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साहित्य जीने का संस्कार पैदा करता है

सदानन्द प्रसाद गुप्त
;उ.प्र. हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अट्टयक्ष, भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में आस्था रखने वाले, जातीय अस्मिता के प्रति सजग लेखक व सम्पादक डॉ. सदानन्द प्रसाद गुप्त से शिप्रा ओझा द्वारा लिया गया साक्षात्कार ः सम्पादकद्ध
शिप्रा ः आप मूलतः झारखण्ड के रहने वाले हैं तो गोरखपुर आपका आना कैसे हुआ, अपने प्रारम्भिक जीवन एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के विषय में कुछ बताइये
शिप्रा ः आप मूलतः झारखण्ड के रहने वाले हैं तो गोरखपुर आपका आना कैसे हुआ, अपने प्रारम्भिक जीवन एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के विषय में कुछ बताइये
डॉ. गुप्त ः हमारे परबाबा जमींदार पृष्ठभूमि से थे, पर उनके देहावसान के बाद हमारे बाबा के समय तक जमींदार का जो सामाजिक व आर्थिक वैभव रहता है, उसका अवसान हो चला था। मेरे पिता साट्टाु प्रकृति के थे और घर पर अक्सर कम रहते थे, तो उसने हमारी आर्थिक व्यवस्था को विपन्न बना दिया। प्रारम्भिक जीवन मेरा बहुत कष्टमय रहा और जीविकोपार्जन हेतु मेरा गोरखपुर आना हुआ। मेरे पिता का गीता प्रेस से जुडाव मेरे जन्म के पहले से था। गीता प्रेस की ट्टाार्मिक पुस्तकें व कल्याण पत्रिका में थी जिसका बचपन में अट्टययन किया , तो एक वैष्णवता का ट्टाार्मिक संस्कार बचपन से ही मिला। हाईस्कूल पास करने के बाद आगे अट्टययन का स्वतंत्र रूप से रास्ता निकालना मुश्किल था, किन्तु यह मेरा सौभाग्य था कि मैं गीता वाटिका में ही आया। उसमें मेरे सगे बाबा के सबसे छोटे भाई रहते थे, वे ही मेरे यहो आने का माट्टयम बनें। बाद में, मैं कल्याण के सम्पादकीय विभाग में कार्यालय सहायक के रूप में कार्य करने लगा। मैं यहो शाम को लाइब्रेरी में जाकर पढता और नोट बनाता। संयोग से एक बार उस पर हमारे निर्माता कृष्णचन्ध् अग्रवाल की नजर पड गयी। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम पढना चाहते हो? मैंने कहा - बेशक पढना चाहता ह। वही वह बिन्दु है जहो से मेरी अट्टययन यात्रा शुरू हुई। मैंने व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में इण्टरमीडिएट की परीक्षा उाीर्ण की, फिर डी.ए.वी. डिग्री कॉलेज में सांट्टयकालीन कक्षाओं के छात्र के रूप में प्रवेश लिया। कल्याण के सम्पादकीय विभाग में काम करते हुए मैंने हिन्दी साहित्य से एम.ए. की परीक्षा उाीर्ण की। उसके पश्चात् मैंने ’हनुमान प्रसाद पोड्ढार‘ के सम्पादकीय व्यक्तित्व पर पी-एच.डी. का काम किया। उसके बाद मेरी नियुक्ति कुछ दिनों के लिये बापू डिग्री कॉलेज पीपीगंज, तत्पश्चात् दिग्विजयनाथ डिग्री कॉलेज में हुई। वहो से यह पद समाप्त कर दिया गया। रामचन्ध् तिवारी जी कहते थे तुमको विश्वविद्यालय में ही आना था, तो डिग्री कॉलेज में तुम कैसे रहते। इस तरह मैं विश्वविद्यालय में आ गया और वहीं सेवा करते हुए मैंने अवकाश ग्रहण किया। शिप्रा ः एक पाठक के रूप में यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि किसी लेखक का साहित्य में कैसे आना हुआ, या किन कारणों से आपकी लेखन में रुचि जाग्रत हुई
डॉ. गुप्त ः मैं जब अपने भीतर साहित्यिक संस्कारों के अंकुरित होने को याद करता ह तो मुझे स्मरण आता है हाईस्कूल के प्रट्टाानाट्टयापक ’श्री बेनी राय‘ का। वे हिन्दी से एम.ए. थे और बहुत अच्छा पढाते थे, उनकी साहित्यिक अभिरुचि थी। श्री बेनी राय के संसर्ग ने ही हमें साहित्यिक रचनाओं की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने हम लोगों से कबीर, तुलसी, जायसी पर छोटे-छोटे निबन्ट्टा भी लिखवाये। इन सबसे ही मेरे भीतर साहित्य का बीज पडा। उन्होंने वहो एक सरस्वती कला केन्ध् की स्थापना की थी, जिसके अन्तर्गत समय-समय पर विभिन्न नाटकों का मंचन किया करते थे। उन्होंने हम लोगों को भी इससे जोडा था। वहो बहुत से पौराणिक और ऐतिहासिक नाटकों का मंचन हुआ, जिसमें हम लोगों ने भाग लिया था। मुझे याद आता है, जब मैं कक्षा नौ का विद्यार्थी था तो रामचरितमानस का पूरा परायण कर गया था और वहीं से साहित्य की तरफ मेरा झुकाव बढता गया।
शिप्रा ः आपने अनेक पुस्तकों का सम्पादन किया है, साथ ही आलोचनात्मक ग्रंथ व लेख भी लिखे हैं। आप आलोचना को किस प्रकार से देखते हैं
डॉ. गुप्त ः आलोचना हिन्दी गद्य की प्रमुख विट्टाा है। मेरे भीतर आलोचना की समीक्षा के संस्कार रामचन्ध् शुक्ल की समीक्षा पढकर के बनी और जो पटना से समीक्षा पत्रिका गोपाल राय निकालते थे तो समीक्षा पत्रिका में लेखन कार्य से मेरी समीक्षा यात्रा शुरू हुई। एक तरह से आलोचना को हम रचना की पुनर्रचना कह सकते हैं। आलोचक पूर्णतया तटस्थ नहीं हो सकता, वह किसी भी कृति को अपनी ही दृष्टि से देखता है। वह दृष्टि जितनी व्यापक होगी, आलोचना उतनी ही उत्कृष्ट होगी। दुःखद बात यह है कि आज की आलोचना में वह दृष्टि की व्यापकता कम होती गई है, आलोचना ज्यादातर वादग्रस्त हो गयी। एक बार मैं तद्भव पत्रिका में विष्णु खरे का इंटरव्यू पढ रहा था तो प्रश्नकाार् ने प्रश्न किया था कि - ’’आप निराला को किस रूप में देखते हैं?‘‘ तो उन्होंने कहा - ’’छोडये निराला साम्प्रदायिक है।‘‘ अब बताइये निराला साम्प्रदायिक कैसे हो सकते हैं। जब आलोचक यह तय करेगा कि रचनाकार को कैसे लिखना चाहिये तो यह रचनाकार की नहीं, आलोचक की संकीर्णता है। जब हम ’राम की शक्ति पूजा‘ और ’तुलसीदास‘ को अप्रासंगिक ठहरा देंगे तो हम इस देश की प्राचीनकाल से चली आ रही सांस्कृतिक ट्टाारा को ही अस्वीकार कर देंगे, हम अपने जड पर ही प्रहार कर देंगे। शिप्रा ः एक लेखक के रूप में आज के समय में आपकी सबसे बडी चिन्ता क्या है
डॉ. गुप्त ः मैं कोई लेखक नहीं ह, मैं मूलतः अट्टयापक ह। पर मैंने आलोचना लिखी है तो एक लेखक के रूप में लोग मान सकते हैं। मैंने कुछ छिट-पुट कविताऐ भी लिखी हैं, कहानियो भी लिखी हैं। कुछ रेखाचित्र व संस्मरण भी लिखे हैं, पर इससे कोई लेखक हो गया हो, ऐसा नहीं है। हो, पर एक साहित्य पाठक जरूर ह और साहित्य की चिन्ता वास्तव में मनुष्यता की चिन्ता है। निर्मल वर्मा का यह वाक्य मुझे बहुत अच्छा लगता है, ’वह घर है बिना दीवारों का घर, जहो मनुष्य अपने मनुष्यत्व से साक्षात्कार कराता है।‘ इसलिये जो खेमों में बेटा साहित्य है, वह मनुष्यता से साक्षात्कार नहीं कराता है। आज की समस्या यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जो पश्चिमी चिंतन आया, उसने हमारे भीतर जो परोपजीविता की भावना भर दी, उसमें हम लोग अपने आप को पहचानना
भूल गये कि हम कौन हैं? वास्तव में उसकी चिंता भारतेन्दु हरिश्चन्ध् के मन में भी थी, गुप्त व अज्ञेय के मन में भी थी। जनवाद के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है वो वस्तुतः काफी हद तक एक तरह का विरूपीकरण है। शाह ने अपनी पुस्तक ’समय संवादी‘ में लिखा है - ’’आज का साहित्य समयग्रस्त साहित्य है।‘‘ साहित्य समय का मूल्यांकन जरूर करता है, पर वो अपनी परम्परा का भी मूल्यांकन करता है और भविष्य के लिये मार्ग भी तैयार करता है। साहित्य समय के आगे भी देखता है, साहित्य संस्कार निर्मित करता है, वह बोटने का काम नहीं करता, जोडने का कार्य करता है।
शिप्रा ः ऐसी कोई रचना या साहित्य जिसने आपको सबसे अट्टिाक प्रभावित किया
डॉ. गुप्त ः एकदम से इसका जवाब दे पाना सम्भव तो नहीं है। कोई एक रचना तो नहीं, बहुत सारी रचनाऐ हैं, जिससे हम लोग प्रभावित होते रहते हैं। उस समय जिसमें आदर्श का निरूपण होता था, वो अच्छा लगता था। उस दृष्टि से अगर एक रचना की बात करें तो हम लोग तुलसी के (णी हैं। हमको कामायनी और निराला की रचनाऐ भी बहुत अच्छी लगती हैं, विशेषकर तुलसीदास की कविता मुझे बहुत प्रभावित करती है। निराला का गीत ’भारत जय विजय करे‘ वह अद्भुत गीत है। तुलसीदास की विनय-पत्रिका का एक पद है, जिसे मैं बराबर दुहराता रहता ह -
कबहक हौं यहि रहनि रहौंगो।
श्री रघुनाथ-कृपाल-कृपाले संत-सुभाव गहौंगो।।
तुलसीदास ने जो संत की कसौटी दी है, वह बहुत बडी कसौटी है। कोई व्यक्ति संसार में अपना जीवनयापन कैसे करे, तटस्थ ढंग से कैसे जीवन को देखे, यह अद्भुत कसौटी है। यह बहुत कठिन शर्त है जीने की, पर एक आदर्श है। यह पंक्ति भी मुझे बडी प्रेरणा देती है। शिप्रा ः वर्तमान रचनाकारों में आप सबसे करीब किसे पाते हैं और क्यों
डॉ. गुप्त ः वर्तमान को अगर थोडा विस्तार दे दें तो निर्मल वर्मा को जब मैंने पढा और उनके निबन्ट्टा जब पढना शुरू किये तो जिस तरह चुम्बक खींचता है, उसी तरह मैं उनके निबन्ट्टा एक-एक करके सारे पढ गया। निर्मल वर्मा का एक निबन्ट्टा है ’हमारी चुनी हुई चुप्पियो‘, इसमें उन्होंने वामपंथ के दोहरेपन को तार-तार किया है, मुझे उस चिन्तन ने बहुत प्रभावित किया। अज्ञेय के ट्टार्मनिरपेक्षता के दर्जे निबन्ट्टा ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अगर हम दायरा थोडा बढा दें तो आज के रचनाकारों में विद्यानिवास मिश्र के निबन्ट्टा, कुबेरनाथ के निबन्ट्टा मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।
शिप्रा ः आप किस रचना को सर्वाट्टिाक क्तदय के करीब पाते हैं
डॉ. गुप्त ः मेरे जो प्रिय लेखक हैं, मैंने उन्हीं लोगों पर केवल लेखनी चलाई है। रुचि से केवल मैंने चुनाव किया है, मैंने पंत व निराला पर अंक निकाला, वो भी मेरी रुचि का विषय था। निर्मल वर्मा, रामचन्ध् शुक्ल, अज्ञेय ये मेरे प्रिय लेखक थे, जिन पर मैंने लिखा व सम्पादन कार्य किया। इसमें से सबसे प्रिय किसे कहें, थोडा मुश्किल है चुनाव करना।
शिप्रा ः संस्कृति और जातीय अस्मिता के प्रश्न आपको किन-किन अथोङ में उद्वेलित करते हैं
डॉ. गुप्त ः देखिये, किसी भी राष्टत्र् के लिये, किसी भी व्यक्ति या समुदाय के लिये उसके भीतर जातीय चेतना आवश्यक है। यदि जातीय चेतना नहीं है तो विश्व के सामने सक्षम देश के रूप में खडा नहीं हो सकता। जातीय चेतना सम्पूर्ण देश की जातीय चेतना होती है, तो व्यक्ति को भी उसका हिस्सा बनना चाहिये, उसके बिना जैसे बिना रीढ का आदमी होता है, वैसे ही माना जायेगा। आज यह पश्चिमी विद्या ने खासकर पश्चिमी संस्कार ने हमको जातीय चेतना से काफी अलग किया है। ट्टार्मपाल ये सही लिखते हैं - कि १८३० के पास अभिजरों का एक वर्ग उत्पन्न हो गया, जो मात्र पश्चिम को ही प्रमाण मानने लगा था। जो मानने लगा था कि हमारे पास न तो अपनी प्रतिभा है न बु=। पश्चिम का ही सब कुछ अच्छा है, तो यह जो चेतना थी उसने बहुत सारे रचनाकारों को उद्वेलित किया। आज बु=जीवियों का एक ऐसा वर्ग है जो पश्चिम को ही प्रमाण मानते हैं, यह बात हमारे देश के समग्र विकास के लिये बहुत बडा रोडा है। हम बहुत सारी राजनैतिक चुनौतियों का जवाब नहीं दे पा रहे हैं, उसके पीछे भी यह बहुत बडा कारण है, जातीय चेतना का अभाव। पूरे समाज में इस चेतना का अभाव है, यह एक बहुत ही दुःखद स्थिति है देश की। स्वाट्टाीनता के बाद जातीय चेतना का क्तास ज्यादा हुआ है। कहना चाहिये तो हम यह कह सकते हैं कि, ’’स्वाट्टाीनता के पहल हम जितने मानसिक रूप से स्वतंत्र थे, स्वाट्टाीनता के बाद हम मानसिक रूप से उतने ही पराट्टाीन हो गये।‘‘
शिप्रा ः आज भूमंडलीकरण का माहौल है, इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में अंग्रेजी का वर्चस्व ज्यादा है। हिन्दी अंग्रेजी की तरह सशक्त भाषा नहीं बन पा रही है, ऐसी स्थिति में सुट्टाार कैसे किया जा सकता है
डॉ. गुप्त ः देखिये, ग्लोबलाइजेशन जिसको हम कहते हैं वह एक बाजार का दिया हुआ शब्द है। हमारा जो चिन्तन था, वह समग्र चिन्तन था। जैसे हमारे यहो चिन्तन है, ’वसुट्टौव कुटुम्बकम्‘। कुटुम्ब में आत्मीयता है, अपनापन है, स्नेह है। बाजारीकरण में उसका उल्टा है, वहो स्नेह नहीं है, वहो त्याग की भावना है। यहो स्वार्थ की भावना है, वहो देने का भाव है, यहो शोषण का भाव है। तो यह भूमंडलीकरण शब्द चलाया गया है, समस्त दुनिया इससे एक हुई हो, यह नहीं कहा जा सकता। भूमंडलीकरण के कारण अंग्रेजी का वर्चस्व जरूर बढा है भारतवर्ष में, लेकिन आज भी कुछ देश ऐसे हैं जो अपनी भाषायी अस्मिता को बनाये रखे हैं, किन्तु भारत में ऐसी स्थिति नहीं है, क्योंकि उनको लगता है कि हम भारत में बिना हिन्दी के भी काम चला लेंगे। यही कारण है कि विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों से हिन्दी की पढाई समाप्त कर दी गई है। अंग्रेजी ने भारत में अपनी जडें जमायी हैं, इसके पीछे मैं कारण यह मानता ह कि हमारे भीतर जो हीनताबोट्टा भर गया है। अंग्रेजी शिक्षा प=ति के नाते, जब तक उस हीनताबोट्टा की ग्रंथि को हम निकाल नहीं पायेंगे, तब तक हम अंग्रेजी के वर्चस्व से दूर नहीं हो पायेंगे। हीनता की ग्रंथि हिन्दीभाषी प्रदेश में ज्यादा है, इसके बहुत कारण हैं। इसका अन्तर्राष्टत्रीय षड्यंत्र भी है और विभिन्न मत मतान्तरों में जो हमारा देश बेटा है, ये भी एक कारण है और यह हीनता की ग्रंथि बढाई जा रही है, विभिन्न राजनैतिक स्वाथोङ की वजह से, यह एक दुःख की बात है।
शिप्रा ः आप कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के निर्णायक मण्डल में रहे हैं, आज के परिप्रेक्ष्य में पुरस्कारों पर अक्सर ये आरोप लगते हैं कि पुरस्कार संस्थाऐ गुटबंदी की शिकार हैं या इनमें पूर्णरूप से पारदर्शिता का अभाव है। तो आपसे मैं यह जानना चाहती ह कि निर्णायक मण्डल के सदस्य के रूप में आप इस तथ्य को कैसे देखते हैं? इसमें कितनी सच्चाई है
डॉ. गुप्त ः देखिये, ये है लम्बे समय तक पुरस्कारों में एक विचारट्टाारा विशेष का वर्चस्व रहा है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। आप साहित्य अकादमी को ही देख लीजिये। साहित्य अकादमी में रामदरश मिश्र को बहुत बाद में साहित्य अकादमी मिला, रमेशचन्ध् शाह को बहुत बाद में मिला। उनसे पहले उनके समक्ष कहीं भी किसी भी स्तर पर न टिकने वाले साहित्यकारों को यह पुरस्कार मिल चुका है, नाम लेना उचित नहीं होगा। मैं बिडला फाउण्डेशन के व्यास सम्मान व सरस्वती सम्मान से छः वषोङ से जुडा रहा ह। मैं हिन्दी भाषा समिति का संयोजक था, उसमें विभिन्न लोगों के अपने पूर्वाग्रह भी सामने आते थे, पर सब मिलकर निर्णय करते थे। जब चन्ध्कान्ता को व्यास सम्मान मिला तो मैं उसका साक्षी रहा। बहुत-सी कृतियो सामने थीं। चन्ध्कान्ता का उपन्यास कश्मीर समस्या से जुडा था, उनको पुरस्कार दिलाने में मुझको ज्यादा मेहनत करनी पडी थी, पर निर्णय हुआ और सबकी सहमति से हुआ। सबने मेरा समर्थन किया। एक बार मैं चाहता था कि ’अपनी ट्टारती अपने लोग‘ पर विचार करें और मैंने प्रस्ताव रखा था, उस समय अट्टयक्ष थे ’गोविन्द चन्ध् पाण्डेय‘। उन्होंने कहा, इस बार नहीं अगली बार विचार करेंगे। दुर्भाग्य रहा कि अगली बार रामविलास जी का निट्टान हो गया और उसमें जीवित रचनाकारों पर ही विचार होता था। मैंने तटस्थ ढंग से काम करने की कोशिश की और लोगों का सहयोग मुझे मिला और मैं निर्णयों से संतुष्ट रहा।
शिप्रा ः आज के हिन्दीभाषी समाज में साहित्य के प्रति वह ललक नहीं दिखाई पडती, पढने का संस्कार समाप्त सा होता जा रहा है। आप इसके पीछे किसको महवपूर्ण कारक के रूप में देखते हैं
डॉ. गुप्त ः यह एक बडा प्रश्न है। इसके बहुत सारे कारण हैं, इसको बराबर सब लोग अनुभव करते रहे हैं। मैं भी अनुभव करता ह कि हमारा जो हिन्दी समाज है, उसमें हिन्दी के प्रति झुकाव नहीं है। वह कैसेट व मोबाइल तो खरीद लेता है पर वह कहानी व कविता की किताब नहीं पढना चाहता। हिन्दी प्रदेश में एक बौ=क दूरदृष्टि है, हिन्दी प्रदेश में जो अट्टययन-अट्टयापन से जुडे लोगों को छोड दिया जाए तो व्यापक हिन्दी समाज के घर में साहित्यिक पुस्तकें नहीं मिलेंगी। यह एक बौ=क दारिध््य हिन्दी समाज में है। अब कैसे इससे ये समाज उबरेगा, यह एक बडा प्रश्न है। इस पर हम सब लोगों को बैठ कर विचार करना होगा। अब तो इन्टरनेट की दुनिया ने भी छपी हुई सामग्री को पाठकों से दूर कर दिया है, यह एक बडा संकट है। हिन्दी समाज में वो आत्मबल नहीं है, साहित्य कुछ करे या ना करे, जीने का संस्कार पैदा करता है, मानवीय संवेदना का विस्तार करता है। पारम्परिक साहित्य से भी अब लोगों का जुडाव नहीं रह गया है। लोग रामचरितमानस को पढने का विषय नहीं मानते, पूजा का विषय मानते हैं। रामचरितमानस अक्षत-चंदन लगाने की चीज नहीं है, वह अद्भुत कृति है जो किसी अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने की ताकत देती है, ये बडा संकट है।
शिप्रा ः एक लम्बे समय से हिन्दी पर वामपंथी विचारट्टाारा का प्रभाव रहा है, जबकि आप राष्टत्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्यर सदस्य रहे हैं, जो एक दक्षिणपंथी विचारट्टाारा मानी जाती है। तो क्या कभी आपने साहित्यिक भेदभाव महसूस किया
डॉ. गुप्त ः दक्षिणपंथ शब्द वामपंथियों का दिया हुआ है। दक्षिणपंथ जैसी कोई चीज नहीं है। हम कहेंगे कि इस देश की जो स्वाभाविक चिन्ताट्टाारा है। राष्टत्रीय स्वयंसेवक संघ उस चिन्ताट्टाारा का समर्थक है। वामपंथी जो विचारट्टाारा है, वो निश्चित ही पश्चिम की विचारट्टाारा का उच्छिष्ट है, वो आयातित विचारट्टाारा है। इसीलिये मैं दक्षिणपंथ व वामपंथ दोनों सही नहीं समझता ह, एक स्वाभाविक विचारट्टाारा है, दूसरी आयातित है। दक्षिणपंथ उनका गढा हुआ शब्द है, दक्षिणपंथ मतलब संकीर्ण, दकियानूस, कूपमण्डूकता जबकि कूपमण्डूक तो वो हैं, जो आयातित विचारट्टाारा से चिफ हैं, तो हम इस दक्षिणपंथ शब्द से सहमत नहीं हैं।
शिप्रा ः आप एक सफल अट्टयापक माने जाते हैं, उससे जुडे अनुभव अगर कुछ हो तो बताइये।
डॉ. गुप्त ः अब मैं सफल अट्टयापक था कि नहीं, यह तो मैं नहीं कह सकता। ये तो मेरे छात्र बतायेंगे कि मैं सफल अट्टयापक रहा कि नहीं। पर इतना जरूर है कि अट्टयापन को मैंने निष्ठा के साथ अपनाया, अट्टयापन एक बहुत पवित्र पेशा है, उसके साथ अन्याय न हो, बेईमानी किसी स्तर की न हो, इसका मेरा बहुत प्रयास रहा है। एक सफल अट्टयापक के लिये यह जरूर है कि वह जिस विषय का अट्टयापन करे छात्रों के साथ उस विषय का संवाद करे। उस विषय का समग्रता से अट्टययन करे, नई-नई जानकारियों का समावेश करे। मैं कुछ भी जब पढाने जाता था यद्यपि मुझे बहुत सारी चीजें याद रहती थीं पर मैं एक-दो घण्टा उस विषय पर देख लेता था, यह भी अट्टयापन के लिये बहुत जरूरी है। जिस विषय का वह अट्टयापन करे, उस विषय में वह आनन्द प्राप्त करे। मुझे लगता था कि जिस दिन मैं बहुत अच्छा पढा लेता था, उस दिन मुझे बडा तृप्ति का अनुभव होता था। अट्टयापक जब अट्टयापन को बोझ की तरह लेगा तो अट्टयापन नहीं कर सकता। अट्टयापन तब अच्छा कर सकता है, जब उस विषय के साथ आत्मीयता का अनुभव करे। मैं यह कह सकता ह कि पढाने के दौरान मैंने आनन्द का अनुभव किया है।
शिप्रा ः आज का दौर संचार र्‍ान्ति का दौर है, आज हम वैश्विक गोव बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर हैं। ऐसे में हिन्दी का इस संर्म ण से बचे रह पाना सम्भव नहीं है, तो इस दिशा में हिन्दी भाषा को कैसे और अट्टिाक सशक्त और सर्वव्यापी बनाया जा सकता है
डॉ. गुप्त ः अब देखिये क्या है कि हम कहें कि वैश्विक गोव बन रहे हैं, यह मुझे बहुत ठीक नहीं लगता है। यह मैं अपनी बात बता रहा ह। हम कहो वैश्विक गोव बन गये हैं, जो इसमें तीसरी दुनिया के देश जिनको कहा जाता है, जिसमें भारत जैसे देश नहीं हैं। यह वैश्विक गोव उनके पक्ष में ज्यादा होता जा रहा है, जो विकसित देश हैं। ऐसा नही है कि हमारे देश की स्थिति अमेरिका, ”ांस जैसी हो गई है। हमारी स्थिति उनकी बराबरी जैसी फिलहाल तो नहीं बन पा रही है। वैश्विक गोव हमको शब्दजाल प्रतीत होता है, अमेरिका हमारे यहो आ रहा है, तो एकदम हमारे हित की बात कर रहा है, ऐसा नहीं है। कुटुम्ब में सबके हित की बात की जाती है, यहो जो व्यापारिक देश हैं, वो अपने हित की चिंता ज्यादा कर रहे हैं। अब इसमें हिन्दी का जहो तक सवाल है, तो जो बाजार की शक्तियो काम कर रही हैं, उनको भी स्थानीय बाजार चाहिये। इसके लिए वे भाषा को ही औजार बना रहे हैं, उसमें हिन्दी का विकास इस दृष्टि से हुआ है। हिन्दी के लिये यह एक अच्छा अवसर है, हिन्दी में बहुत सारे जो संचार माट्टयम हैं, जिसको सोशल मीडिया भी कहते हैं, वहो भी हिन्दी क लिये अच्छा अवसर है। इस पर हम लोगों को बैठ कर विचार करना चाहिये, पर सबसे बडी बात यह है कि हिन्दी का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक हिन्दी के प्रति गर्व का बोट्टा नहीं होगा।
१०-डी, रसूलपुर, इंदिरानगर, गोरखपुर ;उ.प्र.द्ध