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व्यास गुहा का आरोहण

एस.एल. भैरप्पा
अंग्रेजी से अनुवाद ः कुन्दन माली, इन्दुशेखर तत्पुरुष
मैं आरम्भ में ही यह स्पष्ट कर देना चाहता ह कि मैं यहो कोई बौ=क व्याख्यान देने नहीं जा रहा बल्कि मैं वैसा कर भी नहीं सकता। यदि मैं बौ=क व्याख्यान देने का प्रयास भी करूे, तो मेरा सर्जनशील मन इसके आडे आ जाता है। मैं जब कभी भी राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास इत्यादि सामाजिक विज्ञानों का अट्टययन करने बैठता ह तब मेरा दिलो-दिमाग तथ्यों के भारी भरकम बोझ को झटक कर कल्पनाशीलता के आकाश में उडान भरने लगता है, जबकि असल में उक्त विज्ञानों में तथ्यों की ही सर्वाट्टिाक महाा होती है। तो कल्पनाशीलता की उडान मेरा मनोट्टार्म है। यही कारण है कि वैज्ञानिक, समाज-वैज्ञानिक या भौतिक वैज्ञानिक की बजाय मैं कथा साहित्य लेखक ह। यही मेरी नियति है। किशोरावस्था में मुझे एक गोव से दूसरे गोव तक पैदल जाना पडता था, कभी-कभी तो दस से लेकर पन्ध्ह मील तक। इस दौरान मेरी कल्पनाशीलता की कोई सीमा न रहती और तब मैं अपने आप को किसी मिथकीय पात्र की तरह या किसी समकालीन नायक की भोति महसूस करके आनन्दित होता या फिर किसी हिंसक प्राणी के साथ संघर्ष करने वाला यो=ा मानकर खुश होता रहता। इस कल्पनालोक में मैं इस कदर डूब जाया करता था कि मुझे उस भीषण गर्मी की तपन और थकान राीभर भी महसूस नहीं होती थी।
मेरा जन्म कर्नाटक में एक गोव में रहने वाले अत्यन्त निर्ट्टान परिवार में हुआ। प्लेग की वजह से मेरे बडे भाई तथा बडी बहन की मृत्यु एक ही दिन हुई। हालोकि प्लेग की चपेट में तो मैं भी आ गया था, लेकिन किसी तरह जीवित रह गया। इसके दो साल बाद, जब मेरी आयु तेरह वर्ष की हुई, मेरी मो का निट्टान हो गया, उसी प्लेग ही के कारण। इसके अगले साल, मुझे अपने छोटे भाई की लाश कंट्टो पर लाद कर श्मशान स्थल तक ले जानी पडी और उसका दाह-संस्कार मैंने अपने हाथों किया। इन तमाम अनुभवों ने मेरे मन को मथ डाला और मैं मृत्यु के अर्थमात्र की खोज पर केन्ध्ति हो गया। लोग मरते क्यों है? मृत्यु क्यों माताओं को बच्चों से, भाइयों को भाइयों तथा बहनों से अलग कर देती है*
जब मैं इन्टरमीडियेट ;अब प्री-यूनिवर्सिटीद्ध का विद्यार्थी था, तब दर्शनशास्त्र में एक प्रोफेसर से अपने उन्हीं सवालों के जवाब खोजने के सिलसिले में मिला, जो अब तक मुझे बेचैन किये बैठे थे। उन्होंने मुझे पढने के लिये ’कठोपनिषद्‘ तथा इसका कन्नड अनुवाद दिया। मैंने इसे पढा। लेकिन नचिकेता की कथा को छोडकर, मुझे इसका दार्शनिक निहितार्थ समझ में नहीं आया। मैं वापस उनके पास गया, तब प्रोफेसर ने समझाया, ’’दर्शनशास्त्र को समझने के लिये र्मेब= अट्टययन की आवश्यकता होती है। बेहतर होगा कि तुम बी.ए. में अट्टययन के लिये दर्शनशास्त्र को चुनो।‘‘ मैंने उनकी बात मान ली फिर दर्शनशास्त्र में एम.ए. तथा पी-एच.डी. करके गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय में लेक्चरर की नौकरी शुरू कर दी। दर्शनशास्त्र में शोट्टा कार्य से जब कभी बि जाता, तब मैं उपन्यास, कविता या नाटकों की किताबें लगातार पढा करता था। सत्य तथा सौंदर्य के बीच तुलनात्मक अट्टययन पर केन्ध्ति अपनी पी-एच.डी. थीसिस जमा करवाने के बाद मैंने अपना पहला बडा उपन्यास ’वंशवृक्ष‘ लिखा। इस उपन्यास के पूरा होने के समय ही मेरे पास शोट्टा उपाट्टिा की मौखिकी परीक्षा का बुलावा आ गया। थीसिस की काफी प्रशंसा हुई तथा विश्वविद्यालय द्वारा इसे प्रकाशित करने की अनुशंसा भी की गई। परीक्षकों ने मुझे दर्शन में ही आगे अनुसंट्टाान करने का सुझाव किया, यह कहकर कि मैं तवशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र पर शोट्टाकार्य करूे। उनके कथनानुसार उक्त शोट्टा को मैं डी.लिट. के लिए प्रस्तुत कर सकता ह। इससे मुझे अपने कॅरियर में आगे बढने के लिए सहायता मिल सकती है। अतः मैंने अपने को उक्त अट्टययन-शोट्टा में झोंक दिया। अढाई बरस बीत जाने के बाद मेरा शोट्टा कार्य अंतिम चरण तक पहच गया। इस बीच कर्नाटक में मेरे प्रकाशक के पत्र लगातार मेरे उपन्यास ’वंशवृक्ष‘ की पाण्डुलिपि तैयार करने को लेकर आते रहे, लेकिन शोट्टा-कार्य से उपन्यास की ओर जाने की सम्भावना नहीं बनी। अंततः प्रकाशक का गुस्से से तिलमिलाता पत्र मिला। मैंने मजबूर होकर कुछ समय के लिये शोट्टा-कार्य से अस्थाई रूप से छुड्डी ली और उपन्यास की पाण्डुलिपि को पढना शुरू कर दिया। मैं इस काम में आकंठ डूब गया, बल्कि कहिये कि इसके साथ दिलो-जान से जुड गया, एक प्रेमी की तरह। मैंने इसे बारम्बार पढाऋ काट-छट कीऋ जोडा-घटायाऋ सम्पादित किया और यहो तक कि कुछ अंश नये ढंग से भी लिखे, अभिव्यक्ति में बदलाव किया और अंततः इसकी अंतिम प्रेस कॉपी तैयार कर इसे प्रकाशक को भेज दिया। एक सप्ताह बाद मैं वापस शोट्टा कार्य में जुट गया।
लेकिन अब यह काम मुझे बेहद उबा तथा रूखा-सूखा लगने लगा। मुझे महसूस हुआ कि मैं कथा साहित्य लेखन में ही सर्जनशील हो सकता ह, न कि सत्य या सौंदर्य या नैतिक मूल्यों की व्याख्या, तुलना आदि करने जैसे कामों में। विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों की सै=ान्तिकियों की अवट्टाारणाओं के विश्लेषण का काम किसी भी नजरिये से सर्जनात्मक नहीं हो सकता। कॅरियर में फायदे के लिहाज से उपयोगी डी.लिट. डिग्री को पूरा करने में मुझे काफी कशमकश से गुजरना पडा। मैं इस शोट्टाकार्य से आगे नहीं बढा। यहो तक कि अब तक जितना लिख चुका था, उसे पढ भी नही सका। मैं अपनी व्यावसायिक तरक्की तथा सर्जनात्मक अन्तःप्रेरणा के बीच उत्पन्न संघर्ष में उलझ गया।
इस बीच ’वंशवृक्ष‘ का प्रकाशन हो गया। छपते ही इसका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। इस पर जगह-जगह सेमिनार हुए, समीक्षाऐ छपी, कर्नाटक साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी इसे प्राप्त हुआ। इस बेहद उत्साहवर्ट्टाक वातावरण से मुझे काफी आसानी हो गई। वह यह कि मैंने दर्शनशास्त्र में शोट्टा कार्य की जगह अपनी दिशा सर्जनात्मक लेखन की ओर मोड दी। जब मैंने ’वंशवृक्ष‘ की प्रकाशित प्रति को पढा, तब मुझे इसकी शक्ति तथा इसकी तकनीकी सीमाओं, दोनों का पता चला। इसकी कहानी सहज-सामान्य कहन वाली और सहज सम्प्रेषणीय थी। मुझे महसूस हुआ कि इसमें यदि विविट्टा प्रविट्टिायों का इस्तेमाल किया जाता तो यह और अट्टिाक प्रभावी बन सकती थी। तब तक मैं अट्टिाकांश कन्नड उपन्यास तथा प्रमुख अंग्रेजी उपन्यासों के अनुवाद पढ चुका था। उपन्यास विट्टााऋ इसकी संरचना, शिल्प, चरित्र-चित्रण, भाषा तथा अन्य परिवर्तन इत्यादि का अट्टययन मैंने नहीं किया था।
सौंदर्यशास्त्र का अट्टययन मैं अपने कॉलेज की शुरुआत के दिनों से करता रहा था, फिर पी-एच.डी. से लेकर अपूर्ण डी.लिट. तक इस पर पकड भी बना ली थी। सौंदर्यशास्त्र तमाम कलाओं के दर्शन का ही पर्याय है। लिहाजा मुझे साहित्य के दर्शन की खासी जानकारी तो थी, लेकिन साहित्य के शिल्प के अट्टययन में अब तक मैं बिल्कुल कोरा ही था। अब मैंने इसके व्यवस्थित अट्टययन करने की ठानी।
मैंने विश्वविद्यालय में अपने सहकर्मी तथा अंग्रेजी विभाग के अट्टयक्ष प्रोफेसर आर.ए. दवे से अपनी समस्या पर चर्चा की और अनुरोट्टा किया कि वे मुझे एम.ए. अंग्रेजी की कक्षाओं में बैठने की मंजूरी दे दें। दवे साहब ने अपने विभागीय साथियों से विचार-विमर्श किया। लेकिन उनके कुछ सहकर्मियों को झिझक थी क्योंकि मैं पहले ही सौंदर्यशास्त्र में पी-एच.डी. कर चुका था। सो मुझे इसकी इजाजत नहीं मिल सकती थी और ना ही मिली। लिहाजा दवे साहब ने मुझे एक सुझाव दिया, वह यह कि वे मुझे रूसी, फ्र”ेंच, स्पेनिश, इतालवी तथा अंग्रेजी भाषाओं में लिखे गये और क्लासिक माने जाने वाले पच्चीस उपन्यासों की सूची देंगे। इसके साथ ही उन्होंने उपन्यास के विभिन्न पक्षों, संरचना-शिल्प से सम्बन्ट्टिात कुछ किताबें भी उपलब्ट्टा करवाई। विश्व साहित्य की उक्त कालजयी कृतियों तथा अन्य पुस्तकों का मैंने दो बरस तक गहन अट्टययन किया। मैं अक्सर दवे साहब से जरूरी स्पष्टीकरणों तथा उपस्थित संशयों के निवारणार्थ मिलता रहता था। इस लम्बी कसरत का नतीजा यह हुआ कि मैं उपन्यासों के रूपाकार को उसकी कथावस्तु से अलग कर देखने में सक्षम हो सका। इस दौरान मैंने ब्रेख्त, पिरांदेल्लो, सार्त्र, कामूं, हेनरी, मिलर, पिंटर, टेनेसी विलियम्स इत्यादि नाटककारों की महवपूर्ण नाट्य-कृतियों को भी मनोयोग से पढा।
जैसा कि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हुआ, कन्नड साहित्य में भी नवजागरण की शुरुआत अंग्रेजी साहित्य के असर के कारण ही हुई। कुछ भारतीय भाषाओं, मसलन बंगाली साहित्य में नवजागरण का आगाज कुछ दशकों पहले ही हो गया था और इसका असर अन्य भारतीय भाषाओं पर भी पडा। कन्नड में नवजागरण या नवोदय की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही हो गयी थी, जो कि देश की स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलन में रही। नवोदय ट्टाारा के तमाम लेखकों ने अंग्रेजी साहित्य का न केवल अट्टययन किया, बल्कि उससे प्रभावित भी हुए। लेकिन इन दोनों के बीच एक स्पष्ट अंतर था। ब्रिटेन, अन्य यूरोपीय देशों और अमेरिका इत्यादि के राजनीतिक विचारों तथा साहित्यिक रूपाकारों ने कन्नड लेखकों को अभिप्रेरित किया। लेकिन जहो तक विचारों और आदशोङ के मूल तवों का सवाल है, उन्होंने सदैव अपने परिवेश के भीतर देखा और हजार बरस पुराने कन्नड साहित्य तथा तीन-चार हजार बरस पुराने संस्कृत साहित्य को ही अपने लेखन का आट्टाार बनाया, जिसमें वेदों का भी समावेश होता है।
अतएव, नवोदय साहित्य अपनी अन्तर्वस्तु, खोज तथा अन्वेषण की दृष्टि से भारतीय ही था। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद ही भारत की मानसिकता साम्यवादी रंग में रंग गई। इसके मूल में एक तो सोवियत संघ का बौ=क क्षेत्रों में किया जाने वाला अत्यन्त शक्तिशाली प्रचार तंत्र था तथा दूसरी ओर माक्र्सवाद तथा लेनिनवाद के प्रति नेहरू का प्रबल आकर्षण भी इसके लिए जिम्मेदार था। भारतीय साहित्य में माक्र्सवाद ने अपने स्वयंभू शीर्षक ’प्रगतिशील‘ के साथ प्रवेश किया। सोवियत शब्द ’प्रगतिशील‘ ने विचारशीलता के तमाम क्षेत्रों - सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक इत्यादि में देखते-देखते कब्जा जमा लिया।
लेखकों को अमूमन इस तरह के सवालों से सामना करना पडता था यथा - ’’आपका लेखन सामाजिक प्रगति के लिये किस तरह से सहायक होगा? पाठक के मनोमस्तिष्क को प्रगतिशील विचारों की ओर मोडने की दृष्टि से आपका लेखन किस प्रकार से सहायक होगा?‘‘ बेशक, यहो प्रगतिशील शब्द का वही अर्थ लिया जाता था, जो कि सोवियत प्रचार-तंत्र बताता था तथा जो भारतीय साम्यवादियों के स्वर में प्रतिट्टवनित होता था। अट्टिाकतर प्रगतिशील कन्नड लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास तथा मुल्कराज आनन्द से प्रेरित-प्रभावित थे। बहरहाल, कन्नड प्रगतिशील आंदोलन भी अल्पजीवी ही साबित हुआ, क्योंकि कन्नड प्रगतिशील आन्दोलन के कर्णट्टाार नेता भी मूलतः ईश्वर, कर्मकाण्ड तथा पुराणों आदि में आस्था रखने वाले थे।
पोचवे दशक के मट्टय में नव्य आंदोलन की शुरुआत हुई। सबसे पहले गोपाल कृष्ण अडिग की कविता और उसके बाद सातवें दशक के दौरान लिखे जाने वाले कथा साहित्य तथा नाट्यलेखन में इसे स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जा सकता है। प्रगतिशील आंदोलन के मुकाबले सै=ान्तिक तौर पर नव्य आंदोलन अपेक्षाकृत ताकतवर था। जैसा कि जिर्‍ किया जा चुका है, नवोदय आंदोलन अंग्रेजी रोमांटिक कवियों तथा शेक्सपियर से प्रभावित रहा, लेकिन इसी प्रभावशीलता के कारण नवोदय ट्टाारा के कवि लेखक अपनी मौलिक भारतीय जडों को तलाश करने की ओर प्रेरित-उन्मुख हुए। लेकिन अडिग के अतिरिक्त बाकी उस ट्टाारा के तमाम लेखकों ;मुख्यतः गद्यकारोंद्ध को उस वक्त प्रचलित सार्त्र, कामूं के अस्तित्ववाद तथा माक्र्स या लेनिन, माओत्से तुंग तथा ”ायड की वैचारिकता में ही अपनी मुक्ति दिखाई दी।
जहो एक ओर अडिग नेहरू के आलोचक थे, तो वहीं दूसरी ओर अन्य लेखक नेहरू तथा लोहिया दोनों के प्रशंसक थे। इसी वजह से साहित्यिक आलोचना की सै=ान्तिकी तथा अवट्टाारण में परिवर्तन भी आ गया।
ठीक यही वक्त था जब मैंने कन्नड कथा साहित्य- लेखन के क्षेत्र में अपना कदम रखा। लेकिन उस समय मैं कर्नाटक में न होकर अन्यत्र था, मतलब छह बरस तक गुजरात में और उसके बाद साढे चार बरस तक दिल्ली में। उस पर तुर्रा यह कि मेरे अट्टयापन कार्य में साहित्य एक विषय के रूप में कभी रहा ही नहींऋ न कन्नड और न ही अंग्रेजी साहित्य। मैंने भारतीय तथा पाश्चात्य दर्शन दोनों ही अनुशासनों में अपनी पर्याप्त पैठ और गहरी पकड के साथ सर्जनात्मक लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया था। जब मेरा तबादला दिल्ली से मैसूर हो गया, तब मुझे नवट्टाारा के लेखकों के विचारों तथा आदशोङ को जानने का अवसर मिला और कहना चाहिये कि इनमें से अट्टिाकतर अंग्रेजी के अट्टयापक थे। उनके विचार तथा अवट्टाारणा, शब्दावली तथा आदर्श, साहित्यिक वैचारिकता तथा आलोचना के संदर्भ आदि अंग्रेजी तथा यूरोपीय ट्टाारा से लिये गये थे। दर्शनशास्त्र का छात्र तथा अट्टयापक होने के नाते मुझे उस पृष्ठभूमि तथा परिवेश की भली-भोति जानकारी थी, जिससे सार्त्र तथा कामूं आते थे। मैंने सार्त्र की दार्शनिक रचनाओं तथा साहित्यिक रचनाओं को पढ रखा था, जबकि दूसरी ओर कन्नड नव्य लेखकों को सार्त्र की शु= दार्शनिक कृतियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मैं इस नतीजे पर पहचा कि माक्र्स बेशक एक महान आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक ताकत था, लेकिन वह दार्शनिक तो कदापि नहीं था। पश्चिम में दर्शन की परिभाषा सम्प्रदाय विशेष के साथ बदलती रहती है, खास करके आट्टाुनिक काल के परिप्रेक्ष्य में तो यह बात सौ फीसदी सच है। दर्शन तथा साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में हर रोज नई परिभाषाऐ हवा में तैरती नजर आती हैं तथा अमेरिकन विश्वविद्यालयों की ओर उछलने वाला जुमला ’’छपो या फिर खत्म होने को तैयार रहो‘‘ खूब सर्यल दिखाई दे रहा है। प्लेटो ने दर्शनशास्त्र की जो परिभाषा दी है - ’फिलो सोफिया - बु= से प्रेम‘ तथा अरस्तु ने आट्टिाभौतिकी ;मेटाफिजिक्सद्ध का जो वर्णन किया है - ’मेटा फिजिक्स - भौतिकी से परे‘, अर्थात जहो तमाम विज्ञान खत्म होते हैं, वहीं से दर्शनशास्त्र का प्रारम्भ होता है।
इन दोनों का मोटा-मोटा सम्बन्ट्टा या समन्वय भारतीय दर्शन की अवट्टाारणा के साथ बैठता नजर आता है, अर्थात् ’’अट्टिा+आत्म, तत्+त्व+ज्ञान‘‘ या तवशास्त्र। पाश्चात्य शोट्टा की दिशा केवल आट्टाुनिक भौतिक- वैज्ञानिक सि=ान्तों की विभिन्न प्रतिच्छायाओं की ओर उन्मुख नजर आती है।
कन्नड नव्यट्टाारा के लेखक पश्चिम से आई हुई नई साहित्यिक प्रविट्टिायों के प्रबल प्रवाह में बहने लगे और इनको अंगीकार करते समय ये लेखक पश्चिमी लेखकों के विचारों तथा विचारट्टााराओं को भी स्वीकार कर चुके थे। ये लोग नये रूपाकारों तथा नयी अन्तर्वस्तु के बीच के अन्तर को समझने में नाकाम रहे। स्वायत अनुशासन के तौर पर दर्शन की अपनी पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हम लोग अपनी मौलिक अन्तर्वस्तु को बचाये रखते हुए पश्चिम से आने वाले रूपाकारों को अंगीकार कर सकते हैं और यह ठीक भी है।
मुझे यह भी स्पष्ट रूप से महसूस होने लगा कि रूस के विपुल भौगोलिक विस्तार ने दोस्तोयेवस्की तथा तोलस्तोय के व्यापक फलक वाले उपन्यासों को महवपूर्ण रूप से प्रभावित किया। इसके ठीक विपरीत देखें तो ब्रिटेन सरीखे द्वीपदेश में इस तरह के बीजांकुरण की संभावना न्यून ही लगती है। नव्यट्टाारा के लेखक विराट फलक वाले उपन्यास लेखन को दूर से ही सलाम कर रहे थे। वे तो छोटे उपन्यास लेखन-कार्य की वकालत करते हुए लेखन में सर्यह थे। इन रचनाओं को विस्तारित-छोटी कहानियो कहने में भी कोई हर्ज नहीं है।
वे लोग बडे फलक के उपन्यासों का उपहास करते हुए इनको ’डायरिया उपन्यास‘ के तौर पर गरिया रहे थे। ये लेखक छोटे तथा सुगठित उपन्यासों की वकालत कर रहे थे। तब मैं उार भारत में रह रहा था। लगभग ग्यारह बरसों तक वहो रहने के दौरान मैंने देश के तमाम भागों की यात्राऐ कीं, बल्कि भारत के अलग- अलग गोवों में ठहरा भी। विविट्टा राज्यों के अनुभव मैंने एकत्र किये। मुझे लगा कि भारत किसी भी यूरोपीय देश के मुकाबले अत्यन्त विशाल है। हालोकि रूस की अपेक्षा भारत भौगोलिक दृष्टि से छोटा है, लेकिन हमारा देश रूस के मुकाबले सांस्कृतिक विविट्टाता के तौर पर कितना समृ= है, यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है।
कोई भारतीय लेखक देश की विशालता और विविट्टाता को इसकी समग्रता में किसी भी आट्टाुनिक ढोचे में रखकर कैसे व्यंजित कर सकता है? हमारे देश में दो महान आदर्श ग्रंथों - ’रामायण‘ तथा ’महाभारत‘ की रचना आट्टाुनिक ब्रिटिश फलक पर कदापि नहीं की जा सकती थी।
१९७५ में मुझे नैतिक शिक्षा पर एक कार्यशाला में भाग लेने के लिये एक महीने तक जापान में रहने का अवसर मिला। जापानी शिक्षाविद् तब यह कह रहे थे - ’’तकनीकी कौशल तथा कार्य कौशल के लिहाज से हम अमेरिका के बराबर, बल्कि उससे भी आगे निकल चुके हैं। हमने आर्थिक तरक्की भी काफी की है, लेकिन हमारी सबसे बडी चिंता यह है कि हमारा राष्टत्रीय चरित्र दिनों-दिन गिरता जा रहा है। इस क्षरण को रोकने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है।‘‘
भारतीय दर्शन का मूलभूत अभिप्रेत मृत्युबोट्टा है, जबकि ग्रीक दर्शन सितारों-भरे आकाश तथा समुध् की विशालता पर विस्मयबोट्टा तक ही सीमित है।
संस्कृत में एक लोकप्रिय श्लोक है -
अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थफ्ा्च संचयेत्।
गृहीत इव केशेषु मृत्युना ट्टार्ममाचरेत्।। ;सुभाषित रत्न भांडागारद्ध
अर्थात् ज्ञान और सम्पा का संचय स्वयं को अजर-अमर मानते हुए तथा ट्टार्म ;जीवनमूल्योंद्ध का आचरण स्वयं को मृत्यु के चंगुल में फेसे हुए की भोति करना चाहिये।
भारतीय तथा पाश्चात्य दर्शनों में दो विभिन्न उत्प्रेरक तव लगभग एक समान है। आत्मा की अमरता का उदाहरण समझने के लिए हमें सुकरात की उस बात का स्मरण करना होगा, जब उन्होंने जेलर को रिश्वत देकर बच निकलने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। प्लेटो तथा अरस्तु राजनीतिक तथा सामाजिक नैतिक मूल्यों में गहन आस्था रखने वाले हैं। बौ= दर्शन तथा वेदांत, ये दोनों हमारे दर्शन की प्रमुख ट्टााराऐ हैं जिनकी उत्पा से ही इनमें मृत्यु-बोट्टा तथा मृत्यु के बाद क्या? इत्यादि प्रश्नों का समावेश होता है। उपनिषद् ग्रंथ, वैदांतिक ट्टाारा के आट्टाार को स्पष्ट करते हैं। जबकि सि=ार्थ का दृष्टांत बौ=दर्शन की मूलभूत चिंताओं तथा सरोकारों को व्यक्त करता है। किशोर नचिकेता ’जीव‘ के नैतिक न्यायाट्टाीश तथा मृत्यु के देवता यम के पास अपने इस प्रश्न को लेकर जाता है कि ’’जब जीव आफ पास आता है, तब उसके बाद उसका क्या होता है?‘‘ वह जीवित रहता है अथवा नहीं? राजसी परिवेश में पले-बढे सि=ार्थ जब तीन दुःखदायी अवस्थाओं - मृत्यु, वृ=ावस्था, रूग्णता से रू-ब-रू होते हैं और शव को देखते हैं, तब मृत्यु को लेकर उनकी व्यग्रता और मृत्युबोट्टा दोनों उनके दिलों-दिमाग को घेर लेते हैं। बु= ने जीवन की नश्वरता को समझाते हुए मृत्यु की अनिवार्यता को भी रेखांकित किया। उन्होंने तृष्णाओं को ही हमारे दुःखों का मूल कारण माना है और कहा कि तृष्णा से मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है परलोकवाद। इसके बारे में उन्होंने चाहे जितने भी तर्क दिये हों, फिर भी वे निरन्तरता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके। यूरोपीय संस्कृतविदों से प्रभावित कुछ आट्टाुनिक विद्वानों ने बु= को वेदों के खिलाफ विधेह करने वाला बताया है, लेकिन जैसा कि आर.डी. रानाडे ने रेखांकित किया है ;ए कंस्टत्रिक्टव सर्वे ऑफ द औपनिषदिक फिलॉसफीद्ध - उस काल में अनेक जिज्ञासु तथा दार्शनिक ऐसे भी हुए जिन्होंने वेदों की स्वतंत्र साा को स्वीकार करके उनका स्वतंत्र रूप से अट्टययन करना ही बेहतर समझा। उन्होंने वेदों के योगदान को अपनी तरह से ही समझा और निष्कर्ष निकाला। जो भी हो, बु= उपनिषद्-काल की ही उपज थे। त्रिपिटकों में से लिये गये निम्नलिखित उ=रण आत्मा के बारे में बु= की स्पष्ट समझ तथा सम्पूर्ण चेतना की परम अवस्था को प्रकट करते हैं -
अज्झात्म सुखमनुयुफ्जेथा ;मज्झम निकाय ३.२३०द्ध अज्झात्मजलमामि ज्योति ;संयुक्त निकाय १.१६९द्ध ब्र॰ भूतेनात्मा ;दिग्ट्टा निकायद्ध
डॉ. आनन्द कुमारस्वामी ;द लिविंग थॉट्स ऑफ गौतम द बु=ा, हिन्दुइज्म एंड बु=ज्मद्ध, आर्थर ऑस्बोर्न ;बु=ज्म एंड र्स्चिमनीयेटी इन द लाइट ऑफ हिन्दुइज्मद्ध, जी.सी. पाण्डे ;बौ=-ट्टार्म का इतिहासद्ध, बलदेव उपाट्टयाय ;बौ= दर्शनद्ध इत्यादि विद्वानों ने इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित किया है। बु= ने अपने हजारों अनुयायियों को ’संन्यास‘ के उपदेश देने के लिए चार दिशाओं में भेजा था। यद्यपि वेदों में भी संन्यास की अवट्टाारणा मौजूद थी, तब भी संन्यासियों की संख्या नगण्य ही थी। यहो तक कि हमारे वैदिक (षि न केवल विवाहित थे, बल्कि उनके संतानें भी थीं। बावजूद इसके, वे हमारे महान (षि थे।
यद्यपि उन्होंने ब्र॰चर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास इन चारों आश्रमों की महाा पर बल दिया, लेकिन तब भी संन्यास आश्रम को अंगीकार करने वालों की संख्या कम ही रही। बौ= दर्शन के प्रभाव के कारण बाल संन्यास का प्रचलन वैदिक परम्परा में देखा गया।
वेदों का सारतव उपनिषदों में तथा उपनिषदों का सारतव भगवद्गीता एवं बादरायण के ब्र॰सूत्रों में व्यक्त हुआ है। ब्र॰सूत्रों पर पहले शंकराचार्य ने, तत्पश्चात रामानुजाचार्य, शंकराचार्य, मट्टवाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य, श्रीकंठ इत्यादि ने टीकाऐ लिखी हैं। इन सूत्रों तथा अन्य ग्रंथों पर लिखी गई टीकाओं से ही वेदों की प्रवचन परम्परा का आट्टाार निर्मित हुआ है और जिसे सूक्ष्म दृष्टिवान बौ=क विद्वानों द्वारा ही समझा जा सकता है। वेदों तथा उपनिषदों के सारतव को सामान्य जन तक पहचाने में हमारे दो महान ग्रंथों रामायण तथा महाभारत की महवपूर्ण भूमिका रही है। हमारे यहो नैतिक-उपदेश परम्परा की इसमें कोई भूमिका नहीं रही है। यह बेहद अन्तर्दृष्टिपूर्ण तथ्य है कि इन दोनों महाकाव्यों के रचनाकार उनमें विद्यमान कथाओं में प्रतिभागी थे और इस तरह से वे दोनों ही सम्पूर्ण घटनार्मं के प्रत्यक्षदर्शी भी थे। किसी भी आट्टाुनिक उपन्यास लेखक के लिए भी यह एक कारगर प्रविट्टिा हो सकती है, लेकिन इन दोनों महाकाव्यों के रचनाकारों को उस तरह से साहित्यिक तकनीकों या प्रविट्टिायों की जानकारी नहीं थी, जैसे कि आट्टाुनिक लेखकों को है। महाकवि वाल्मीकि ने स्वयं यह स्पष्ट किया है कि ’रामायण‘ त्रेतायुग में उचित महाकाव्य है। व्यास कृत ’महाभारत‘ का सम्बन्ट्टा द्वापर युग से है। रामायण की कथा अपेक्षाकृत सहज-सरल है तथा इसके चरित्र भी सरल एवं स्पष्ट मनोभाव वाले हैं, जबकि महाभारत के पात्र, समस्याऐ तथा अस्मिताओं का संघर्ष अत्यन्त जटिल किस्म का है। रचनाकार व्यास स्वयं मानते हैं कि महाभारत एक युग के एक कालखण्ड के समापन तथा एक नये कालखण्ड के प्रारम्भ का चित्रण करता है। इसलिये इसका फलक इतना विशाल, व्यापक तथा विविट्टावर्णी है। ये दोनों महाकाव्य महज कथाऐ न होकर अपने-अपने रचनाकारों की अन्तर्दृष्टि तथा वेदों में विद्यमान नैतिक दृष्टिबोट्टा का विश्लेषण, व्याख्या तथा रेखांकन करने वाली महारचनाऐ हैं।
इसे हजारों बरसों की हमारी परम्परा में सुगुंफित देखा जा सकता है और जो निम्नांकित उ=रणों में व्यक्त किया गया है*-
वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना।। ;पारायण रामायणद्ध
चत्वारैकतो वेदाः भारतं चैकमैकतः।
समागतैः सुरर्षिभिस्तुलामारोपितं पुरा।।
महत्वे च गुरुत्वे च ट्टिा्रयमानं ततो*ट्टिाकम्। ;महाभारत १.१.२०८द्ध
यो*ट्टिाट्टयाच्चतुरोवेदान् सांगोपनिषदान् द्विजः। न चाख्यानमिदं विद्यान् नैव स स्याद् विचक्षणः।। ;महाभारत १.१.२३५द्ध
अर्थात् राम वेदों में वर्णित परम सत्य के प्रतीक हैं तथा रामायण (षि कवि-वाल्मीकि द्वारा अनुभूत वेद का ही पर्याय है। महाभारत के बारे में स्वयं इस महाकाव्य में कहा गया है - जब (षियों तथा देवताओं ने चारों वेदों को मिलाकर महाभारत से तुलना की तब, व्यास की कृति ने वेदों पर अपनी श्रेष्ठता सि= कर दी। यदि कोई व्यक्ति वेद, उपनिषद और वेदांग में पारंगत भी हो जाए तो भी जब तक वह इस महाभारत की कथा को नहीं जान लेता तब तक विद्वान पंडित नहीं कहलाता।
व्यास ने अपनी कथा में परिस्थितियों की रचना एवं उपयोग इसी दृष्टिकोण से किया है। इसके अठारह अट्टयायों में विस्तारित दार्शनिक विमर्श मात्र ही नहीं है, बल्कि इसमें अन्य अनेक विमर्श विद्यमान हैं, यथा - विदुर नीति, भीष्म नीति इत्यादि। रामायण में भी ऐसे विमर्श मिलते हैं। इनमें कथाओं तथा उप-कथाओं की निर्मिति संदभोङ की संभावना के लिए की गई है। इस दृष्टि से इन दोनों महाकाव्यों के द्वारा न केवल हमारे आदशोङ को स्पष्ट किया गया है वरन् हमारी राष्टत्रीय अस्मिताओं का आट्टाार भी इनसे ही निर्मित होता है। इन दोनों महाकाव्यों का प्रभाव इतना सशक्त रहा है कि बहुत सारी परवर्ती कृतियों में गद्य-लेखकों तथा नाट्य-लेखकों ने इन दोनों महाकाव्यों से कथाओं, पात्रों, घटनाओं को लिया है अथवा इनसे प्रभावित होकर कथानक में घटनार्मं की रचना की है। संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं में सर्जनशीलता की दृष्टि से ये दोनों महाकाव्य अक्षय भंडार की तरह हैं।
इन दोनों महाकाव्यों में वर्णित पात्रों की बोली-बानी, बर्ताव, संर्यास इत्यादि दुःख के दिनों में उन शिक्षाओं तथा उपदेशों का स्मरण कराते हैं, जो परवर्ती काल के नीतिशास्त्रों तथा ट्टार्मशास्त्रों में मिलते हैं।
वेदों में ’कवि‘ के अनेक अर्थ हैं जैसे कि (षि, विद्वान, बु=, ट्टाीर, प्राज्ञ, पंडित, ट्टाीमान, दूरदर्शी, दीर्घदर्शी, र्‍ांतदर्शी इत्यादि। रोमन संस्कृति में कवि को ’वेट्स‘ ;टंजमेद्ध कहा गया है, जिसका अर्थ है - (षि या र्‍ांतदर्शी। ग्रीक संस्कृति में कवि ;चवमजद्ध का अर्थ है ’निर्माता‘ या ’रचयिता‘ या ’सर्जक‘। कवि शब्द का वास्तविक अर्थ ’रचयिता‘ या ’सर्जक‘ ही है। वैदिक सन्दर्भ में सिर्फ एक (षि ही कवि हो सकता है या कवि आवश्यक रूप से (षि ही होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कविता केवल ’शिल्प‘ ही नहीं है, वरन् वह किसी दृष्टि या अभिप्रेरित अभिव्यक्ति का पर्याय है। कविता का शिल्प वस्तुतः परवर्ती कालखण्ड में सामने आई सै=ान्तिक अवट्टाारणा है। इसलिये भारत में दो तरह की काव्य परम्पराऐ हैं - वाल्मीकि एवं व्यास की परम्परा तथा कालिदास की परम्परा। लेकिन कालिदास की परम्परा में भी सिर्फ उसी काव्य या साहित्यिक कृति को महान या महवपूर्ण माना जाता है जिसमें किसी महान जीवनदर्शन या रामायण तथा महाभारत-सम्मत दर्शन की अभिव्यक्ति होती हो। वैदिक मंत्र असल में अभिप्रेरित काव्य के ही उदाहरण हैं तथा इनमें मौजूद लय ;तीलजीउद्ध, काव्य शिल्प की व्यवस्था नहीं है, बल्कि वह तो इनमें विद्यमान सत्यपरक अन्तर्वस्तु की ट्टवन्यात्मकता की वजह से है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि अन्तर्वस्तु काव्य में रूपान्तरित हुए बिना सत्य के तौर पर स्वीकार्य नहीं हो सकती। काव्य के रूपान्तरण में ही सत्य को व्यक्त किया जा सकता है। यही कारण है कि वेदों के सभी मंत्र और (चाऐ लयात्मक ;तीलजीउपबद्ध छन्दोब= होते हैं। सभी उपनिषद् काव्यात्मक हैं। उपनिषद् वेदों के अंग हैं, उनके विरोट्टाी नहीं। अर्थात ’रसो वै सः‘ परम आट्टयात्मिक अनुभव को ’रस‘ कहा गया है और इसीलिये हमारे यहो उक्ति है -
’’नानर्षिः कुरुते काव्यम्‘‘।
परवर्ती सौन्दर्यशास्त्रियों ने ’रस‘ को ही कलाभिव्यक्ति का अंतिम प्रतिमान स्वीकार किया है। यह सि=ान्त केवल काव्य पर ही नहीं, वरन् अन्य व्यावहारिक कलाओं यथा नाटक, नृत्य तथा संगीत पर भी समान रूप से लागू होता है। यही प्रतिमान वास्तुशिल्प तथा चित्रकला इत्यादि प्लास्टिक कलाओं पर भी लागू होता है।
रस की अनुभूतियों या संवेदनाओं की मनोवैज्ञानिक अवस्था को ठीक उसी तरह से नहीं माना जा सकता, जिस तरह से समाट्टिा की एकाग्रचिाता की अवस्था को माना जाता है। जैसा कि ’साहित्यदर्पण‘ ;३.२,३द्ध में सौन्दर्यशास्त्री विश्वनाथ ने कहा है -
सत्वोध्ेकादखण्ड-स्वप्रकाशानन्द चिन्मयः।
वेद्यान्तरस्पर्शशून्यो ब्र॰ास्वाद-सहोदरः।।
लोकोार चमत्कार प्राणः कै“चन् प्रमातृभिः। स्वाकारवदभिन्नत्वे नायमास्वाद्यते रसः।।
अर्थात रस हमारी अखण्ड, आत्मप्रकाशक तथा अभिप्रेरित परम अवस्था को व्यक्त करने वाला तव है, जो कि विषय और विषयी के द्वैत का अतिर्म ण करते हुए हमें आनन्दानुभूति कराता है। इसीलिये इसे ब्र॰ानन्द का अनुज कहा गया है। रस वस्तुतः कलानुभव की उदाा अवस्था है, जिसका आस्वादन हमारी आट्टयात्मिक अवस्था की अनुभूति के समान ही है।
समाट्टिा एक ऐसी अवस्था है जिसमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्र॰चर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाट्टयाय तथा ईश्वर- प्रणिट्टाान इत्यादि समस्त नैतिक मूल्यों को अंगीकृत करके साट्टाा जाता है। ये हमारे लिये नैतिक शु=करण के लिए अनिवार्य है तथा समाट्टिा के माट्टयम से हमें इनको पार करना होता है, इनका अतिर्माण ;ज्तंदेबमदकद्ध करना पडता है। इसके बाद ही हम उस रस की प्राप्ति कर सकते हैं जो कि आनन्द की विशिष्ट गुणवाा का पर्याय है। भारतीय सौंदर्यशास्त्रियों ने सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमान के द्वारा यह स्पष्ट कर दिया कि कलानुभव का उद्भव नैतिक अनुभव से होता हुआ उससे पिर उठ जाता है। इसलिये कलाकार के लिए कला की रसानुभूति महज संवेदनात्मक अवस्था ही नहीं है, बल्कि वह तो जीवन के उच्चतम तथा उत्कृष्ट मूल्यों का चरम उत्कर्ष हेाती है। जीवन मूल्यों के प्रतिकूल होने वाली कला रस की सृष्टि नहीं कर सकती। इस तरह की कला केवल जुगुप्सा ही पैदा कर सकती है, जो कि जीवन-विरोट्टाी भी होगी। कला के परिप्रेक्ष्य में, जुगुप्सापरक तथ्यों को भी अनुभवपरक बनाया जा सकता है।
इसके लिये हमें उन तथ्यों को रस में रूपान्तरित करना पडता है। उदाहरणार्थ - भय हमारे मन में कंपन पैदा करने वाला, पसीना लाने वाला भाव पैदा करता है, तो वहीं दूसरी ओर पलायनवादी भाव वीभत्स रस से पैदा होता है तथा “ाृंगार भाव काम की अनुभूति कराता है। आट्टाुनिक पश्मिी सौन्दर्यशास्त्री इसे सौन्दर्यशास्त्रीय अंतराल ;।मेजीमजपब कपेजंदबमद्ध के तौर पर निरूपित करते हैं। यह केवल कला ही है जो मूल संवेदनों को रसों में रूपान्तरित करके जीवन को अट्टिाक सहनीय तथा आनन्दानुभूति के योग्य बनाती है।
सौन्दर्यशास्त्री बटत्र्ेर्म मॉरिस ने एक उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि तथाकथित कला-सर्जन के माट्टयम से नैतिक तौर पर अपकर्षक ;त्नचनसेपअमद्ध तव को केवल भौंडेपन में ही बदला जा सकता है। एक जगह सिफलिस रोगियों के समुदाय द्वारा पूजा-अर्चना के लिये एक चर्च की स्थापना की गई। चर्च की आंतरिक सजावट करने वाले एक चित्रकार ने बाईबल का अपना ज्ञान उंडेलते हुए चर्च के अंदर स्वयं ईसा मसीह को सिफलिसग्रस्त दर्शाते हुए चित्र बना लिया, जिसमे ईसा मसीह सिफलिसग्रस्त रोगियों की सेवा-सुश्रुषा करते नजर आ रहे थे, लेकिन जब चर्च का उद्घाटन किया गया और सिफलिसग्रस्त रोगियों ने उस चित्र को देखा तब वे सभी जुगुप्सा से भर उठे। कारण सिर्फ इतना ही था कि करुणा करने वाले ईसा मसीह को वे उस पाप को भुगतते हुए नहीं देख सकते थे, जिसे वे सभी स्वयं भुगत रहे थे ;द एस्थेटिस प्रोसेस, पृ. १३४द्ध। इस उदाहरण से सि= होता है कि जीवन मूल्यों के विपरीत या उनका तिरस्कार करने वाले तथा उनको महिमामंडित करने वाले रस या अनुभव कभी भी कलानुभव में रूपान्तरित नहीं हो सकते।
पिछले कुछ दिनों से एक्टिविस्ट लेखकों ने लगातार हो-हल्ला मचा रखा है। उनका मंतव्य स्पष्ट है कि कोई भी सच्चा लेखक आरामदायक-सभ्रांत आवास में नहीं रहता, बल्कि उसे तो प्रत्यक्ष रूप से, सार्वजनिक तौर पर सामने आकर सामाजिक समस्याओं तथा उनके कथनानुसार देश में व्याप्त अन्याय का प्रतिकार करना चाहिये। एक्टिविस्ट लेखकों के साझा लक्ष्य इस प्रकार है -
;१द्ध भारतीय परम्परा, मूल्यों, संस्थाओं इत्यादि की प्रशंसा करना या पक्षट्टार होना उनके अनुसार साम्प्रदायिकता है। उनकी ट्टार्मनिरपेक्षता भी इसी से तय होती है। वे यह भी मानते हैं कि भारत की बहुसंख्यक आबादी ही साम्प्रदायिक हो सकती है।
तमाम सामाजिक बुराइयो यथा - स्त्रियों का दमन, जाति प्रथा, दहेज, पारस्परिक सम्बन्ट्टाों में अभाव इत्यादि सिर्फ हिन्दुओं में ही प्रचलित है तथा हिन्दुत्व अपनी उत्पा से ही शोषक ट्टार्म रहा है। यदि कोई उनका ट्टयान मुस्लिम आबादी में स्त्रियों के हालात की ओर दिलाता है, तब वे लोग बगलें झोकते हुए इतना ही कह पाते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय तथा उनके ट्टाार्मिक र्या कलापों के बारे में बात करना ही अपने आप में साम्प्रदायिक मानसिकता तथा कड्डरता को दर्शााता है।
;२द्ध वे लोग मुक्त व्यापार के कटु आलोचक हैं तथा सोवियत संघ में साम्यवादी अर्थव्यवस्था की विफलता एवं चीन के प्रशासन तंत्र की असलियत से ओखें मदे हुए हैं। इस ट्टाारा के लेखक अब भी भारत में ’समाजवादी प्रणाली के सुनहरे दिनों‘ के स्वप्न देखते हैं।
;३द्ध इनकी दृढ मान्यता है कि अमेरिका ही सारे विश्व में प्रचलित अन्याय तथा शोषण करने वाली ताकतों का नेतृत्व करता है। ये लोग भारत-चीन सम्बन्ट्टाों के सन्दर्भ में चीन के बारे में चुप्पी साट्टा लेते हैं।
;४द्ध ये लेखक तमाम चीजों/मुड्ढों को वाम तथा दक्षिणपंथ के नजरिये से देखते हैं और इस बात पर एकमत हैं कि दक्षिणपंथ सदैव गलत ही होता है तथा इसके विपरीत वामपंथ सदैव गुणवाापूर्ण, सही और नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित है। उनकी शब्दावली में दक्षिणपंथ को तिरस्कृत तथा निंदनीय शब्द ही माना जाता है। यदि कोई यह कहे या दावा करे कि वह न तो वामपंथी है और न ही दक्षिणपंथी, तब वे उसे तत्काल दंभी ठहराते हुए दक्षिणपंथी घोषित कर देंगे।
;५द्ध जब कभी भी नक्सली या माओवादी या जिहादी किस्म के आतंकी पुलिस द्वारा मुठभेड में मारे जाते हैं या गिरय्तार किये जाते हैं, तब ये एक्टिविस्ट लेखक मानवाट्टिाकारों की दुहाई देने लगते हैं या फिर पुलिस द्वारा की जाने वाली ज्यादतियों का हल्ला मचाने लगते हैं। शिक्षित बेजरोजगार युवाओं के अतिवादी संगठनों से जुडने के मुड्ढे पर सवाल उठाकर इस वर्ग के लेखक पुलिस या भारतीय सेना के मनोबल को कमजोर ही करते हैं।
;६द्ध एक्टिविस्ट लेखक किसी भी आंदोलन या सार्वजनिक अशांति/असंतोष के मुड्ढे को हथिया लेने में या उनके बहाने घुसपैठ करने में माहिर होते हैं। आग में घी डालने का काम ये बेहद कुशलता से करते हैं।
सरकारी अनुदान से संचालित शैक्षणिक, सांस्कृतिक तथा अकादमिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने में भी ये लोग सि=हस्त होते हैं तथा युवा लोगों को दिग्भ्रिमित करने में भी इनका कोई सानी नहीं है।
विचार, आदर्श तथा विचारट्टाारा के बीच जबरदस्त अंतर होता है। एक्टिविस्ट विचारट्टाारा से बेट्टो हुए होते हैं। सामान्यतया एक्टिविस्ट किसी एक विचारट्टाारा तथा उसके एक या अट्टिाक उपजीव्य कार्यर्मोंस में प्रतिब= होते हैं। ये लोग एक समूह बना लेते हैं। इस समूह से जुडे साहित्यिक लेखक को समस्त समूह में प्रचार-प्रसार तो प्राप्त होता ही है, अपितु उसे अपनी किताब की बिर्‍ी तथा प्रोत्साहक समीक्षाओं का भी काफी फायदा मिल जाता है। ये तमाम लाभ उठा लेने पर कोई भी प्रगतिशील लेखक अपनी मुख्य विचारट्टाारा से विमुख होने की कल्पना तक नहीं कर सकता। वह जानता है कि उसके समूह में हमारे बाहरी शत्रुओं की बजाय अन्दरूनी शत्रुओं के प्रति अट्टिाक घृणा तथा कटुता बरती जाती है। ऐसा करने पर कोई भी लेखक अपने रचनाकर्म से च्युत हुआ माना जाता है तथा उसका लेखन मृतप्रायः मान लिया जाता है। यही समूह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हल्ला मचाकर जमीन- आसमान एक कर देता है।
असली या मौलिक ;ळमदनपदमद्ध लेखक सभी पूर्वनिट्टाार्रित तथा पूर्वग्रहग्रस्त अवट्टाारणाओं तथा विचारों का अतिर्म ण करता है। असली कवि अपनी कल्पना के प्रवाह या उडान को स्वतंत्र रूप से उसकी अपनी मनचाही दिशा में जाने देने को तत्पर रहता है। इसे स्वतंत्र अन्वेषक की भोति होना चाहिये। किसी भी उपन्यासकार को रचना की परिस्थितियों, पात्रों के स्वभाव तथा बर्ताव, कहन या अनुभूतियों को उनके आंतरिक आलोक के अनुसार सम्भव करने की छूट देनी चाहिये। वस्तुतः उसे तो रचना के चरमोत्कर्ष पर पहचने से पहले अपने अभिप्रेत से अनजान ही रहना चाहिये। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि लेखक लिखने से पहले अपनी अन्तर्वस्तु/थीम के बारे में पूर्णतः अनजान ही रहता है, लेकिन इसका अर्थ इतना अवश्य है कि लेखक अपने पात्रों के औचित्य, अनौचित्य, सही या गलत होने के बारे में, उनकी मानसिकता के बारे में तथा परिस्थितियों के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं देता या उनके बारे में कोई पूर्वट्टाारणा स्थापित करके नहीं चलता। जैसे-जैसे कहानी या घटनार्मा का विकास होता है, वैसे-वैसे पता चलता जाता है कि उसके द्वारा कल्पित पात्र ठीक इसका उल्टा बर्ताव करते नजर आ सकते हैं या कि उसके विचारों के प्रतिकूल आचरण कर सकते हैं।
उसकी कहानी बिल्कुल नई हो सकती है, जिसका उसे पहले से कोई अंदाजा नहीं होता है, जब तक इस तरह की रहस्यलीला की र्या न्विति नहीं हो जाती, तब तक उसे सर्जनात्मक नहीं कहा जा सकता है।
सर्जन का अर्थ है - ऐसी किसी वस्तु का उद्भव/आविर्भाव जो इससे पूर्व कभी अस्तित्ववान नहीं रही, लेकिन एक एक्टिविस्ट लेखक को लिखने से पहले ही यह भली-भोति पता होता है कि वह क्या और क्यों लिखने वाला है। इतना ही नहीं, एक्टिविस्ट लेखक को समाज के समक्ष अपनी विचारट्टाारा को उद्घोषित करना पडता है तथा एक बार किसी विचारट्टाारा के प्रति अपनी प्रतिब=ता को घोषित करने के बाद, वह इससे विचलन नहीं कर सकता। वह लेखक तो पहले से ही प्रतिब= हैऋ समाज के सामने प्रतिब= तथा इस प्रतिब=ता को उसके साथी एक्टिविस्ट लेखक वर्ग का अनुमोदन प्राप्त होता है। वह यह मानता है कि कोई भी उद्यमी ;म्दजतमचतमदमनतद्ध शोषक ही होता है तथा प्रगति के लिए उचित व्यक्ति के उचित व्यवसाय में होने की अनिवार्यता अमानवीयता का ही पर्याय है। संक्षेप में एक्टिविस्ट को समूह-वैचारिकता पर निर्भर रहना पडता है। कोई भी असली/मौलिक लेखक व्यक्तिनिष्ठ अनुपात में उदारमना भी होना पडता है। कोई एक्टिविस्ट लेखक उदाा/उच्च अभिप्रेत के साथ रचना प्रवृा हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे वह अपने व्यावहारिक आंदोलन में गहराई तक उतरता जाता है, वैसे-वैसे वह अन्य लोगों के विचारों के प्रति असहिष्णु होता जाता है। खासकर के तब, जब समाज में अन्य विचारों की स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अट्टिाक होती है, तब उसकी इच्छा या मंशा उसकी बौ=कता पर हावी हो जाती है क्योंकि वह तमाम प्रयासों का आंदोलन में निवेश करता है। ;एक्टिविस्टों को राजनैतिक दलों से सम्ब= होने की अनिवार्यता हेाती है, जैसा कि बिहार विट्टाानसभा निर्वाचन से पूर्व पुरस्कार वापसी की मुहिम से स्पष्ट होता हैद्ध -
बधीनाथ में ’व्यासगुहा‘ नाम की एक गुफा है। ’स्थलपुराण‘ के अनुसार, ’महाभारत‘ के रचनाकार ने इसी गुफा में निवास करते हुए मानवता के इतिहास का महानतम महाकाव्य लिखा ;लिखवायाद्ध।
हमें पता नहीं कि यह एक मिथक मात्र है या ऐतिहासिक सत्य, जिसका मूल मकसद इस तीर्थस्थल की पवित्रता को बढाने का रहा हो। जो भी हो, यदि यह एक मिथक मात्र भी है तब भी, साहित्यिक लेखकों के लिए उसमें एक महान संदेश अन्तर्निहित है। महाभारत के इतिहास में व्यास भले ही एक सर्ये कारक अभिनेता न रहे हों, तब भी ट्टाृतराष्टत्र्, पाण्डु तथा विदुर के जन्म के मूल कारक नियोग में तो अवश्य प्रतिभागी रहे थे। अर्थात् वे प्रतिभागी थे और महाभारत के मूल घटनार्मू तथा र्या कलापों के रंगमंच के समीप ही रहे थे तथा उन्हें प्रत्येक घटनार्मल की पूर्ण जानकारी रहती थी। लेकिन इसे बैठकर लिखने ;या लिखवानेद्ध के लिये वेदव्यास को सौ बरस से अट्टिाक की आयु में दस हजार फीट की ेचाई की क्या आवश्यकता थी? इस मिथक का गहरा अर्थ है और वह यह कि वेदव्यास के पास विपुल मात्रा में कच्ची लेखन सामग्री मौजूद थी, जिसका स्रोत मैदानी क्षेत्र ;या कि निचला इलाकाद्ध था और व्यास इस तमाम घटनार्म, तथा इसके सहभागियों के अत्यन्त समीप रहे थे। वे हिमालय की ेचाई तक जा पहचे ताकि वहो से वे समग्र कथा को तटस्थता से, सहानुभूति ;सक्तदयताद्ध के साथ देख-परख सकें तथा दुष्ट चरित्रों की मानसिकता को भी समझ सकें और साथ ही साथ सर्जन प्रर्याद के दौरान जीवन के रहस्यात्मक दर्शन को प्रकट कर सकें।
कोई भी लेखक, जो इस मिथक के सम्पूर्ण अर्थ को समझने में असफल रहता है, वह व्यास गुहा की चढाई एकाट्टा फुट भी नहीं चढ सकता।
;सौजन्य ः साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव के अवसर पर दिया गया सम्वत्सर व्याख्यान-२०१८द्ध