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सात कविताऐ

गरिमा शर्मा
औरत
तामीर ना बना,
य खुद को कैद ना कर।
ये शब्द ले उडेंगे मुझे,
तू बस अपना ख्याल कर.....
मुखालिफ ह मैं तेरी हर बात का
तेरी सोच और तेरे हिजाब का
मेरी बात मान मेरे साथ चल
ये इलाका है सह्याद का.....
ये ओट से झोकना,
बंद कमर में खुद को मारना,
हर तर्ज के जुर्म तूने सह लिए,
अब खुद पर रहम खा,
एक बात मान यहो से भाग जा।
तू निकली तो संग में काफिले भी निकल पडेंगे, यहो रुक गई तो फिर से वही जुर्म सहने पडेंगे,
अक्सर भुला के सारी बातें, जेहन में एक बात रख, य तामीर ना बना, य खुद को कैद ना कर,
रवानी तुझसे है संसार की, तू बस अपना ख्याल कर।
विश्वास करो
अच्छे लोगों को ही बुरा बनते देखा है
विश्वास करो,
मैंने कई लोगों को हैवान बनते देखा है.....
पेट की आग क्या-क्या ना बिकवाए
कहीं मन बिकवाए तो
कहीं जिस्म बिकवाए
ये सब छोडो, मैंने तो जिम्मेदारी की आड में
कई बापों को बिकते देखा है।
अच्छे लोगों को ही बुरा बनते देखा है.....
अन्जान रास्तों पे डर सा रहता है,
रास्तों में अकेले चलने पर दिल जोरों से
मेरा भी ट्टाडकता है,
क्या करूे मैंने ’दामिनी‘ जैसे किस्सों को
मशहूर होते देखा है।
अच्छे लोगों को ही बुरा बनते देखा है.....
इन सब बातों में नजर का खेल है
और जो लिखा वो नजरिये की कहानी
मैंने तो बस वो ही कहा जो मैंने सरेआम देखा है। अच्छे लोगों को ही बुरा बनते देखा है.....
मो
मो, तेरे आंगन में पली ह मैं
हर रोज किसी कली की तरह तेरे साये में
बडी हुई ह मैं.....
जैसे समाए रखता है बादल
बारिश को अपने सीने में
कुछ ऐसे ही तेरी छोव में सेभली ह मैं।
मो तेरी बेटी ह मैं.....
मुझे बचना सिखाया,
गिर के संभलना सिखाया.....
तुम हो असीम सागर मेरे लिए और
उसमें केवल बद भर ह मैं।
मो तेरी बेटी ह मैं.....
शिक्षक
अंट्टाकार के कफस में उम्मीद सी आई,
जब बडे मोहज्जब से उसने हर बात समझायी... वो शिक्षक ही था, जिसने हर पथ पर मेरे
रोशनी जलायी....
मुझे जम्हूरियत थी हर बात की पर
सलीका-ए-एंग नहीं
फिर कुछ य हुआ कि लिहाज, इक्खितयार,
एहितराम और रिफाकत से मेरी दोस्ती करायी,
वो शिक्षक ही था,
जिसने हर पथ पर मेरे रोशनी जलायी.....
मेरा रहनुमा रहा, मेरे साथ खडा रहा और
मेरे कांट्टो पे हाथ रख मुझे राह दिखलाई....
वो शिक्षक ही था,
जिसने हर पथ पर मेरे रोशनी जलायी.....
दीवारों के कान होते हैं...??
दरीचो से लोग झोकते-फिरते हैं
फिर कहते हैं
दीवारों के कान होते हैं.....
ना जाने कहो से आए हैं !!
ये ओखों से चीरते हैं और
बेतुके लतीफों पे हेसते हैं।
क्या कहा ? हममें से है,
चलो मान लेती ह,
जानवर चार पैर के ही नहीं,
दो पैर के भी होते हैं।
शब के साये में निकलते हैं दरिंदे
ना नोचते हैं, ना खाते हैं
बस ओखों से नंगा करते हैं....
य तो डरती कोई भी लडकी नहीं
बस मुय्लिसी की आड में,
ये वर्दी वाले चुप करा दिया करते हैं।
तुम्हें होगा यकीन पर मुझे तो नहीं
कि दीवारों के भी कान होते हैं.....
देखो.....!!
बेशर्म बन के बेबाक खडी ह
मैं बिकने को तैयार खडी ह
निकल जो दिन में तो खुद को क्या-क्या सुन
हर कहीं नीचे नजरें और
सर झुका कर चल.....
जो उजाले में बेहया कहे
रातों में उनके लिए आराम का सामान बन खडी ह... देखो मैं बिकने को तैयार खडी ह.....
बंद दरवाजे हैं मेरे लिए हर कहीं
कोई और काम करने की इजाजत मुझे नहीं...
और भी हुनर बख्शे हैं खुदा ने,
फिर भी लाश बन कमरे में पडी ह...
देखो मैं बिकने को तैयार खडी ह...
मजबूरी नहीं देखती,
बस हर नजर सवाल किया करती है।
कोई तो पूछो, मैं क्या बिकने को तैयार खडी ह
हिन्दी सभ्यता सिखाती है...
मेरे देश में हर बात हाथ जोड के बोली जाती है
मेरी भाषा मुझे सभ्यता सिखाती है.....
पत्थरों को पूजना, नदियों में मोक्ष ढढना
यहो अग्नि को भी साक्षात् देवों की उपाट्टिा दी जाती है मेरे देश में हर बात हाथ जोड के बोली जाती है...
कहीं हल्दियों के छापे, तो रंगीन कहीं मांडने हैं,
छम-छम करती पायल चलती है तो
संगीत सुनाती जाती है...
मेरी भाषा सूर्य को भगवान बताती है
मेरे देश में हर बात हाथ जोड के बोली जाती है...
साडयो तन ढके, हया “ाृंगार करे
जो बात आए आन की तो औरतें जौहर भी कर जाती है मेरी भाषा मुझे अडिग रहना सिखाती है
मेरे देश में हर बात हाथ जोड के बोली जाती है...
सबको बोह खोल अपनाती है
हर रंग में भी ढल जाती है
हिन्दी है तो हिन्द है, ये सीख हर रोज सिखलाती है। मेरे देश में हर बात हाथ जोड के बोली जाती है....
२८८/२२, चौथी गली, बिहारी गंज, अजमेर-३०५००१ मो. ७६९०९ ००६३९