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चोपडे की चुडैलें

विजय जोशी
समय की शाश्वतता कि गतिमान रहे और सामाजिक संदभोङ को चरैवेति- चरैवेति के परिवेश से स्पन्दित किये रखे। यह समय ही है जो अपने भीतर उन तमाम आयामों को समेटे रहता है और प्रकीर्णित करता है जो मनुष्य और उसके परिवेश को प्रभावित करता है। प्रमाणिकता के इन संदभोङ में न जाने कितनी परम्पराऐ और आट्टाुनिकता की व्यापकता अपने-अपने तरीके से पोव फैलाकर अपनी उपस्थितियो दर्ज करवाकर अद्यतन अपने अस्तित्व का भान कराती हैं। इन सबके मट्टय समय-समय पर बनते-बिगडते सेतु उन क्षणों का साक्षात्कार कराते हैं जिनमें व्यक्ति और समाज की चेतन-अवचेतन अवस्थाओं का साकार रूप उपस्थित रहता है।
इन तमाम संदभोङ को अपने भीतर तक समाये शिड्ढत से सामने आकर संवाद स्थापित करती है ’’चौपडे की चुडैलें‘‘ और ’’एक था पेड‘‘ में संग्रहीत कहानियो। ये सभी कहानियो संवाद कर सोच और समझ के वातायनों में जमी ट्टाूल को झाडकर परम्परा और आट्टाुनिकता की यात्रा में उभरे दस्तावेजों की पडताल करती है।
पंकज सुबीर के इस कहानी संग्रह में सभी कहानियो जहो घटना की तस्वीर को उभारती हैं, वहीं घटना के पहले और बाद के सभी पहलुओं का विस्तार से विवरण और विवेचन भी प्रस्तुत करती हैं। शीर्षित कहानी ’चौपडे की चुडैलें‘ समाज के उस पहलू को सामने लाती है जहो सांझ की लालिमा जब रात के आगोश में जाने को आतुर होकर संवेदना के दायरों को झिलमिलाती है। चुडैलों के प्रतीक में व्यापार और दमित संदभोङ का खुलासा करती यह कहानी आज के कॉल सेन्टर की कॉल अटेण्डर की समूची प्रर्या से साक्षात्कार कराती हैं। वहीं ’नाता‘ परम्परा की आहटों से प्रतिट्टवनित होती वर्तमान समाज की बदलती तथापि परिष्कृत रूप से उभरती और फैलती प्रर्याि का यथार्थ रूप है कहानी ’जनाब सलीम लेगडे और श्रीमती शीला देवी की जवानी‘।
’अप्रेल की एक उदास रात‘ में अतीत-वर्तमान और भविष्य के ताने-बाने की उस हकीकत को उभारा है जो वास्तव में युगान्तर में भी समाज के परिष्कृत और अट्टाुनातन स्वरूप में स्वीकार न हो पायेगी। प्यार और प्रतिशोट्टा की जुगलबंदी की यह कहानी अपने में कई प्रसंगों को समेटे है। स्त्री स्वातं*य और स्व के अस्तित्व को उभारने और जीने के मट्टय में उठे कदमों की आहट और स्व से ही निर्मित अपराट्टा बोट्टा की दास्तां सामने आयी है कहानी ’सुबह अब होती है... अब होती है... अब होती है...‘ में। वहीं लोकट्टाारणा के साथ सामाजिक संस्कृति और संस्कारों की उदााता के विविट्टा पक्षीय स्वरूप के मट्टय तेजी से उपजे और विकसित साम्प्रदायिक भावबोट्टा के कंटकाकीर्ण पथ पर जुम्बिश करते संदभोङ को उकेरती कहानी है, ’इन दिनों पाकिस्तान में रहता ह...‘।
’रेपिश्क‘ शीर्षक भले ही चौंकाने वाला हो और अपने भीतर से भले ही इसी ट्टवनि को अंकित करते प्रचलित शब्द का भान देता हो, परन्तु कहानी ’रेपिश्क‘ में ’लिव इन‘ के मंसूबों और परिणामों की खुल कर चर्चा और विश्लेषण हुआ है। अतीत और वर्तमान की सुगबुगाहट का भी असर दिखा है, वह भी परम्परागत सोच की लीक से हटकर परिपक्व विचारों की सायास खींची गई लकीर से। ’ट्टाकीकभोमेग‘ कथित बाबाओं की करतूतों और व्यापारिक जंजालों का कच्चा चिद्दा खोलती कहानी है, जो वर्तमान में जनमानस की भावनाओं के सेतु पर इस-पार से उस- पार तक का दृष्टांत कहती है। ’औरतों की दुनिया‘ जमीन-जायदाद के झगडों की बानगी है परन्तु इस कहानी में आदमी और औरत की प्रवृा को उभारा है जो वास्तव में कहानी के प्रतिपाद्य की स्वीकारोक्ति है कि समन्वय रखना है और समन्वित रहना है तो ’’... दुनिया हो सके सचमुच औरतों की दुनिया‘‘। अंतिम कहानी ’चाबी‘ बच्चों के प्रति समर्पण, लगाव, आस्था और कर्तव्य की मार्मिक कहानी है।
कुल मिलाकर इस संग्रह की तमाम कहानियों में व्यक्ति को अपने प्रत्येक वयः से संदर्भित विविट्टा आयामों का दिग्दर्शन होता है। इन कहानियों में कहानीकार की कथा-कहन की विशेषताऐ भी उभरी हैं। ये कहानियो जहो रेखाचित्र सी खींचती हैं तो दृश्यावलोकन का भान भी कराती हैं। वहीं शब्द विशेष का विवरण और विश्लेषण भी प्रस्तुत करती हैं यथा ’ चौपडा, नातरा, ट्टाकीकभोमेग। विवरणात्मक शैली की विशिष्टता लिये इन कहानियों में औपन्यासिकता के प्रभाव स्पष्ट झलकते हैं।
अन्ततः यही कि पंकज सुबीर की ये कहानियो समाज के विविट्टा पहलुओं का विवेचन तो करती ही हैं, साथ ही व्यापक संवेदनाओं का तीक्ष्ण अन्वेषण भी प्रस्तुत करती हैं।
एक था पेड
हरीदास व्यास के इस संग्रह की कहानियो वर्तमान समय में परिवर्तित मूल्यों और बदलते दायरों से उपजती जा रही परिस्थितियों को उजागर ही नहीं करती वरन् सम्बन्ट्टिात परिवेश की विवेचना भी करती है। मानव मन के भीतर की द्वंद्वात्मक स्थितियों को सहजता से उभारती ये कहानियो यथार्थ की भूमि पर संवाद स्थापित करती है। शीर्षित कहानी ’एक था पेड‘ वस्तुतः ’एक था पेड ः एक थी लडकी‘ शीर्षकानुकूल एक पेड और एक लडकी क मनोभावों की कहानी है जो आवश्यकता और अपेक्षा की सम्पूर्ति के पश्चात् के मनोजगत का विवरण देती है। ’नदी जो सूखी नहीं थी‘ प्रथम कहानी ही पति-पत्नी और बच्चे के त्रिकोणात्मक संदर्भ को गतिशील करती हुई स्त्री-पुरुष के स्वाभिमान के फलस्वरूप खींची ज्ञात-अज्ञात सीमा का ब्यौरा देती है। ’अच्छी किताब‘ कहानी बदलती सोच और उससे उपजे संदभोङ का खुलासा करती हुई गहरे पैठ संस्कारों को एक बच्चे द्वारा ’अच्छी किताब‘ की ही मांग से समाज के एक पहलू को उजागर करती है। वहीं लेखन संदभोङ को आशा की किरण प्रदान करती है ’’जब तक अच्छी किताब पढने वाला मौजूद है, तब तक अच्छी किताब भी जरूर लिखी जाती रहेगी‘‘।
’आहट बुनता परिन्दा‘ और ’इस शहर में एक इमरोज रहता था‘ कहानियों में सामाजिक दायरों का वह दंश उभरा है जहो स्वार्थी और मौकापरस्त लोगों की जीवन शैली में व्यवट्टाान आने पर वे व्यवट्टाान के स्रोत को समूल नष्ट करने को उतारू हो जाते हैं। ’संवलायी सोझ‘ साहित्यिक और पारिवारिक संदभोङ के मट्टय के जीवन को रेखांकित करती है। ’इंतजार‘ कहानी में व्यवहारिक जीवन और प्रेम की उदााता के मट्टय की जड्ढोजहद को उभारा है। ’रविश‘ कहानी कर्तव्य और कर्म के बीच की संवेदनाओं को उजागर कर पारिवारिक परिवेश को बनाये रखने का संकेत देती है। ’बस आखिरी बात‘ बच्चों की स्वाभाविकता और प्रकृति से दूर ले जाकर थोपी गई मानसिकता के परिणामों को उजागर करती सशक्त कहानी है, जिसमें वर्तमान शैक्षणिक संदभोङ की सटीक विवेचना उभर कर आयी है। यदि आखिरी बात पर ही थोडा-सा सकारात्मक हुआ जाये तो बच्चों के सवाङगीण विकास और व्यक्तित्व की बहुमुखता को कोई रोक नहीं सकता। यही मूल स्वर कहानी का प्रतिपाद्य भी है।
’वह कहीं खो गया है‘ वर्तमान नौकरशाही, ईमानदारी और व्यवस्था के त्रिकोणात्मक पहलू के यथार्थ को सामने लाती है। वहीं इसी कहानी की व्यापक प्रतिट्टवनि ’एक और वागीश‘ में उत्पन्न होती है और विविट्टा संस्थाओं के गोरखट्टांट्टाों और यौन शोषण जैसे कायोङ का खुलासा होता है तथापि एक स्वाभिमानी ’वागीश‘ सदा के लिये मौन हो जाता है। अट्टिाक सोच कर परिणामों की चिंता करना और अपने वर्तमान को झुठलाकर कोरे आदर्श की ओर कदम बढाने से उपजे अतिवादिता के प्रसंगों को उजागर करती कहानी है - ’अब उसे होने दें उदास‘। वहीं साहित्यिक ट्टाारा और उारार्ट्टा में जीवन के यथार्थ की अनुभूति के सच को उट्टोडती कहानी ’उारार्ट्टा‘ में साहित्यिक कर्म और आत्मिक ट्टवनि को आत्मसात् करने का सम्भाषण उकेरा गया है। ’इलाज‘ कहानी में घटना विशेष से प्रभावित हो ’कुछ न करने‘ की ग्लानि से सराबोर व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक सत्य को बखूबी उभार कर ’कुछ कर जाने के‘ विश्वास से सहजता प्राप्त करने की वस्तुस्थिति को दर्शाया है। वहीं ’पिता‘ कहानी में पिता के अस्तित्व और व्यक्तित्व के साथ उनके होने की विशेषता और महत्व का ब्यौरा कविता-सा उभर कर सामने आया है।
’सजीला बुत‘, ’चिलचिलाती ट्टाूप और चोदनी‘, ’नदी का दूसरा घाट‘, ’तिनका भर तपिश‘, ’अंट्टाी गली का आखिरी दरवाजा‘, ’आखिरी दस्तक‘ आदि ऐसी कहानियो हैं जो व्यक्ति के परिवेश और मन के भीतर के द्वंद्व को उभार कर सामाजिक सरोकारों को उकेरती जीवन-जगत् की यात्रा के कई पडावों की दास्तां को सुनाती हैं।
कुल मिलाकर इस संग्रह की सभी कहानियो मानवीय संवेदनाओं के वे बिम्ब-प्रतिबिम्ब हैं जो व्यक्ति के भीतर और बाहर के अस्तित्व को अपने परिवेश के साथ उभार कर सतत् साक्षात्कार करवाते हैं।
पुस्तकें ः
१. चौपडे की चुडैलें/कहानी संग्रह/पंकज सुबीर/ शिवना प्रकाशन, पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्पलेक्स बेसमेंट, बस स्टेण्ड, सीहोर ;म.प्र.द्ध/प्र.सं.२०१७/ मूल्य २५० रु.
२. एक था पेड/कहानी संग्रह/हरीदास व्यास/बोट्टिा प्रकाशन, बाईस गोदाम, जयपुर/प्र.सं. जून, २०१६/मूल्य १२५ रु.
१७४-बी, आर.के.पुरम्, सेक्टर-बी, कोटा-३२४०१०