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कैलेण्डर

अनुपम सक्सेना
रामबाबू ने अपने कमरे का ताला खोला, टेबल को व्यवस्थित किया, खिडकियो खोली और उनकी दृष्टि सामने दीवाल पर टंगे कैलेण्डर पर पड गई। ’’अरे! आजह सात तारीख होने को आई और दीवाल पर दिसम्बर का कैलेण्डर लटका हुआ है‘‘ राम बाबू ने सोचा। अनमने मन से उन्होंने कैलेण्डर को निकाला और कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने कैलेण्डर को देखा, उसके पन्नों को छुआ। कितने गन्दे हो गए हैं पन्ने, भुरभुरे, मटमैले और बदरंग। उन्होंने ट्टयान से देखा, केवल तारीखें ही स्पष्ट थीं, तारीखों की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण की तस्वीर उन्हें साफ दिखाई नहीं दे रही थीं। उन्होंने अपना चश्मा उतारा ओखों को हथेलियों से दबाया, चश्मे को रुमाल से साफ किया और गौर से देखने लगे। जनवरी... फरवरी... मार्च... अप्रेल... दिसम्बर तक कहीं भी उन्हें कृष्ण की लीला स्पष्ट दिखाई नहीं दी। एक साल में ही कैलेण्डर ने अपने स्वरूप को खो दिया था।
रामबाबू सोच में पड गए, उन्होंने चश्मा उतार कर टेबल पर रख दिया और ओखें बंद कर लीं। पहले कैलेण्डर कितने अच्छे होते थे। सेहतमंद पन्ने... साफ और स्पष्ट, चिकने पन्नों पर चटख रंगों में छपी हुई थीम बेस्ट पेंटिंग, कभी-कभी विभिन्न मौसम के रंग और हमारी संस्कृति और सभ्यता के चित्र, ठीक हमारे जीवन की तरह साफ-सुथरे और मर्यादित। रामबाबू हर साल पुराने कैलेण्डर को सम्भाल कर रखते और नये वर्ष का कैलेण्डर बडे उत्साह से सम्भाल कर दीवाल पर लगाते। ट्टाीरे-ट्टाीरे हवाऐ बदलीं... नए-नए मौसम के साथ और फिर, फिल्मी सितारों के कैलेण्डर या फिर किसी मॉडल को विभिन्न और विशेष उत्पादों को दर्शाती देह कैलेण्डर में आकर्षण का केन्ध् होते चले गए। जहो पहले सावट्टाानी से कैलेण्डर को दीवाल पर लगाया जाता था, वहीं अब कैलेण्डर में चाकू से छेद करके सुतली के टुकडे से उसे दीवाल पर लटका दिया जाता है। महीना समाप्त होने पर उेगली से छेद बडा करके सुतली को दूसरे माह के पन्ने से बोट्टा कर वापस लटका देते हैं। रामबाबू ने समय का परिवर्तन न सिर्फ देखा किन्तु उसे महसूस भी किया और वह भी पूरी ईमानदारी से। समय कितना बदल गया, साट्टान कम थे, किन्तु जीवन सुखी था। हम जीवन मूल्यों का आट्टाार, परिवार का सुख और सामाजिक सरोकार, एक-दूसरे के सुख-दुख को बिना किसी भेदभाव के बोटते थे। रामबाबू भूतकाल में विचरण कर रहे हैं, वर्तमान से उन्हें क्या मिला? और भविष्य?... उसकी तो कोई स्पष्ट तस्वीर भी दिखाई नहीं दे रही है।
स्वतंत्रता के पहले वे छोटे थे और देश में अंग्रेजों का राज था। उस समय उन्हें स्वतंत्रता और गुलामी में अंतर समझने में काफी समय लगा। उन्होंने सुना था कि गुलामी की खीर पूडी से आजादी की घास खाना कहीं अच्छा है और वे तैयार भी थे। महाराणा प्रताप ने आजादी के लिए घास की रोटी खाना स्वीकार किया। लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि घास की रोटी खाने का नारा लगाने वाले अपने-अपने मवेशियों को घास खिलाकर, दूट्टा, घी और मक्खन खाने लगेंगे।
रामबाबू स्वतंत्र भारत में पढ-लिखकर गोव के स्कूल में पढाने लगे। मो-बाप की एक ही संतान। गोव में खेतों के मालिक होने से जीवनयापन में कोई बाट्टाा नहीं थी। उन्हें केवल यही ट्टाुन थी कि कैसे उनके द्वारा खुशहाल समाज बने? कैसे वे नवयुवकों को अच्छे संस्कार से जोडें। कुछ वर्ष आराम से निकले फिर उनका स्थानान्तरण शहर में हो गया।
शहर में आकर उन्हें लगा, वे यहो अट्टिाक से अट्टिाक विद्यार्थियों को अच्छा बना सकते हैं। स्वतंत्रता के बाद का भारत कैसा हो इसकी कल्पना उनके मन- मस्तिष्क पर थी। रामबाबू बडे मनोयोग से विद्यार्थिय को पढाते, दसवीं और ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों में वह भारत का भविष्य देखने लगते।
ट्टाीरे-ट्टाीरे समाज विकसित होने लगा। गोव अब शहर बनने लगे। अब सब समझने लगे कि आजादी के बाद उन्हें क्या करना चाहिए। अट्टिाकांश युवा वर्ग, पान की दुकानों पर एवं चाय की गुमटियों पर देश और समाज पर बहस करने लगे। फिर शहर और भी बडा हो गया। अब तक चाय की थडयों पर और पान की दुकानों पर जो बहसें हुआ करती थीं, वह कॉफी हाजों में शिय्ट हो गई। युवा अब ट्टार्म और राजनीति पर खुलकर चर्चा करने लगे।
रामबाबू सम्पूर्ण परिवर्तन को देख रहे थे, कुछ युवाओं ने अपनी दाढी और बाल बढा लिए। बेमतलब की लम्बी-लम्बी बहसें होने लगीं और वे युवा तुर्क कहलाने लगे। काफी हाज के एक कोने में ऐसे ही दाढी वालों का जमावडा होने लगा। जिसकी दाढी और बाल सबसे बडे वह सबका नेता। दाढी की साइज के हिसाब से युवा वर्ग में नकारात्मकता भी हावी होने लगी।
इसी बीच रामबाबू का स्थानान्तरण दूर किसी गोव के स्कूल में हो गया। रामबाबू चले गए। भारत की जनता अब तक वोटों के महव को, चुनाव को और राजनीति को समझने लगी थी। कुर्सी की महाा अब उसे समझ में आ गई थी, ट्टाीरे-ट्टाीरे राजनीति भी व्यापारिक हो गई।
रामबाबू का स्थानान्तरण एक गोव से दूसरे गोव में, और फिर एक शहर से दूसरे शहर में होने लगा। रामबाबू परेशान हो गए। बार-बार अट्टिाकारियों के पास जाते, अपने वृ= माता-पिता और गोव के प्रति अपनी श्र=ा का हवाला देकर अपने गोव के पास ही रहना चाहते। कुछ समय तो ठीक रहा फिर यह व्यवस्था मंत्रियों के पास आ गई। स्थानान्तरण रोकने अथवा इच्छित स्थानों पर कराने के लिए रामबाबू को पसीना आने लगा। बार-बार इट्टार से उट्टार स्थानान्तरण होने से वह खिन्न हो गए। पहले वे मंत्री के पास प्रार्थना पत्र लेकर जाते, तो मंत्री जी ससम्मान उनका प्रार्थना पत्र लेकर आश्वासन दे देता। इसके बाद सिफारिशी पत्र लेकर जाने लगे। अब जब वे मंत्री जी से मिलते तो उन्हें वही दाढी वाले जो काफी हाज में व्यवस्था को, समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए, आग उगलते थे और देश के महान नेताओं और महापुरुषों के जीवन को आत्मसात करने की बात करते थे, बैठे हुए मिलते। मंत्री जी इन्हीं में से किसी एक को इशारा करते और वह रामबाबू से प्रार्थना पत्र ले लेता।
’’आप प्रार्थना पत्र दे जाइए, मंत्री जी इसे देख लेंगे।‘‘
’’लेकिन मेरा एक ही साल में यह तीसरा टत्रंसफर है सर।‘‘ रामबाबू चिरौरी करते।
’’हो-हो मंत्री जी देखेंगे, हमने आपकी एप्लीकेशन ले ली है।‘‘ उनमें से कोई एक कहता।
रामबाबू खिन्न मन से वापस लौट जाते। ट्टाीरे-ट्टाीरे विकास की दर बढने लगी। गोव और शहर की सडकें जुडने लगीं... बिजली की लाइनें खिंच गई... ट्यूबवेलों से ट्टारती के सीने से पानी निकाला जाने लगा। हो यह बात और थी कि एक बरसात के बाद एक गोव से दूसरे गोव की सडक साफ हो जाती या घंटों बिजली नहीं आने से ट्यूबवेल नहीं चलते। बिजली के खम्भे खडे-खडे अंट्टोरे की ओर मूक दर्शक से देखते रहते।
रामबाबू ने उस दिन नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया जब उन्होंने सुना कि स्थानान्तरण रोकने या करवाने के लिए रुपये देने पडेंगे। स्वतंत्र भारत का वह सपना जो उन्होंने इतने वषोङ से देखा था, दूर-दूर तक साकार होते नहीं दिख रहा था। परिवर्तन की ऐसी लहर चली कि शिक्षा, राजनीति, सामाजिक बंट्टान, सभ्यता और संस्कृति बिका होते गए। व्यापारी वर्ग बढ गया। समाज जाति, ट्टार्म, जनता और साा में बेटने लगा। रामबाबू ने अपने घर में ही एक स्कूल खोल लिया और छोटे-छोटे बच्चों को पढाने लगे। उन्हें अभी भी आशा थी कि शायद इन्हीं में से कुछ बच्चे बडे होकर उनके सपनों के भारत को कभी न कभी तो साकार करेंगे। उम्र के इस पडाव पर वे स्वयं क्या कर सकते थे। उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं आया था। अलबाा बच्चे कम पढने आते थे, लेकिन रामबाबू की दुनिया वैसी की वैसी थी।
यहो मैं पाठकों को यह बताना चाहता ह कि रामबाबू की स्वयं की दुनिया वैसी ही थी, किन्तु वे नियमित टेलीविजन देखते। घटनार्मोंै पर मनन करते और जो भी मिलता उससे यह कहना नहीं भूलते कि हमें एक होकर देश को बनाने में योगदान देना चाहिए। नेताओं को जनता के सेवक बनकर और अट्टिाकारियों को लंच और डिनर पर बहस करना छोडकर सबको साथ लेकर चलना चाहिए, आदि-आदि...।
रामबाबू की एकाग्रता भंग हुई। छोटे-छोटे बच्चों ने आना आरम्भ कर दिया था, वे वापस अपनी दुनिया में लौट आए, लेकिन वे अभी भी सोच रहे थे कि क्या इन्हीं में से कोई बच्चा नई र्‍ान्ति में आग लगाने की एवं महापुरुषों की जीवनी को आत्मसात करने की बात करेगा? यदि ऐसा हो जाए तो क्या हम गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद से लडकर, एक होकर भारत को शिखर पर खडा कर सकते हैं
’’आजादी की घास गुलामी की खीर पूडी से अच्छी है‘‘ वे बुदबुदाए और पुराने कैलेण्डर को उठाकर एक ओर रख दिया। इस दुविट्टाा के साथ कि नया कैलेण्डर कैसा होगा?... लेकिन जैसा भी होगा छब्बीस जनवरी और पन्ध्ह अगस्त तो उसमें होंगे ही, इसके लिए वे आश्वस्त थे।
१५/१४, पुराना फतहपुरा, ’सागर एन्क्लेव‘, विद्या मार्ग, उदयपुर ;राज.द्ध, मो. ९४१४१६८८२८