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रंग अब वो रंग नहीं

हितेश व्यास
कवि भानु भारवि लेखक, नाट्य-समीक्षक एवं समाजसेवी हैं। पिछले चार दशक से कविता में हैं। समीक्ष्य संकलन से पहले ’एक और एक दो बनाम एक-एक ग्यारह‘, ’किस बसंत का फूल चुन?‘, ’रात के साये‘, ’इस नदी को क्या नाम द?‘ और ’आगे विकट मोड है‘ शीर्षकों से कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हें। यह छठा काव्य संकलन है। इसमें सैंतालीस कविताऐ हैं। अंतिम आवरण पर प्रकाशकीय है। ’कविता के आयाम‘ शीर्षक से आत्मकथ्य है और ’कविता का सच‘ में कविता को परिभाषित करते दो गद्यात्मक अवतरण हैं। ’कविता का सच‘ के शब्द देखें, ’’कविता शब्द नहीं है, कविता अर्थ नहीं है, कविता वह अनुभूति भी नहीं, कविता वह रीति-नीति भी नहीं, जिस बंट्टान और तुकांत में कविता दीखती है। कविता काष्ठ की अग्नि है, कविता (षि के ट्टयान में उतरी ट्टवनि है, कविता किसी संवेदना का उन्मुक्त प्रवाह है।‘‘
यदि हम शीर्षक कविता ’रंग अब वो रंग नहीं‘ को देखें तो पाते हैं कि ’पहचानने से पहले ही बदल जाते हैं रंग‘। कवि को लगता है कि सब चीजों का रंग बदल गया है। इस महापरिवर्तन को रेखांकित करने के लिए इसे ही कृति शीर्षक बना दिया। ’ट्टाूप के थपेडों में इन दिनों ट्टाुंट्टालाने लगा है लाल रंग‘ में स्पष्ट है कि र्‍ांतिकारिता की ओच ट्टाीमी पडने लगी है। ’सूरज के इंतजार में कुम्हला गए हैं सूरजमुखी‘ में गोदों का इंतजार है। कवि दुःखी और निराश है कि ’रंगों में मिलावट से लगता है कि रंग... अब ... वो ... रंग नहीं रहे।
जब आप अपनी दृष्टि का रिमोट अन्य के सुपुर्द कर देते हैं तो यही हश्र होता है, ’मैं बंद कर अपनी दोनों ओखें, करता रहा प्रतीक्षा उसके अगले निर्देश की, किन्तु, अब न उसका हाथ था मेरे हाथ में और न था, वह मेरे पास।‘‘ ;और न, वहद्ध महानगर में किस कदर संवादहीनता पसर गई है। ’’शहर में यकायक उग आए बहुमंजिले अपार्टमेंट्स के द्विबिस्तरी-त्रिबिस्तरी य्लेट्स के आमने-सामने खुलने वाले दरवाजों को भी नहीं देखा गया कभी परस्पर बतियाते।‘ ;तंग दरवाजेद्ध ’सफेद नहीं रह गया है अब कुतोङ का रंग‘ क्योंकि सच की जगह झठ ने ले ली है, ’’सचमुच बार-बार चीख-चीख कर बोला गया झठ भी अब बदलने लगा है सच में‘‘ ;कुतोङ का रंगद्ध साल बदलने के साथ कैलेण्डर बदलता है, ’याद आता है वह पुराना कैलेण्डर गए साल का‘ जिसमें दर्ज हैं, ’दूट्टा का हिसाब/कचहरी की तारीखें/पानी-बिजली के बिल/बच्चों के जन्मदिन और पितरों की पुण्यतिथियो, एक-एक कर निभाए जाते हुए।‘‘ ;पुराना कैलेण्डरद्ध कैलेण्डर के बारह पृष्ठ जिंदगी में कितनी अहमियत रखते हैं, चीजों ही नहीं शब्दों के रंग भी बदल गए हैं, ’’शब्द जब गुजरते हैं छोडते हैं मायने गहरे और गंभीर, कुछ समझ से परे तो कुछ क्तदय में गहरे पैठते हुए।‘‘ लेकिन सच ये भी है कि ’’शब्दों के मेलों में खो रही आदमी की अस्मिता और जीवन-शैली।‘‘ ’’नए-नए शब्दों से निकल रही है नई-नई ट्टवनियो‘‘ ;शब्दद्ध
भानु भारवि को ’सर्दियो‘ कविता में अपने लिए बुने जा रहे मो के हाथों स्वेटर की प्रतीक्षा है तो ’’पगडंडियों पर सिकुडी पडी लावारिस गठरियों को देखकर तलाश है एक निरापद रैन बसेरे की।‘‘ भानु भारवि की एक महवपूर्ण कविता है ’पानी‘। पानी का समाजवाद देखिये कि ’हर पीने वाले को देता है यह एक जैसी सतुष्टि, पानी का अनुकूलन - ’रूप और रंग से निरपेक्ष यह ढल जाता है किसी भी रूप में। पानी की नम्रता देखें।‘ ’’यह जीवन का महा-आट्टाार होते हुए भी सदैव रहता है अट्टाोमुखी।‘‘ संसार एक रंगमंच है, यह तो एक सनातन कथन है, पर भानु भारवि इससे कहीं आगे बढकर अलग बात कहते हैं। ’’मैं रंगमंच ह, मैं रंग-निर्देशक ह, मैं अभिनेता ह और प्रेक्षक भी मैं ही ह।‘‘ ;मैं रंगमंच हद्ध भानु भारवि की कई कविताओं में समाज के अंतिम आदमी की चिंता है, कचरे का बोरा लटकाए कोट्टाों तथा चाय के झूठे गिलासों को अपनी नन्हीं अंगुलियों से फेसाने को बाट्टय उन नंगे- अट्टानंगे बच्चों के लिए मुझे सिलवाने हैं स्कूली गणवेश, जेठ की तपती दुपहरी में सिर पर भरी तगारी को बोस की जर्जर निसेनी के सहारे ढोती हुई उस स्त्री को कराना है मार्गशीर्ष की बासंती बयार का स्पर्श, ’’मुझे अभी देनी है तंत्र के कोलाहल में दबी गण की चीखों को एक सशक्त आवाज‘‘ ;मृत्यु का स्थगनद्ध भानु भारवि साम्प्रदायिकता के गहन परिणामें से अवगत हैं। ’नै(त्य‘ कविता में घर के मुखिया की वस्तुस्थिति को भानु भारवि ने रेखांकित किया है, ’’घरों में भी होता है यह कोना गृहस्वामी के नाम सर्वथा बेकाम और अनुपयोगी चीजें, इसी कोने के ठीक नीचे गृहस्वामी का शयन कक्ष, ओझल रहता है वह परिवार के शेष सदस्यों की निगाहों से, कबाड की तरह‘‘। पारम्परिक प्रतीकों से भानु भारवि का मोह भंग है। ’’मुझे चोद नहीं चाहिए, भूख नहीं मिटाता, सितारे नहीं चाहिए, जीर्ण-शीर्ण कपडों के पैबन्द नहीं बन सकते।‘‘ पहचान पर प्रश्नवाचक लगाते हैं भानु, ’’हर पल रखने पडते हैं, मुझे मेरी पहचान के कई-कई सबूत।‘‘ ;अपरिचितद्ध निराला की कविता ’वह तोडती पत्थर‘ के पडोस में रखे जाने योग्य है भानु भारवि की ’ओ रूकमा‘। ’घटना‘ में भारवि कुछ घटनाओं का जिर्‍ करते हैं। सर्वहारा की दुनिया से कवि स्वयं को पृथक नहीं समझता। ’’दुनिया से बेदखल हैं हम, तुम और वे, कब्रिस्तान में अवश्य मिल जाती है हमें आदमकद जगह, चिरकाल तक सोने के लिए, घरों में निःशब्द, निःश्वास और निष्प्राण।‘‘ ;बेदखलद्ध बदलते समय को भानु ने बांट्टाा है अपनी कविताओं में, ’कितने आत्मीय हो गए हैं मोबाइल और लेपटॉप की स्र्ीनन पर उभरे शब्द, उपकरणों ने हडप ली है उसके पोवों तले की जमीन‘‘ ;बच्चे हो रहे हैं बडेद्ध।
बैंक ऑफ पालमपुर
’बैंक ऑफ पालमपुर‘ ;एक अनोखी दास्तानद्ध को एक हास्य उपन्यास के रूप में वेद माथुर ने बडी रोचक शैली में लिखा है। यह एक बैंकिंग व्यवसाय की कहानी है। लेखक स्वयं एक पूर्व बैंककर्मी है। इसलिए यह काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक अनुभवों पर आट्टाारित कथा है।
इस उपन्यास का एक पृष्ठीय आवरणीय य्लैप कथन हास्य अभिनेता राजू श्रीवास्तव ने लिखा है। राजू लिखते हैं, ’’विजय माल्या से नीरव मोदी तक के कांडों से मुझे पता चला है कि बैंकर्स आम आदमी के खाते में घटाते और अमीरों के खाते में जोडते रहते हैं। बडे लोगों को (ण राशि का दुरुपयोग कर अह्याशी करने तथा बेईमानी से अन्यत्र ले जाने की भी अप्रत्यक्ष रूप से खुली छूट होती है। श्री लाल शुक्ल की रागदरबारी की तरह ’बैंक ऑफ पालमपुर‘ ऐसी ही एक और पुस्तक होगी। यह हास्य उपन्यास वेद माथुर को श्रेष्ठ व्यंग्यकारों की श्रेणी में लाकर खडा कर देगा।
उपन्यास की भूमिका व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने लिखी है। भूमिका में आलोक लिखते हैं, ’’वर्ष १९८० में हिन्दी के वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेशकांत जी का बैंकिंग पर केन्ध्ति उपन्यास आया था, ’ब‘ से बैंक। करीब चालीस सालों के अंतराल के बाद बैंकिंग पर दूसरा उपन्यास यह है। एकाट्टा दिन में नीरव मोदी और माल्या पैदा नहीं होते। इनके पीछे ढीले-भ्रष्ट बैंककर्मी और स्मार्ट-भ्रष्ट कारोबारी बरसों मिल-जुलकर काम करते हैं।‘‘
वेद माथुर उपन्यास के आत्मकथ्य में लिखते हैं, ’’हमारा सूत्रट्टाार कश्मीरी लाल चावला ’बैंक ऑफ पालमपुर‘ का सीट्टाा-सादा-सा महाप्रबन्ट्टाक है, जो लिपिक के रूप में बैंक में भर्ती हुआ और गट्टाा-घिसाई करते-करते महाप्रबन्ट्टाक बन गया।‘‘ कश्मीरी लाल चावला ने जो संस्मरण अपनी पत्नी मनप्रीत को सुनाये, वे यहो पुस्तक के रूप में प्रस्तुत हैं। उपन्यास को ४२ अट्टयायों में विन्यस्त किया गया है। इन अट्टयायों में प्रमुख हैं - मैं-कश्मीरीलाल चावला, के.सी.एम. - कामचोर महासंघ, प्रशिक्षण-सवैतनिक अवकाश, पदोन्नति- अतिरिक्त आरक्षण, प्रशासनिक कार्यालय विश्राम-गृह, पत्राचार- पिंगपांग ;टेबल टेनिसद्ध, (ण प्रबन्ट्टाक, राजभाषा हिन्दी, ग्राहक सेवा, स्वैच्छिक सेवानिवृा, ग्रामीण पोस्टिंग, गरीबी उन्मूलन, (णी ऐसे भी, डिफॉल्टर्स, इन्सपेक्टर, कमेटियो, निदेशक मण्डल, उपहार और भ्रष्टाचार, स्थानान्तरण, प्राथमिकता क्षेत्र-ओकडों की खेती, विदेशी शाखाऐ, डत्रइवर-बैंक के सारथी, अफसर कैसे-कैसे?, पुरस्कार, प्रट्टाान कार्यालय, अनुशासनात्मक कार्यवाही, ट्टाोखाट्टाडी, पिल्लई साहब ः भाषण ही भाषण, ट्विटर पर बैंक, प्रबन्ट्टान के नये सि=ान्त, वॉर रूम, उपसंहार - क्यों हुआ पतन? आदि अट्टयायों के शीर्षकों से ही उपन्यास की रोचकता का अनुमान हो जाता है। उपन्यास के आरम्भ से अंत तक कुतूहल बना रहता है।
पुस्तक ः रंग अब वो रंग नहीं/कविता संकलन/कवि ः भानु भारवि/प्रकाशक ः अनुष्टुप प्रकाशन, १३, गायत्री नगर, सोडाला, जयपुर-३०२००६
पुस्तक ः बैंक ऑफ पालमपुर/हास्य उपन्यास/लेखक ः वेद माथुर/प्रकाशक ः टिनटिन पब्लिकेशंस, टी-३२९, उन्नति टावर्स, सेन्टत्र्ल स्पाइन, विद्याट्टार नगर, जयपुर-३०२०२३/पृ. ३००/मू. ३७५/- / संस्करण ः २०१८
६-ए/७०५, कल्पतरू सेरेनिटी, महादेव नगर, मांजरी, पुणे-४१२३०७ ;महा.द्ध, मो. ९४६०८ ५३७३६