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कूप मंडूक

गोपीनाथ पारीक ’गोपेश‘

बच्चो! एक कहानी सुन लो
सुनना ट्टयान लगा के।
सुनना और सुनाना सबको
गुनना चिा लगा के।।
एक कुऐ में मेंढक रहता
था देखो अभिमानी।
अपने को वह ज्ञानी समझे
अन्यों को अज्ञानी।।
उस कुऐ में रह इतराता
खूब छलोग लगाता।
कभी इट्टार को कभी उट्टार को
दौड दौड सुख पाता।।
एक दूसरा मेंढक जो था
वह समुध् में रहता।
उछल लहर के साथ गिरा वह
ट्टारती पर दुःख सहता।।
चलते-चलते कुओ एक जब
उसको दिया दिखाई।
कूद गया उस कुऐ में वह
खुशियो मन में छाइङ।।
कुऐ वाले मेंढक ने जब
दूजा मेंढक देखा।
नफरत के भावों से छाई
उसके मुख पर रेखा।।
’आया बोल कहो से भाई
किस जल में रहता है।
तेरा परिचय मुझे सुना दे
कह रे क्या कहता है‘।।
’मैं समुध् में रहने वाला
यह परिचय है मेरा।
दैवयोग से हुआ मिलन यह
भाई! तेरा मेरा‘।।
दोन मेंढक मिले वहो पर
अपनी बातें करते।
खा खाकर कीडे जल के वे
पेट उन्हीं से भरते।।
उस समुध् के मेंढक से यों
कुऐ वाला बोला।
अपनी शंकाओं का चिद्दा
उसके आगे खोला।।
क्या तेरा समुध् वह, इस
कुऐ के जितना है।
लगा छलांग बूझता उससे
कह दे क्या इतना है।।‘
’वह समुध् तो बहुत बडा है
भरा वहो जल भारी।
तेरा कुओ कहो बराबर
तज अपनी होशियारी।।‘
’मेरे इस कुऐ से बढकर
नहीं समुध् वह तेरा।
नहीं देख तू इस कुऐ को
बडा बहुत यह मेरा।।‘
कौन खपाये सिर अपना
तू नहीं मानने वाला।
’कूम मण्डूक‘ कहा जाये तू
अल्प जानने वाला।।‘
कहकर यों समुध् का मेंढक
चुप होकर जा बैठा।
किन्तु ’कूप मण्डूक‘ कुऐ में
रहा सदा ही ऐंठा।।
२१, रामेश्वर ट्टााम, मुरलीपुरा स्कीम, जयपुर-३०२०३९ मो. ९२१४८ ८१३७५