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समकालीन सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक संदर्भ तथा वर्तमान हिन्दी साहित्य

राजकुमार लाटा

जब भी साहित्य के संदर्भ में विचार होता है तो यह बात अवश्य ही निकल कर आती है कि साहित्य में क्या किया जा रहा है? क्या साहित्य परिवर्तित हो रहा है? निश्चय ही साहित्य कभी भी जडवस्तु की तरह स्थिर नहीं रह सकता। साहित्य हमेशा मनुष्य के भावों एवं विचारों से जुडा है। भाव एवं विचार परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। उनकी झलक साहित्य में सदैव उपस्थित रहती है, अतः साहित्य भी परिवर्तनशील होता है। यह कहा जाता रहा है कि ’साहित्य समाज का दर्पण होता है।‘ यह सच भी है। साहित्य समाज की कमियों, विशेषताओं और प्रवृायों को अपने भीतर समाहित रखता आया है और उसके अनुरूप ही उसका स्वरूप उभर कर आता है। साहित्य की रचना की जाए या फिर उसका अट्टययन किया जाए, वह कभी काल निरपेक्ष नहीं हो सकता। हो कालजयी अवश्य हो सकता है। अतः उसका काल विभाजन करते हैं तथा नामकरण भी करते हैं। यह नामकरण ही समय विशेष के साथ जुडे साहित्य की विशेषताओं को हमारे समक्ष लाता है। हिन्दी साहित्य के इतिहास को मूलतः तीन काल खण्डों में बांटा जाता है। प्रत्येक कालखण्ड का यदि आवश्यक हुआ है तो उप विभाजन भी किया गया है। इन सबसे साहित्य का एक सामान्य अट्टयेता भी निश्चय ही परिचित है। हमारा मूल विषय साहित्य के इतिहास में उसका काल विभाजन नहीं है, अतः हम इस तरफ ट्टयान नहीं देंगे।
साहित्य के इतिहास में हर कालखण्ड का अपना नाम है, उसकी अपनी प्रवृायो हैं जो एक हद तक स्पष्ट भी है। विशेष प्रवृा या ट्टाारा विशेष से जुडे होने के कारण इनका नामकरण एवं पहचान करना आसान रहा है। परन्तु आट्टाुनिक काल में साहित्य का न तो प्रवृायों से और न ही ट्टाारा विशेष से लम्बे समय तक जुडाव रहा है। अतः समकालीन साहित्य का न तो विभाजन ही हो पाया है और न ही नामकरण। इसका तात्पर्य यह तो हो नहीं सकता कि इस युग में साहित्य की कोई प्रवृा ही नहीं रही। या फिर यह तात्कालिक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविट्टिायों से अछूता रहा हो। वर्तमान युग में विशेष रूप से सन् १९८० के पश्चात साहित्य की यह विशेषता रही है कि वह सामाजिक परिवर्तनों के साथ कदमताल करते हुए चला है तथा आवश्यकता होने पर नेतृत्व प्रदान कर समाज को नया मार्ग भी दिखाया है। इतना सब होते हुए भी वर्तमान साहित्य किसी विचारट्टाारा विशेष की कारा में बंट्टाकर नहीं रहा है। वर्तमान साहित्य के साहित्यकार ने समय की नब्ज को पकडा है एवं सामने उपस्थित समस्याओं से सरोकार रखते हुए उनका सामना कर उनके समाट्टाान का भी प्रयास किया है। इस शोट्टा-पत्र के माट्टयम से इनमें से कुछ ज्वलंत समस्याओं पर ट्टयान केन्ध्ति कर निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत वर्तमान हिन्दी साहित्य की स्थिति पर विचार किया है -
१. वर्तमान साहित्य में नारी -
नारी प्राचीनकाल से ही साहित्य का केन्धीय विषय रहा है। समय के अनुसार दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न रहा है। वर्तमान काल से पूर्व नारी मात्र सम्मान का पात्र रही है या फिर उसे “ाृंगार का विषय बना दिया गया। वर्तमान साहित्य नारी पर विचार करता है तथा विचार करते हुए नारी की स्थिति हेतु पुरुष पर आक्षेप भी लगाता है। नारी के बारे में पुरुष क्या सोचता है, इससे आगे जाकर यह बताया जा रहा है कि नारी स्वयं अपने बारे में क्या सोचती है। आज की नारी पुरुषों के बारे में व तात्कालिक समाज के बारे में क्या विचार रखती है। इस संदर्भ में सिमोन नारी के विचार प्रकट करते हुए लिखती है कि ’स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे स्त्री बना दिया जाता है।‘ सदियों से पुरुष प्रट्टाान समाज में रहने के कारण उसकी मनोवृा पिंजरे में बंद तोते की भोति हो जाती है जो खुला छोडने पर भी मुक्त आकाश में उडने के प्रति उदासीन रहता है। ’जयन्ती रथ‘ की ये कविता नारी की स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहती है -
मेरी बेटी अपनी गुडया से कहती है -
’’मर जाती तो अच्छा था, मुझे कितना परेशान करती है‘‘ ठीक यही बात मेरी नानी ने मेरी मो से कही थी, और मो ने मुझसे कही थी।
इसी तरह स्त्री की मजबूरी और भय को प्रकट करते हुए शीला सुभध देवी अपनी कविता में लिखती है -
पैदा होते ही/मेघा को सरौते से काटकर/
सपाट बना दिया गया/विचारों की कोंपल को/
सिर उठाने ही न दिया/बंट्टानों के ट्टाागों से होठों को सी दिया बस/
उसके बाद जैसे सब कुछ रुक गया/मेरे पैर चलना भूल गए/जो जहो खींच ले जाता/मैं चली जाती।
इतना सब कुछ झेलने के पश्चात भी आज की नारी हार नहीं मानती है। वह स्वतंत्रता की चाहत रखती है। यहो तक कि वह प्रतिशोट्टा भी लेना चाहती है। निर्मला पुाुल की कविता -
मैं जानती ह कि तुम क्या सोच रहे हो मेरे बारे में, वही जो एक पुरुष स्त्री के बारे में सोचता है।
मैं चुप ह तो मत समझो मैं गगी ह
या कि मैंने रखा है आजीवन मौन व्रत।
गहराती चुप्पी के अेट्टोरे में सुलग रही है भीतर मेरे जो आर्‍ोश की आग, उसकी रोशनी में पढ रही ह तुम्हारे खिलाफ अकेले लडने के खतरों के खेल पर याद रखो
तुम्हारी मानसिकता की पेचीदी गलियों से गुजरती मैं तलाश रही ह तुम्हारी कमजोर नसें
ताकि ठीक समय पर, ठीक तरह से कर सक हमला और चला सक सरेआम
गिरेबान पकड के कि मैं वो नही ह, जो तुम समझते हो।
यह नहीं कि वर्तमान साहित्य में मात्र कविता के माट्टयम से ही नारी की परिस्थितियों पर विचार हुआ हो बल्कि साहित्य की अन्य विट्टााओं जैसे कहानी, उपन्यास, एकांकी व नाटक आदि में भी नारी की स्थिति पर सजगतापूर्वक चिंतन सतत रूप से चल रहा है।
इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर हिन्दी साहित्य में महिला साहित्यकारों के आगमन से साहित्य के क्षेत्र में एक र्‍ांतिकारी मोड आ गया है। इन साहित्यकारों ने महिला जीवन की समस्याओं, रूढयेां व परम्पराओं की जकडन को अट्टिाक संजीदगी से व्यक्त किया है। इन साहित्यकारों द्वारा रखी गई कुछ समस्याऐ जो ट्टयान आकर्षित करती है, वे इस प्रकार हैं -
दाम्पत्य जीवन में दरार और विघटन, उनका आर्थिक- शारीरिक और मानसिक शोषण, समता का अट्टिाकार न मिलना, दोयम दर्जे का माना जाना, विकास का पर्याप्त अवसर न मिलना, उनकी अस्मिता पर उठते प्रश्न, कामकाजी महिलाओं का आत्मसंघर्ष तथा आट्टाुनिकता व नैतिकता में द्वंद्व इत्यादि।
पिर जिन समस्याओं की तरफ इशारा किया गया है उन पर महिला साहित्यकारों द्वारा खुल कर लिखा गया है। कृष्णा सोबती के उपन्यास की नायिका ’मित्रोमरजानी‘ पुरुषों द्वारा दी गई छवि को उतार फेंकती है। पारम्परिक स्त्री की भोति उसे अपनी नियति का खेल स्वीकार नहीं है। वह विधेह कर कहती है, ’’अम्मा अपने पहलवान बेटे को किसी वैद्य- हकीम के पास ले जा। यह लीला उसके वश की नहीं है।‘‘
शशिप्रभा शास्त्री के उपन्यास ’सीढयो‘ में नारी संस्कारों के द्वंद्व में झूलती रहती है। ’उम्र एक गलियारे की‘ नामक उपन्यास में ’सुनन्दा‘ नारी जीवन को सरल नहीं मानती है।
नासिरा शर्मा के उपन्यास ’शाल्मली‘ की नायिका पति के व्यंग्य-बाणों के कारण उस पर होने वाले प्रहारों के विरोट्टा में सीना तानकर खडी हो जाती है। इसी प्रकार राजी सेठ के उपन्यास ’तत्सम‘ में वसुट्टाा के विट्टावा होते ही परिवार व समाज का दृष्टिकोण बदल जाता है, परन्तु वसुट्टाा दृढतापूर्वक सामना करती है। इनके अलावा जिन लेखिकाओं ने नारी समस्याओं पर उपन्यास लिखे और हिन्दी साहित्य को समृ= किया, उनमें ममता कालिया, मृदुला गर्ग, मंजुला भगत, मन्नू भंडारी आदि प्रमुख हैं।
ेकहानी विट्टाा में भी नारी की समस्याओं पर जमकर प्रकाश डाला गया है, परन्तु उनका विस्तार से वर्णन यहो सम्भव नहीं है। फिर कुछ कहानीकार लेखिकाओं के नाम का उल्लेख करना आवश्यक है। मणिका मोहिनी, दीप्ति खण्डेलवाल, मृणाल पाण्डे, सुट्टाा अरोडा, उषा प्रियंबदा, चित्रा मुद्गल, मालती जोशी, शिवानी, सूर्यबाला, क्षमा शर्मा, नासिरा शर्मा आदि लेखिकाओं की कहानियों के माट्टयम से वर्तमान साहित्य में नारी के प्रतिवाद के स्वर सुनाई देते हैं।
२. वर्तमान हिन्दी साहित्य में दलित
आट्टाुनिक युग से पूर्व दलित, पीडत एवं आदिवासी हिन्दी साहित्य में कभी भी प्रमुखता से स्थान नहीं पा सके थे। स्वतंत्रता से पूर्व प्रेमचन्द के साहित्य तथा स्वतंत्रता के पश्चात के साहित्य में दलितों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। पहले से मान्यता प्राप्त साहित्यकारों द्वारा तो दलित समाज पर विचार किया ही गया है। इसके साथ-साथ स्वयं को दलित कहने वाले लेखकों का भी एक बहुत बडा समूह साहित्य सृजन में सर्यय भूमिका का निर्वहन करने लगा। दलित चेतना के बहुत से ऐसे बिन्दु जो पूर्व के साहित्य में नहीं उठाए गए, वे बिन्दु इस समय साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान पाने लगे। जिनमें से प्रमुख बिन्दु निम्नांकित हैं -
अम्बेडकर के दर्शन को स्वीकार करना, वर्ण व्यवस्था, जातिभेद व साम्प्रदायिकता का विरोट्टा, अलगाव नहीं भाईचारे का समर्थन, पजीवाद का विरोट्टा, सामाजिक न्याय की पक्षट्टारता, सामन्तवाद व ब्रा॰णवाद का विरोट्टा, पारम्परिक सौंदर्यशास्त्र का विरोट्टा इत्यादि। इन मुड्ढों के साहित्य में चित्रण के माट्टयम से ये लेखक शोषण का विरोट्टा करते बराबरी का दर्जा पाने की मोग करते हैं। ’दलित चेतना‘ कविता में डॉ. एन. सिंह कहते हैं -
दुकान हमारी भी है/और तुम्हारी भी/
ये बात और है कि/हमारी दुकान पर बिकता है जूता और तुम्हारी दुकान पर/रामनामी
हमारे लिए जूतों का महव वही है/
जो तुम्हारे लिए रामनामी का/
आओ समानता का तार पकडें/एकता का सूत्र गढें साथ बढें।
पूर्व जन्म आदि ढकोसलों का विरोट्टा भी इस समय के साहित्य में मिलता है। ’पूर्व जन्म का ढकोसला‘ कविता में सोहनपाल सुमनाक्षर ने समाज में व्याप्त अंट्टाविश्वास को इस प्रकार व्यक्त किया है -
मेरे परदादा मर गए जूठन खाते/उतरे चिथडे पहनते, खेत बोते जोतते!
इसे पूर्व जन्मों का फल मानते-मानते/और जमींदार/ फूलता गया/फलता गया/
जमींदार का वंश बढता गया/आकश बेल की तरह/ इनका खून चूसते-चूसते/ट्टार्म का भय दिखाकर/ नीच कमोङ का फल बताकर...
...पर/अब मैं पूर्व जन्म नहीं वर्तमान देखता ह।
;अंट्टाा समाज और बहरे लोगद्ध
डॉ. अम्बेडकर द्वारा विकृत रूढयों, परम्पराओं, अंट्टाविश्वासों, आडम्बरों, देवी-देवताओं और अवैज्ञानिक सोच का खण्डन व विरोट्टा किया गया। इसी बात को अपने काव्य में मोहनदास नैमिशारण्य ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हुए स्पष्ट करते हैं*-
ईश्वर की मौत उस पल होती है/
जब मेरे भीतर उठता है सवाल/
ईश्वर का जन्म/किस मो की कोख से हुआ/
ईश्वर का बाप कौन है
जयप्रकाश अपनी कविता में इसे आर्‍ोश की सीमा तक ले जाते हैं -
शुर्‍ है तू नहीं/केवल ट्टार्म के ट्टान्ट्टो का/
एक टेत्र्ड नेम है/अगर सचमुच तू कहीं होता/
तो सदियों की अपनी यातना का हिसाब मैं तुमसे जरूर चुकाता।
दलितों के साथ होने वाले अन्याय का प्रतिकार करते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं -
कभी नहीं मोगी बालिश्त भर जगह/
नहीं मोगा आट्टाा राज भी/मोगा है सिर्फ न्याय/
जीने का हक/थोडा सा पीने का पानी....
...जब-जब भी कुछ मोगा/वे गोलबन्द होकर टूट पडे मैं अवाक! चर्व्यूाह में ट्टांसे/अभिमन्यु की तरह देखता रह गया....
इसके अलावा ’आत्मकथा‘ और ’कहानियों‘ के माट्टयम से भी दलित आवाज को सशक्त तरीके से उठाया जा रहा है। प्रमुख आत्मकथाओं में ’जूठन‘, ’अपने-अपने पिंजरे‘, ’दोहरा अभिशाप‘ व ’तिरस्कृत‘ आदि हैं, जिनमें यह आवाज उठाई गई है।
कहानीकारों व उनकी कहानियों के संग्रह में डॉ. सुशीला टाकमोरे का ’टूटता वहम‘, सूरजपाल चौहान का ’हैरी कब आएगा‘, डॉ. दयानन्द बटोरी का ’सुरंग‘, ’कफनखोर‘ आदि प्रमुख कहानी संग्रह हैं।
इन कहानियों के संदर्भ में रमणिका गुप्ता का यह कथन ट्टयान देने योग्य है कि - ये कहानियो सामाजिक बदलाव की बात करती है। इन कहानियों में आर्‍ोश है, आग है, गुस्सा है तो साथ-साथ संवेदना, मानवीयता और सब्र भी है। न्याय की उत्कृष्ट लालसा है, समानता की तीव्र ललक है। भाईचारे की भावना है, आदर पाने की इच्छा भी बलवती है।
इन दो प्रमुख ट्टााराओं के अतिरिक्त वर्तमान साहित्य समाज की विविट्टा प्रवृायों को अपने कलेवर में समेटता हुआ आगे बढता है। इनमें से सभी पर तो नहीं, परन्तु कुछ प्रवृायों पर दृष्टि डालकर विचार करना शोट्टा-पत्र के लिहाज से आवश्यक है।
३. मनुष्य मन का बढता जहर -
आज के मनुष्य का स्वभाव इतना खराब हो गया है कि वह बिना कारण के अपने स्वाथोङ के वशीभूत हो प्रवृागत रूप से किसी को भी कितना ही बडा नुकसान कर सकता है। कवि का संवेदनशील मन उसकी तुलना सोप से करने को मजबूर हो जाता है। कवि (तुराज की कविता ’समय के घाव‘ तथा मायामृग की कविता ’सोप और आदमी‘ में इसकी बानगी मिलती है -
पहले (तुराज की कविता -
इस समय तो किसी भी आदमी का नाम विषदन्त हो सकता है,
किसी को भी रूप विग्रह कहा जा सकता है,
कोई भी शांति भक्षित हो सकता है।...
...बाजार से गुजरते हुए पशुओं में भय है
कि किसी का विष हिंसा और विनाश की हवस उन्हें मार सकती है निरपराट्टा।
इसी प्रकार मायामृग कहते हैं -
भीतर जागा सोप!/फुत्कारा-जहर उगला/
भीतर सब नीला हो गया।.....
.... भीतर फैलता जहर/मीठा लगने लगा,
आदमी शनैः शनैः मरने लगा/
सोप शनैः शनैः बढने लगा।
४. परिवर्तित होते व दरकते रिश्ते -
समय के साथ रिश्तों की बनावट में अन्तर आता है। ’पिता अब भी चिल्ला रहा है‘ कविता में कवि दफैरून कहते हैं -
पिता ने कहा ’हाथ पकडो‘/पुत्र ने नहीं पकडा/
छोटा था सो खेल में तब्दील किया पिता का कहा/ हेसता हुआ दौड पडा सडक पर/
तेज रय्तार वाहनों से डर गया पिता/
और दौड कर हाथ थामा/
चलता रहा ये खेल दिनों, वषोङ /
खेलते-खेलते पिता बूढा हो गया.....
..... पिता डरा हुआ अब भी चिल्ला रहा है
सडक किनारे खडा/हाथ पकडो, हाथ पकडो
५. शहरीकरण एवं गोवों से पलायन का दुष्प्रभाव
जब शहर बसते हैं तो गोव के लोग रोजी-रोटी के लिए तथा अपने सपने साकार करने के लिए शहरों में आकर बसते हैं तथा स्वयं की सभ्यता एवं संस्कृति को भूल जाते हैं। कविता ’हम शहर में आकर इस तरह ठहरे‘ में देखें -
शहर में आए/तो सबसे पहले ओखें गई/
फिर गई जीभ/फिर गए कान/
फिर पैरों ने जवाब दिया/फिर हाथों ने मना किया/... ... कि शहर में आकर इस तरह ठहरे -
हुए अेट्टो/हुए गगे/हुए लेगडे/हुए लूले/हुए बहरे।
यह कविता स्पष्ट करती है कि मानव होने के नाते जो मानवता के भाव, कर्म इत्यादि गोव में रहते हमारे भीतर होते हैं, वे सब शनैः शनैः शहरीकरण की भेंट चढ जाते हैं।
६. संवेदनाओं का मरना -
संवेदना मानव का सर्वोपरि गुण माना जाता है। यदि संवेदना न हो तो मानव, मानव नहीं रहता। लेकिन आज के इस व्यस्तता भरे युग में आज का मनुष्य अपनी संवेदनाऐ खोता जा रहा है। यहो तक कि किसी के मरने पर उसके दाह संस्कार में शामिल होने व दुःख व्यक्त करने का भी समय उसके पास नहीं है। हरीश करमचंदानी की कविता के भाव देखें -
सभा थी स्मृति की/उच्चारित किए जा रहे थे/
ट्टार्म और नैतिकता से लदे भारी शब्द/.....
..... कुछ लोग जल्दी में थे देख रहे थे बार-बार घडी/ कुछ व्यस्त थे मोबाइल पर/कुछ उकता चुके थे, ले रहे थे उबासी/.....
.....महिलाओं के समूह में खुसर-फुसर थी...
.... सजल ओखों से मैंने याद किया/ उस वृ= को/ जिसे देखे मुझे बरसों बीत गए थे
७. दूसरे की खुशियो न देख पाना
आज का मनुष्य स्वभाव एवं विचारों से इतना संकीर्ण हो गया है कि वह दूसरे की खुशी को देखकर जलता है व दूसरे को दुःखी देखकर खुश होता है। हरीश करमचंदानी की कविता ’हम और वे‘ इन्हीं भावों को लेकर आती है -
हम उदास थे/वे खुश थे पर यह स्थायी भाव न था/ हम उदास ही थे/जब वे भी उदास हो गए/
हम खुश थे/और वे उदास थे/
और हम भी उदास हो गए/
हम खुश थे/कि वे खुश थे/
हमें खुश देख/वे उदास हो गए/
हमारी खुशी उनसे देखी न गई।
८. पति-पत्नी के रिश्ते एवं आपसी समझ -
पति व पत्नी का रिश्ता हमेशा खड्डे-मीठे अनुभवों से भरा रहता है, जिसमें कभी अच्छे तो कभी कडवे अनुभवों की अनुभूति होती रहती है। वर्तमान हिन्दी साहित्य में भी इन रिश्तों के चित्र उकेरे गए हैं। उनमें से एक अनुभव कवि ब्रज श्रीवास्तव अपनी कविता ’पत्नी के लिए एक कविता‘ के माट्टयम से बहुत ही मार्मिक तरीके से कह जाते हैं -
सुबह जागती हो तो ऐसे जैसे पृथ्वी जाग जाती हो/ मिनट दर मिनट छोड देती हो/घर में कुछ नई तब्दीलियो/ ....तुम बिना पढे कोई किताब/जिया करती हो जीवन का हर पल/
और मैं पढ-पढकर/जीने के उसूलों को/
परास्त हो जाता ह/जीवन के सैलाब से।
९. प्रकृति से सम्बन्ट्टा -
आट्टाुनिकीकरण के प्रभाव से मनुष्य सुविट्टााभोगी हो गया है। वह अपने कार्य हेतु मशीनों पर निर्भर हो गया है तथा प्रकृति से दूर हो गया है। परन्तु आज का कवि न तो प्रकृति से ओखें फेरता है और न ही प्रकृति से अपने जुडाव को तोडता है। उसका जुडाव अंट्टाा नहीं है, बल्कि वह रिश्तों एवं भावनाओं के साथ तार्किक दृष्टि से प्रकृति के साथ जुडा है -
अब तक तुम मेरे साथ हो बरसात/
वह बाढ का पखवाडा था। जब मैं जन्मा था/
तुम आई थी एक बार तो/आ नहीं सकी थी बुआ/ पिताजी नहीं बंट्टाा सके थे राखी/.....
.....इस बार तुम इस रूप में साथ हो/
कि हम इंतजार कर रहे हैं कई दिनों से/
तुम्हारे एक दौरे का।
;तुम्हारे एक दौरे का - ब्रज श्रीवास्तवद्ध
१०. शासकों द्वारा अंट्टाविश्वासों का अनुचित लाभ उठाना -
शासक वर्ग हमेशा से सुविट्टााभोगी रहा है। सुविट्टाा व साा की प्राप्ति हेतु उसे जनता का साथ चाहिए। जनता का साथ पाने के लिए वह कुछ भी उचित, अनुचित करने को तैयार रहता है। वे भोली-भाली जनता के अंट्टाविश्वास एवं ईश्वर में आस्था का नाजायज लाभ उठाते हैं -
मृत्यु का भय/ईश्वर के भय को सींचता है/...
...र्‍ूर, अत्याचारी का जबडा/लगातार खुल रहा है/ एक ऐसी ओट्टाी/जो कभी खत्म नहीं होना चाहती/ कहो हो तुम! ;कहो हो तुम - विजेन्ध्द्ध
११. व्यवहार का दोगलापन -
व्यक्ति अपनी सुविट्टाानुसार स्वाथोङ के आट्टाार पर अपने व्यवहार को तय करने लगा है। नैतिकता से वह कोसों दूर हो गया है। इसी बात को आज का कवि कहता है -
एक जीभ से प्यार करूेगा/एक से दगा गाली/
एक से तेरी खाल उघेड/एक से छीनू थाली/...
...ट्टान से मारे/ट्टान से जीते/गुणों की खान कहावै। कोई राजा/कोई परजा/तू कलिराज कहावै।
१२. आजादी के नाम पर युवाओं में फैलती अराजकता -
कवि उद्भ्रान्त अपनी कविता ’आजादी‘ में युवा पीढी के उन कायोङ की तरफ ट्टयान खींचता है जो कि वे आजादी के नाम पर करना चाहते हैं, परन्तु किसी भी नैतिक या सामाजिक दायित्व के बंट्टान को स्वीकारना नहीं चाहते -
कल एक मित्र के बेटे की/बर्थडे पाटी से लौटने में/ हो गई आट्टाी रात/मित्र हम उम्र/
जाहिर है बेटा उसका था जवान/...
...दोस्तों में जाहिर है लडकियो भी होंगी/...
...मस्तिष्क ने पूछा मुझसे/अब तुम क्या करोगे?/ चुल्लू भर खोजोगे पानी या/ओखें फोड लोगे/
शर्मा की नुकीली बरछी से।
१३. लोकानुभव -
आज के वैज्ञानिक युग में जबकि हम हर जानकारी के लिए यंत्रों का सहारा लेते-लेते उन पर निर्भर हो गए हैं। वर्तमान साहित्य का कवि लोकानुभव के महव को भूला नहीं है, वह उसे याद रखता है -
लोक यदि जानता है बादल का नाम/
तो होते ही होंगे बादल भी/...
... मेरे पास बचे हैं उम्मीदों के कुछ बीज जो/
मैं उन्हें रोपगा और/बारिश का इंतजार करूेगा/
इंतजार करूेगा कि/लोक मिथ्या नहीं होता/
मिथ्या नहीं होते लोक के अनुभव।
;लोक मिथ्या नहीं होता - दफैरूनद्ध
१४. जिजीविषा ः
जीवन में इतनी विध्ूपताओं के होते हुए तथा जीवन के कष्टों का सामना करते हुए भी कवि जीवन जीने की आकांक्षा को बनाए रखने पर जोर देता है। मरगोजा नामक फूल के माट्टयम से वह बताता है कि कठिन परिस्थितियों के उपरान्त भी यह फूल बना रहता है व जीने का संदेश देता है -
चूरू के निर्जन टीलों पर/मैंने देखा/खिला मरगोजा... ...देखने में विनम्र/पर बडा हठी था/...
...जडों से इसे अलग करके/घर के कोने में रखा/ बडे आदर से/नया अतिथि अब कुछ-कुछ उदास था/ फीका-फीका/जैसे कह रहा हो/
अपनी तरह ही निर्मूल किया है/तुमने मुझको/
अग्रदूत ह मैं बसन्त का/इस निर्जन थार में/
देख मुझे जीवन पाते हैं किसान/
अच्छा संवत होगा इस साल/
सिर्फ बसन्त ही रहा है मेरा जीवन/मेरे मुरझाने से/ लोग समझ लेते हैं/ग्रीष्म आने को है।
जिजीविषा के अलावा कवि इसमें यह संदेश भी दे रहा है कि न तो हमें स्वयं जडविहीन होना चाहिए और न ही दूसरों को उनके मूल स्थानों से अपने स्वाथोङ की पूर्ति हेतु हटाना चाहिए।
इन सबके अलावा वर्तमान साहित्य समाज की तात्कालिक परिस्थितियों एवं समस्याओं पर नजर रखता हुआ आगे बढ रहा है। जिनमें मतलबपरस्ती, अंग्रेजी परस्ती, मानसिक गुलामी की प्रवृा एवं भदेस का चित्रण आदि बुराइयों की तरफ तो इंगित किया गया है, साथ में त्याग एवं बलिदान जैसे उत्कृष्ट भावों को भी साहित्य में स्थान दिया गया है।
पिर सामने आए तथ्यों के आट्टाार पर कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य का वर्तमान उज्ज्वल है। साहित्य अपने सामाजिक सरोकारों का निर्वहन संजीदा तरीके से कर रहा है। साथ ही साथ वर्तमान साहित्य पर आक्षेप भी लग रहे हैं, परन्तु यह तथ्य भी स्पष्ट है कि कभी भी किसी भी युग का साहित्य सम्पूर्ण नहीं रहा है तो वर्तमान साहित्य भी नहीं हो सकता। छिधन्वेषी लोगों का कार्य है छिध् ढढना और वे अपना कार्य भलीभोति कर रहे हैं। यह उचित भी है। यदि ये नहीं होंगे तो साहित्य सुट्टाार के मार्ग पर अग्रसर कैसे होगा।
वर्तमान हिन्दी साहित्य में ऐसे बहुत से विषय मौजूद हैं जो पूर्व के साहित्य में नहीं रहे थे। इनमें मुख्यतः नारी विमर्श व दलित विमर्श का नाम लिया जा सकता है। पुराने साहित्य में साहित्यकारों ने इन विषयों पर ट्टयान दिया ही नहीं और यदि दिया भी है तो सतही तौर पर। इस कारण से समाज का बडा हिस्सा साहित्य से कटा रहा। समाज की भी सुट्टाारात्मक दृष्टि उसकी तरफ नहीं जा पायी। वर्तमान हिन्दी साहित्य में न सिर्फ इन पर साहित्य लिखा जा रहा है अपितु यह साहित्य उन लोगों के द्वारा भी लिखा जा रहा है जो स्वयं को दलित कहते हैं। यह एक बहुत अच्छा संकेत है। हालोकि वषोङ-वषोङ से दमित शोषित रहने से ये दमित इच्छाऐ कुछ कटुता के साथ प्रकट हो रही है जिसे कि संभ्रान्त साहित्यकार समाज एवं साहित्य के लिए हानिकारक बता रहे हैं। परन्तु निष्कर्ष यह है कि ये कटु भावनाऐ समय के साथ हिन्दी साहित्य से तिरोहित हो जाऐगी तथा समरसता का भाव दिखाई देने लगेगा। इसका लाभ यह होगा कि दलितों के लिए मात्र सहानुभूतियुक्त साहित्य ही नहीं आएगा बल्कि एक अनुभूत साहित्य जो वास्तविक स्थितियों को प्रकट करे, सामने आएगा। इस प्रकार यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि हिन्दी साहित्य समाज के सभी वर्गी को साथ लेकर चला आ रहा है।
जो स्थितियो सामने उभर कर आती हैं निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि कुछ रिक्तताओं के साथ वर्तमान हिन्दी साहित्य समाज एवं देश को साथ रखते हुए आगे बढ रहा है व समाज को मार्ग दिखा रहा है।
व्याख्याता-हिन्दी, राजकीय लोहिया महाविद्यालय, चूरू