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राष्ट्रीबोध, संस्कृति और साहित्य के अन्तर्सम्बन्धों पर विचार करते हुए

इन्दुशेखर तत्पुरुष
राष्टत्र् और संस्कृति पर विचार करते हुए हमें सर्वप्रथम यह बात समझ लेनी चाहिए कि विगत तीन शताब्दियों में निर्मित आधुनिक पश्चिमी राष्टत्र्वाद की अवधारणा और भारत में हजारों वषोङ से चला आ रहा राष्टत्र्बोध एक ही वस्तु नहीं हैझ यही कारण है कि यहो आट्टाुनिक राष्टत्र्वाद के समान्तर भारतीय राष्टत्रीयता की भावना को ‘राष्टत्र्वाद’ न कहकर ‘राष्टत्र्बोध’ कहा जा रहा हैझ ये दोनों संज्ञाऐ राष्टत्रीयता के दो भिन्न स्वरूपों को प्रतिपादित करती हैंझ अपने देश के प्रति उत्कट अनुराग की भावना यद्यपि दोनों तरह की राष्टत्रीयताओं में उभयनिष्ठ हैं, किन्तु इनके मूलाधार, प्रर्याध और परिणाम अलग-अलग हैं, जिनकी विस्तृत और स्पष्ट विवेचना की जानी आवश्यक हैझ इसीलिए जहो अनेक विचारकों ने आधुनिक राष्टत्र्वाद को विश्वशांति के लिए बाधक माना है, वहीं उससे उलट भारतीय राष्टत्र्बोट्टा को वैश्विकता और विश्वबंधुत्व के पोषक के रूप में देखा गया हैझ रवीन्ध्नाथ टैगोर ने अपने जापान और अमेरिका प्रवास के समय वहो दिए गए व्याख्यानों में राष्टत्र्वाद की भर्त्सना करते हुए इसे अन्तर्राष्टत्रीयता का विरोधी बताया है तो दूसरी ओर महात्मा गोधी भारतीय राष्टत्रीयता और पश्चिमी राष्टत्रीयता के अन्तर को दृष्टि में रखते हुए ‘यंग इंडिया’ ;17.9.1925द्ध में लिखते हैं - ‘‘राष्टत्र्वाद बुरी चीज नहीं है, बुरी है संकुचित वृा, स्वार्थपरता और एकांतिकता, जो आधुनिक राष्टत्रें के विनाश के लिए उारदायी हैझ इसमें से प्रत्येक राष्टत्र् दूसरे की कीमत पर, उसे नष्ट करके, उन्नति करना चाहता हैझ भारतीय राष्टत्र्वाद ने एक भिन्न मार्ग चुनाझ यह समूची मानवता के हित तथा उसकी सेवा के लिए स्वयं को संगठित करना यानी पूर्ण आत्माभिव्यक्ति की स्थिति को प्रकट करना चाहता है’’ ;महात्मा गोट्टाी के विचार ः आर.के. प्रभु एवं यू.एस. राव, पृ. 421द्धझ स्पष्ट है कि यहो गोधी जी - ‘‘भारतीय राष्टत्र्वाद ने एक भिन्न मार्ग चुना’’, यह कहकर इसे आधुनिक राष्टत्र्वाद से भिन्न मानते हैंझ पश्चिमी राष्टत्र्वाद की आधुनिक परिभाषा के अनुसार यह ‘इण्डिया दैट इज भारत’ गौरांग महाप्रभुओं के आगमन से पहले एक राष्टत्र्रूप नहीं था तो वह कौनसी प्रेरणा थी जो हजारों मील के अन्दर को पाट कर एक सी मान्यताओं, संस्कारों व संस्कृति को पोषित करती आयी? वह कौनसी परम्परा थी जिसने एक हजार वर्ष पूर्व शंकराचार्य को यह प्रेरणा दी कि जिस भूखण्ड को वे एकसूत्रित करने जा रहे थे उसके सुदूर उार में बधीनाथ और दक्षिण सीमा पर रामेश्वर हैझ पश्चिम के छोर पर द्वारिका और पूर्व में जगन्नाथपुरी हैझ राज्य तो तब भी इस चतुष्कोण में अनेकानेक ही थेझ आवागमन की साधनशून्यता और जिस पर वह पदयात्री परिव्राजकझ यह किसने निर्देशित किया था कि जो मंत्र कच्छ में बोले जायेंगे वे ही कलिंग में भी बोले जायेंगे? रात को किसी वृक्ष की पायों को तोडना यदि बंगाल में अपराध माना जाता है तो पंजाब व केरल में भी वह अपराध ही माना जाता हैझ उमडती नदियों, उगते सूरज और गरजते महासिंधु को देखकर अहोभाव और कृतज्ञता से नतमस्तक हो जाने का जैसा मन गुजरात में होता है, वैसा ही उडीसा या तमिलनाडु में भी होता हैझ जल से भरा हुआ कुंभ, नारियल, हल्दी और अक्षत यदि राजस्थान में मगलिक माने जाते हैं तो उडीसा में भी इसी तरह मांगलिक माने जाते हैंझ इन प्रश्नों पर विचार करें तो यह ध्यान में आता है कि यह आधार किसी राजतंत्र या दण्ड विधान या व्यावसायिक तंत्र के कारण नहीं थाझ यह आमूलतः संस्कृति द्वारा निर्मित था जो अनेक स्वतंत्र, अपितु परस्पर सं/ार्षरत राजसााओं के होने पर भी पूरे भू-खण्ड को एकसूत्र में बोधे हुए थाझ इस प्रकार यह भारतीय राष्टत्र्बोध एक भू-जन-सांस्कृतिक इकाई है, जबकि आधुनिक राष्टत्र्वाद भू-जन-राजनैतिक इकाई हैझ राजनैतिक साा के स्थान पर सांस्कृतिक साा को आधार मानने को ही भारतीय राष्टत्रीयता की संज्ञा देते हैंझ हमने इसे राष्टत्र्वाद के स्थान पर राष्टत्र्बोट्टा कहना उचित समझा है, क्योंकि एक परम्परा, एक इतिहास बोध और एक समन्वयी संस्कृति पर आट्टाारित यह राष्टत्रीय भावना कोई ‘वाद’ नहीं हैझ इसका कोई प्रतिवाद भी नहीं होताझ यह भावना वादातीत होती हैझ अतः इसे राष्टत्र्वाद कहकर किसी वाद के सोचे में डालना इसे बहुत छोटा करके देखना हैझ
विडम्बना ही है कि इस सम्पूर्ण भू-भाग में जिसे भारतवर्ष कहा गया, पूर्व काल में पचासों स्वाया राज्य अस्तित्व में रहे, वे आपस में सं/ार्षरत भी रहते थे, किन्तु राष्टत्रीय एकत्वबोध अखण्ड और अक्षुण्ण रहाझ जबकि आज उसी भू-खण्ड पर पोच-सात पूर्ण सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य हैं, किन्तु सबकी राष्टत्रीयता पृथक-पृथक हैझ राष्टत्र्-राज्य ;नेशन स्टेटद्ध की अवधारणा ने भारतवर्ष की चिरकालीन सांस्कृतिक अखण्डता को छिन्न-भिन्न कर दियाझ
जब यह कहा जाता है कि भू-जन-सांस्कृतिक इकाई है तो इसका अभिप्राय यह है कि राष्टत्र् के अस्तित्व के लिए एक निश्चित भूखण्ड, परम्परागत जनसमुदाय और एक संस्कृति चाहिएझ न तो जन एवं संस्कृतिविहीन धरती का टुकडा राष्टत्र् कहला सकता है और न भू और संस्कृतिविहीन जनसमुदाय भीझ यह एक भीड तो हो सकती है, किन्तु राष्टत्र् कहलाने की अधिकारी नहींझ इसी तरह संस्कृतिविहीन भू और जन भी राष्टत्र् नहीं माने जा सकते हैंझ एक निश्चित भू-भाग में रहने वाले लोग जब उस भौगोलिक परिवेश के प्रति सहज रागात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं और इन सम्बन्ट्टाों के तार पीढी-दर-पीढी हस्तान्तरित होते रहते हैं तो इनकी रागात्मक प्रगाढता बढ जाती हैझ जनसमुदाय के सामूहिक अवचेतन के निर्माण में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती हैझ समूचा भौतिक परिवेश लोकजीवन का स्वाभाविक और अविभाज्य हिस्सा बन जाता हैझ उस भू-भाग पर बहने वाली नदियो उस जनसमुदाय को संसार की सबसे पवित्र, सर्वाधिक पुण्यसलिला लगने लगती हैंझ पर्वतों की बर्फीली चोटियो भी जीवन में जिार् का अक्षय स्रोत बन जाती हैंझ दुर्गम गिरिशिखर विश्वभर का किरीट लगने लगते हझ बंजर, बिड-खाबड पठारों में गीतों की कोपलें फूटती नजर आती हैंझ कडवे पानी से भरे महासागर क्षीरसागर की उपमा पा जाते हैंझ अपने समुदाय के ऐतिहासिक चरित्रों के सम्मुख विश्व के महामानव भी फीके लगते हैंझ इन समूचे भावों का स्पन्दन भू-लोक के प्रति जिस एकात्मता का निर्माण करते हैं, उसे चीन्हे बिना राष्टत्र् की सच्ची परिकल्पना नहीं हो सकतीझ
किन्तु पिछली दो-तीन सदियों से ही राज्य निर्धारित सीमाओं में बेधे हुए देश, भू-भाग को राष्टत्र् का पर्याय समझा जाने लगाझ नेशन-स्टेट की इस अर्वाचीन ट्टाारणा ने सांस्कृतिक एकात्मता को विस्थापित कर उसकी जगह राजनैतिक एकात्मता को प्रतिष्ठाापित कर दियाझ विश्व मानचित्र पर पश्चिमी देशों का प्रभुत्व बढने पर साम्राज्यवादी और तानाशाही प्रवृायो नेतृत्व करने लगींझ हर शक्तिशाली देश दूसरे देशों को हडपने और अपनी सीमाओं को बढाने की आपाधापी में लगाझ इस प्रकार राज्य का निर्णय किया सैन्यबल ने और राष्टत्र् की छतरी टिकी संगीनों परझ संगीनों के दबाव के अनुरूप ही यह छतनी फैलने और सिकुडने लगी और इसी के साथ राष्टत्रें के कृत्रिम विभाजन और विलय जैसी विकृत अवधारणाओं का जन्म हुआझ
मानवीय विकास की दृष्टि से यद्यपि राजनैतिक एकात्मता कोई बुरी चीज नहीं है, अपितु राज्य के सुखमय जीवन निर्वाह हेतु बहुत से कार्य इस राजनैतिक एकात्मता से ही सधते हैं, किन्तु इसके प्रबल और ऐकांतिक आग्रह के कारण जब सांस्कृतिक बोध क्षतिग्रस्त हो जाता है तो यह राजनीति केन्धीयता ही वैश्विक शांति और सम्पूर्ण मानवता के लिए खतरा बन जाती हैझ
जैसा कि इस लेख के आरम्भ म कहा गया है, आट्टाुनिक राष्टत्र्वाद से अलग भारतीय राष्टत्र्बोध सम्पूर्ण मानवता के अभ्युदय और विश्वबंधुता का पथ प्रशस्त करता है तथा इसका संस्कृति से गहरा नाता है, तो इसकी मीमांसा की जानी चाहिएझ उन विशेषताओं को देखा- परखा जाना चाहिए जो इसे वरेण्य और आदर्श बनाती हैं और यह प्रतिपादित करती हैं कि सं/ार्ष के दावानल में झुलसते आज के विश्व के लिए यह बोध शीतल हवा के स्पर्श जैसा जीवनदायी हैझ
आज सारे संसार की विडम्बना यह है कि हम किसी न किसी वाद या पंथ या दल या गुट या खेमे के झंडाबरदार बनकर टुकडों में सोचते हैं, टुकडों में जीते हैंझ विखण्डित एवं वि*ांृखलित रूपों से साक्षात्कार हमारी नियति हैझ हम व्यक्ति होकर सोचते हैं तो समाज को विरोधी मानते हैं, समाज होकर सोचते हैं तो प्रकृति को विरोधी मानते हैंझ राष्टत्रीय होकर सोचते हैं तो अन्तर्राष्टत्रीयता को विरोधी मानते हैंझ पुरुष होकर सोचते हैं तो स्त्री को विरोधी मानते हैंझ हिन्दु होकर सोचते हैं तो मुसलमान को विरोधी मानते हैंझ वामपंथी होकर सोचते हैं तो दक्षिणपंथी को विरोधी मानते हैंझ भोग को सोचते हैं तो त्याग को विरोधी मानते हैंझ इन द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों में भी परस्पर न केवल विरोधी मानते हैं अपितु विरोधी का अस्तित्व मिट जाए, ऐसा प्रयत्न भी करते हैंझ मानो समूचा विश्व /ान/ाोर विरोट्टाी तवों का समुच्चय हो, परस्पर सं/ार्षरत एक सर्व/ााती रणस्थली होझ वस्तुतः यह सोच अभारतीय सोच हैझ भारतीय चिन्तन इन समस्त द्वन्द्वों को समग्रता के ट्टारातल पर लाकर परस्पर संवादी-सहगामी बना देता हैझ वह भारतीयता ही है जो विभिन्न दिशाओं को जाने वाली परस्पर परा*्मुखी त्रिज्याओं को एक विस्तीर्ण परिधि के आंचल में समेट लेती है और सत्य के सार्वभौमिक स्वरूप का दर्शन कराती हैझ ऐसा नहीं कि सं/ार्ष का कोई मूल्य नहीं हैझ सं/ार्ष का मूल्य अवश्य ही महवपूर्ण है, किन्तु भारतीय मनीषा ने सं/ार्ष के स्थान पर मंथन की कल्पना प्रस्तुत की ओर कहा कि ‘निर्मन्थध्वमतन्ध्तिाःझ’ निरन्मतर मथते रहेंझ आलस्य त्याग कर, बिना रुके मथते रहेंझ सत्य ही है कि नवनीत प्राप्त करने के लिए बहुत धैर्यपूर्वक निरन्तर मंथन करना पडता हैझ यह मंथन की प्रर्याे सत्य को समग्र रूप से उद्/ााटित करती हैझ दक्षिणावर्त- वामावर्त के र्मप अन्तरालों से चलती हुई, कहीं कुछ छूट न जाए इस ध्येय से मथनी सम्पूर्ण माध्यम को आलोडित-विलोडित करती चलती हैझ तभी जाकर नवनीत निकल कर आता हैझ इस दृष्टि से समुध् मंथन का पौराणिक आख्यान एक खास दृष्टिबोट्टा प्रदान करता हैझ एक ओर देव, एक ओर दानवझ भिन्न आचार, भिन्न विचार - मानो दो विपरीत ध्रुव होंझ कहो अतल, निस्सीम सिन्धु और कहो धरा गगन को एक करता विराट मन्दराचलझ कहो कर्मपृष्ठ और कहो नागराज वासुकिझ किन्तु सम्पूर्ण सत्य का अमृत प्राप्त करने के लिए सारी सााओं को एक परिधि में समायोजित होना पडता हैझ ऐसा नहीं कि इस आयोजन में सं/ार्ष नहीं हैझ वासुकि के फेनोद्गम सं/ार्ष की लपटें ही हैं जो दानवों पर टूट पडती हैंझ /ाोर हलाहल उस सं/ार्ष की ज्वाला ही तो है, जो चराचर को थरथरा देती हैझ जिसकी आहुति के लिए किसी शिव को आगे आना पडता हैझ अतः सं/ार्ष है भी तो मंथन की प्रर्याा के अंगभूत ही है, लेकिन इससे मंथन र्म अवरु= नहीं होता, जारी रहता हैझ तब कहीं जाकर अमृतोपलब्धि होती हैझ
महवपूर्ण प्रश्न है कि इस अमृत के उपभोग के अट्टिाकारी कौन होते हैं? यहो एक बार फिर हमें भारतीय जीवन मूल्यों की झोकी दिखाई पडती हैझ देवों और दानवों में जो मूलभूत अन्तर है, वह हमें एक अन्य आख्यायिका के माध्यम से ज्ञात होता हैझ एक प्रसि= /ाटना के अनुसार दोनों अलग-अलग समूहों में भोजन पर नियन्त्रित होते हैंझ पंगत में बैठाकर इनके हाथ इस प्रकार बोध दिए जाते हैं कि हाथ मुड नहीं पायें और भोजन परोस दिया जाता हैझ असुरगण ग्रास लेकर खाने को उद्यत होते हैं तो कोहनी मुड नहीं पाती और हाथ का ग्रास सिर के पिर पहच जाता है, किन्तु मह में नहीं जा पाताझ बहुत प्रयत्न करने पर भी दानवगण भूखे ही रह जाते हैं और सारा भोजन इधर-उधर बिखर जाता हैझ दूसरी ओर देवगण इस विषम परिस्थिति में एक युक्तिपूर्वक राह निकालते हैंझ अपना हाथ स्वयं के मह पर न सही, दूसरे साथी के मह में तो जा ही सकता है, यह सोच कर वे एक-दूसरे को भोजन कराते हुए प्रसन्नता से अपना पेट भर लेते हैंझ परस्पर पूरकता और समन्वय की भावना के बिना ऐसी युक्ति सूझ ही नहीं सकती थीझ
केवल ‘स्व’ का ख्याल ही जिनके चिा में आता है, वे दानव खाद्यों को इधर-उधर तो बिखेर देते हैं, किन्तु अपना पेट नहीं भर पातेझ जबकि ‘परस्परं भावयन्तः’ के विश्वासी देव तृप्त हो जाते हैंझ देवों और दानवों के इस मूलभूत अन्तर के आधार पर हम अपनी बात आगे बढाऐ तो देखते हैं कि इस अमृत के अधिकारी वे होते हैं जो ‘अयं निजः परो वेति गणना ल/ाुचेतसाम्’ में आस्था रखते हैंझ इस अमृत के अधिकारी वे होते हैं जो ‘तवमसि’ की भावना के बिना ‘अहं ब्र*ास्मि’ के उद्/ाोष को अधूरा व वागाडम्बर मात्र मानते हैंझ इस अमृत के अधिकारी वे होते हैं, जो यह विश्वास रखते हैं कि सारी सृष्टि सह-अस्तित्व पर ही टिकी हुई हैझ अन्ततोगत्वा यह अमृत उन देवों को प्राप्त होता है, जो अपने सम्मुख बैठे बन्धुओं को ही भोज्यार्पण कर संतुष्ट हो लेना जानते हैंझ जिनके चिा में दूसरों के भी पोषण की कल्पना नहीं आती, वे दानव अमृत से वंचित रह जाते हैंझ समुध् मंथन के इस सम्पूर्ण आख्यान म जो विचार छुपा है वह भारतीय जीवन दर्शन को बडे कौशल के साथ प्रतिबिम्बित कर देता हैझ
भारतीय मनीषा ने यह माना कि ‘सवङ खल्विदं ब्र*’ के अनुसार सभी में एक परमव्यापक तव विद्यमान हैझ यह सारा चराचर जगत ईश्वर का अंश हैझ जिस प्रकार विभिन्न अंगोपांग देह के अविभाज्य /ाटक हैं, उसी प्रकार यह विश्व भी एकात्मक हैझ व्यक्ति-व्यक्ति, व्यक्ति और समाज, समाज और प्रकृति, प्रकृति और परमेश्वर एक दूसरे में अनुस्यूत हैं, गुंथे हुए हैंझ यह सस्यश्यामला धरती हमारी मो हैऋ ये नदियो जीवनदात्री जननी हैं, ये पर्वत हमारे पोषक हैं, ये वृक्ष हमारे पालनहार हैं ये सब हमारे अपने हैं, ये सभी ‘ईशावास्य’ हैंझ इनमें परस्पर सं/ार्ष होना अथवा अनुभव करना वैकारिक अवस्था हैझ थोडा और आगे विचार करें तो जीवन सं/ार्ष के फलस्वरूप ‘योग्यतम के अस्तित्व’ ;ैनतअपअंस व जीम पिजजमेजद्ध का विचार भी भारतीय मनीषा गर्हित मानती हैझ यह पाशविक व्यवस्था है जो ‘मात्स्य न्याय’ के नाम से सम्बोधित हुई हैझ आत्मरक्षा के लिए आत्मपोषण में प्रवृा होना जीवमात्र की प्रकृति है और स्वयं के पोषण के लिए दूसरों का अंश छीनना विकृति है, किन्तु आत्मपोषण के साथ आत्मेतर-अन्य के पोषण का भी प्रयत्न करना, यह संस्कृति हैझ
भारतीय मान्यता रही है - निर्बल का यत्नपूर्वक संरक्षणझ यह सक्षम का उारदायित्व है कि वह अक्षम की रक्षा करेझ सम्पन्न का दायित्व है कि वह विपन्न का पोषण करेझ योग्यजन का उारदायित्व है कि वे अयोग्य को साथ लेकर चलेंझ अयोग्य का बहिष्कार नहीं संस्कार हो - यह समाज के योग्यजन की जिम्मेदारी हैझ किसी एक प्रकार के एक ही प्रकृति-प्रवृति वाले लोगों का वर्ग समाज नहीं होताझ ज्ञानी-अज्ञानी, बलवान-निर्बल, सम्पन्न-विपन्न, गोरे-काले, देव-दानव सभी के समुच्चय को समाज कहते हैंझ जो ज्ञानीजन हैं, वे अपने से अल्पज्ञ का बहिष्कार न करेंझ अज्ञानियों के विरु= मोर्चा बनाने के स्थान पर उन्हें ज्ञानवान बनाने का उारदायित्व लेंझ शक्तिशाली, निर्बल का तिरस्कार न कर उनकी रक्षा का दायित्व लेंझ धनिक लोग निर्धन को दान देकर उसे भी समाज में रहने की आश्वस्ति प्रदान करेंझ भारतीय शास्त्रों में दान की महाा इसी विचार की ओर इंगित करती हैझ एक प्रसि= संस्कृत सुभाषित से इस भारतीय दृष्टिकोण को समझा जा सकता हैझ जिसमें कहा गया है कि, ‘‘दुर्जन की विद्या विवाद के लिए, धन /ामण्ड के लिए और शक्ति परपीडन के लिए होती है, जबकि, सज्जन की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति रक्षा के लिए होती हैझ सज्जन और दुर्जन व्यक्ति में यही अंतर होता हैझ’’ सं/ार्ष, वर्गवाद और द्वन्द्वात्मक दृष्टिकोण की परिणति जहां विवाद, मद और पर उत्पीडन में होती है वहीं भारतवर्ष का एकात्म चिन्तन ज्ञान, त्याग और रक्षण को वरेण्य मानता हैझ यही सज्जन-पथ हैझ
भारतीयता को पहचानने, समझने के लिए एक और महवपूर्ण पक्ष पर विचार करना आवश्यक है और वह है आस्तिकताझ इस आस्तिकता से भारतीय संस्कृति को भलीभोति समझा जा सकता हैझ यहो आस्तिकता का अभिप्राय किसी शास्त्रीय अथवा सम्प्रदायपरक परिभाषा से नहीं, अपितु संसार को रचने वाली किसी सर्वोच्च अलौकिक साा में विश्वास करने से हैझ ऐसा नहीं है कि आस्तिकता की भावना भारत में ही विद्यमान है विश्व में अन्यत्र नहींझ परन्तु आस्तिकता का जो रूप भारत में है, वह अनन्य हैझ अन्यत्र जहो जहो भी आस्तिकता की भावना है, वह जीवन का आवश्यक अंग होते हुए भी एक पृथक विभाग के रूप में हैझ भारत की तरह सम्पूर्ण जीवन व्यवहार के पोर-पोर में रमी हुई नहीं हैझ जीवन में सवाङग समाविष्ट नहीं हैझ अन्यत्र जो आस्तिकता है वह एक पूजालय, एक ग्रंथ, एक ईश्वरीय प्रतिनिधि द्वारा निर्धारित होती है और जीवन में कुछ विधि-निषेधों का सम्पादन करती हुई, जीवन के एक अलग प्रकोष्ठ में समाविष्ट हुई रहती हैझ इसकी आवाजाही रोजमर्रा जन्दगी के अन्य कक्षों में कम ही रहती है, किन्तु ‘सवङ खल्विदं ब्र*’ और ‘हरि व्यापक सर्वत्र समाना’ के रूप में आस्थावान भारत की आस्तिकता का अटूट अजस्र स्रोत मिड्डी के कण-कण और जीवन के क्षण-क्षण में फूट पडाझ कैलास के उाुंग शिखरों से लेकर सिन्धु के गहन तल तक, कंकडों, शिलाखण्डों से लेकर माटी ढेलों तक, वट-अश्वत्थ-बिल्ब पत्रों से लेकर तुलसी के बिरवों तक, आक-धतूरा-पूग-नारिकेलों से लेकर इंदीवर-कदंबों तक, हरी-हरी दूब, हल्दी, अक्षत और गेह की बालियों तक, चबूतरों, चतुष्पथों, स्थानकों तक, धरती से लेकर आकाश तक - निर्विकार परम् ब्र* परमात्मा कहीं शिव, कहीं शक्ति, कहीं सौभाग्य, कहीं सौंदर्य, कहीं शुचिता का रूप रखकर रम गयाझ यही नहीं भारत में विज्ञान, ज्योतिष, चिकित्सा शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि समूची विद्याऐ, कलाऐ और विज्ञान इसी आस्तिकता की छत्रछाया में पले-बढेझ यह बहुत विलक्षण बात थीझ संसारभर में ऐसा कहीं नहीं हुआझ ऐसे बहुत उदाहरण दुनिया में मिल जाऐगे कि किसी वैज्ञानिक, किसी चिकित्सा शास्त्री या किसी गणितज्ञ के विरु= आस्तिकता के पुरोधाओं ने मौत के फतवे-फरमान जारी कर दिएझ किन्तु पूर्णतः विट्टोयात्मक मूल्यों पर आधारित एवं रचनात्मक मूल्यों से संवलित भारतीय आस्तिकता ने इन सभी क्षेत्रों को पोषित, पुष्पित और पल्लवित कियाझ
भारतीय चिंतन में भौतिक व आध्यात्मिक, भोग व त्याग, व्यक्तिवाद व समाजवाद, राष्टत्रीय व वैश्विक, जड व चेतन, माया व ब्र* सभी द्वन्द्वों को परस्पर पूरक मानते हुए इन्हें साथ-साथ समायोजित करते रहने पर निरन्तर बल दिया गयाझ पुरुषाथोङ में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की गणना इस समतुलित समायोजन का पुष्ट प्रमाण हैझ यह एक महज संयोग नहीं है कि ‘‘एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति’’ की मान्यता के समानान्तर ही श्रमण परम्परा के जैनाचायोङ ने स्याद्वाद जैसे व्यापक दृष्टि वाले सि=ान्त की स्थापना कीझ निश्चय ही इसके पीछे समग्र देश की वैश्विक मनीषा कार्यरत थी और यही नहीं हमारे आट्टयात्मिक चिंतन की धुरी जिस पर टिकी हुई है, वह भगवद् गीता पुनः-पुनः एक बात दोहराती हैझ वह है - ‘समत्व’झ समत्व ही योग हैझ विवेकी उन्हीं को कहते हैं, जो द्वन्द्वों में भी समदृष्टि रखता हैझ
समीकृत रूप में कहें तो यह समत्व ही भारतीयता का मूलमंत्र हैझ यह समत्व ही है जो कपाली, भूतेश्वर, श्मशानवासी औ/ाडनाथ शिव को त्रैलोक्यमोहिनी, आनन्दपूर्णा, अन्नपूर्णा, वात्सल्यमयी जगदम्बा से जोड देता हैझ यही वह समत्व है जो आदर्श नरपुंगव चैत के उजले दिन की भरी दोपहर में प्रकटने वाले श्री राम को षोडशकलानिधान, लीलाविहारी, मे/ााच्छन्न /ानान्ट्टाकारमयी अर्धरात्री में जन्मने वाला कान्हा बना देता हैझ निवृा में प्रवृा को, सृष्टि में समष्टि को, समष्टि में व्यष्टि को गथ कर उदाा बना देता हैझ बाहर से विपरीत और विमुख दिखाई पडने वाले तव ज्यों-ज्यों गहराई में उतरते हैं, एकाकार होते जाते हैंझ ऐसा लगने लगता है मानो एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं हैझ यही समग्रता, यही वैश्विकता, यही सम्पूरकता, यही समत्व भारतीयता हैझ
आज सारी दुनिया विस्मित-चकित है कि भाषा, भूगोल, वर्ण, जाति, सम्प्रदाय आदि की इतनी विविधता में बेटा यह महादेश एक राष्टत्र् क्यों कर बना हुआ है? यह बेटता-बिखरता क्यों नहीं? यूरोप और अरब देशों में भाषाओं, राजसंस्थाओं, भौगोलिक स्थितियों, सम्प्रदायों, गुटबंदियों आदि के पार्थक्य को आधार बनाकर छोटी-छोटी अस्मिताऐ राष्टत्र् के रूप में खडी हुई हैझ ऐतिहासिक /ाटनाचर्‍ों से बना सोवियत रूस टुकडे-टुकडे होकर स्वतंत्र राष्टत्रें में बेट गया, किन्तु इस महादेश की एकात्मकता अक्षुण्ण है इसका क्या रहस्य है? मूल प्रश्न यही है कि यह भिन्नताओं के सामंजस्य और विविधताओं के सामरस्य का पाठ भारत के लोकमानस में इतनी गहराई तक कैसे पैठ गया? जीवनादशोङ की वह कौन-सी कीमियागिरी थी, जिसने विरु=ों के सहअस्तित्व का बीजमंत्र भारत को इसके शैशवकाल में ही /ाुड्डी की तरह चटा दिया
यह अद्भुत कार्य किया भारत के कवियों और मनीषियों नेझ भारतीय आत्मा से साक्षात्कार करने और लोकमानस में डुबकियो लगाने वाले साहित्यकारों ने समय-समय पर इस सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूत कियाझ उन्होंने अपनी रचनाओं में जिन कथानकों, बिम्बों, प्रतीकों और कल्पनाओं द्वारा राष्टत्र् के आदर्श चरित्रों को गढा, वह भारतीयता की अमिट पहचान बन गयेझ इन गीतों को गा-गा कर बाहरी आ/ाातों और आन्तरिक वि/ाटन के दौर में राष्टत्रीय चेतना को जाग्रत करते हुए मूल्य संर्मअण की विषम परिस्थितियों से मुकाबला कियाझ
आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण यों ही हमारा राष्टत्रीय महाकाव्य नहीं हैझ हमारी सांस्कृतिक पहचान के सूत्रों को आदिकवि किस महीनता और मजबूती के साथ गढते हैं, यह देखने योग्य हैझ हम देखें कि किस तरह उन्होंने अपने महाकाव्य के माध्यम से भारत के इस सांस्कृतिक चरित्र को गढा हैझ उनके काव्य नायक राम अत्यन्त धैर्यवान, क्षमाशील, सौम्य और धीर-गंभीर हैझ इसके विपरीत उनके अनुज लक्ष्मण अधीर, उग्र और आर्‍ामक स्वभाव के हैंझ बात-बात में आवेश में आकर उबल पडना उनकी प्रकृति हैझ राम जहो विषम से विषम परिस्थिति में भी संयमित रहते हैं, /ाोर प्रतिकूलता के बीच में भी अविचलित रहते हैं, वहीं लक्ष्मण का हाथ सीधा तरकश की ओर जा पहचता हैझ उधर भरत का स्वभाव राम के जैसा है तो शत्रु/न का स्वभाव लक्ष्मण के जैसाझ सहज बु= यह कहती है कि इन चारों भाइयों में उचित जोडी समान स्वभाव वाले राम-भरत की और लक्ष्मण-शत्रु/न की होनी चाहिए थीझ किन्तु यह इस महाकवि की सर्जनात्मक उद्भावना का चमत्कार है कि वह राम का सर्वाधिक प्रिय सहचर लक्ष्मण को और भरत का प्रिय सहचर शत्रु/न को बनाती हैझ मानो यह संदेश देती है कि भिन्न विचार, भिन्न मत और भिन्न स्वभाव होने पर भी दो व्यक्ति अत्यधिक प्रेम और विश्वास के साथ रह सकते हैं, यदि उनके लक्ष्य एक हो, उनके जीवन का ध्येय एक होझ धर्म की संस्थापना और आततायी असुरों का उन्मूलन जिनके जीवन का ऐकान्तिक ध्येय था, ऐसे राम और लक्ष्मण भिन्न स्वभाव के होकर भी भाइयों के पारस्परिक प्रेम की पराकाष्ठा बनते हैंझ रामकथा को लेकर शताब्दियों से हजारों काव्य लिखे गये होंगेझ जब तक इस संसार में मनुष्य का वास रहेगा, राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रु/न की अमर जोडी इस विरु=ों के सहअस्तित्व, भिन्नताओं के सामंजस्य और विविधताओं के सामरस्य के संस्कार को सुदृढ करती रहेगीझ
इसी तरह मध्यकाल में हम देखते हैं कि अरब आर्म णकारी एक राजनैतिक साा के रूप में आये, किन्तु भारत की अपराजेय संस्कृति चड्डान की तरह टिकी रहीझ इस प्रतिरोध की शक्ति और साहस भी साहित्य ने ही जुटाया थाझ कबीर, तुलसी, सूरदास, रैदास, नानकदेव, मीरो जैसे भक्त कवियों का ही प्रभाव था, जिसने कि राजनैतिक या सामाजिक दृष्टि से पददलित समाज की आस्था को डिगने नहीं दियाझ भारत का सारा भक्ति साहित्य विदेशी आर्मसणकारियों से मूच्र्छित हुए भारतीय प्राणों के लिए संजीवनी की तरह जीवनदायी सि= हुआझ
इधर स्वतंत्रता आन्दोलन के कालखण्ड पर हम दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि कवियों, लेखकों ने अपनी पूरी जिार् सांस्कृतिक चेतना और राष्टत्र्बोध जाग्रत करने में लगा दीझ भारतेन्दु हरिश्चन्ध्, बंकिमचन्ध् चटर्जी, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, जशंकर प्रसाद, निराला जैसे कवियों की कृतियो इतनी सुपरिचित और चर्चित हैं कि उनके बारे में कुछ अट्टिाक कहने की आवश्यकता नहीं हैझ ‘भारत भारती’, ‘कामायनी’, ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’ जैसी कालजयी कृतियों की जितनी चर्चा की जाय कम
वर्तमान में अपनी दृष्टि केन्ध्ति करें तो हम पायेंगे कि वैचारिक दुराग्रहों और पश्चिमपरस्ती से मुक्त साहित्य आज भी भारत की मूलचेतना और संस्कृति के सूत्रों को सुदृढ करने का धर्म निभा रहा हैझ हर विधा में ऐसी महवपूर्ण कृतियो रची जा रही हैं जो भारतीय चिा को उद्/ााटित करती हुई हमारे संस्कृति बोध को पुष्ट और परिमार्जित करती हैं, चाहे वह ज्ञानेन्ध्पति का कविता संग्रह ‘गंगातट’ हो, भैरप्पा का उपन्यास ‘आवरण’ हो, रमेशचन्ध् शाह का उपन्यास ‘विनायक’ हो, देवेन्ध् दीपक का नाटक ‘कोवर श्रवण कुमार की’ हो अथवा ऐसी अनेकानेक कृतियो, जो भारत की सांस्कृतिक पहचान को कायम रखते हुए समकालीन वैश्विक परिदृश्य में इसको पुनर्नवा कर रही हैंझ
‘मधुमती’ के नियमित पाठकों को याद होगा, पिछले वर्ष जून अंक के आवरण पृष्ठ पर नागार्जुन की एक अल्पज्ञात कविता ‘भारतमाता’ का पृष्ठभर अंश छापा गया थाझ भारत की भू-जन-सांस्कृतिक पहचान को हमारी अनुभूति का हिस्सा बनाने वाली यह एक अद्भुत रचना हैझ इसे पुनः याद करते हुए ......इत्यलम्