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दो गीत

मुकुन्द कौशल
(1)
गिर गई आलपिन
फट चुकी हैं नस्तियो
प्रतिब=ताओं की,
मेज पर अवट्टाारणाऐ, गिन रही हैं दिन।
चीख के जूडे सजी है
सीख की वेणी
ढढता है न्याय नित
अपराट्टा की श्रेणी
सर्वहारे हारकर गिनने लगे पलछिन।
वह सडक जिसको
प्रतिष्ठा की खुमारी है
कुछ दिनों से अब
उसी पर गश्त जारी है
फिर रही है नेवलों को ढढती नागिन।
कोयलें मट्टाुमास में
अब गा नहीं पातीं
एक दिन घर पर खुशी
पैरोल पर आती
संट्टिापत्रों से निकलकर गिर गई आलपिन।
2)
बची हुई हो आग
लोगों को बस एक बात का अचरज है,
है कितना उजियारा एक सितारे में।
दहक रहे थे शोले जिनके सीनों में,
उनके सीने, जाने कैसे चाक हुए
इन्किलाब अभ्यस्त हो गया सुविट्टाा का,
विधेहों के जंगल जलकर खाक हुए
किन्तु जरा सी राख हटाकर देखो तो,
बची हुई हो आग किसी अंगारे में।
लोग चीखते रहे, मगर हर अपराट्टाी,
पार हो गया पीछे के दरवाजे से
रातों में छुपकर चोरी करने वाले,
निकल रहे हैं दिन में बाजे-गाजे से
लेकिन यह ढोली बेचारा क्या जाने,
किसका चमडा पिटता है नक्कारे में।
जितने घर कच्ची मिड्डी के ढहे यहो,
रूप वहो उतना भवनों का निखरा है
उत्सवट्टार्मी शहरों में है शोर बहुत
गोवों में अब भी सन्नाटा पसरा है
रातें लापरवाह हो गई इसीलिये,
घुटने टेके दिन बैठा गलियारे में।
एम-५१६, पद्मनाभपुर, दुर्ग-४९१००१ ;छाीसगढद्ध, मो. ८१०३४१५६८३