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सत्यनारायण ः रेत पर लिखा रिपोर्ताज

कुन्दन माली
देश तथा प्रदेश में हिन्दी साहित्यिक परिदृश्य में सुपरिचित गद्यकार, कथाकार सत्यनारायण के व्यक्तिपरक एवं अभिव्यक्तिपरक पक्षों पर अब तक आलोचकों ने अपेक्षित ट्टयान नहीं दिया और अब इस खामी को आंशिक तौर पर पूरा करने की दृष्टि से राजपाल सिंह शेखावत के सम्पादन में सत्यनारायण के रचनाकार तथा सृजनात्मक परिवेश को समझने-सुलझाने के र्मर में हाल में पुस्तक प्रकाशित हुई है - ’सत्यनारायण ः रेत पर लिखा रिपोर्ताज‘, जिसमें कुल मिलाकर पचास से अट्टिाक रचनाकारों/ टिप्पणीकारों/आलोचकों/ कवियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से टिप्पणियो एवं लेख दिये हैं, जो अलग-अलग खण्डों में विन्यस्त हैं, यथा - ’’उसके भीतर मिड्डी की बू‘‘, ’’रेगिस्तान के इस तरफ‘‘, ’’तुम्हारा पत्र मिला‘‘ एवं ’’काठ का घर लोहे का आदमी‘‘ जैसे शीर्षकों के तहत समाविष्ट हैं और साथ ही साथ किताब के दो अंतिम खण्डों ’’अपनों का साथ‘‘ तथा ’’सफर जिंदगी का‘‘ में सत्यनारायण के पारिवारिक तथा साहित्यिक माहौल में बिताये गये क्षणों तथा व्यक्तियों के श्वेत-श्याम चित्र दिये गये हैं और इस र्मय में कहना जरूरी लगता है कि स्वयं सत्यनारायण जितने सहज-आत्मीय-सरल व्यक्तित्व के ट्टानी हैं, ठीक उसी तर्ज पर अन्य लेखकों ने भी उन्हें उसी शिड्ढत के साथ याद करते हुए उनके रचनाकर्म की प्रामाणिकता को परिपुष्ट किया है। दरअसल सत्यनारायण संत किस्म के रचनाकार हैं, जो जितना समाज में घुले-मिले हैं, उतने ही उससे एक निश्चित दूरी बनाकर रखते हैं, उस समाज के संभ्रांत वर्ग से जिसका रिश्ता लोकमन और संवेदना से कृत्रिम किस्म का है। सत्यनारायण की रचनाओं में भी वही स्वाभाविकता, सहजता, रोचकता और प्रवाहमयता है जो उनके व्यक्तित्व में झलकती है। इस तथ्य को हसन जमाल, कृष्ण कल्पित, राजाराम भादू, आईदान सिंह भाटी, श्याम जांगिड, मायामृग, चरणसिंह पथिक, हबीब कैफी तथा पद्मजा शर्मा इत्यादि ने अत्यन्त आत्मीय और रोचक ढंग से निरूपित किया है - वह भी ’’जो है, जैसे है, जहो है‘ की तर्ज पर। जिस तरह से रेत की खामोशी और व्याकता हमारा ट्टयान आकृष्ट करती है, ठीक उसी तरह से सत्यनारायण की चुप्पी और ट्टाीर-गंभीरता भी उल्लेखनीय है। शोखी और चंचलता न तो रचनाकार से और ना ही उसके सर्जन से कोई खास रिश्ता रखती है। हिन्दी साहित्य में राजस्थान के रेगिस्तान की व्यापकता, जीवट, ट्टाीरज, सहनशीलता तथा गंभीरता को उसकी ठेठ राजस्थानी रंगत और मुहावरे के साथ प्रकट करने की दृष्टि से जिस तरह का महत्वपूर्ण लेखन यादवेन्ध् शर्मा ’चन्ध्‘ ने किया, उसी तरह से अपनी कहानियों, रेखाचित्र, डायरी, रिपोर्ताज इत्यादि विट्टााओं के माट्टयम से करके सत्यनारायण ने समकालीन हिन्दी साहित्य में अपना अलग स्थान बनाया और रेत के जनजीवन को रचना में पुनर्जीवित करके अपनी रचनाट्टार्मिता को सार्थकता प्रदान की है। यहो उपस्थित तमाम रचनाकारों ने अतिरंजना से बचते हुए विवेकसम्मत ढंग से सत्यनारायण के जीवन तथा केरियर के विविट्टा पक्षों को उद्घाटित करने का संतुलित प्रयास किया है। इतना ही नहीं, डायरी, रिपोर्ताज, रेखाचित्र और कहानी जैसी विट्टााओं में महत्वपूर्ण, रेखांकनीय-सार्थक सृजन करने के अतिरिक्त सत्यनारायण के पत्रकार पक्ष को भी लेखकों ने प्रकट किया है। सत्यनारायण की पत्रकारिता को साहित्यिक भाषा ने और उनके साहित्यिक रुझान तथा मानसिक संरचना को उनके पत्रकारिय पक्ष ने निस्संदेह परिमार्जित-परिष्कृत करने का कार्य किया है और सम्भवतया यही वजह है कि जीवन को अपने ही ढंग से जीने वाले सत्यनारायण की रचनाऐ जीवन को अपने ही अलग तथा विशिष्ट ढंग से पकडने का दस्तावेज बनने का माड्ढा रखती हैं और हैं भी। अलग-अलग लेखकों ने अपनी टिप्पणियों में इस बात को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि सत्यनारायण की कथा भाषा एवं गद्य भाषा मूलतः और मुख्यतः अपनी खुराक राजस्थानी भाषा के मुहावरे, उसकी भावभूमि तथा सांस्कृतिक परिवेश से ग्रहण करती है और निश्चित तौर पर यही कारण है कि सत्यनारायण की रचनाभाषा और उसकी विशिष्ट छाप और छवि अंकित करने में सर्वथा सफल रहकर सत्यनारायण के रचनाकर्म को विशिष्ट दर्जा प्रदान करने में सक्षम बन जाती है।
अगर ये कहा जाये कि सत्यनारायण ने लिखकर जितनी ख्याति नहीं कमाई, उससे कहीं अट्टिाक उन्होंने मित्रता कमाई है और यह उपलब्ट्टिा सबसे अलग है, उनकी रचनाशीलता का परम साट्टय भी। सत्यनारायण के मित्रमण्डल में तमाम विट्टााओं/क्षेत्रों के लोग शामिल हैं, तभी तो ये तमाम लोग बेहद शिड्ढत से, समीपता से, स्नेह से इस रचनाकार को रेखांकित करते हैं। जनपक्षट्टारता के हामी, दमित-पीडत मानवता के पैरोकार, लोकजीवन में रचे-बसे, सांस्कृतिक परिवेश में घुले-मिले बहुआयामी रचनाकार सत्यनारायण ने जिस तरह से हमारी कथाभाषा तथा कथेतर गद्य की भाषा को नई रंगत और रवानी प्रदान की है, ठीक उसी ढंग से, सम्मान और विवेकपरक नजरिये से अन्य समकालीन रचनाकारों ने सत्यनारायण का आत्मीय मूल्यांकन किया है, जो विश्वसनीय भी है और पठनीय भी। सत्यनारायण की एक पुस्तक का शीर्षक है - ’इस आदमी को पढो‘। प्रस्तुत पुस्तक इसी को चरितार्थ करती है।
पुस्तक - सत्यनारायण ः रेत पर लिखा रिपोर्ताज/ संस्मरण-मूल्यांकन/स. राजपाल सिंह शेखावत/ बोट्टिा प्रकाशन, सी-४-६, सुदर्शनपुरा इंड. एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, २२ गोदाम, जयपुर/प्रथम सं. २०१८/पृ. सं. ३०४/मूल्य - २९५ रु.
१७० टेकरी, उदयपुर-३१३००२, मो. ८००३३ ५५५४१