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तीन गीत

राजेन्ध् स्वर्णकार
(1)
स्नेहागार जैसे मिल गया
मूक वाणी को मट्टाुर उद्गार जैसे मिल गया !
तुम मिले, नूतन मुझे संसार जैसे मिल गया !
एक आश्रय मिल गया, आट्टाार जैसे मिल गया !
रेंगता मंथर विकल क्षत आयु-रथ हतभाग-सा !
प्रीत-स्वर रससिक्त पतझड में बसंती राग-सा !
सुन लियाऋ ...तो स्वप्न इक सुकुमार जैसे मिल गया !
बुझ रहा जो दीप उसकी कौन सुट्टा लेता यहो !
दृष्टिगत शशि तिमिर रजनी में हुआ किसको कहो ?
विजन वन में पूर्ण स्नेहागार जैसे मिल गया !
पूर्ण तो होती नहीं हर चाह हर इक एषणा !
शेष रह जाती क्तदय की प्यास और गवेषणा !
मीत ! तुम में कर्म का प्रतिकार जैसे मिल गया !
(2)
मन हार न जाना रे !
वर्तमान कहता कानों में... भावी हर पल तेरा है। कलुषित स्याह रैन से अगला चरण सुरम्य सवेरा है। मन हार न जाना रे।
जिन दीयों की चुकी स्निग्ट्टाता, वे प्रकाश कब तक देंगे*? वे परिवेश प्रदूषित कर के, ट्टाुओ-कुहासा भर देंगे। वातावरण परिष्कृत करने, रवि नव ट्टाूप बिछाएगा। अस्तु, मिटे अविलम्ब यहो जो कल्मष ट्टाुओ अेट्टोरा है। वर्तमान कहता कानों में... भावी हर पल तेरा है। मन हार न जाना रे।
युग अभिशप्तऋ श्रेष्ठ की कोई परख कसौटी भाव नहीं। गिरवी जि(वा नयन क्तदय सबऋ सत्यनिष्ठ सद्भाव नहीं। अभय, प्रलोभन-रहित आत्मा मूल्यांकन करतीऋ इसने यत्र तत्र सर्वत्र नित्य सुंदर शिव सत्य उकेरा है। वर्तमान कहता कानों में... भावी हर पल तेरा है। मन हार न जाना रे।
किसी निराशा की अनुभूति न कर, तू पश्चाताप न कर। शिथिल न हो मन। क्षुध् कारणों से, कोई संताप न कर। संबल शक्ति क्तदय की निर्मलता निश्छलता सच्चाई। कुंदन तो कुंदन है, क्या यदि कल्मष ने आ घेरा है? वर्तमान कहता कानों में... भावी हर पल तेरा है। मन हार न जाना रे
(3)
नन्हे दीप ! न डरना...
नन्हे तेरे हाथ-पोव हैं, नन्ही-सी औकात रे।
पीछे तेरे ओट्टाी-तूफां, आगे झंझावात रे।
नन्हे दीप! न डरना, लडना, जलना काली रात रे। ले आ तू मुद्दी में सुनहरी नूतन आज प्रभात रे।
उल्टी बहती हवा, ओ दीपक! दिशा-दिशा खाने आए। देख अकेला, मुझे कालिमा घेर-घेर कर ट्टामकाए। रेशे-रेशे व्याप्त कपट छल बैर कुचालें घात रे।
नन्हे दीप! न डरना, लडना, जलना काली रात रे।
आज विलुप्त हुए हैं सच का साथ निभाने वाले, सुन। बस्ती-बस्ती बसे बनैले, हाड चबाने वाले सुन। आदमखोर हुई है पूरी अब आदम की जात रे।
नन्हे दीप! न डरना, लडना, जलना काली रात रे।
रात-बाद दिन आता, सूरज उगता, होता शुभ्र उजास। तब तक तेरी लौ से दीपक! दुखियारों को होती आस। क्या छोटी-सी और क्या लम्बी? रात-रात की बात रे। नन्हे दीप! न डरना, लडना, जलना काली रात रे।
जलने पर छीजेगी तेरी काया... सुन, परमार्थ में। दीपक! तू भी अंट्टाा मत बन जाना, जग ज्यों स्वार्थ में। आस किसी से मत करनाऋ है कठिन बहुत संघात रे। जलता चल तू एक अकेला! जब तक काली रात रे। नन्हे दीप! न डरना, लडना, जलना काली रात रे।
बीकानेर ;राज.द्ध, मो. ९३१४६८२६२६