fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

संत वील्होजी की रेवाडी से रामडावास तक...

रामचन्द्र बिश्नोई

विश्वप्रसि= थार का रेगिस्तान, जहो कोसों तक प्राणी और पाणी मिलना दुर्लभ होता है, उस पर सालों तक पडता अकाल और भूख-प्यास से व्याकुल यहो से पलायन करते लोग, जनशून्यता को और भी भयावह बना देते हैं। जेठ-आषाढ में चलती ओट्टिायों से बनते-बिगडते टीलों वाला यह क्षेत्र सदा से ही दुर्लभ, रोचक और रहस्यमयी रहा है। सैकडों मीलों तक पसरे सन्नाटे से ऐसा लगता है जैसे यहो की समस्त चेतना चादर ओढकर सो गई है, ऐसे बियाबान में यहो की सोई चेतना को जागृत करने का बीडा स्वयं भगवान ने उठाया। संवत् १५०८ में इस मरुभूमि के एक गोव पीपासर में श्री जाम्भोजी ने अवतार ट्टाारण किया। आट्टाी सदी तक समराथल पर विराजमान रहकर उन्होंने जाम्भाणी साहित्य के अनुसार १२ करोड लोगों तक अपना संदेश पहचाया, जिसमें इस मरुभूमि का बहुत बडा हिस्सा भी इनके सम्फ में आया। अपने इस महाी कार्य को करने के बाद इस मृत्युलोक से स्वट्टाामगमन करते समय लोगों के आर्त आग्रह को ट्टयान में रखते हुए श्री जाम्भोजी ने अपने द्वारा संस्थापित बिश्नोई पंथ की बागडोर एक ऐसे व्यक्ति को सौंपने का निर्णय लिया, जिसका अभी तक उनसे मिलना भी नहीं हुआ था। रोचक बात तो यह है कि उसकी उम्र अभी चार वर्ष ही थी और बडे आराम से अपनी मो की गोद में सो रहा था, उसे तनिक भी भान नहीं था कि सैकडों कोस दूर समराथल पर स्वयं भगवान उसके पड्डाभिषेक का सामान पंथ को सौंप रहे हैं। कहते हैं कि श्री जाम्भोजी के वियोग में असंख्य लोगों ने उनके साथ ही अपने प्राणों का परित्याग कर दिया, तभी इस उाराट्टिाकारी बालक ने भी चार वर्ष की अवस्था में अपनी ओखों को बंद कर लिया तथा लोग कहते हैं कि किसी बीमारी से इसकी ओखें चली गई थी। पर जब बालक आठ वर्ष बाद मुकाम पर आता है और बेहद व्याकुल होकर ’गुरु तार बाबा‘ नामक साखी बोलता है, तब इसके भावों को देखकर ऐसा लगता है कि इस बालक को आठ वषोङ में अपने इष्ट-विहीन जगत को देखना गवारा नहीं था और मुकाम आते ही इसे जगत दृष्टिगोचर होने लगता है। आगे ’पंथ के ट्टाणी‘ बने वील्होजी महाराज ही ये बालक थे।
इनका जन्म वर्तमान हरियाणा की रेवाडी नगरी में संवत् १५८९ में हुआ और संवत १६७३ में इन्होंने राजस्थान में जोट्टापुर जिले के रामडावास गोव में अपने नश्वर शरीर को छोडा। रेवाडी से रामडावास तक के इनके जीवन सफर में अनेक ऐसी विलक्षण उपलब्ट्टिायो हैं, जिनका एक-एक का विशद् विवेचन करने पर ग्रंथ रचे जा सकते हैं।
आज विश्व की उत्कृष्ट जीवनशैली और पर्यावरणीय समर्पण के कारण दुनिया में बिश्नोई समाज को जो सम्माननीय स्थान प्राप्त है उसके पीछे बहुत बडा योगदान वील्होजी महाराज का है। श्री जाम्भोजी ने जिस चेतना की अग्नि को प्रज्जवलित किया, वील्होजी महाराज ने उसमें आहुतियो डालकर उस अग्नि को अमर कर दिया। पंथ की आट्टयात्मिक उन्नति के साथ-‘साथ उसे सामाजिक नेतृत्व प्रदान करने वाला ऐसा अलौकिक व्यक्तित्व पंथ को दोबारा नहीं मिला।
संस्कृति और समाज का सम्बन्ट्टा सापेक्ष है। संस्कृति, समाज और साहित्य का त्रिवेणी संगम आदि से अंत तक सदैव एक रूप में रहता है। संत साहित्य इस सुंदर संगम का श्रेष्ठतम “ाृंगार है। साहित्य समाज का दर्पण है तो संत साहित्य समाज का सद्गुरु है, जो समाज के लिए सदा-सर्वदा मंगलकारी है। संत साहित्य द्वारा निर्दिष्ट पंथ समाज के लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी है। संत वील्होजी महाराज विरचित संत वाणी की वे विशेषताऐ जो समाज सुट्टाार के लिए उपयोगी तथा समाजो=ार का सशक्त आट्टाार है।
सि= साट्टाक वील्होजी का आगमन बिश्नोई पंथ के लिए वरदान साबित हुआ, श्री जाम्भोजी के परम ट्टााम गमन के बाद जब लोग हताशा-निराशा अनुभव कर रहे थे। उसे समय लक्ष्मण की तरह मूर्छित पडे पंथ के लिए अमृत-संजीवनी लाने वाले वील्होजी हनुमान साबित हुए। अपने जीवन के बहार वर्ष पंथ को बेहतर बनाने में वील्होजी ने समर्पित कर दिये। इस बहुमुखी व्यक्तित्व के ट्टानी महामनीषी ने जीवन में कितना परिश्रम किया होगा। रात्रि के एकान्त में साथ- भजन, साहित्य-सृजन करते और दिन में ट्टार्म-प्रचार करते तथा सामाजिक व्यवस्था देखते। हर पल र्या शील रहना ही इन्हें अभिष्ट था। वे कहते हैं - हे मनुष्य! कर्म कर उसी से तुम्हारी दरिध्ता दूर होगी, उाम कर्म करते हुए विष्णु का जप करो, इससे तुम्हारे पाप नष्ट हो जायेंगे।
उदिम करि रे आदमी, उदिम दालिद जाय। जीभ विसन को नोव ले, अहनिस साम्य ट्टिायाय। विसन जंपो उदिम करौ, पाप पराछित जाय।।
एक बार वील्होजी महाराज ट्टार्मभ्रष्टों को सुट्टाारने के लिए सहायता मोगने के लिए जोट्टापुर दरबार में गए। जोट्टापुर नरेश संत की महिमा से परिचित होकर, प्रसन्नतापूर्वक वील्होजी से कहा कि जैसी आप सहायता चाहे वैसी ही सौत्साह देने को तैयार है, क्योंकि इस मत के सुस्थिर रहने से प्राणियों को सर्वोत्कृष्ट सुख प्राप्त होगा। हमारी प्रजा ट्टार्मशील होकर हमें भी पुण्य फल का भागी करेगी।
इस कथन से यह भी पता चलता है कि उस समय राज दरबार और जनसामान्य में बिश्नोई पंथ को कितने आदर की दृष्टि से देखा जाता था और ऐसे पंथ के मुखिया होने के नाते स्वाभाविक रूप से वील्होजी के प्रति लोगों में विशेष सम्मान था।
महात्मा गोविन्दराम जी तो यहो तक कहते हैं कि वील्होजी तो एक मुक्त पुरुष थे और बैकुण्ठ में निवास करते थे, वे तो श्री जाम्भोजी की आज्ञा से ही ट्टारती पर आये थे तथा पंथ में दया ट्टार्म को आगे बढाया था।
वील्होजी महाराज राज संतन के सिरतान,
आग्या मांन जांभैजी की देह जिन ट्टाारी है।
पंथ में पकट भये र्याी कर्म हाथ लिये,
लोगन निहार टेर दया विस्तारी है।
इस पृथ्वी पर आने के बाद ट्टार्म-प्रचार करते हुए लोगों को परमात्मा की ओर लगाने के महाी कार्य को वील्होजी, भगवान की कृपा मानते हैं और स्वयं को इसके योग्य न मानते हुए सामर्थ्य प्रदान करने के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं -
नवण्य करूे गुर आपणै, नी निरमल भाय।
कर जोडे बंद चरण सीस नुवाय नुवाय।।
ऐक जीभ मुख नान्हडो, अलप आव एण्य ठाय। हरिगुण सायर ते घणौं, मो मुखि क्यों र समाय।। ज्यौं पंखी समंद तै मो मुखि चंच छलि लेय।
सायर णिौ न थीयौ, हरि गुण पारिख एह।।
हे गुरुदेव! मैं निर्मल भाव से हाथ जोडकर और शीश झुका-झुकाकर आफ चरणों में नमस्कार करता ह। मेरी एक जीभ, छोटा मुख और छोटी अवस्था है परन्तु हरि का गुण समुध् की तरह अथाह है। वह मेरे मुख में कैसे समा सकता है। जैसे समुध् में से पक्षी पानी की चोंच भर लेता है तो भी समुध् में पानी की कोई कमी नहीं होती, इसी तरह ही हरि गण होता है।
वील्होजी का व्यक्तित्व तपोबल से परिपूर्ण ऐसा तेजोमय रहा था कि लोग बरबस ही इनकी ओर आकर्षित हो जाते थे और इसका दर्शन, स्पर्श और उपदेश पाकर स्वयं को ट्टान्य मानते थे। मार्ग तो श्री जाम्भोजी ने बता ही दिया था। पर लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है, एकमात्र परमात्मा की प्राप्त के लिए मिलने वाले इस शरीर के उड्ढेश्य को जीव भूल जाता है। हालांकि गर्भकाल में इस बात को स्मरण रखता है और गर्भ में बाहर आकर केवल ईश्वर के लिए जीवन ट्टाारण करने की शपथ खाता है, पर बाद में संसार की माया उसे सब भुला देती है। श्री जाम्भोजी के बताये मार्ग और जीव के लिए किये वादे की याद दिलाते हुए अज्ञानान्ट्टाकार में सोये जीव केा जगाने का प्रयास वील्होजी ने किया।
वील्होजी के समग्र जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो वे दयालुता की प्रतिमूर्ति लगते हैं। वील्होजी ने तो दया को ही ट्टार्म माना है, हालोकि वे कहते हैं कि कलियुग में कथित ट्टार्मट्टाारी लोग भी दयाविहीन हो जायेंगे। वे निशंक जीवहत्या करेंगे। उनके कर्म कसाई के समान होंगे पर वे ज्ञान कथन करते हुए मिलेंगे, ऐसे गुरुओं के भरोसे जो मूर्ख रहेंगे, वे निश्चय डूबेंगे।
वील्होजी तो यहो तक कहते हैं कि ’’जिसने दया रूपी ट्टार्म को नहीं अपनाया है, उसका इस संसार में आना व्यर्थ है। दयाहीन मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति नहीं कर सकता।‘‘ ट्टार्म के नाम पर जीवहत्या करने वालों को वील्होजी की यह कडी फटकार थी। ट्टार्म के सनातन लक्षणों मं अगर वील्होजी ने सर्वोपरि किसी को स्थान दिया है तो वह दया ही है।
ऐसे दयालु महापुरुष के जीवन-चरित्र में कठोरता का संकेत हमें मिलता है तो वह स्वयं के प्रति है, दया तो दूसरों के प्रति है। बात जब स्वयं के आचरण की आती है तो दया को छोडकर सत्य को पकड लेते हैं। वहो उन्हें असत्य तो क्या अशु= बोलना भी गवारा नहीं है।
सत्य के विषय में ५५ दोहों की एक स्वतंत्र रचना ’कथा सच अखरी विगतावली‘ मिलती है, जिसमें वील्होजी कहते हैं कि ’’सत्य ही भगवान है, सत्य ही भगवान को प्रिय है, उनका शाम भी सत्य है।‘‘ ऐसे सत्य को बताने वाले सतगुरु की पहचान भी सत्य से की जाती है, इसलिए मैं ऐसे सद्गुरु की वंदना करता ह, जिन्होंने मुझे ऐसी सत्य दृष्टि प्रदान की है। अ=र्सत्य बोलने वाले को ज्ञानी नहीं कहा जा सकता। सच और झूठ में भेद न करने वाला तो मूर्ख है। स्वर्ग प्राप्ति तो सच बोलकर ही की जा सकती है।
साचौ नांव विसन कौ, सतगुरु कहयौ स साच।
गुर सोई सति बंदिये, जिंहकी अबचल वाच।।
साच पियारौ साम्य दरि, सति साच दीवाष्य।
सुगर सभा सौ सांचरै, जिंह सांच सूं पिछाष्य।।
आट्टाा झूठा अरु आट्टाा साचा, गुरमुखि काढै पूरा लाचा। झूठ सांच को नहीं प्रवाणां, साच बोल न चढे विवाणा।। बोल्या कूडै आखरे, दान कुपातां दीव।
वील्ह कहै गुर दाखै, बोह दुख सहिसी जीव।।
श्री जाम्भोजी की वाणी में अहिंसा का संदेश विश्व को दिया गया किसी जीव के प्रति की गई नाममात्र की हिंसा भी उन्हें कितना व्याकुल कर देती है।
वील्होजी द्वारा रचित ’कथा जैसलमेर की‘ में उस समय के ताकतवर राजा रावल जैतसी से श्री जाम्भोजी शपथ दिलवाते हैं कि अगर तुम अपने राज्य में जीव हिंसा बन्द करवाओ तो ही मैं तुम्हारे राज्य में प्रवेश करूेगा। ऐसी अहिंसक पृष्ठभूमि से तैयार किये गये पंथ को जब वील्होजी सम्भालते हैं तो इनकी प्राथमिकता में भी अहिंसा का विषय रहता है। वे कहते हैं - गुरु महाराज ने खाण्डे की ट्टाार वाला यह पंथ बताया है। अवसर आने पर दूसरे जीव रक्षार्थ अपने प्राण दे देने चाहिए। अपने हृदय में ट्टौर्य ट्टाारण करते हुए दूसरे जीवों को बचाइये। बिश्नोई पंथ में जीव रक्षा की परम्परा वर्तमान में भी जीवित है। वृक्षों की रक्षार्थ मरना चाहिये। जैसे करमां ने अपना बलिदान किया, उसने अच्छी करनी करके इस सतपंथ को उज्ज्वल किया। इससे उसे परम ज्योति मिली। उसने जीवों को रक्षार्थ अपने प्राण दिये और गुरु महाराज की आज्ञा मानी।
गुरु जाम्भोजी की आज्ञा का पालन आज भी बिश्नोई पंथ कर रहा है तथा वर्तमान में जीव हिंसा के मामलों में पंथ जाग्रत है, जिसका वर्तमान में जीव हिंसा एक उदाहरण है। चिंकारा शिकार करने के मामले में फिल्म अभिनेता सलमान खान को पोच साल की सजा मिली।
वील्होजी कहते हैं कि वृक्षों को काटना पाप का आरम्भ है, जो दयाहीन होकर वृक्षों को काटता है और जीवों को दुःख देता है, उसे कुम्भीपाक नरक मिलता है। जहो तीखी ट्टाार से उसका शरीर काटा जाता है। यह हरे वृक्ष काटने का फल है।
रूख विरख रो पावै थंभ पाप तणौ मांडै आरम्भ। दयाहीण काटी वणरा, जीव असंख्य दहया दुंटलाय।। पान बहै करवत ज्यौं ट्टाार, वन वाद्यां का ए उपगार। दोर कुम्भ तणो ओ कारि, जीव नीपजता समै झारि।।
वृक्षों की रक्षा करते हुए अगर प्राण देना पडे तो वील्होजी कहते हैं, यह अवसर है चूक मत जाना और यह बात आज से साढे चार सौ वर्ष पूर्व कही जब पर्यावरण प्रदूषण कोई समस्या नहीं थी। उस समय लोगों ने पूछा होगा इसकी क्या आवश्यकता है? और आज विश्व आश्चर्यचकित होकर जानना चाहता है कि ऐसे ट्टार्मोपदेशक भी ट्टारती पर विचरण करते थे, जो सदियों पहले वन एवं वन्य जीवों की रक्षा करना ट्टार्म बताते थे।
वील्होजी के समय पर्यावरण रक्षा हेतु पंथ में आठ साके हुए हैं, इससे पता चलता है कि पंथ पर वील्होजी की जबरदस्त पकड थी। लोग उनके वचन को अंतिम बात मानकर आदेश पालन के लिए तत्पर रहते थे। वील्होजी ने पंथ से विलग हुए लोगों को पुनः पंथ में शामिल किया ही तथा अनेक नवीन लोगों ने भी उनतीस नियमों की आचार-संहिता को स्वीकार किया वि.सं. १६७३ की चैत्र शुक्ला एकादशी को। वील्होजी ने रामडावास में इस नश्वर शरीर का परित्याग किया, तब पंथ का ट्टारातल इतना सुदृढ हो चुका था कि इस पर चार सदी बीत जाने के बाद भी सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत बिश्नोई पंथ अचल खडा है।
स्वयं जाम्भोजी ने ’अल्लाह अलेख अडाल अजोनी सम्भु‘ कहकर ईश्वर और अल्लाह की एकरूपता का उद्घोष किया है तथा वील्होजी की वाणियों में हिन्दू- मुस्लिम एकता के रूप में साम्प्रदायिक एकता के रूप में अनेक उदाहरण है -
जपै जाप नीवाज रोजा, जुगति मिलिया सतपंथे। आस पीयासा मिलै मोमीण, मेल हुई निज तीरथे।।
पारस्परिक स्नेह के प्यासे तथा मिलन की आशा रखने वाले प्रियजनों का जाम्भोजी के मुख्य तीर्थट्टााम ’मुकाम‘ पर मिलन हुआ। जहो विष्णु का नाम जपने वाले ;हिन्दूद्ध तथा नमाज पढने वाले इस ’सतपंथ‘ अर्थात् सत के मार्ग ;बिश्नोई पंथद्ध में युक्तिपूर्वक मिले।
हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदाय के आडम्बरी लोगों को संत वील्होजी ने एक साथ एक ही भाव से कटु सत्य कहते हुए सुट्टारने की शिक्षा देते हुए कहा है*-
वांमण वांचै वैद पुराणा, काजी कुतन कुराणा।
पत्थर पूजै मसीत पुकारे, हरि ता दंहु न जांणा।।
संत वील्होजी ने कहा कि हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों के साट्टाु-संत तथा पैगम्बर सभी एक की ही उपासना करते हैं, उनके नाम और रूप भिन्न-भिन्न हैं। जाम्भोजी के इस कथन को हिन्दू-मुस्लिम सभी सत्य रूप से स्वीकार करो।
संत वील्होजी अपने जीवन के अंतिम समय रामडावास आ गये और वहो रहने लगे तथा रामडावास में ही अपने नश्वर शरीर को त्यागा। रामडावास में आज हम वील्होजी की समाट्टिा को ट्टयानपूर्वक देखते हैं तो हमें प्रस्तर पर भगवान विष्णु दृष्टिगोचर होते हैं, जो सृष्टि के महाप्रलय के समय क्षीरसागर में शयनावस्था में विश्राम करते प्रतीत हो रहे हैं। भगवान नवीन सृष्टि के सृजन तक इसी अवस्था में रहते हैं। इसी प्रस्तर के नीचे वील्होजी की स्थूल देह परम विश्राम पाते हुए अनन्त में विलीन है। जब कभी भगवान ने फिर उन्हें पुकारा तो ये किसी नवीन देह को ट्टाारण कर पुनः उठ खडे होंगे, जगत का कल्याण करने के लिए।
वील्होजी ने स्वयं साहित्य सृजन किया है और इनका साहित्यिक अवदान अमर कीर्ति को प्राप्त कर गया। अपने युग के ऐसे महान नरपुरुष को पाकर बिश्नोई पंथ ट्टान्य हो गया। जब तक इस ट्टारती पर पंथ की चमक आलोकित रहेगी, तब तक वील्होजी की दिव्य चरित्र-गाथा गाई जाती रहेगी।
संदर्भ ग्रंथ ः
१. वील्होजी की वाणी, डॉ. कृष्णलाल बिश्नोई ;सम्पादक एवं टीकाकारद्ध।
२. पोथा ग्रंथ ज्ञान, सम्पादन आचार्य कृष्णानन्द, जाम्भाणी साहित्य अकादमी, बीकानेर।
३. जाम्भोजी, बिष्णोई सम्प्रदाय और साहित्य, डॉ. हीरालाल माहेश्वरी।
४. संत वील्होजी का साहित्यिक एवं सामाजिक अवदान, सम्पादक - डॉ. देवेन्ध् कुमार सिंह गौतम।
५. पर्यावरण संरक्षण एवं खेजडली बलिदान, सम्पादक ः डॉ. बनवारी लाल सह।
६. श्री स्वामी वील्हाजी का जीवन चरित्र, सम्पादक ः साहबराम जी राहड।
शोट्टाार्थी, हिन्दी विभाग, मोहनलाल सुखाडया विश्वविद्यालय, उदयपुर, मो. ९९२८० ०१२५५