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संतों की सांस्कृतिक चेतना

घनश्याम मैथिल
हम अपने दैनिक जीवन में प्रतिदिन यह पढते अथवा सुनते आये हैं कि वर्तमान समय विज्ञान का युग है, बिना विज्ञान के एक कदम भी चलना मुश्किल है। विज्ञान के नित-नए आविष्कारों ने मानव जीवन को सुगम और सुखी बनाने का अनूठा कार्य किया है। आज जहो हमारा प्रगतिशील और उन्नत समाज खडा है, उसमें विज्ञान का बहुत बडा योगदान है। इन सब बातों से सभी सहमत हैं, परन्तु विज्ञान से प्राप्त उपलब्ट्टिायो ही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य और अभीष्ट नहीं है। मनुष्य अपने जीवन में सभी प्रकार की भौतिक सुख-सुविट्टााओं और सफलताओं को प्राप्त करने के पश्चात् भी कहीं यह महसूस करता है कि उसे किसी चीज की तलाश है, जिसके बिना वह अतृप्त है, अपूर्ण है और इसी अलौकिक, अज्ञात को पाने-जानने का परमानन्द प्राप्ति का अंतिम और परम सत्य मार्ग दिखाया है, हमारे सद्पुरुषों, साट्टाु-संतों ने। इसीलिए कहा भी गया है - ’’जहो विज्ञान की सीमा समाप्त होती है, वहो से अट्टयात्म की यात्रा आरम्भ होती है।‘‘
इन संतों ने अपनी वाणी और आचरण से राष्टत्र् और समाज को अपनी आट्टयात्मिक चेतना, भक्ति और सृजन से सदैव सुखी और समृ= बनाने का प्रयास किया है। इन संतों ने समाज में मौजूद तमाम विकृतियों, कुरीतियों, रूढयों के विरु= खुलकर विधेह किया। आपसी भेदभाव भूलकर परस्पर सहयोग, शांति, भाईचारे एवं एकता की डोर को मजबूत बनाने का काम किया। जिन संतों ने सदियों पूर्व जो जन आंदोलन खडा किया उसमें शैव-वैष्णव, नाथ-जोगी, सगुण-निर्गुण, सूफी आदि सभी मतों को मानने वाले थे, जिन्होंने पूर्व से पश्चिम और उार से दक्षिण तक, जब समाज विदेशी आर्मिणकारियों के अत्याचारों से पूरी तरह टूट रहा, उसका सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा था, ऐसे कठिन दौर में समाज को नया जीवन, नई जिार् और दिशा प्रदान की, जिसकी सदियों पश्चात आज भी समाज को उतनी ही आवश्यकता है जितनी उस समय थी।
’आग लगी आकाश में, झर-झर गिरें अंगार, संत न होते जगत में जल जाता संसार‘। ऐसे जगत के महत्वपूर्ण संतों के जीवन पर केन्ध्ति महत्वपूर्ण सद्य प्रकाशित कृति पाठकों के सम्मुख आई है ’संतों की सांस्कृतिक चेतना‘, जिसके लेखक हैं, संत-साहित्य के अट्टयेता, भारतीय संस्कार-संस्कृति और लोकजीवन को समर्पित, चिंतक, विद्वान मनीषी, शिक्षाविद, सुपरिचित रचनाकार डॉ. उमेश कुमार सिंह। इस महत्वपूर्ण कृति में उनके द्वारा सृजित २७ महत्वपूर्ण संतों के जीवन पर केन्ध्ति आलेख हैं।
इस कृति के आलेखों पर चर्चा से पूर्व इसके ’आमुख‘ से कुछ पंक्तियो मैं आफ सम्मुख रखना आवश्यक समझता ह, जिससे इस कृति का महत्व सहज ही प्रकट हो जाता है। एक अंश देखें - ’विज्ञान हमें प्रकृति के अंदर निहित शक्ति का परिचय कराता है, किन्तु शक्ति का उपयोग किस प्रकार किया जाये, यह विवेक द्वारा ही निर्णय हो सकता है। विवेक को जाग्रत करने का काम हमारे संत, (षि, ज्ञानी, संन्यासी, मुनि ही करते हैं और यह साहित्य और संतों के सत्संग से ही सम्भव है।‘‘ इसके साथ ही ’अभिमत‘ में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उदय प्रताप सिंह ने जो लिखा है, उस लेख से भी मैं कुछ पंक्तियो यहो उ=रित करना समीचीन समझता ह। वे लिखते हैं, ’’संतों की मान्यता है कि सांस्कृतिक चेतना को जितना ही जाग्रत किया जाएगा, मनुष्यता उतनी ही समाज में उतरती दिखाई पडेगी। इन संतों ने अपने समय में अनेक चुनौतियों का मुकाबला किया था। उस समय अनेक सामाजिक- राजनीतिक एवं सांस्कृतिक द्वंद्व चल रहे थे, ऐसे कठिन समय में जब भारतीय समाज इन हस्तक्षेपों से उद्विग्न था। रूढब=ता, सगुण-निर्गुण विवाद, भारतीय भाषाओं का द्वंद्व, अस्पृश्यता, नारी-पुरुष विभेद, ऐसी सामाजिक समस्याओं के शमन में संतों ने अपनी प्रेमपगी, भावभरी एकता विट्टाायिनी वाणी द्वारा संस्कृतिट्टार्मी समाज बनाने का स्तुत्य कार्य किया। संत काव्य मूलतः जनजीवन का साहित्य है और संत उसका मार्गदर्शक है। संत ट्टार्म की पर्याय बनी कुरीतियो, रूढयो, विषमताओं एवं पाखण्ड को संत तोडकर मनुष्य और मनुष्य के बीच विभेदक रेखा से बडी एक सांस्कृतिक चेतना की रेखा खींचता है, जिसमें सभी बराबर दिखते हैं।‘‘
संग्रह के प्रथम आलेख में हमें ’गौतम बु=‘ के जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में पढने को मिलता है। हमें इस आलेख से यह महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है कि बु= ने किसी को शिष्य नहीं बनाया, दीक्षा नहीं दी, किसी के कान नहीं फके। उनका मानना था कि दीक्षा दी नहीं जाती, वह घटित हेाती है और दीक्षा परमात्मा से घटित होती है। बोट्टा अंदर से घटित होता है, उनका भी कोई गुरु नहीं था। इस आलेख में बुट्टा और यशोट्टारा का बडा क्तदयस्पर्शी, करुण वृाांत हमारे सामने आता है, जब वह भिक्षुक बु= को अपने पुत्र राहुल का हाथ सौंप देती है। महाराष्टत्र् राज्य के हिंगोली जिले के नरसी-बमनी गोव में जन्मे सामाजिक समरसता और सद्भाव के प्रतीक, विठोबा के अनन्य भक्त, अद्भुत प्रतिभा के ट्टानी संतनामदेव और उनके जीवन से जुडी अनेक महत्वपूर्ण घटनाऐ जैसे विठोबा को साक्षात भोग लगाना, पत्थर को कपडे बेचना, मृत गाय के बछडे को जीवित करना, आदि घटनाऐ पाठक के क्तदय पर गहरा प्रभाव छोडती है। उनके द्वारा रचे गए अभंग, पद और कविताऐ आज भी हमें भक्ति-मार्ग पर चलने का अनुपम संदेश देती हैं। इस कृति के महत्वपूर्ण आलेखों में एक और आलेख है ’शंकराचार्य‘, भारतीय ट्टार्म-दर्शन को शिखर पर प्रतिष्ठित करने वाले शंकराचार्य का मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ पढने योग्य है, जो इस लेख की उपलब्ट्टिा है। मातृभूमि के प्रति अद्भुत प्रेम रखने वाले हिमालय से कन्याकुमारी तथा द्वारका से जगन्नाथपुरी तक तीन बार भारत यात्रा करने वाले गृहस्थ संत, जाति-पोति को मिथ्या बता, मानव सेवा को ट्टार्म मानने वाले ’श्री कृष्णायनमः‘ मंत्र का जाप करने वाले, भारतीय दर्शन, शु=ाद्वैत, पुष्टिमार्ग, वेदांतमय परम्परा के महान संत के बारे में कई जानकारियो पाठक को मिलती हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु ’समर्थ रामदास‘ के बारे में आलेख पढकर क्तदय राष्टत्र्प्रेम की उदाा भावना से भर जाता है। परिव्राजक, कर्मयोगी, शिवगुरु, राष्टत्र्संत और अपने साथ ही दूसरों को समर्थ बनाकर अपने नाम को सार्थक बनाने वाले, समर्थ रामदास केन्ध्ति आलेख कृति की उपलब्ट्टिा है। भक्ति मार्ग के निर्गुण साट्टाक ’संत कबीर‘ पुस्तक का अगला आलेख है। कबीर के सूफी मत, निर्गुण ब्र॰ के बारे में महत्वपूर्ण सामग्री पढने को मिलती है। इसी अगले र्म में रामचरितमानस के रचियता, घर-घर में प्रतिष्ठित, कंठ-कंठ में बसे, भारत की आट्टयात्मिक चेतना के प्रतीक ’तुलसीदास‘ के सृजन, भाषा के साथ ही सम्पूर्ण व्यक्तित्व, कृतित्व को संक्षिप्त में समझने का अनुपम अवसर मिलता है।
इस प्रकार इस कृति में श्रीज्ञानेश्वरी गीता के भाष्यकार संत ज्ञानदेव, शिवाजी महाराज के आट्टयात्मिक गुरु माने जाने वाले संत तुकाराम, भगवान शंकर का साक्षात् अवतार माने जाने वाले भगवान दाात्रेय, तमिल के प्रसि= ’थिरुकुरल‘ की रचना करने वाले संत तिरुवल्लुवर, कृष्ण भक्त संत सूरदास, कर्नाटक के संत वसेवेश्वर, संत पीपा, कृष्ण भक्त मीरा बाई के गुरु संत रैदास, महाप्रभु चैतन्य, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि रमण, संत पलटू, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, गुरु गोरखनाथ, गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी रामानन्द, महावीर स्वामी और सिख पंथ के प्रवर्तक गुरुनानक देव पर विपुल सामग्री दी गई है। काफी गहन अट्टययन और शोट्टा के पश्चात् इन संतों के इतने विराट व्यक्तित्व और कृतित्व जिन पर केन्ध्ति कई-कई ग्रंथों का सृजन भी कम पड जाए, उनके सम्पूर्ण जीवन चरित्र, जिसमें सब कुछ, यानि सार-तत्व बचा रहे। यों कहें कि गागर में सागर समेटते हुए लेखक ने एक साथ एक कृति में इतने संतों और उनकी सांस्कृतिक चेतना से पाठकों को जोडा, परिचित करवाया। निश्चित ही यह बडा महत्वपूर्ण कार्य है। आज की युवा पीढी जब अपने राष्टत्र् और समाज से विलग हो, अपनी संस्कृति और संस्कारों को विस्मृत करती जा रही हो, ऐसे में यह कृति खासकर हमारे विद्यार्थियों और युवाओं में सांस्कृतिक चेतना का विकास कर, उन्हें राष्टत्र्ट्टार्म के मार्ग पर चलने को प्रेरित करेगी, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है। सहज-सरल भाषा में रोचक ढंग से लिखी गई, साफ-सुथरे मुध्ण वाली, आकर्षक आवरण पृष्ठ से सुसज्जित कृति हेतु रचनाकार को बट्टााई, साट्टाुवाद।
संतों की सांस्कृतिक चेतना/रचनाकार ः डॉ. उमेश कुमार सिंह/प्रकाशक ः आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली-११००९४/पृ. २१६/मू. ३७५ रु.
अयोट्टया नगर, भोपाल ;म.प्र.द्ध. मो. ९५८९२ ५१२५०