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तीन गीत

अहद ’न्नकाश
(1)
भ्रम
जब टूटते हैं भ्रम
सपनों के,
अपनों के,
रिश्तों के,
नातों के,
तो चटक जाते हैं
जाने कितने...
सच के आईने भी
बिखर जाते हैं कोच...
समेटे नहीं सिमटते
बटोरने लगो तो...
चुभ जाते हैं
किरच किरच
ेगली के पोर से होकर
मन में...
नहीं जुड पाते वो
सच फिर से...
नहीं नजर आता अब,
उनमें वह अपना
पहला सा अक्स
इससे तो अच्छा...
भ्रम ही बने रहें
जीवन का सच।
(2)
नियति
कब तक छलती रहेगी तू
नियति!
बदल कर नित्य नये रूप,
कौन करेगा यकीन
अब किसी पर...
जाने किसमें छुपी बैठी हो,
जाने कौन सी नयी बाजी बिछाए
नित्य हो तलाश में,
किसी सॉय्ट टारगेट की...
आजमा सको
अपना कोई नया पैंतरा,
दे सको किसी को
कोई नया जख्म,
कर डालो छलनी
किसी कोमल मन को
हो जाती हो जग जाहिर
फिर भी...
कैसी है विडम्बना
नहीं है कोई आरोप तुम पर,
रह जाते हैं चुप,
कर लेते हैं स्वीकार
समझकर तुम्हें...
हम अपनी ही...
ओ नियति !!!
3)
साजश
जब तुम रच रहे थे साजश
मेरे खलाफ
सो रही थी मैं
बेखटके,
जब तुम अपनी सारी शक्ति
लगा रहे थे अगला दोव सोचने में,
मैं फूलों को सींच रही थी
बतिया रही थी...
जब तुम मुझको बेघर करने के
मंसूबे बोट्टा रहे थे
मैं नन्ही गोरैया के
घोंसले से गिरे तिनके बटोर रही थी
न जाना पडे उसे दूर फिर से
इनकी तलाश में...
जब तुम मेरी मौत के
साट्टान जुटा रहे थे,
मैं कोयल संग
गीत कोई गुनगुना रही थी...
आज तुम अवसाद में डूबे हुए हो,
मैं आज भी खोई ह
निहारने में...
खूबसूरत तितलियों के पर
खूबसूरत तितलियों के पर...
अट्टयापिका, केसर देसर जाटान, बीकानेर ;राज.द्ध
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काव्य-सर्जना
अहद ’न्नकाश‘
तीन गीत
(1)
जीते हैं हम लोग
झूठी मूठी हेसी ओढ कर
जीते हैं हम लोग
दिखने में हैं हरे भरे पर
रीते हैं हम लोग
ऐश टत्र्े सा अपना जीवन
बुझी बुझी सी ढेरों बातें
गुडी मुडी चेहरों पर चेहरे
देते हैं अपने ही घातें
तनी हुई है दुःख की चादर
सीते हैं हम लोग
झूठी मूठी हेसी ओढ कर
जीते हैं हम लोग
बचपन हरी निबोरी जैसा
कडवा कडवा बेमानी सा
और जवानी नीम करेला
सबको लगता शैतानी सा
इस सारे अवसाद को पीकर
जीते हैं हम लोग
झूठी मूठी हेसी ओढकर
जीते हैं हम लोग।
2)
टूटा रोशनदान
बाप पुराने घर में जैसे
टूटा रोशनदान
घर में अम्मा खोस रही है
वह थूके बलगम
हवा सरीखी प्यारी बिटिया
ले भागा मौसम
वह बूढी ओखों से तकता
इक फूटा गुलदान
बेटा घर से गया
बाप की बैसाखी टूटी
मो की नींद चुराने वाले
चमक दमक सब झूठी
चकाचौंट्टा में खो बैठे हम
रिश्तों की पहचान
बाप पुराने घर में जैसे
टूटा रोशनदान....
(3)
खाली सीपों से
खाली सीपों से कब तक हम
अपने मन को बहलाऐ
मोती भरे गगन को देखें
खाली हाथों घर जाऐ
विडम्बना है जवान होकर
फूलों से क्यों डरता है मन
पग पग पर ठोकर व कोटे
पाकर आहें भरता है मन
अजब दशा है दिशा ट्टाुंट्टा है
मन रे बता किट्टार जाऐ
खाली सीपों से कब तक हम
अपने मन को बहलाऐ
बूढे बरगद के पत्रों को
हवा उडा कर दूर हो गई
मो की दुआ बाप की आशा
आखिर क्यों मजबूर हो गई
अब तो ऐसा लगता है कि
दूर गगन में खो जाऐ
खाली सीपों से कब तक हम
अपने मन को बहलाऐ...
१६-राजीव नगर, कोहफजा, भोपाल ;म.प्र.द्ध-४६२००१, मो. ०९३२९४१२५३१