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चार गजलें

कुमार विनोद
(1)
खोल दे खिडकी ताजा हवा का झोंका अन्दर आने दे
जाने कब से गुमसुम है घर, अब इसको मुस्काने दे
दोस्त मेरे ऐ फूल ! तू जाकर तितली से कुछ ऐसा बोल
आने दे गालों पे लाली थोडा-सा शरमाने दे
सौ-सौ तरकीबें उनसे मिलने को लडानी पडती हैं
मेरे मौला मुझको तो बस थोडे और बहाने दे
घर-गिरस्ती में छोटी-मोटी बातें चलती रहती हैं
रात गई सो बात गई, अब तो गुस्से को जाने दे
अट्टारों का “ाृंगार प्रिये ! तू कर ले अपने हाथों से
मुझको तो बालों में अपने गजरा एक सजाने दे
यायावर होना ही गर मेरी कस्मत में लिक्खा है
राह में रुकने भर को रब्बा मुझको नेक ठिकाने दे
(2)
ये माना कम ही मैं इस बात का इजहार करता ह
चलो अब लिख के देता ह मैं तुमसे प्यार करता ह
नहीं तुम वो जिसे मैंने कभी ख्वाबों में देखा था
मगर अब जान से प्यारी हो मैं स्वीकार करता ह
जरा-सी बात पर मुझसे वो कितना रूठ जाती है
मैं उसके रूठ जाने की अदा को प्यार करता ह
सफर का लुत्फ है जानम तुम्हारे साथ होने से
बडी शिड्ढत से मैं महसूस ये हर बार करता ह
नए ही रूप में मुझसे वो तब-तब पेश आती है
मजे के वास्ते उससे मैं जब तकरार करता ह
मैं अक्सर ही कहीं भी रख के चश्मा भूल जाता ह फिर उसके चश्मे से अपनी मैं ओखें चार करता ह
कहें सब लोग पत्नी को बहुत तुम ’भाव‘ देते हो कहा किसने कि मैं इस बात से इन्कार करता ह
;३द्ध
एक हवा का झोंका आकर दोनों को छू जाता है
पत्थर की मैं क्या जान पर फूल बहुत मुस्काता है
तितली उसको कहती है चल आ मिलकर हम डोस करें भेवरा भी राजी है लेकिन थोडा-सा शरमाता है
ज्यों मरुथल में दूर कहीं पर पानी-सा कुछ दिखता है हमको ये संसार युगों से बस य ही भरमाता है
सुबह सवेरे ओस की बदें जब पाों पर गिरती हैं लगता है जैसे कोई छिपकर मोती बरसाता है
फूलों में खुशबू भी आखर कोई तो भरता होगा
तितली के रंगीन परों को इतना कौन सजाता है
सिंदूरी है शाम फजा में मदहोशी-सी छाई है
ऐसे में हर एक परिंदा गीत खुशी के गाता है
बादल अपनी पलकों में पानी को छिपाकर रखता है बिन पूछे ही ट्टारती से फिर उसकी प्यास बुझाता है
लब खामोश हैं मेरे, हो बस, मन ही मन में चाहा था देखो, यार मेरा खुद चलकर नंगे पोवों आता है
प्रतिबिम्बों का आना जाना इसमें लगा ही रहता है अन्त में दर्पण फिर खाली का खाली ही रह जाता है
;४द्ध
कोई सपना हकीकत में बदल जाए तो क्या कीजै किसी दिन चोद ट्टारती पर उतर आए तो क्या कीजै
क्षितिज को मानकर सच तुम चले जाओ कहीं तक भी मरुस्थल में भरम पानी का हो जाए तो क्या कीजै
ये सूरज, चोद और तारे, हैं तेरे अक्स का हिस्सा जो ये ब्र॰ाण्ड तुझमें फिर सिमट जाए तो क्या कीजै
महज इन्सान बनना भी बहुत मुश्किल है दुनिया में खुदा समझे जो खुद को और इतराए तो क्या कीजै
नकलची बंदरों जैसा हुआ करता है आईना
किसी के मुस्कुराते ही वो मुस्काए तो क्या कीजै
ये दुनिया खेल माया का, है सब कुछ उसकी ही माया वो अपने जाल में हमको जो उलझाए तो क्या कीजै
उलझ जाऐ बहुत ज्यादा कभी जब तार जीवन के कि ऐसे में समर्पण ना किया जाए तो क्या कीजै
गणित विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र-१३६११९ ;हरियाणाद्ध, मो. ०९४१६१-३७१९६