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सेंध

हरीप्रकाश राठी
अभी दो माह पूर्व ही मैंने चौबीस पूरे किये हैं। यह उम्र इतनी बडी भी नहीं कि मैं दम्भ से कह सक कि मैंने अनेक पापड बेले हैं अथवा अनेक दुर्ट्टार्ष समस्याओं को सुलझाया है लेकिन इतना तो कह ही सकता ह कि इस छोटे से अन्तराल में यानि जब से मेरी समझ बनी है एवं जिन-जिन समस्याओं को मैंने सुलझाया है, बजरंगबली की कृपा से ही सुलझाया है। मेरी समस्याओं एवं बजरंगबली में अनन्य नाता है। कोई एक समस्या हो तो बताे। जब-जब मेरे परीक्षफल को लेकर आशंकित हुआ, जब-जब मेरा स्वास्थ्य बिगडा, जब-जब मुझे घर-बाहर की अन्य समस्याओं से जूझना पडा, मैंने बजरंगबली के इसी मंदिर में माथा टेका है। मेरी समस्याओं में पापा द्वारा मोटरसाइकल न दिलाने अथवा हाथखर्ची न बढाने से लेकर मैं किस विषय का चयन करूे, कौन-सी नौकरी करूे आदि तक रही हैं। वस्तुतः इस मंदिर में मुझे तब से ही श्र=ा हो गई जब मैं दस वर्ष का था एवं भयानक टाइफाईड की चपेट में आया था। अन्य कोई इलाज नहीं लगा तब दादी मुझे यहो लेकर आई एवं बाद में जाने क्या चमत्कार हुआ कि मैं भला चंगा हो गया। हालोकि घर आने वाले डाक्टर ने इसका श्रेय यह कहकर लेना चाहा कि एंटिबायोटिक्स का असर होते-होते होता है एवं यह इन दवाइयों का ही चमत्कार है, दादी ने इस तर्क को इंकार कर मेरी श्र=ा को पुरजोर किया कि यह सब बजरंगबली की मेहर है। तब से अब तक हर मुसीबत की घडी में मैं यहीं आता रहा ह। कभी-कभी बजरंगबली को देखकर अनेक प्रश्न भी मेरे जेहन में आते हैं कि यह वानर है तो इनका मह, ओखें, कान, दोत, बु=, विवेक मनुष्यों जैसा क्योंकर है अथवा अन्य वानर यदि निर्वस्त्र रहते हैं तो यह वस्त्रों में क्यों रहते हैं, गले में माला आदि क्यों ट्टाारण करते हैं अथवा रामजी के जमाने में मनुष्यों की क्या कमी थी जो उन्हें वानर से दोस्ती करनी पड गई लेकिन मरी अंट्टाश्र=ा इन सभी प्रश्नों को सिरे से खारिज कर यही कहती है कि तेरी सारी समस्याओं का समाट्टाान तो यहीं माथा टेकने से होता है तो तू क्यों खामख्वाह प्रभु के रूप-वस्त्रों वगैरह का विवेचन करता है। तू कोई (षि है, जो ईश्वर के रूप-गुण की व्याख्या करे। तुझे आम खाने से मतलब है अथवा पेड गिनने से। ऐसा सोचते ही मेरे दोनों हाथ अनायास मेरे दोनों कानों की ओर चले जाते हैं जिसका अर्थ है कि, हे प्रभु! क्षमा करना! दुर्बु= मनुष्य कभी-कभी कुतर्की हो ही जाता है।
बहरहाल इस बार जो समस्या आन पडी है उसका समाट्टाान बिना बजरंगबली की कृपा के सम्भव नहीं है। मैंने बहुत सोचकर देख लिया, मुझे दूर-दूर तक समाट्टाान नजर नहीं आ रहा। सोप सर पर एवं बूंटी पहाड पर हो तो प्रभु कृपा के बिना समाट्टाान मिल सकता है क्या? इसीलिए पद्मासन लगाकर उनसे याचना कर रहा ह, प्रभु! यह समस्या तो पर्वत से अट्टिाक भारी है। पर्वत हिलाना कदाचित सम्भव हो लेकिन इस समस्या को सुलझाना सम्भव नहीं है। मैं आपकी तरह इतना बलशाली भी तो नहीं कि पर्वत उठाकर आकाश में उड ल, मेरी समस्या का समाट्टाान तो आपकी कृपा से ही सम्भव है। आपकी कृपा ही मेरी संजीवनी है। किसी समस्या के समाट्टाान के मार्ग में एक राक्षस अथवा एक सुरसा खडी हो तो उसे लोघ भी जाे, यहो तो पग-पग पर राक्षस एवं सुरसाऐ खडी हैं। एक से बच तो दूसरी हाजिर। मेरा परिवार है ही ऐसा। इस समस्या के चलते मेरी स्थिति उस डत्रइवर की तरह बन गई है जिसे न सिर्फ अनेक स्पीड ब्रेकर्स पार करने हैं, सडक के गड्ढों से भी गाडी को बचाना है। हे बजरंगबली! अब तो आपका एवं मात्र आपका ही सहारा है।
अगर मैं मेरे कुनबे को घर न कहकर संग्रहालय कह तो लाजमी होगा। आप उस घर को क्या कहेंगे जहो एक साथ चार-चार पीढयो बसती हों यानि परदादा, दादा, पापा एवं मैं। मैं तो अभी कआरा ह पर बाकी तीन के साथ उनकी पत्नियो यानि परदादी, दादी एवं मम्मी ऐसे रहती हैं जैसे ब्र॰ा के साथ ब्र॰ाणी, विष्णु के साथ लक्ष्मी एवं शिव के साथ पार्वती। इन महान देवियों की तरह यह तीनों भी अपने-अपने पतियों की अंट्टाभक्त हैं एवं सदैव उनकी हो में हो मिलाती हैं। यानि एक अडंगे का अर्थ दो अडंगा है एवं सब बिगड जाये तो अडंगा क्यूब। एक बार ही क्या कम होता है झेलने के लिए? यहो तो कृपासिंट्टाु ने बाप का बाप एवं उसका बाप भी बसा रखा है। इतना ही नहीं सभी फ घडे एवं एक से बढकर एक गुणी एवं घुटे हुए हैं। तिस पर मेरी समस्या भी तो ऐसी है कि मैं अच्छी तरह जानता ह कि सुनते ही तीनों की ओखें अंगारे उगलने लगेंगी। परदादी-दादी एवं मम्मी कौन-सा मुझे बख्श देंगी। कोई कुऐ में पडने की ट्टामकी देंगी, तो कोई फोसी से लटकने की। मम्मी का बस चले तो जहर खा ले। इन औरतों के पास कम हथियार हैं क्या? घर में जब भी अपनी चलानी हो तो सभी मर्द इनको आगे कर खुद ऐसे दुबकते हैं जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो। तीनों ने बिलियार्ड कभी न खेली हो पर एक बॉल से दूसरी बॉल हिट करने की कला सबको बखूबी आती है। ऐसे उस्तादों-उस्तादनियों एवं इतनी भीषण समस्या के बीच मेरी वह गति है जो अभिमन्यु की चर्व्यू्ह में फेसने पर हुई थी।
मेरे परदादा जिनका नाम सत्यनारायणजी सक्सेना है, अब नब्बे पार हैं। वे अनेक बार गर्व से कहते हैं, वषोङ पूर्व घर आए एक ज्योतिषी ने ठीक ही कहा था कि मैं नब्बे से पिर जीेगा। मैं जब भी उनसे अकेले में मिलता ह वे अपने यौवन, तत्कालीन जमाने एवं उस समय की प्रथाओं आदि के बारे में चटखारे लेकर सुनाते हैं। उन जमानों में क्या भोज हुआ करते थे, बारातें दस-दस घोडों के साथ निकलती थी, औरतें मदोङ की ओख से डरती थी। अब तो सत्यानाश हो गया है, उस समय बहुऐ रोज सास के पोव दबाती थी एवं जाने क्या-क्या। इन रोमांचक कथाओं को सुनाते हुए कई बार वे अपनी पिर जाती हुई मछों पर ताव भी देते हैं हालोकि मुझे साफ दिखता है कि इन मछों में अब वो ताव नहीं है। हो, यह बात अवश्य है कि नब्बे में भी वे अपने सारे कार्य स्वयं करते हैं एवं किसी के अट्टाीन नहीं है। उनकी कमर थोडी झुकी होने से उनकी लम्बाई का आकलन कठिन है। परदादी बताती है कि जवानी में इनका सिर दरवाजे की पिरी चौखट से टकराता था तब सास ताने देकर कहती थी, जरा सम्भल कर चला कर। परदादाजी को हम सभी बाबा कहते हैं। परदादी बताती है अपनी जवानी में यह न सिर्फ सौ दण्ड नित्य लगाते थे, पहलवानी करने अखाडे भी जाते थे। पूरे मोहल्ले में इनका दबदबा था। रूआब तो आज भी कौनसा कम है। दादा एवं पापा से अपनी बात मनवाते समय य ओखें तरेरते हैं कि दोनों के पास उनसे सहमत होने के अतिरिक्त विकल्प ही नहीं रहता। बाबा की तुलना मैं उस बूढे शेर से कर सकता ह जो शिकार के लिए भले न दौड पाता हो पर अपने दायीं ओर के दो दोत दिखाकर शिकार हथिया अवश्य लेता है। बाबा हमें अनेक बार अंग्रेजों एवं स्वातंत्र्य संग्राम की कथाऐ भी गर्व से सुनाते हैं। गोट्टाी के साथ ’भारत छोडो आन्दोलन‘ में जेल भी होकर आये हैं एवं आज भी शहर के उन चंद स्वतंत्रता सेनानियों में हैं, जिन्हें सरकार प्रतिवर्ष सम्मानित करती है। बाबा कहते हैं स्वतंत्रता का जुनून उन दिनों हर युवा के दिलों में समुध् की लहरों की तरह हिलौरे लेता था। कभी-कभी आज की व्यवस्थाओं को देखकर बाबा निराश भी हो उठते हैं। तब कोय्त में भरकर कहते हैं हमें क्या पता था कि असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से मिली इतनी महंगी आजादी का आज की पीढी के लिए यह मोल होगा। काश! इन्होंने अंग्रेजों की प्रताडनाऐ देखी होती। जमाखोरों, मिलावटखोरों एवं भ्रष्टाचारियों के नाम से ही बाबा उखड जाते हैं। जिर्‍ होते ही ओखें लाल हो जाती हैं। तब रोष में भरकर कहते हैं हमारे जमाने में इनकी रूह कोपती थी। बाबा अनेक बार मुझे उन जमानों की व्यवस्थाओं, रूढयों के बारे में भी बताते हैं। कहते हैं दादी प्रथम बार घर आई तब एक हाथ घघट ओेढे थी। मेरे परदादा यानि मेरे बाबा के माता-पिता से तो वह वषोङ बात नहीं करती थी। उस समय बहुओं को सास-श्वसुर से बोलने तक पर पाबन्दी थी।
मेरे दादा सार पार हैं। परदादा जब बीस के रहे होंगे, तब उनका जन्म हुआ। बाबा का विवाह तो मात्र सोलह वर्ष में हो गया था। तब परदादी चौदह की थी। उन दिनों रजस्वला होते ही लडकियों का विवाह कर देते थे। कमोबेश दादा के जमाने में भी यही प्रथाऐ चलती रही पर हो, घघट चार अंगुल का हो गया, लडकियो पढने लगी एवं युवक-युवतियों के विवाह की उम्र में भी कुछ इजाफा हुआ। दादा का विवाह हुआ तब वे बीस एवं दादी सत्रह बरस की थी। परदादी निपट निरक्षर थी लेकिन दादी आठ जमात बढी थी। मैंने दादा को बाबा का विरोट्टा करते हुए कभी नहीं देखा, हो पापा से उनका अनेक मुड्ढों पर मत-मतांतर रहता है। दादा कहते हैं इन दिनों जमाने की हवा तेजी से बदली है एवं वे अक्सर मुझे एवं मेरी बहनों को लेकर आशंकित रहते हैं। हमारे पहनावे का वे विरोट्टा तो नहीं करते, लेकिन कभी-कभी हम जीन्स पहनते हैं, पार्टियों में डांस करते हैं अथवा फिल्में देखकर देरी से आते हैं तो दादा की भौंहें चढ जाती हैं। हमारा नसीब अच्छा है कि वे सीट्टो हमें कुछ नहीं कहते पर कभी-कभी दादी पर अथवा अपने सुपुत्र यानि मेरे पापा पर भडास अवश्य निकालते हैं। पापा तब चिढकर कहते हैं कि खुद अपने पोते को क्यों नहीं समझाते तो वे वही पुराना जुमला इस्तेमाल करते हैं, ’’मैं क्यों कह पोते से। ब्याज मूल से प्यारा होता
है। तुझे बाबा कुछ कहते हैं क्या?‘‘ दादा की ये बातें सुनकर मेरी छाती चौडी हो जाती है। कभी-कभी घर के अनेक मुड्ढों पर दादा की अथवा पापा की स्थिति सेंडविच की तरह होती है जिसके पिर-नीचे दो अलग-अलग पीढयों का दबाव होता है। मेरे पापा बैंक में काम करते हैं, अब पचास पार है। पापा ने एम.कॉम. किया है एवं मम्मी भी एम.ए. है। दादी बताती है कि पापा का विवाह हुआ तब पापा तेबीस वर्ष के थे एवं मम्मी इक्कीस की। मैं उनके विवाह के दो वर्ष बाद हुआ एवं मेरी दो बहनों में से एक पोच एवं दूसरी मेरे सात वर्ष बाद हुई। खुदा का शुर्‍ है कि बहनें छोटी हैं। अगर वे बडी होती तो इस वंशावली में मेरी स्थिति पहाड के नीचे दबे चूहे की तरह होती। बाबा एवं दादा दोनों अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे जबकि पापा के मेरी ही तरह दो बहनें हैं। फूफा-फूफी जब कभी सपरिवार घर आते हैं तो हमारी बीस कुर्सियों वाली डाइनिंग टेबल पूरी भर जाती है। बाबा आज भी किसी उत्सव में जाते हैं तो पगडी बोट्टाकर जाते हैं। दादा पगडी बोट्टाना तो नहीं चाहते पर बाबा के कहने से कभी-कभी लगा लेते हैं। दादा अक्सर पैंट-शर्ट पहनते हैं एवं यदा-कदा ट्टाोती-झब्बा भी पहन लेते हैं। पापा को यह सब पसन्द नहीं है, अतः वे इन प्रथाओं का पालन नहीं करते। वे पैंट-शर्ट पहनते हैं एवं पगडी लगाना तो उन्हें कतई नहीं सुहाता। मम्मी घघट नहीं रखती एवं कभी-कभी सलवार-कुर्ता भी पहन लेती हैं हालोकि दादी-परदादी को यह नहीं सुहाता। परदादा-दादा-पापा तीनों को औरतों की नौकरी नहीं सुहाती, अतः पापा ने मम्मी को नौकरी नहीं करने दिया, हालोकि मम्मी भी बैंक प्रतियोगी परीक्षा में सलेक्ट हुई थी। मम्मी पापा को आज तक इसका ताना देती है। परदादी अक्सर ईश्वर भजन में लगी रहती है। दादी-परदादी के साथ मंदिर जाती है तो मम्मी की रसोई में हाथ भी बेटाती है। कुल मिलाकर खड्डी-मीठी यादों के बीच हमारा कुनबा ठीक चल रहा है एवं गली-मौहल्ले के लोग पारिवारिक संगठन की बात पर अक्सर हमारा उदाहरण देते हैं।
अरे बाप रे्! इन सबका पर्सनेलिटी-पुराण पढते-पढते मैं मेरी समस्या तो भूल ही गया। मैंने सीए किया है एवं अभी छः माह पूर्व ही बैंक में लगा ह। इसी दरम्यान मेरा सकीना से, जो जाति की मुसलमान है परिचय हुआ है। वह भी सीए है, बिंदास है, ऑफिस जीन्स एवं टॉप पहनकर आती है एवं अपने काम में भी मुस्तैद है। अनेक बार तो वह मुझे भी काम में मदद करती है, हालोकि यह इतर बात है कि मैं उसे कम ही सहयोग करता ह एवं न ही वह कभी ऐसा करने को कहती है। औरतों में कुछ न पाकर देने का भाव जन्मजात होता है। वह इसी शहर की है, उसके पापा-मम्मी दोनों वकील हैं एवं यहीं स्थानीय कोर्ट में नामी वकील है। सकीना जितनी कर्मठ एवं विदुषी है उतनी ही सुंदर एवं आकर्षक भी है। उसके ेचे कद, पहनावे, तीखी नाक, कसी भौंहें, शराबी ओखें एवं ताजे फूल की तरह खिले रूप पर कोई भी युवक रीझ सकता है। तब्बस्सुम जानलेवा है एवं दन्तपंक्ति इतनी सुन्दर कि हेसते हुए मोती झरते हैं। आवाज ऐसी की कोयल भी लजा जाये। अब जबकि अट्टिाकांश लडकियो बॉबकट पर उतर आई हैं, उसके बाल घने लम्बे हैं। वह मेरे बगल वाली सीट पर बैठती है। जाने कब हम दोनों में प्रेम के अंकुर पैठ गए एवं गत तीन माह से आलम यह है कि हम एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। हम दोनों विवाह के इच्छुक हैं एवं मेरा सौभाग्य है कि उसके माता-पिता ने सहमति दे दी है। मेरी आट्टाी समस्या का तो समाट्टाान हो गया है, लेकिन मैं जानता ह कि मेरे कुनबे से अनुमति मिलना टेढी खीर है। एक बाप को तो मनाया जा सकता है पर यहो तो बाप के बाप कतार में लगे हैं। इन दिनों यही सोचता रहता ह कि क्या जुगत भिडाे कि इन छहों यानि पापा से बाबा एवं मम्मी से परदादी सबको पार पा जाे। मैं जानता ह अगर मैंने पापा को मना लिया तो दादा-बाबा अड सकते हैं एवं दादा को मना लिया तो पापा एवं बाबा अड सकते हैं। यह मान भी गए तो औरतें कौन-सी मान जाऐगी? सबसे पहले तो परदादी दादी को चश्मा उठाकर कहेगी, यही लच्छन दिये हैं बहू-बेटों को। दादी फिर मम्मी के एवं मम्मी मेरे कान ऐंठेगी। यही सोचते-सोचते मेरी खोपडी इन दिनों गरमा जाती है एवं मैं अकारण र्‍ोट्टा करता रहता ह। इसी समस्या को लेकर आज बजरंगबली के आगे पद्मासन लगाकर बैठा ह। सुना है ट्टयान-साट्टाना में अच्छे-अच्छे समाट्टाान निकल आते हैं।
यकायक मेरे मन में एक जुगत आई है एवं मैं बल्लियों उछल पडा ह। चाह सच्ची हो तो राह दिख ही जाती है। यह युक्ति एक ताली से अनेक पक्षी उडाने जैसी है। मैंने तीनों को यानि बाबा-दादा-पापा को अलग- अलग गोपनीय पत्र लिखने की ठानी है। शायद यह तरीका कारगर सि= हो जाय पर इसमें जूते खाने की जोखिम भी कम नहीं है। खैर जो होगा देखा जायेगा, यही सोचकर मैंने पहला पत्र परदादा को लिखा है, जो इस प्रकार है -
आदरणीय बाबा, गोपनीय
सादर प्रणाम!
सबसे पहले तो मैं गर्व से यह बात आपको कहना चाहता ह कि मैं एक ऐसे परिवार में रहता ह जिसके मुखिया आप हैं। गत अनेक वषोङ से आपने जिस तरह से परिवार को बोट्टाकर रखा है, काबिल-ए-तारीफ है। अनुकूल परिस्थितियों में परिवार की नाव तो कोई भी खे सकता है पर आपने विषमतम परिस्थितियों में भी सटीक एवं साहसी निर्णय लेकर हमारे परिवार को न सिर्फ मानसिक द्वंद्व से बचाया है, टूटने से भी बचाया है। आपकी सूझबूझ, अनुभव एवं विवेक से आज हमारा परिवार शहर के चंद अच्छे परिवारों में गिना जाता है। आपने परिवार की सभी कडयों को जंजीर की तरह जोडे रखा है। सच मानें तो दादा एवं पापा से भी आगे जीवन की सीख हमें आपसे मिली है। आपसे आफ समय की गाथाऐ सुनकर मैं आत्मविभोर हो उठता ह। स्वातंत्र्य यु= में आपकी वीरगाथाऐ मैं अपने मित्रों को गर्व से सुनाता ह। आफ साथ रहकर ही मैंने यह जाना है कि अनुभव शिरोमणि ही ज्ञान शिरोमणि है। आप एवं परदादी का स्नेह मेरे लिए उस विशाल बरगद की तरह है जिसके साये में सभी निर्द्वन्द्व सोते हैं। आप सदैव समय से आगे सोचते हैं एवं हर पीढी की लय-ताल-वैवलेंथ समझते हैं। मेरे प्रति आफ स्नेह का स्मरण कर मैं गद्गद् हो उठता ह। पापा जब भी मुझे डोटते हैं आपकी तीखी ओखें देखकर सहम जाते हैं। पापा के चिढने पर आपका उन्हें यह कहना कि अगर मूल से ब्याज प्यारा है तो तू ही सोच ब्याज पर ब्याज कितना प्यारा लगेगा, मुझे गर्व से भर देता है। ट्टान्य हैं वे परिवार, वे बच्चे जिन्हें आप जैसे वयोवृ= बुजुगोङ का सान्निट्टय मिलता है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि प्रत्यक्ष रूप से ना ही अप्रत्यक्ष रूप से मेरे केरियर को दिशा देने में आपका अहम योगदान रहा है। यह पत्र लिखते हुए इसीलिए मैं विहृल हो उठा ह।
बाबा! गत एक माह से मैं एक ऐसी समस्या से उलझा ह कि लाख प्रयास करने पर भी मार्ग नहीं सूझ रहा। मैं इस समस्या को आफ साथ बोटना चाहता ह। मेरी प्रार्थना है कि आप मेरे कंट्टो पर हाथ रखकर इस समस्या के समाट्टाान में मदद करें। समस्या यह है कि इन दिनों सकीना नाम की एक मुस्लिम लडकी से मुझे प्यार हो गया है। वह मेरी सहकर्मी है एवं अच्छे संस्कारित घर से भी है। चकि उनकी हमारी जाति-ट्टार्म भिन्न हैं एवं मेरे दो छोटी बहनें हैं तो मैं सोच नहीं पा रहा कि मैं क्या करूे। किंकर्तव्यविमूढ कभी मुझे बहनों की चिंता सताती है तो कभी इस बात की कि अगर मैंने भागकर यह विवाह कर लिया तो आप सबकी प्रतिर्याब क्या होगी? मैं ऐसा करना भी नहीं चाहता। परिवार की जिस प्रतिष्ठा को आपने दशकों के संघर्ष से बनाया है उसे मैं ट्टाूल में कैसे मिला सकता ह। इसी कश्मकश में मेरी बेचैनी बढती जा रही है। सकीना के साथ मेरे सम्बन्ट्टा बहुत आगे बढ गए हैं एवं मैं अब अन्य किसी से विवाह करने की सोच भी नहीं सकता।
इस कठिन घडी में आप ही मेरा सम्बल है, लेकिन आपको व्यक्तिशः कहने में मुझे डर लगता है। मैं जानता ह आपकी हो में सबकी हो एवं आपकी ना में सबकी ना है। इसीलिए विवश आपको पत्र लिखा है। बाबा! मुझे मार्ग सुझाऐ।
पुनः प्रणाम।
आपका प्रपौत्र
कौशल
ऐसा ही एक गोपनीय पत्र मैंने दादा एवं पापा को लिखा जिसमें उनके प्रशंसा-पुराण के साथ-साथ मेरे जीवन में उनके योगदान की चर्चा भी थी। मैं स्वयं आश्चर्यचकित था ऐसे चापलूसी भरे शब्द एवं पत्र-लेखन की ऐसी अद्भुत कला का प्रादुर्भाव मुझमें क्यों कर हुआ। सचमुच प्रेम की ताकत कितनी सघन होती है। सुबह एक साथ इन सभी खलनायकों को मैं कैसे सामना करूेगा? पापा तो फाड खायेंगे। रात बारह बजे उठकर मैंने उनके कमरों में यह पत्र अलग- अलग लिफाफे में बंदकर सरकाए एवं चुपचाप अपने कमरे में आकर लेट गया।
सारी रात ओखों में बीती। एक-दो बार तो लगा जाकर पत्र उनके दरवाजे से वापस ले आे। मैंने यह क्या कर डाला। सुबह-सुबह घर में कोहराम मचना एवं मेरी फजीती दोनों तय थी। यही सोचकर मैं आनन- फानन तैयार हो मह अंट्टोरे घर से निकल गया। ऑफिस जाकर मैंने मम्मी को फोन किया कि आज मुझे दो-तीन क्लाइंट्स से मिलना था, अतः जल्दी निकल गया। आज का ब्रेकफास्ट मैंने ले लिया है एवं लंच भी बाहर ही लगा। दोपहर लंच में सकीना को उन सभी पत्रों के बारे में बताकर मैं हल्का हुआ। सकीना ने प्रत्युार में यही कहा, ’’खुदा पर भरोसा रखें। अगर हमारे दिलों में सच्ची मोहब्बत है तो वह अवश्य मदद भेजेगा।‘‘
रात डाइनिंग टेबल पर अपराट्टाी की तरह मह लटकाये बैठा था। कभी-कभी गर्दन उठाकर बाबा, दादा एवं पापा का चेहरा देखता तो भीतर ही भीतर सहम जाता। उनके चेहरे पर उभरते मिश्रित भावों को देखकर यह आकलन करना कठिन था कि वे रो रहे हैं, हेस रहे हैं अथवा तटस्थ हैं। अमूमन परदादी-दादी-मम्मी की भी यही स्थिति थी। आज मैं खाना खा नहीं रहा था, गटक रहा था। मन कह रहा था जितना जल्दी इन सबसे निजात मिले अच्छा है। खाना पूरा कर मैं उठने लगा तो यकायक बाबा गंभीर होकर बोले, ’’जाना नहीं! वहीं बैठे रहना।‘‘
मैं कुर्सी से चिपक गया। हे भगवान! मुझे इश्क क्यों हुआ? न करता न डरता।
बाबा ने छडी हाथ में ली एवं ट्टाीरे-ट्टाीरे चलकर मेरे करीब आए। मेरे कंट्टो पर हाथ रखकर पहले तो जोर से अड्डहास किया फिर बोले, ’’प्यार करते समय यह नहीं सोचा कि आगे क्या होगा? जो कार्य तुम्हारी औकात में नहीं है, जिस कार्य को करने से डरते हो, उसे करते क्यों होघ्श्श् मुझे सोप सघ गया।
लेकिन यह क्या! अब बाबा की अंगुलियो मेरे सिर में घूम रही थी। ट्टाीरे-ट्टाीरे यही अंगुलियो वहो से हटकर मेरे कंट्टाों पर आ गई। मेरा कंट्टाा दबाकर वे बोले, ’’मेरी हो है।‘‘ बाबा का इतना कहना था कि दादा-पापा एवं तीनों औरतें एक साथ बोली, ’’हमारी भी हो है।‘‘
मेरे कानों में अमृत पिघल गया। कपोलों से अश्रु बह गए। मेरे ओसू पौंछते हुए बाबा बोले, ’’तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं ना कहगा। मैं तो हर हाल में तुम्हारे साथ ह। जात-पोत, ट्टार्म, छुआछूत, पर्दाप्रथा, घघट, स्त्री अशिक्षा, औरतें घर की चौखट में ही रहेंगी जैसे कुप्रथाओं को हमने खूब ढो लिया एवं उसके दुष्परिणाम भी भोग लिए। आज नया सवेरा उगा है तो हम तुम्हारा साथ क्यों न दें? अब जमाना अगर जाति- ट्टार्म विहीन सि=ान्तों से उठकर मनुष्यता की दुहाई दे रहा है तो इसमें बुरा क्या है? समुध् हमारे सामने हिलौरे ले रहा हो तो हम कुऐ के मेंढक क्यों बनें। मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा ह जब सकीना से तुम्हारा ब्याह होते देखगा। मेरी बूढी सोसें अब तक शायद इसीलिए अटकी हैं।‘‘
मेरी दशा ऐसी थी जैसे मन के बगीचे में सैकडों चिडयो एक साथ चहक उठी हों। आनन्द-उध्ेक देह की सुट्टिा न रही। मैं कुर्सी से उठकर बाबा के चरणों में लौट गया।
रात मैं अपने कमरे में आकर लेट गया।
आज फिर ओखों में नींद कहो थी। अत्यट्टिाक बेचैनी एवं अत्यट्टिाक चैन दोनों सोने कब देते हैं? आट्टाी रात कमरे के दरवाजे पर सरसराहट सुनी तो मैं चौंका। मैंने उठकर बाी लगाई तो देखा वहो एक लिफाफा पडा था। शायद कोई उसे बाहर से सरका गया था।
लिफाफा खोलकर पढा तो हतप्रभ रह गया। मन श्र=ा से लबालब हो उठा। बाबा का पत्र था, लिखा था -
प्रिय कौशल,
सदा सुखी रहो।
सकीना से तुम्हारे विवाह पर सहमति का निर्णय मेरे अकेले का नहीं था। यह हम तीनों का संयुक्त निर्णय है। तुमने भले दादा एवं पापा को गोपनीय पत्र लिखे, लेकिन उन्होंने निर्णय लेने के पूर्व दोनों पत्र यह कहकर मेरे हवाले कर दिए कि आप जो भी निर्णय लें, हमें मंजूर है। तुम्हारी परदादी-दादी एवं मम्मी ने भी हमारे निर्णय पर अपनी सहमति की मोहर लगाई है। हम सभी इस शुभ अवसर को शीघ्र देखने को उत्सुक हैं।
बरखुरदार! अलग-अलग पत्र लिखकर तुमने तिकडम तो खूब भिडाई पर यह भूल गए कि मैं भी सरदारों का सरदार ह। मेरी ओख से कौन बच सकता है? मेरे होते हुए मेरे ही घर में सेंट्टा? पकडे गये ना। खैर! अब चिंता नहीं करना।
आशीर्वाद।
तुम्हारा
बाबा
अब कहने-सुनने को क्या बचा था। मैं चुपचाप आकर अपने बिस्तर पर लेट गया।
सी-१३६, प्रथम विस्तार, कमला नेहरू नगर, जोट्टापुर ;राज.द्ध, मो. ०९४१४१-३२४८३