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तीन गजलें

प्रकाश प्रियम
(1)
मेरे रूखसत होने पर गम न करना
सुन्दर सी इन पलकों को नम न करना
मैंने कुछ न किया दुनिया में रह के
सो, मेरे जाने पे मातम न करना
पुनर्जन्म में फिर मिलेंगे हम दोनों
मन से इन उम्मीदों को कम न करना
मेरी चिता में आग लगने वाली है
ए बारिश कुछ देर झमाझम न करना
ए खुदा उसके जाने का गम बहुत है
कुछ रोज बहारों का मौसम न करना
(2)
दरख्त चट कर रहे हैं पायों डालों को
ट्टााये खा रहे हैं भूखों के निवालों को
गरीबों के दिल तो साफ हैं ट्टाूप की तरह
रोशनी की जरूरत है आज उजालों को
क्यों लडवाती हैं अवाम को ये मसनदें*?
कोई न जान पाया इन सियासी चालों को
रब और भगवान भी नहीं सुनते दरिधें की
फिर भला क्यों पूजें मस्जदों शिवालों को
हमेशा लुटते हैं केवल मुफलिसों के घर
कोई नहीं खोलता अमीरों के तालों को
(3)
वो की वो सारी आदत आज भी है
उसकी ओखों में नफरत आज भी है
भले ही हो गया होगा वो सम्पन्न
फतरत में पर आदमियत आज भी है
वैसे तो इबादत कभी की छोड दी
खुदा की बराबर रहमत आज भी है
आज नहीं रहा वो बेकार आदमी
लोगों की किन्तु तोहमत आज भी है
दोजख बन गई है ये सारी दुनिया
मेरा मुल्क किन्तु जन्नत आज भी है
साा पे काबिज होने के बावजूद भी
दिलों में उनके शराफत आज भी है
ग्रा.पो. - लखेर, वाया - मनोहरपुर, तहसील - आमेर, जिला - जयपुर ;राज.द्ध-३०३१०४, मो. ०९८२९११९५५१