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जिन्दा हूँ मरने के बाद

कुंजन आचार्य
आम आदमी के सरोकारों से जुडी कविताऐ जब पाठक तक पहचती हैं तो सोचने को मजबूर करती हैं। जीवन जीने से जुडे तमाम मसलों पर चिंता जाहिर करती कविता मजदूर, किसान, कामगार, महिलाओं, बच्चों व वंचित वर्ग के साथ खडी दिखाई पडती हैं। ऐसा ही मजमून रेवतीरमण शर्मा के कविता संग्रह ’जिन्दा ह मरने के बाद‘ की कविताओं का है।
कविता का शीर्षक सिर्फ कवि के मनोभाव का उद्घोष भर नहीं है बल्कि मौजूदा दौर में अंगदान करने की सबसे बडी जरूरत को भी रेखांकित करता है। पहले सिर्फ नेत्रदान ही लोकप्रिय था, लेकिन विज्ञान एवं चिकित्सकीय पेशे के विकास के साथ शरीर के सभी अंगों का जरूरतमंदों के शरीर में प्रत्यारोपण सम्भव हो गया है। कवि कहता है - ’’कितने खुश होंगे वे, पाकर मेरे गुर्दे और जिगर, एक सुखद जीवन जीने के लिए, मुझे लगेगा, जिन्दा ह मैं मरने के बाद भी।‘‘ कवि मृत्यु के बाद देहदान की बात कहता है - ’’मेरे पास देने के लिए क्या है? जो बचेगा प्राणहीन शरीर, वह तुम्हारा ही होगा। दे देना उसे किसी अस्पताल, कॉलेज को, बच्चे वहो मेरे शरीर से सीखेंगे, कि कैसे बचाया जा सकता है जीवन।‘‘
जनवादी स्वर की कविताओं को मुखर करती इस संग्रह की अट्टिाकांश कविताऐ श्रमिकों के दुःख-दर्द से जुडी हैं। घरों में काम करती बाईयो, उनके बच्चे, कुम्हार का मौहल्ला, होटल में काम करते शोषित बच्चों के हालात पर चिन्तातुर कविता मेहनतकश लोगों के संघर्षपूर्ण जीवन का शाब्दिक रेखाचित्र प्रस्तुत करता है। जनवादी सोच को अभिव्यक्त करती रेवतीरमण शर्मा की कविताऐ समाज के हर उस पहलु को छूती हैं, जिस पर प्रायः आम व्यक्ति की नजर नहीं जाती या वह नजरअंदाज कर जाता है। श्रम सौंदर्य से गढी कविता ’बीडी पीती औरत‘ इसी ओर ट्टयान खींचती है। कवि कहता है - ’’वह नहीं पीती बीडी शौक के लिए, जब वह खटती है खेत में या पहचाती है इङटें, चार मंजिल पिर, तब तलब लगती है बीडी की।‘‘
रेवतीरमण शर्मा की कविताओं में भाषा का चमत्कार नहीं है, लेकिन वंचित वर्ग की संवेदनाओं का असर है। शिल्प और बिम्ब से ज्यादा पसीने की महक और श्रम का सम्मान है। कवि सीट्टो, सरल और आम बोलचाल में कविता को पिरोते हैं। कहीं-कहीं कवि में पत्रकार जैसी पैनी नजर है, जिसको वह शब्द चित्र बना लेता है। खुद कवि स्वीकारता भी है कि ये छायाचित्र मेरे मन में चिपक जाते हैं। गाहे-बगाहे कवि शासन पर भी लगातार कटाक्ष करता है, अति पूर्वाग्रह के साथ। जन प्रतिब=ता और तार्किक कसौटी साथ-साथ चलना भी जरूरी है। एकांगी तथ्य सुट्टिा पाठक के विचलन का जिम्मेदार होता है।
सुबह, ट्टाूप, बारिश, कबूतर, गिलहरी, बादल, गि=, चिडया आदि विषय जहो कवि की प्रकृति के नजदीकी होने का अहसास कराते हैं, वहीं टत्रंसजेंडर समुदाय को सामन्तवाद का अंतिम प्रतीक बताते हुए उनके सशक्तीकरण और उनके बढते वर्चस्व को बखूबी रेखांकित किया है।
कवि खुद के भौतिकवादी होने की गवेषणा करते कहता है - ’’अट्टयात्म मुझे छू भी नहीं गया है।‘‘ शायद इसीलिए कवि को माता वैष्णोदवी के दर्शन की बजाय टट्टुओं को लेकर दौडते नंगे पैर श्रमिकों की ज्यादा फिर्‍ है। वह माता से उन लोगों की तरफ झोली खोलने की बात भी कहता है। काव्य व्यंजना में कहीं-कहीं नाटकीयता भी है तो कहीं अतिरेक भी। बावजूद इसके पाठक कविता से जुडाव महसूस करता है, क्योंकि कल्पना के सपनीले आसमान में उडने के स्थान पर कवि जमीन पर उन लोगों के साथ बैठा है जिनके लिए हर रोज भूख के साथ संघर्ष करना पडता है।
कवि जुगमंदिर तायल ने संग्रह के य्लेप पर टिप्पणी अंकित की है, वहीं विजेन्ध् ने आमुख लिखा है। विजेन्ध् ने ही आकर्षक कवर पेज भी बनाया है। कविता संग्रह पठनीय है।
राजाजी की कथाऐ
राजाजी के नाम से प्रसि= भारत के पहले गवर्नर जनरल चर्व र्ती राज गोपालाचारी तमिल साहित्य के उत्कृष्ट सर्जक भी थे। तमिल भाषा में उनके द्वारा लिखी लघुकथाओं के हिन्दी अनुवाद का कार्य एस. भाग्यम शर्मा ने किया है। उन्होंने इन कथाओं को ’राजाजी की कथाऐ‘ नाम से पाठकों के समक्ष रखा है। पुस्तक में चर्वार्ती राज गोपालाचारी की मूल तमिल कहानियों का हिन्दी में सहज, सरल और सुबोट्टा भाषा शैली में अनुवाद किया गया है, जो कि पठनीय है।
आमतौर पर दक्षिण भारतीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया था वह अनुवाद के रूप में हिन्दीभाषी पाठकों तक कम पहचा, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह अनुवाद का कार्य बहुत ही अच्छे तरीके से हुआ। इससे दो भाषाओं के बीच ना केवल सेतु का काम हुआ है, बल्कि दो संस्कृतियों को आपस में जानने-समझने का भी अवसर मिला है।
इस संग्रह की सभी कहानियो पाठक के लिए उपयोगी, शिक्षाप्रद और जीवनमार्ग दिखाने वाली हैं। इसमें नैतिक शिक्षा से ओतप्रोत लघुकथाऐ हैं, जिनमें उपदेश की भाषा, राजा का भेष, पेठे के बेल, शराब की कहानी, मुर्गे की चिंता, नाक की लॉन्ग की कथा आदि शामिल हैं।
हर लघुकथा के साथ चित्रांकन भी शामिल किया गया है जो शब्दों के साथ पाठक को चित्रात्मक तरीके से भी जोडता है। कुछ कथाऐ आसपास के दैनिक जीवन, ग्रामीण परिवेश परम्पराओं और दिन प्रतिदिन की घटनाओं का रोचक अंदाज में प्रस्तुतीकरण है। वहीं कुछ कथाऐ पशु-पक्षियों के संवादों पर आट्टाारित है, जो दिल को छूती है और एक जीवन से भरा संदेश भी देती है। दक्षिण भारत की ४ भाषाओं में तमिल, तेलुगू, कन्नड और मलयालम शामिल हैं। हर भाषा में विपुल साहित्य का सृजन हुआ है।
पिछले कुछ वषोङ में अनुवाद के जरिये दक्षिण भारतीय साहित्य भी राजभाषा के माट्टयम से देश की हिन्दीभाषी क्षेत्र में भी पहचा है, जो कि स्तुत्य है।
स्वयं अनुवादक शर्मा की यह पोचवी किताब है, जो तमिल से हिन्दी में अनूदित हुई है। इस संग्रह में ३१ कथाऐ हैं, कुछ मनोरंजक तो कुछ रूपक कथाऐ हैं। कुछ पुराणों से ली गई संदर्भ कथाऐ हैं।
यह संग्रह बच्च के लिए भी उतना ही रोचक है जितना बडों के लिए, क्योंकि इनम पंचतंत्र की तरह बोट्टाकथाऐ भी हैं जो जीवन मूल्यों से जुडी, शिक्षाप्रद हैं और बच्च के लिए प्रभावी साबित हो सकती है। चित्रांकन बच्चों को लुभाते हें। कोऑपरेशन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित इस अनुवाद संग्रह में कई जगह छूट गई मात्रात्मक अशु=यो खलती है। मुध्ण का कार्य आकर्षक और प्रशंसनीय है। कुल मिलाकर संग्रह की लघुकथाऐ पाठकों को आनन्दित करेगी।
पुस्तकें ः
१. जिंदा ह मरने के बाद/काव्य संग्रह/रेवती रमण शर्मा/प्रथम संस्करण २०१७/
२. राजाजी की कथाऐ/लेखक चर्व र्ती राजगोपालाचारी/ अनुवादक ः एस.भाग्यम शर्मा/प्रकाशक ः कोऑपरेशन पब्लिकेशन, जयपुर/पृ. १२८/ मूल्य २२० रु.
५६-५७/ए, विद्यानगर, सेक्टर-४, उदयपुर-३१३००२