है जिसके होने की कोई सम्भावना ही नहीं बनती और यहो पर कुछ ऐसा ही हो रहा था, शिष्टमण्डल के बाहर आने के कुछ समय पश्चात ही एक और नोटिस नृसिंह को मिला जिसमें आरोप था कि ’’आप अपने उच्चाट्टिाकारी से बदतमीजी से पेश आए हैं और अपने अट्टिाकारी से अपमानजनक व्यवहार किया है। इसके बारे में अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें अन्यथा आफ विरु= अनुशासनात्मक कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।‘‘
यह तीसरा नोटिस था। जिस व्यक्ति को ततीस साल की नौकरी में एक भी नोटिस नहीं मिला उसे एक दिन में ही तीन-तीन नोटिस? अब इसको आप क्या कहेंगे? नौकरी करने वाला हर कोई जानता है कि तीसरे नोटिस का मतलब क्या होता है? अगर अट्टिाकारी आफ जवाब से संतुष्ट नहीं होता है तो आफ विरु= दण्डात्मक कार्यवाही शुरू की जाती है जिनमें तीन वेतनवृ=यों तक की रोक सम्भव है।
सारा माजरा अब हर किसी के सामने था, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा था अथवा समझते हुए समझने की कोशिश नहीं कर रहा था। उन्हें भी पता चल गया कि अट्टिाकारी से ेची आवाज में बात करने का फल क्या होता है। नृसिंह के सहकर्मी उसे समझाने लगे कि कुछ नहीं है, अट्टिाकारी से माफी मोग लीजिए। फालतू में अपना नुकसान क्यों करवाते हैं? पर यह तो कोई बात नहीं हुई। आखिर नृसिंह किस बात की माफी मोगे? नृसिंह ने ेची आवाज में बात की तो क्या अट्टिाकारी ने नीची आवाज में बात की थी? उसने तो उसे ’गेट आउट‘ तक कह दिया था। नृसिंह ने तो सिर्फ अपनी सीट के बारे में पूछा था, जिसे वहो से हटाने का कोई औचित्य उसे समझ नहीं आया और फिर हटाया भी तो कहीं उसका सम्मानजनक स्थान पर स्थान तो निट्टाार्रित करवाते, ऐसे ही गैलेरी में पटकी हुई सीट न तो उसके ओहदे का सम्मान था और न ही उसका। फिर उसने अट्टिाकारी का अपमान कैसे कर दिया? अपमान तो अट्टिाकारी ने उसका किया है। यह तो वही बात हुई कि उलटा चोर कोतवाल को डोटे। आखिर उसकी भी तो कोई इज्जत है कि नहींघ् नृसिंह ने तय कर लिया कि अब तो जो होगा, देखा जाएगा। जब कोई गलती ही नहीं की है तो माफी कैसे मोगे। यह तो सरासर उसकी तौहीन है। इन नोटिसों के जवाब वह जरूर देगा, ऐसे कि अट्टिाकारी तो क्या उच्चाट्टिाकारी भी उसके तथ्यों को झुठला नहीं सकेंगे।
नृसिंह ने तीनों नोटिसों के जवाब र्म ब= लिखे। ’’श्रीमान् जी आपने लिखा है कि मुझे आवंटित कार्य बकाया तथा मैंने कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरती है। जो कि तथ्यहीन एवं मिथ्या है। मैंने अवकाश पर रहते हुए भी बकाया कार्य किया है, जो कि मेरी राजकार्य के प्रति निष्ठा को दर्शाता है तथा जिन फाइलों का जिर्‍ आपने किया है उनके निस्तारण में एक माह से अट्टिाक का वक्त अभी शेष है, उक्त फाइलें भी अगर कार्य मुझे आवंटित रहता तो समयावट्टिा से पूर्व निस्तारित किया जाता। अतः नोटिस अस्वीकार्य है। नम्बर दो नोटिस स्वीकार्य नहीं है। उक्त कार्य मुझे आज दिनांक को आवंटित किया गया है तथा कार्य बकाया होने अथवा सूचनाऐ समय पर उपलब्ट्टा नहीं करवाये जाने का उारदायित्व मुझ से पूर्व आवंटित प्रभारी का है। अतः नोटिस नम्बर दो भी अस्वीकार्य है। नोटिस नम्बर तीन भी मिथ्या है, क्योंकि मुझ कार्मिक द्वारा आज तक किसी भी अट्टिाकारी अथवा कर्मचारी से दुर्व्यवहार सम्बन्ट्टाी किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं रही है। आपने जिस भाषा का इस्तेमाल मेरे साथ किया है, उसी भाषा में मैंने जवाब दिया है तथा किसी भी प्रकार के अपशब्दों का प्रयोग मेरे द्वारा नहीं किया गया है। अतः निवेदन है कि उक्त तीनों नोटिस निरस्त फरमाते हुए दाखिल दय्तर करवाने का श्रम करावें।‘‘
नृसिंह ने तीनों नोटिसों के जवाब बडे सटीक एवं समयावट्टिा में प्रस्तुत कर दिए थे और नोटिस तथा जवाब की एक प्रति उच्चाट्टिाकारी को भी प्रेषित कर दी थी। सहकर्मियों को उसके जवाबों से तसल्ली थी कि मामला रफा-दफा हो जाएगा।
परन्तु यहो तो मामला अहं का था। न तो अट्टिाकारी कदम पीछे हटाने को तैयार था और न ही नृसिंह झुकने को। तब मामला रफा-दफा कैसे हो? जीवन में कई बार ऐसा होता है कि कोई बात सीट्टो आफ स्वाभिमान पर चोट करती है और उसका आघात इतना कठिन होता है कि आप मन मारकर जीना नहीं चाहते। अपने अहं की पुष्टि के लिए आप ऐसा भी कर जाते हैं, जो करना नहीं चाहते। आज भी ऐसा ही हुआ। अट्टिाकारी का मानस था कि नृसिंह आकर अपने व्यवहार पर शर्मिन्दगी जाहिर कर दे तो नोटिसों को दाखिल दय्तर करे, किन्तु ऐसा हुआ नहीं।
कई दफा ऐसा ही होता है कि जैसा आप चाहते हैं, वैसा होता नहीं है और जो आप नहीं करना चाहते, वैसा करना पड जाता है। अपेक्षा के अनुरूप नृसिंह के क्षमायाचना नहीं करने पर कुपित हो उन्होंने टिप्पणी लिख दी - ’’अद्योहस्ताक्षरकर्ता जवाब से संतुष्ट नहीं है।‘‘ और अपनी टिप्पणी के साथ अनुशासनात्मक कार्यवाही हेतु प्रकरण उच्चाट्टिाकारी को अग्रेषित कर दिया।
किसी भी कार्मिक के विरु= तीन आरोप-पत्र एक साथ दाखिल होना अपने आप में गंभीर प्रश्न पैदा करता है। उच्चाट्टिाकारी के यहो से दण्डात्मक कार्यवाही का नोटिस और व्यक्तिगत सुनवाई की तिथि नियत करते हुए पत्र नृसिंह को प्राप्त हो गया। साथियों ने नृसिंह को फिर से समझाना चाहा कि सभी के अपना स्वाभिमान होता है। आपका है तो अट्टिाकारी का भी है, किन्तु यह दुनिया खाली स्वाभिमान से ही नहीं चलती। यहो समझौता भी चलता है। अगर समझौता करोगे तो फायदे में रहोगे अन्यथा आर्थिक नुकसान उठाना पडेगा। यह दुनिया सदियों से तीन क्लासों में बेटी रही है, उच्च-मट्टयम और निम्न। अब तुम ही समझ लो कि उच्च और निम्न को तो वैसे भी कोई फर्क पडने वाला है नहीं। क्योंकि उच्च का पक्ष वैसे ही मजबूत होता है और निम्न को वैसे भी कोई चिंता नहीं है, क्योंकि नंगा नहाए क्या और निचोडे क्या? पर तुम्हें जरूर फर्क पडेगा। इसलिए समझौता ही उाम मार्ग है। झुकने से तुम टूट नहीं जाओगे और अपने अट्टिाकारी के सामने झुकने से कौन-सा तुम्हारा स्वाभिमान चूर हो जाएगा? आखिर गलती तो तुम्हारी भी थी कि तुम तेज आवाज में बोले थे।
पर क्या होता है कि कभी-कभी ऐसा ही होता है, जिसकी किसी को आशा नहीं होती। नृसिंह की सोच थी कि इन मिथ्या आरोपों पर उच्चाट्टिाकारी उन्हें क्या कहेंगे, वह सीट्टो-सीट्टो सीट बदलने वाली पूरी घटना उनके सामने रख देगा। फिर तो ये आरोप-पत्र रड्ढी की टोकरी में जाऐगे ही। उसने उच्चाट्टिाकारी के सामने अपना पक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर रखा। उच्चाट्टिाकारी उसकी बातों से सहमत हुए और जवाब से संतुष्ट भी, किन्तु जब नृसिंह उनके चैम्बर से निकला तो उसे वहो अपना अट्टिाकारी दिखलाई दिया जो नृसिंह के चैम्बर से निकलते ही चैम्बर में घुस गया था।
नृसिंह के माथे पर शिकन उभर आई। उसके मन में खटका हुआ कि कुछ न कुछ तो दाल में काला है। पर वह कर भी क्या सकता था।
नृसिंह की सारी दलीलें ट्टारी रह गई और उसे एक इंर्‍ीमेंट की रोक से दण्डित किया। नृसिंह की सेवानिवृा में भी एक साल ही बचा था।
जैसा कि अमूमन होता है। सेवानिवृा कार्मिक के विदाई समारोह में सभी कर्मचारी, अट्टिाकारी अपनी- अपनी शुभकामनाऐ देते हुए उसके सुखी-स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए दो शब्द भी कहते हैं। सबसे पहले नृसिंह ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मैंने इस कार्यालय को मेरे घर की तरह ही समझा है और इसके हर सदस्य को अपने परिवार के सदस्य की तरह ही माना है। मनुष्य गलतियों का पुतला होता है। मुझसे भी जाने-अनजाने गलतियो हुई होंगी। आफ प्यार-स्नेह एवं अपनत्व के लिए मैं सदैव आपका (णी रहगा। मेरी किसी बात से किसी का दिल दुखा हो, किसी को ठेस पहची हो तो मैं क्षमाप्रार्थी ह।
सभी के दो शब्द होने के बाद अट्टिाकारी ने कहा, ’’नृसिंह जी, आज अपने राजकीय कर्तव्यों का भली- भोति निर्वहन करते हुए राज्य सेवा से सेवानिवृा हो रहे हैं। इनका कार्य और व्यवहार सभी के लिए अनुकरणीय है। इन्होंने अपने सभी कार्य पूरी लगन और निष्ठा से किए हैं तथा कार्यालय में अपने मृदु व्यवहार की छाप छोडी है। मैं इनके सुखद एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना करता ह और आशा करता ह कि मुझसे अथवा स्टाफ के किसी कार्य-व्यवहार से उन्हें ठेस पहची है तो हमें क्षमा करेंगे।‘‘
विदाई समारोह के बाद सभी अपने-अपने घरों की तरफ चल पडे पर सभी के मन में एक निरुार प्रश्न घुमडने लगा था। नृसिंह के दो शब्द में क्षमा प्रार्थना थी और अट्टिाकारी ने भी दो शब्द में क्षमा मोगी, ये दो शब्द सालभर पहले कहे होते तो आज कहे शब्दों में कितना वजन होग? पर क्या है कि कभी-कभी कुछ ऐसा ही होता है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं करता और वह हो जाता है।
कालूबास, वार्ड नं. २८, श्रीडूंगरगढ-३३१८०३ ;बीकानेरद्ध, मो. ९४६०५६४५१४