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मानवीय विकास की अवधारणा और व्यष्टि-समष्टि के जटिल अन्तर्सम्बन्धों पर विचार करते हुए

इन्दुशेखर तत्पुरुष
मनुष्य यदि विवेकशील प्राणी है तो इसलिए कि वह बाहर के साथ-साथ भीतर देखने की भी सामर्थ्य रखता है। अवलोकन अर्थात् बाहर की ओर झोकने का कार्य तो प्रत्येक जीव करता है, परन्तु मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो आत्मावलोकन करता हुआ आत्मालोचन भी करता है। यह आत्मालोचन ही मनुष्य को आत्म- परिष्कार के लिए प्रेरित करता है। मानव के सवाङगीण विकास की यात्रा स्वयं के अवलोकन, आलोचन और आकल्पन के द्वारा ही सम्पन्न होती है। उल्लेखनीय है कि यह स्वयं को परखने और निखारने की प्रर्याख अन्तः और बाह्म, व्यष्टि और समष्टि तथा मम और ममेतर के संतुलन-सामंजस्य पर निर्भर है। यही प्रर्या मानव के विकास की दिशा को निट्टाार्रित करती है।
आज विकास के जितने भी मापदण्ड हैं वे सभी बाहरी अवलोकन-आलोचन पर आट्टाारित हैं। खाद्यान्न कितना उत्पादित किया जा रहा है, इसका तो पूरा हिसाब है पर अपनी थाली की रोटियों में से एकाट्टा रोटी बोटने की मनोवृा का स्तर क्या है, इसका कोई हिसाब नहीं। मातृ मृत्युदर, शिशु मृत्युदर, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी, निर्ट्टानता में कितनी कमी आयी और बिजली का उत्पादन, सडकों की लम्बाई, अस्पतालों, विद्यालयों की संख्या कितनी बढी, इसका भी पूरा लेखा-जोखा है। पर इनके उपभोक्ता समूह में पारस्परिक प्रेम, करुणा, बन्ट्टाुता, समरसता कितनी बढी और उनमें हिंसा, शोषण, अहंकार, अनाचार की प्रवृा कितनी घटी, यह जानने का न तो कोई प्रावट्टाान है, न पैमाना। बल्कि भौतिक संसाट्टानों के साथ-साथ इन मनोभावों की आनुपातिक की घटा-बढी के सम्बन्ट्टा की कल्पना ही हमें अटपटी लगती है। प्रश्न यह है कि मानव के समग्र विकास का पैमाना क्या केवल बाहरी प्रगति और उपलब्ट्टिायों पर आट्टाारित होना चाहिए? क्या मानवीय विकास के सन्दर्भ में जीवन मूल्यों की अनदेखी करने वाला कोई भी मापदण्ड न केवल अट्टाूरा अपितु अमानवीय भी नहीं होता
विडम्बना यह भी है कि नितांत भौतिक संसार पर अवलम्बित ये विकास के मानक भी ममेतर की अपेक्षा मम पर ही केन्ध्ति हैं। मानव ने अपनी सुख-सुविट्टाा के लिए अपने से अन्य को किस तरह निर्ममतापूर्वक रौंद डाला, प्राकृतिक संसाट्टानों की कितनी बलि चढाई है, इस बात का कोई लेखा-जोखा नहीं है। विकास के उच्चतम बिन्दुओं को स्पर्श करने की आपाट्टाापी में हमने कितने पर्वतों को चूर-चूर कर दिया, ट्टारती को कितना खोखला कर दिया, नदियों और हवा में कितना जहर घोल दिया, कितने जंगल बर्बाद कर दिये, इसका भी तुलनात्मक आकलन नहीं है। यह विडम्बना ही है कि अब तो विकास का प्राथमिक मापदण्ड विनाश पर आट्टाारित प्रतीत होता है। जो प्राकृतिक सम्पदा और संसाट्टानों को बर्बाद करने की जितनी क्षमता रखता है, वह उतना ही विकसित माना जाता है। इसलिए विकास के वर्तमान मानक अट्टाूरे ही नहीं, वरन् अनैतिक, अमानवीय और हिंसक भी हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि जीवन की आट्टाारभूत आवश्यकताऐ हैं। इनके बिना मानवीय जीवन असम्भव है। किन्तु सत्य, प्रेम, करुणा, दया, क्षमा, तितिक्षा जैस भावों के बिना भी मनुष्य जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। बाहरी सम्पन्नता और आन्तरिक समृ=, इन दोनों का सामंजस्य ही मनुष्य को परिपूर्ण बनाता है। जो केवल बाहरी परिवर्तन पर जोर देते हैं अथवा जो केवल भीतरी परिष्कार पर ट्टयान केन्ध्ति करते हैं, वे विकास के अट्टाूरे और एकांगी मार्ग को चुनते हैं। वास्तविक मानवीय विकास के लिए बाहरी बदलाव के साथ भीतरी बदलाव भी आवश्यक है। इस प्रकार परिवर्तन और परिष्कार को मिला कर ही हम हमारी विकास यात्रा सम्पन्न करते हैं और उारोार आगे बढते हैं।
विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि मानव की सांसारिक प्रर्यांओं का अट्टययन करते हुए भौतिक परिवर्तनों की भूमिका तैयार करते हैं। दर्शन, अट्टयात्म, साहित्य और कलाऐ हमारे आन्तरिक-आत्मिक परिष्कार का साट्टान बनती हैं। यहो बरबस हमारा ट्टयान भारतीय परम्परा में प्रयुक्त एक ऐसे तल पर जाता है जो अन्तः और बाह्म दोनों संसारों के बीच की कडी है। यह शब्द जिस अभिप्राय को व्यक्त करता है, वैसा अर्थ विश्व की अन्य किसी भाषा में नहीं मिलता। यह शब्द है ट्टार्म। भारतीय वा-्मय में यद्यपि ट्टार्म शब्द की अनेक परिभाषाऐ और अर्थाभिप्राय मौजूद हैं तो भी सर्वाट्टिाक अर्थपूर्ण परिभाषा महान दार्शनिक कणाद ने की है। अपने वैशेषिक सूत्रों में ट्टार्म की परिभाषा करते हुए वे कहते हैं कि ’जिससे बाहरी विकास ;अभ्युदयद्ध और अन्तरिक उन्नयन ;निःश्रेयसद्ध की सि= हो, वह ट्टार्म है।‘
उगते हुए सूर्य की तरह, खिलते हुए पुष्प की तरह, उजली पायों की तरह, पक्षियों की चहचहाहट की तरह, रम्भाती गायों की तरह, मन्दिर की घंटियों की तरह, दूट्टा वालों के भोंपूओं की तरह, कारखानों के सायरनों की तरह, उमडते टत्र्ैफिक की तरह उजागर होता जीवन का विस्तार अभ्युदय है, संसार की आराट्टाना है। सांसारिक जीवन के सर्वारम्भ, साभ्यतिक विकास और सुखमय जीवन की उपलब्ट्टिायो सब अभ्युदय के अन्तर्गत आती हैं। अभ्युदय शब्द में महवपूर्ण बात यह है कि इसकी निर्मिति ’अभि‘ उपसर्गपूर्वक होती है, जो कि ’दोनों ओर‘ के भाव को व्यक्त करता है। अर्थात् व्यष्टि और समष्टि, इन दोनों को ट्टयान में रखकर किया गया विकास। ईशोपनिषद् में इसे ही अविद्या कहा है। यह जीवन का विस्तार है जो मृत्यु को आने से रोकता है।
किन्तु मृत्यु कब रुकी है? काल किसे बख्शता है? सभी का कलन-आकलन-कवलन कर लेने के कारण ही तो वह काल कहलाता है। यह अटल काल मनुष्य को अपने पंजों में दबोच ले उससे पहले ही यदि अमृत चख लिया जाए तो उसके प्रहार की वेदना से बचा जा सकता है। प्रहार तो अवश्यम्भावी है, पर उसकी वेदना को भोगना, न भोगना भोक्ता पर निर्भर है। उस काल-कराल के जहाज में चढने से पूर्व ही ऐसी मनोस्थिति में आ जाना कि वह भवसागर के बन्ट्टान से मुक्त होने जैसा अनुभव करा दे, अमृत की प्राप्ति है और यह अट्टयात्म से प्राप्त होती है। जैसे सोझ ढलने पर सूर्य अपनी किरणों को समेटने लगता है, पक्षी अपनी उडानों को समेटने लगते हैं, मछुआरा अपना जाल समेटता हुआ घर लौटता है, ेची छत पर खडा पतंगबाज अपनी पतंग को कटने से बचाते हुए आसमान से ट्टाीरे-ट्टाीरे उतारता हुआ चरखी पर मांझे को लपेटता जाता है, उसी तरह मनुष्य अपने जीवन-जाल को समेटकर सभी से निर्लिप्त होता हुआ अवसान की ओर बढता है। यह जाल समेटना और घर लौटना ही निःश्रेयस है, अट्टयात्म साट्टाना है, अमृत प्राप्ति है। उपनिषद्कार ने इसे विद्या कहा है ः
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नते।।
;ईशोपनिषद्द्ध
मनुष्य का सवाङगीण विकास विद्या और अविद्या दोनों की साट्टाना से सम्भव है। जो विद्या को बडा मानकर केवल उसकी ही उपासना करते हैं अथवा जो अविद्या को बडा मानकर केवल उसकी उपासना करते हैं, उपनिषद्कार उनकी भर्त्सना करते हुए चेतावनी देता है कि ऐसे लोग अंट्टो कुऐ में जा पडते हैं। यहो यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि केवल भौतिकवाद की शरण में जाने वाले तो अट्टाार्मिक-अनैतिक होते ही हैं, केवल अट्टयात्मवाद की शरण में जाने वाले भी अट्टाार्मिक-अमानवीय होते हैं ः
अन्ट्टां तमः प्रविशन्ति ये*विद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।।
;ईशोपनिषद्द्ध
यहो इस प्रसंग में मनु द्वारा कही गई एक महवपूर्ण बात ट्टयान में आती है। जब वे चेतावनी देते हुए यह कहते हैं कि अट्टार्मपूर्वक की गई प्रगति से तत्काल तो सब हरा-हरा, भरा-भरा दिखता है और प्रतिस्पट्टाार् में हम और से आगे भी निकल जाते हैं किन्तु कालान्तर में वह विकास चरमरा कर ढह जाता है और समूल नाश कर देता हैऋ तो वहो उनका अट्टार्म से यही तात्पर्य होता है कि ऐसा विकास जो निःश्रेयस की उपेक्षा कर केवल अभ्युदय के आट्टाार पर हासिल किया गया हो अथवा समष्टि की उपेक्षा कर केवल व्यष्टि के आट्टाार पर हासिल किया गया हो। मनु कहते हैं कि ः
अट्टार्मेणैट्टाते यावत् ततो भधणिपश्यति।
ततः सपत्नाफ्जयति समूलस्तु विनश्यति।।
निःश्रेयस को परे रखकर अभ्युदय की कामना से की गई प्रगति कितनी ही आकर्षक, उत्साहवर्ट्टाक और चकाचौंट्टा भरी दिखाई पडती हो, वास्तव में वह अस्थायी होती है। यह उस व्यवस्था की तरह होती है जो तात्कालिक रूप से हमारे सकल घरेलू उत्पाद दर अथवा विकास के सूचकांकों में बढोतरी दिखाती हो किन्तु अन्दर ही अन्दर वह हमें या हमारे सम्पदा-संसाट्टानों को खोखला कर जाती है। जो उपलब्ट्टिा हमारे मूलभूत संसाट्टानों की बलि चढा कर हासिल की जाती हो वह कालान्तर में हमें समूल नष्ट कर देती है। याने हम स्वयं तो नष्ट होते ही हैं, हमारे मूलाट्टाार - हमारे जीवनमूल्य, हमारी आत्मा, हमारी ट्टारती, वन, पर्वत, नदियो भी नष्ट हो जाती हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि मानव का सवाङगीण विकास इस बात पर निर्भर है कि विकास की प्रर्याी में अन्तर्जगत और बहिर्जगत का सामंजस्य कैसा है? व्यष्टि और समष्टि का संतुलन कैसा है? मम और ममेतर का सम्बन्ट्टा कैसा है? शारीरिक बल और मानसिक शक्ति की अन्तःर्याैऐ कैसी हैं? बौ=क विकास और संवेदनात्मक विकास का अनुपात क्या है
वस्तुतः अन्तर्जगत-बहिर्जगत, व्यष्टि-समष्टि, मम- ममेतर जैसे युग्मों में से किसी एक पक्ष की उपेक्षा हमारी अट्टाूरी दृष्टि का परिचायक है। सत्य के सम्पूर्ण स्वरूप से साक्षात्कार कराने में यह अट्टाूरी दृष्टि ही सबसे बडी बाट्टाा है। यही हमारे पूर्वग्रह और दुराग्रह का कारण बनती है। यही हमें असहिष्णु, अहंकारी और अन्ततः हिंसाचारी बनाती है।
आट्टाुनिक युग के प्रखर चिंतक विवेकानन्द इसी सन्दर्भ में आट्टयात्मिकता और सामाजिकता के द्वंद्वात्मक सम्बन्ट्टाों का विचार करते हुए एक गहरी बात की ओर संकेत करते हैं। अपने प्रिय शिष्य आलासिंगा पेरुमल को २९ सितम्बर १८७४ को अमेरिका से लिखे एक पत्र में लिखते हैं कि, ’’विकास के लिए पहले स्वाट्टाीनता चाहिए। तुम्हारे पूर्वजों ने आत्मा को स्वाट्टाीनता दी थी, इसीलिए ट्टार्म की उारोार वृ= और विकास हुआ, पर देह को उन्होंने सैकडों बन्ट्टानों के फेर में डाल दिया, बस इसी से समाज का विकास रुक गया। पाश्चात्य देशों का हाल ठीक इसके विपरीत है। समाज में बहुत स्वाट्टाीनता है, ट्टार्म में कुछ नहीं। इसके फलस्वरूप वहो ट्टार्म बडा ही अट्टाूरा रह गया, पर समाज ने भारी उन्नति कर ली है‘‘ ;विवेकानन्द साहित्य, खण्ड तृतीय, पृ. ३१७द्ध।
अन्यत्र भी वे यह चिन्ता व्यक्त करते हुए स्पष्ट करते हैं कि ’’केवल आट्टयात्मिक स्वतंत्रता की चिंता करना और सामाजिक स्वतंत्रता की चिंता न करना एक दोष है, किन्तु इसका उल्टा होना और भी बडा दोष है। आत्मा और शरीर, दोनों की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए‘‘ ;विवेकानन्द साहित्य, खण्ड प्रथम, पृ. २८६द्ध।
मानवीय विकास के सि=ान्तों और अवट्टाारणाओं का गहराई से अट्टययन किया जाए तो सारा हिापोह मुख्यतः इस प्रश्न में समाहित होता हुआ देखा जा सकता है कि मानवीय संरचनाओं का केन्ध्-बिन्दु व्यक्ति है अथवा समाज? व्यक्ति के लिए समाज है अथवा समाज के लिए व्यक्ति? यह प्रश्न इतना जटिल है कि सारी मानवीय व्यवस्थाऐ इसी प्रश्न से जूझते हुए किसी न किसी एक बिन्दु पर टिकने को विवश हो जाती हैं। इसी आट्टाार पर विश्व में दो चिंतन ट्टााराऐ प्रवर्तित हुइङ एक-व्यक्ति केन्ध्ति और दूसरी-समाज केन्ध्ति, जो र्म शः व्यक्तिवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं के नाम से जानी गई। एक में व्यक्ति के स्वतंत्र विकास को अंतिम लक्ष्य मानते हुए समाज को उसका उपकरण मात्र माना गया तो दूसरी में समाज की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना को नियंत्रित किया गया।
व्यक्ति को केन्ध् मानकर चलने वाली विचारट्टााराओं ने समूहभाव की उपेक्षा कर व्यक्ति को इतना अनियंत्रित और आत्मकेन्ध्ति बना दिया कि आत्मसि= में डूबा हुआ वह अन्य को नरक ;व्जीमत पे ीमससद्ध समझने लगा। समष्टि को केन्ध् मानकर चलने वाली विचारट्टााराऐ व्यक्ति के अस्तित्व को एक स्वतंत्र इकाई न मानकर मशीन का एक पुर्जाभर मानती हैं और उसकी अस्मिता पर प्रतिबन्ट्टा लगाकर उसके असीमित विकास की सम्भावनाओं को अवरु= कर देती हैं। अर्थात् या तो यह माना जाए कि व्यक्ति ही इस सृष्टि का एकमात्र केन्ध् है और शेष सारी प्रकृति, सारे संसाट्टान, सारी निर्मितियो उसी के सुख के लिए हैं जिसका नियामक और निर्णायक वह स्वयं है। वह अपने स्वार्थ के लिए अपने से अन्य का उपयोग, उपभोग, दोहन, शोषण और अन्ततः विनाश - जैसा चाहे - करने को स्वतंत्र है। अथवा यह स्वीकार किया जाए कि व्यक्ति की हैसियत समाज नामक संस्था को चलाने वाले एक पहिए की तरह है जिसकी अपनी क्षमता, प्रतिभा, परिश्रम और साट्टाना का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं। वह जुए में जुते हुए पशु की तरह होता है, जिसके लिए आत्मविकास और आत्मपरिष्कार लगभग महवहीन हैं।
पिछली सदी में हमने इन दोनों अतियों को निर्ममतापूर्वक घटित होते हुए और मानवता को ट्टवस्त होते हुए देखा है। व्यक्तिकेन्ध्ति व्यवस्थाओं ने जिस तरह निर्दय होकर शेष समुदायों पर र्‍ूरता और नृशंसता की सीमाऐ पार करते हुए अत्याचार किए और समाजकेन्ध्ति व्यवस्थाओं ने परिवर्तन के नाम पर लाखों भिन्नमति लोगों का भीषण नरसंहार किया, इतिहास साक्षी है।
आट्टाुनिक साहित्यकारों में इन प्रश्नों पर सर्वाट्टिाक मीमांसा और मौलिक विचार अज्ञेय ने रखे। उन्होंने अपने वैचारिक निबन्ट्टाों और अंतःप्रर्याखओं के माट्टयम से तो इन प्रश्नों पर खूब लिखा ही, उनका काव्य भी इन विचारोोजक प्रश्नों से अछूता न रहा। अज्ञेय की उत्कट प्रश्नाकुलता और उड्ढाम उाराहट उनकी कविताओं में दीपशिखा की-सी दीप्ति और झरने के अम्लान जलदाब की-सी तरह आती है।
व्यष्टि और समष्टि के अन्तर्सम्बन्ट्टाों की इस उलझन भरी पहेली ’नदी के द्वीप‘ कविता के माट्टयम से सुलझाते हैं। उनकी यह प्रसि= कविता इस भावबोट्टा पर आट्टाारित है कि समाज और उसका परिवेश नदी की तरह है तथा व्यक्ति साा - प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति - उसके विराट् परिकर में आश्रित द्वीपों की तरह होती है। अज्ञेय ने इस कविता में व्यष्टि और समष्टि की परस्परपूरकता और परस्परोपजीविता की अत्यन्त क्तद्य और अर्थगर्भी परिकल्पना की हैं। यद्यपि कुछ आलोचकों ने दुर्भावनावश इसे अनदेखा करते हुए अज्ञेय को लेकर अनेक मिथ्या ट्टाारणाऐ गढ लीं और अज्ञेय पर व्यक्तिवादी होने का ठप्पा लगा दिया गया। किन्तु वे ट्टाारणाऐ कितनी भ्रामक थीं, यह भी हम यहो इस कविता की विवेचना में देख सकते हैं।
कविता की पहली पंक्ति है - ’हम नदी के द्वीप हैं‘। ट्टयान रखने की बात है कि यह कविता ’मैं‘ से नहीं वरन् ’हम‘ से शुरू हो रही है और अज्ञेय कहते हैं, हम नदी के द्वीप हैं। यहो कविता की पहली पंक्ति बल्कि, कविता का पहला शब्द व्यक्तिवादिता का प्रतिरोट्टा करता है। यहो हममें से प्रत्येक ’मैं‘ की बात है। यह किसी अकेले ’मैं‘ की बात नहीं है और यहो किसी अन्य ’मैं‘ का तिरस्कार भी नहीं है। तो प्रश्न उठता है कि यदि व्यक्ति द्वीप है और समूह या समाज नदी है तो क्या इसका यह अभिप्राय नहीं कि नदी अपने रास्ते और द्वीप अपनी जगह। और इतना ही नहीं, हर द्वीप अलग-अलग, पृथक से अस्तित्ववान। तो क्या व्यष्टि और समष्टि परस्पर इतने अलग-अलग! इतने भिन्न- भिन्न! एक-दूसरे से विच्छिन्न हैं, ऐसा भ्रम होता है। कविता की आगे की पंक्ति इस भ्रम का निवारण करती है।
वे कहते हैं - ’’हम नहीं कहते कि हमको छोडकर/ स्रोतस्विनी बह जाए।‘‘ अज्ञेय कहते हैं कि द्वीप को अलग और अकेला छोडकर यह ट्टाारा बह जाए ऐसा हम कभी स्वीकार नहीं करते। आखिर ये क्यों ऐसा स्वीकार नहीं करते? क्योंकि वे नदी और उसके द्वीपों को इस तरह विच्छिन्न और अलग-अलग नहीं मानते हैं। इस तथ्य की पुष्टि हेतु आगे सकारण लिखते हैं - ’’वह हमें आकार देती है/हमारे कोण, गलियो, अंतरीप, उभार, सैकत कूल, सब गोलाइयो उसकी गढी हैं/मो है वह/हैं, इसी से हम बने हैं।‘‘ कविता की ये पंक्तियो बहुत महवपूर्ण है। यह व्यष्टि और समष्टि के मूल सम्बन्ट्टाों का सत्व है जो उन्हें निरूपित करता है। वस्तुतः नदी के प्रत्येक द्वीप की रचना नदी की ट्टााराऐ ही करती हैं - उसे आकार-प्रकार देकर गढने का कार्य - उसे स्वरूप देने का कार्य - नदी ही करती है। सारा अखण्ड भू-भाग स्रोतस्विनी के ट्टााराघात के कारण ही द्वीपाकृति को प्राप्त होता है। उसके द्वारा निर्मित होने के कारण ही नदी और द्वीप का रिश्ता जननी और संतति जैसा होता है। किन्तु, इस पवित्र और यथार्थ सम्बन्ट्टा को स्वीकार कर लेने पर भी द्वीप की स्वतंत्र अस्मिता और उसकी अनन्यता को अज्ञेय तिरोहित नहीं होने देते।
’’किन्तु हम हैं द्वीप/हम ट्टाारा नहीं हैं/स्थिर समर्पण है हमारा/हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के/किन्तु हम बहते नहीं हैं।‘‘ यहो यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि ट्टाारा के साथ द्वीप क्यों नहीं बहना चाहिए? और द्वीप का यह न बहना उसकी विवशता है अथवा वैशिष्ट्य? और यह भी कि साथ होने के लिए क्या साथ बहना भी जरूरी है? क्या ट्टाारा में बिना बहे भी ट्टाारा में संपृक्त, समाविष्ट नहीं हुआ जा सकता? यहो इन प्रश्नों पर गहराई से विचार किया जाना अपेक्षित है। क्योंकि इन प्रश्नों का उार ही यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति का अर्थ स्वयं को अस्तित्वहीन कर समूह में विलीन हो जाने में है अथवा समूह के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखने में है। अज्ञेय की दृष्टि में ट्टाारा में बह जाने का अर्थ अपने होने को अर्थहीन करना होता है। ट्टाारा के द्वारा द्वीपों का गढा जाना यदि सत्य का एक पक्ष है, तो द्वीपों और तटबंट्टाों का अस्तित्व नदी की ट्टाारा को प्रवाह प्रदान करता है, यह सत्य का दूसरा पक्ष है। द्वीपों, कूलों और तटबंट्टाों से सर्वथा मुक्त नदी की ट्टाारा भी अपना अस्तित्व नहीं बचा पाती। उसका मूल स्वरूप नष्ट हो जाता है वह एक निर्बन्ट्टा, निर्गतिक और स्थिर जलराशि मात्र रह जाती है।
द्वीप और ट्टाारा अर्थात् व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ट्टाों की अंतर्दृष्टिपूर्ण उद्भावना करते हुए अज्ञेय मानते हैं कि द्वीप जब अपने अस्तित्वगत गुणट्टार्म को छोडकर ट्टाारा के गुणट्टार्म को अपना लेता है और अपनी जगह को छोडकर उसके साथ बहने लगता है तो उसका क्षरण होने लगता है और इस तरह खिर-खिर कर वह रेत में बदलकर उल्टे ट्टाारा को भी गंदला करता जाता है। यदि कगारों की मिड्डी भी निरन्तर उखड-उखड कर नदी के साथ बहने लग जाए तो न जमीन बचती है और न नदी। बचता है सिर्फ गंदला पानी और कीचड। यहो हमें बरबस महर्षि अरविन्द का एक कथन स्मरण होता है। ’ट्टार्म‘ में प्रकाशित ’समाज‘ शीर्षक से लिखे गये एक लेख में वे लिखते हैं - ’’हमने मनुष्य को छोटा कर समाज को बडा बना दिया है परन्तु समाज इससे बडा नहीं बनता, बल्कि क्षुध्, निश्चल और निष्फल हो जाता है। हमने समाज को उारोार उन्नति का साट्टान नहीं वरन् निग्रह और बंट्टान बना डाला है, यही है हमारी अवनति, निश्चेष्टता, निरुपाय, दुर्बलता का कारण। मनुष्य को बडा बनाओ, अंतरस्थ भगवान जहो गुप्त रूप से विराजमान है उस मंदिर का सिंहद्वार खोल दो, समाज खुद ही महान, सवाङग सुन्दर बन जाएगा।‘‘
व्यक्ति और समाज के रिश्तों की परतों को खोलते हुए कविता नये भावबोट्टा के साथ आगे बढती है - ’’द्वीप हैं हम/यह नहीं है शाप/यह अपनी नियति है/हम नदी के पुत्र हैं/बैठे नदी के र्‍ोड में।‘‘ एक पृथक इकाई होना एक नैसर्गिक-प्रकृति नियत- अवस्था है। यह कोई हीन या पतित अवस्था नहीं है कि इसे शाप समझा जाए। वास्तव में तो यह हमारा होना-द्वीपों का साावान होना-समष्टि के प्रसवसामर्थ्य का परिचायक है। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति को प्रकट करने वाली उसकी जन्मदात्री समष्टि ही होती है कि वह किसी भी समाज की श्रेष्ठता का मापदण्ड है कि वह कितनी इकाइयों की अस्मिता को अक्षुण्ण रखते हुए अपनी गोदी में ट्टाारण करने की सामर्थ्य रखता है। जो ट्टाारा जितने अट्टिाक द्वीप, घाट, कूल-किनारों वाली होती है वह उतनी ही पुण्यतोया भी होती है। वह उतनी ही लोकाभिगम्य और जीवनदायिनी भी होती है। वह उतनी ही पाप-ताप-शाप शमनी भी होती है।
इसी प्रसंग में अज्ञेय यह कहना नहीं भूलते कि - ’’नदी तुम बहती चलो/भूखण्ड से जो दाय हम को मिला है, मिलता रहा है/मोजती, संस्कार देती चलो।‘‘ भूखण्ड से जो दाय द्वीप को मिलता है उसके शोट्टान-प्रक्षालन का कार्य नदी करती है। उसका यह प्रक्षालन करना-पखारना-ही द्वीप को मांजना है। व्यक्ति में युगों-युगों से संचित वृायों-प्रवृायों को सामाजिक अन्तःर्यारऐ ही संस्कारित करती हैं और उनके कलुष-कालिमाओं को ढोती, बहाती रहती हैं।
इस तरह स्वयं के द्वारा ही आकार दिए गए द्वीपों से सनातन सम्बन्ट्टा रखती हुई ट्टाारा अनवरत बहती रहती है और अन्ततः हर द्वीप का अन्त किसी भूखण्ड में मिलकर ही होता है जो कि मूलतः उस द्वीप का ही कुलपुरुष होता है। विशाल ट्टाराखण्ड से छिटका यह क्षुध् अंश अन्ततः उसी में जा समाता है। इस बहती नदी के जीवन में जब कोई युगप्रवर्तक घटनाऐ घटती हैं तो यह नदी-द्वीप का सहज सम्बन्ट्टा ट्टवस्त हो जाता है। यह किसी समाज के सभ्यता के चरम बिन्दु पर पहचने की स्थिति में भी सम्भव है, नदी की उत्साहभरी आ(लादावस्था की भांति। अथवा किन्हीं युगान्तकारी घटनाओं-प्रभावों में सामुहिक विधेह, जनर्‍ांति, विप्लव या संमर्द के रूप में प्रचण्ड होकर सब कुछ तहस-नहस हो जाने की भी आशंका के रूप में। ट्टयान देने की बात है कि द्वीप ;व्यक्तिद्ध की अस्मिता के प्रखर समर्थक होते हुए भी अज्ञेय नदी की ट्टाारा के इस द्वीपविट्टवंसी प्लावन रूप की भी उपेक्षा या तिरस्कार नहीं करते वरन् उसका स्वागत करते हैं। क्योंकि उन्हें यह दृढ विश्वास है कि इस बाढ में सब कुछ नष्ट होने पर अन्ततः एक नयी ट्टाारा और उस ट्टाारा के प्रवाह से भूखण्डों से कटते-छटते नये-नये द्वीप पुनः आविर्भूत होंगे। एक नया व्यक्ति, एक नया समाज नये अनुभव संवेदनों के साथ जन्म लेगा तथा वह नया व्यक्ति पुनः अपने जन्मदाता समाज से संस्कारित होता रहेगा। इसे समग्रतः अभिव्यंजित करते हुए अज्ञेय लिखते हैं -
’’यदि ऐसा कभी हो/तुम्हारे आ(लाद से या दूसरों के किसी स्वैराचार से-अतिचार से/तुम बढो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे/यह स्रोतस्विनी की कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल-प्रवाहिनी बन जाए/तो हमें स्वीकार है वह भी/उसी में रेत होकर फिर छनेंगे हम/जमेंगे हम/कहीं फिर पैर टेकेंगे/कहीं फिर भी खडा होगा नये व्यक्तित्व का आकार/मात, उसे फिर संस्कार तुम देना।‘‘
कविता का समापन अपनी जन्मदात्री ट्टाारा से की गई इस प्रार्थना के साथ होता है कि हे मो फिर से हमें मांजना, तराशना, तैयार करना।
इस पूरी कविता में जहो व्यष्टि की स्वाट्टाीन अस्मिता को महव देते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि व्यष्टि के बिना समष्टि का कोई अर्थ नहीं, इसी के समान्तर यह भी प्रतिपादित करने का पुष्ट प्रयास किया गया है कि समष्टि के बिना व्यष्टि का कोई मूल्य नहीं, बल्कि अस्तित्व ही नहीं।
अन्त में विवेकानन्द का यह कथन यहो याद किया जानरा प्रसंगोचित होगा जो उन्होंने अपने लम्बे निबन्ट्टा ’वर्तमान भारत‘ में लिखा है - ’’समष्टि के जीवन में व्यष्टि का जीवन है, समष्टि के सुख में व्यष्टि का सुख हैऋ समष्टि के बिना व्यष्टि का अस्तित्व ही असम्भव है।‘‘
इसी निबन्ट्टा में आगे वे लिखते हैं, ’’अनन्त समष्टि के साथ सहानुभूति रखते हुए उसके सुख में सुख और दुख में दुख मान कर ट्टाीरे-ट्टाीरे आगे बढना ही व्यष्टि का एकमात्र कर्तव्य है और कर्तव्य ही क्यों? इस नियम का उल्लंघन करने पर उसकी मृत्यु होती है और उसका पालन करने से वह अमर हो जाता है।‘‘
समग्र, सर्वस्पर्शी और सर्वसमावेशी विकास के लिए व्यक्ति और समाज, समाज और प्रकृति, भौतिक और आट्टयात्मिक आयामों के अविच्छिन्न और परस्परपूरक सम्बन्ट्टाों को समझना और व्यवहार में लाना अनिवार्य है। इसके बिना विकास का जो भी प्रारूप अपनाया जायेगा, वह अट्टाूरा और एकांगी ही रहेगा। वह आभासी और तात्कालिक विकास तो हो सकता है, वास्तविक और स्थायी विकास कदापि नहीं। इति शुभम्।।