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बडे मुद्दो पर धीमी बहसें

इष्टदेव सांकृत्यायन
’’साहित्य-संस्कृति की दुनिया अपने मूल रूप में विचारों की दुनिया है। अपने समसामयिक समाज को चित्रित करते हुए वास्तव में सभी निष्कर्ष रूप में एक विचार ही अपने पाठक-दर्शक के सामने रखने की कोशिश करते हैं। कभी पहले से चले आ रहे विचारों का मूल्यांकन करते हैं, उनमें परिष्कार की गुंजाइश करते हैं, कभी उन्हीं में से किसी ऐसे विचार को झाड-पोंछ कर नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश करते हैं, जिस पर समय की ट्टाूल जम गई है। कभी दुनिया के किसी दूसरे कोने में हलचल मचा रहे किसी विचार को हम अपने परिवेश में लिए आते हैं और कुछ नया स्थापित करने की कोशिश करते हैं। इस र्मत में कई बार मीठी नोक-झोंक से लेकर तीखी झडपें तक हो जाती हैं बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि चलती ही रहती हैं। इट्टार ऐसे मौके बहुत आए और भले कहीं-कहीं उनके घाव बने रह गए हों, लेकिन सतह पर सब बहुत जल्दी ही थिर हो चुके भी दिखने लगे। इस लिहाज से देखें तो बडे मुड्ढों पर ट्टाीमी बहसों का दौर कह सकते हैं। इनमें से एक कवि-आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी का वह इंटरव्यू है जो ’पाखी‘ के जुलाई-अगस्त अंक में आया था। वैसे मैं इट्टार के दो-तीन महीनों के दौर को विवाद के बजाय रचनाट्टार्मी हस्तक्षेप के लिए रेखांकित करना पसंद करूेगा। ’साहित्य अमृत‘ का हिन्दी के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर तथा ’हंस‘ का न्यू मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषांक चर्चा में रहे। इनके अलावा ’आजकल‘ के पहले शिवपूजन सहाय और फिर कुंवर नारायण पर आए विशेषांक, साहित्य अकादमी की अंग्रेजी पत्रिका ’इंडियन लिटत्र्ेचर‘ में हिन्दी कवि केदारनाथ सिंह पर आई विशिष्ट सामग्री, ’सामयिक सरस्वती‘ के पहले आचार्य रामचन्ध् शुक्ल और फिर टत्रंसजेंडर्स पर आए विशेष अंक और फिर ’समकालीन अभिव्यक्ति‘ के प्रेम पर केन्ध्ति अंक को शामिल करना चाहगा।
हिन्दी की वैश्विक स्थिति पर केन्ध्ति है ’साहित्य अमृत‘ का अगस्त अंक। यह अंक हिन्दी के प्रति हिन्दीप्रेमियों का आत्मविश्वास बढाने वाला है। भाषा को लेकर जो एक निराशाजनक वातावरण प्रायः बनाया जाता है, यह अंक उसे नकार कर एक लौ-सी जलाने की कोशिश है। इसमें अजरबैजान, अमरीका, अर्मेनिया, ऑस्टत्र्ेलिया, इटली, केनेडा, चीन, जापान, डेनमार्क, थाईलैण्ड, नार्वे, नीदरलैंड, नेपाल, वारसा, पैसिफिक, बल्गारिया, बांग्लादेश, मारीशस, यूके, रूस, श्रीलंका, सदिी अरब, सिंगापुर, सूरीनाम, स्विट्जरलैंड और हंगरी आदि में हिन्दी की दशा-दिशा को लेकर पूरी और प्रामाणिक जानकारियो हैं। इसमें हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं के प्रश्न को लेकर एक लेख पं. मदनमोहन मालवीय का है। अगर संपादक मण्डल की ओर से यह स्पष्ट किया गया होता कि यह लेख कहो से लिया गया और यह उन्होंने कब लिखा या कहा तो यह पत्रिका की एक और उपलब्ट्टिा होती। हालोकि देश में ही साहित्य के अलावा विज्ञान, तकनीक, विट्टिा, व्यवसाय आदि अन्यान्य विषयों की वस्तु-सामग्री और उच्च शिक्षण के मामले में हिन्दी की क्या स्थिति है, इसका इसमें कोई जिर्‍ नहीं है। एक पडताल इसकी भी होनी चाहिए। सितम्बर अंक में फिर हिन्दी-अंग्रेजी विमर्श को ही लेकर आचार्य बलवंत का एक लेख है - अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त हों। इसमें शिवपूजन सहाय पर श्री नारायण चतुर्वेदी का लेख भी है। सुनील कुमार पाठक का लेख ’लोककाव्य में कअर सिंह‘ भी संग्रहणीय है।
शिवपूजन सहाय को ’आजकल‘ ने भी याद किया था अपने जुलाई अंक में। सहाय जी हिन्दी के उन बहुत थोडे से व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्हें मुंशी प्रेमचन्द, निराला और प्रसाद जैसे रचनाकारों की पाण्डुलिपियों के संपादन का अवसर प्राप्त हुआ। ’आजकल‘ के सम्पादकीय स्तम्भ ’प्रसंगवश‘ में सहाय जी का परिचय कुछ इस तरह दिया गया है, ’’सहायजी को भाषा के प्रति अपनी लगन और समर्पण की भारी कीमत चुकानी पडी। ’देहाती दुनिया‘ जैसे उपन्यास, अनेक चर्चित कहानियों और निबन्ट्टाों क इस रचनाकार का कथाकार, उपन्यासकार वाला स्वरूप कहीं पीछे छूट गया। शिवपूजन जी के व्यक्तित्व ने उनके कृतित्व को ढक लिया। निश्चय ही उनका व्यक्तित्व उनके लेखन से बडा था, लेकिन अब तक इसके कारणों का समुचित मूल्यांकन नहीं हो पाया है। समकालीन लेखकों में से अनेक उनके महव और योगदान को समझते थे। तभी राहुल सांकृत्यायन ने उन पर एक अभिनंदन ग्रंथ निकालने की योजना बनाई।‘‘ सहाय जी पर केन्ध्ति एक आयोजन में नामवर जी के व्याख्यान की अविकल प्रस्तुति इस अंक की उपलब्ट्टिा है। वहीं उनके सुपुत्र मंगलमूर्ति का डॉ. रामविलास शर्मा और सहाय जी से जुडा एक संस्मरण भी दोनों ही व्यक्तित्वों और उनकी विशिष्टताओं की कई अनछुई परतें खोलता है। ’आजकल‘ का सितम्बर अंक कुवर नारायण पर केन्ध्ति है। इसमें श्रीराम वर्मा, विनोद दास, ओम निश्चल, मनोज मोहन, साट्टाना अग्रवाल, अमित कुमार विश्वास और ममता कुमारी के लेख हैं। इसके अलावा एक लेख कुंवर नारायण का भी उनके गद्य की बानगी के रूप में है। कुंवर नारायण की ११ कविताऐ भी इसमें शामिल हैं।
’इंडियन लिटरेचर‘ के जुलाई-अगस्त अंक में अन्य चीजों के अलावा केदारनाथ सिंह पर पर्याप्त सामग्री है। इनमें पद्मा सचदेव, अशोक वाजपेयी, हरीश त्रिवेदी, मंगलेश डबराल, लीलाट्टार मंडलोई और अवट्टोश कुमार सिंह के संस्मरणात्मक लेख हैं। ये लेख केवल संस्मरण भर नहीं हैं, बल्कि केदार जी के जीवन, व्यक्तित्व और उनके कविकर्म की गहन परतें उभारते सजग और भावप्रवण लेख हैं। अनामिका द्वारा किए गए केदार जी की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद हैं।
स्मरण के ही र्मव में श्रीपत राय को याद किया गया है, ’वागर्थ‘ के अगस्त अंक में। वेंकटेश कुमार ने श्रीपत जी के व्यक्तित्व के संपादक पक्ष को खासतौर से उभारने की कोशिश की है। ’स्वतंत्रता का अर्थ‘ विषय पर एक महवपूर्ण परिचर्चा है। संजय जायसवाल की इस प्रस्तुति में सुट्टाीरचन्ध्, नंदकिशोर आचार्य, विजय कुमार और अवट्टोश कुमार सिंह शामिल हैं। इसमें नंदकिशोर आचार्य की एक बात ट्टयान देने योग्य है, ’’किसी भी समाज को वास्तविक अथोङ में तभी स्वतंत्र कहा जा सकता है, जब वह हिंसा के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष किसी भी रूप से पूर्णतः मुक्त हो।‘‘ भीष्म साहनी पर जवरीमल्ल पारख और शंकर के लेख महवपूर्ण हैं। कहानियों-कविताओं के अलावा इसमें राट्टाावल्लभ त्रिपाठी की संस्कृत कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी है, जो कौशल तिवारी का किया हुआ है। राट्टाावल्लभ जी की कविताऐ स्पष्ट करती हैं कि आप न पढना चाहें तो यह एक अलग बात है, लेकिन संस्कृत साहित्य वहीं नहीं ठहरा है जहो आप सोच रहे हैं। ये कथ्य और शिल्प दोनों ही स्तरों पर बिल्कुल नई रचनाऐ हैं।
आचार्य शुक्ल हिन्दी साहित्य की यात्रा में वह दिशा-संकेत हैं, जिन पर ट्टयान दिए बिना चला ही नहीं जा सकता। इसके बावजूद ट्टयान नहीं आता कि बीते एक दशक में किसी पत्रिका ने उन पर कुछ विशेष सामग्री दी हो। ’सामयिक सरस्वती‘ ने अपने अंक में इस कमी को पूरा किया है। आचार्य शुक्ल के आलोचना विट्टाान, उनकी आलोचकीय एवं इतिहास दृष्टि, हिन्दी में साहित्य-शास्त्र के विकास में उनकी भूमिका और वैचारिक सीमाओं को लेकर अच्छी शोट्टापरक जानकारियो दी गई हैं तो प्रश्न भी उठाए गए हैं और प्रश्नों के उार भी आए हैं। विभिन्न वैचारिक आट्टाारों और मानकों वाले लेखक इसकी उपलब्ट्टिा हैं। सदानन्द शाही आचार्य शुक्ल की मूल्यांकन प=ति पर प्रश्न उठाने की कोशिश करते हैं तो सुट्टाीश पचौरी हिन्दी-उर्दू के प्रश्न को लेकर उनकी पक्षट्टारता और उसके कारणों का वस्तुगत विश्लेषण करते हैं। उनका प्रश्न बहुत महवपूर्ण है और शुक्लजी से सम्बन्ट्टिात कई प्रश्नों के जवाब देने वाला भी, ’’जब सर सैयद उर्दू के आगे हिन्दी को दबाकर रखने की जुगत करें और तासी भाषा को ट्टाार्मिक नजर से देखें तो क्या सिर्फ शुक्ल जी को साम्प्रदायिक माना जाएगा?‘‘ पत्रिका का अप्रैल-सितम्बर अंक थर्ड जेंडर पर केन्ध्ति है। इसमें चित्रा मुद्गल और सुभाष अखिल के उन उपन्यासों के अंश हैं जिनमें थर्ड जेंडर पात्र आए हैं। तो निर्मला भुराडया और नीरजा माट्टाव ने अपनी ऐसी ही रचनाओं की रचना-प्रर्याभ के बारे में बताया है। मोहम्मद हुसैन डायर द्वारा किया गया तीन लोगों का साक्षात्कार और कुसुम अंसल की कहानी ’ई मुर्दन का गोव‘ खास गौरतलब है।
अब तक दुबई से प्रकाशित होती रही पत्रिका ’निकट‘ का २०वां अंक इस बार कानपुर से प्रकाशित हुआ है। इसमें लगभग पूरे भारत के हिन्दी रचनाकारों से कहानियो और कविताऐ जुटाई गई हैं। राजेन्ध् राव और जयनारायण बुट्टावार जैसे वरिष्ठ रचनाकारों से लेकर अभिषेक चंदन और भरत प्रसाद जैसे युवा रचनाकार तक शामिल हैं। लघुकथाऐ और समीक्षाऐ भी कई हैं और महवपूर्ण हैं। ’परिकथा‘ के सितम्बर- अक्टूबर अंक में राजेन्ध् कुमार की ग्यारह कविताऐ हैं। उन्हीं में से एक ’आम आदमी‘ - ’’अखबारों में इन दिनों/रोज छपती है हमारी तस्वीर/दिया जा रहा है हमें श्रेय/बहुत लम्बी उम्र वाले इरादों को जन्म दने का/मगर कितनी अजीब बात है/किसी को/हमारे भाग्य से/कोई ईर्ष्या नहीं होती।‘‘ कई और कहानियों- कविताओं के अलावा ’राग दरबारी‘ में यथार्थ और यथार्थवाद विषय पर रमेश उपाट्टयाय का लेख भी महवपूर्ण है।
व्यावसायिक ही नहीं, साहित्य की लघु पत्रिकाओं के भी प्रेम पर विशेषांक प्रायः आते ही रहते हैं। अक्सर इन विशेषांकों में प्रेम को या तो देह तक सीमित कर दिया जाता है या फिर ऐेसे आट्टयात्मिक तल पर बिठा दिया जाता है कि लगता है जैसे ये इस दुनिया का पदार्थ ही नहीं है। प्रेम पर ही केन्ध्ति ’समकालीन अभिव्यक्ति‘ का अंक ६४-६५ हट घ्घ् है। पेशे से आर्किटेक्ट नरेन्ध् नागदेव की कहानी ’मुक्का ः एक प्रेमकथा‘ का एक अंश देखें, ’सुन रही हो तुम...! स्कूल मास्टर भासिाहब जोगलेकर की बेटी सुनंदा जोगलेकर! इस इलाके के शक्तिशाली कुंवर साहब ने तुम्हें प्यार करना आरम्भ करने का आदेश दिया है। उन्होंने तुम्हारी पसन्द-नापसन्द नहीं पूछी है। तुम्हें महज सूचना दी जा रही है।‘‘ अब प्रेम पर कहानियो हो सकती हैं तो व्यंग्य क्यों नहीं! हरिशंकर राठी का व्यंग्य ’प्रेम गली अति सांकरी‘ से एक उ=रण, ’’आज नेता साा से, अफसर घूस, रुतबे और पद के अहंकार से, जनता मुय्तखोरी से, कर्मचारी कामचोरी से, अट्टयापक ट्यूशन से, छात्र-छात्राऐ र्मोशः गर्ल”ेंड और ब्वाय”ेंड से, नौजवान फैशन और अनुशासनहीनता से प्रेम करने लगे हैं और अनन्य प्रेम करने लगे हैं।‘‘ रामदरश मिश्र की दो गजलें और कविताऐ भी हैं। ट्टारोहर स्तम्भ में अनिल डबराल ने प्रेम के स्मृतिशेष कई स्थानों का जिर्‍ किया है। ’चर्वा क‘ के अंक ४४ में कहानियों, कविताओं, लघुकथाओं और वैचारिक निबन्ट्टा के अलावा चार शोट्टा-निबंट्टा भी हैं। किरणबाला का ’द्विज की साहित्यिक साट्टाना‘, रजनी प्रताप का ’हिन्दी उपन्यास साहित्य में लघु उपन्यासों का अवदान‘, मट्टाुकर अष्ठाना का ’प्रत्यभिज्ञा-दर्शन और कामायनी‘ एवं मंजू पांडेय का ’हिन्दी-साहित्य के विकास में विभिन्न संस्थाओं का योगदान‘।
२८, मीना बाग, ;निर्माण भवन एंटत्री गेट के सामनेद्ध, मौलाना आजाद रोड, नई दिल्ली-११, मो. ७८३५० ६८२५९