fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

गुड नाइट डैडी ! मूल गुजराती कहानी/ चन्द्रकांत बक्षी

अनु शिवा कनाटे
उसने देखा कि बेबी कहानी सुनते-सुनते सो गई थी। ट्टाीरे से उसने बेबी के बालों की रेशमी रिबन खोली। फिर एक के बाद एक हेअर पिन निकालीं, बाल खोल दिये और माथे पर हाथ फेरा, गाल का चुम्मा लिया। कहने का मन हुआ, ’’गुड नाइट, डालिङग!‘‘
सुबह की य्लाइट से बेबी को जाना था।
टेबल पर पडी पुरानी डबल लाइन वाली नोटबुक का पन्ना फडफडाया। वह खडा हुआ। होमवर्क वाली कॉपी ठीक से बैग में रखते-रखते उसकी नजर पडी, आडे-तिरछे अक्षरों में लिखा था, ’’फेअरी पिंक कुड नॉट य्लाय, फॉर हर विंग्स वेर वेट‘‘। पंख भीग गए थे इसलिए फेअरी पिंक उड नहीं सकती थी। फेअरी पिंक परी थी। नदी के किनारे रहती थी। लाइलेक के फूलों के बीच उडती थी। वह उडती थी तो फूल हिलते थे और पंखुरियों पर से शबनम झरती थी और जहो-जहो शबनम की एक बद झरती थी वहो-वहो एक तितली पंख फडफडाकर उड जाती थी।
उसने कॉपी बंद करके बैग में रखी।
उसने कहा, ’’बेटा, जल्दी सो जा, सुबह जल्दी उठकर तैयार होना है।‘‘
’’क्यों?‘‘
’’कल जल्दी उठना है। फिर तू उठेगी नहीं।‘‘
’’उठगी, मुझे कहानी सुनाओ।‘‘
वह कहानी कहने लगा, ’’एक थी बेबी...‘‘
’’मेरे जैसी?‘‘
’’हो, तुम्हारे जैसी, पर उसके बाल तुमसे ज्यादा लम्बे थे।‘‘
’’कितने लम्बे, डैडी?‘‘
’’खूब लम्बे।‘‘
’’वो चश्मा लगाती थी*?‘‘
वह हेसा। फिर याद आया, मम्मी चश्मा लगाती थी इसलिये और वह उदास हो गया। संयत होकर फिर हेसा।
’’तुझे कैसे पता चला?‘‘
’’मुझे नहीं पता।‘‘
’’अच्छा। वो चश्मा लगाती थी?‘‘
’’अपनी मम्मी भी चश्मा लगाती है ना? हो, मम्मी चश्मा लगाती थी। पर बेबी का चश्मा मम्मी के चश्मे से छोटा था।‘‘
’’वो देख नह सकती थी?‘‘
’’देख सकती थी, पर ज्यादा नहीं।‘‘
’’चश्मा पहन के रो नहीं सकते?‘‘
’’रो सकते हैं।‘‘
’’फिर?‘‘
’’फिर वो बेबी एक बादल पर बैठ गई और बादल आकाश में बह रहा था। फिर एक छोटा हरा पक्षी आया। पक्षी बहुत थक गया था, वह उड-उडकर पंख फडफडाते हुए बादल पर बैठकर दम लेने लगा, और...‘‘
’’वो रास्ता भूल गया था?‘‘
’’हो, वो रास्ता भूल गया था।‘‘
’’रात हो गई थी?‘‘
’’ना, रात नहीं थी। पर अेट्टोरा हो गया था इसलिये पक्षी घबरा रहा था। बेबी के पास आकर बैठ गया।‘‘
’’उसे डर लग रहा था?‘‘
’’डर लगेगा ना? इतने बडे आकाश में अकेले-अकेले उडते डर तो लगेगा ना?‘‘
’’लगेगा।‘‘
इसलिये बेबी ने पक्षी से पूछा, ’’पक्षी, तू कहो रहता है?‘‘
’’पक्षी कहो रहता था?‘‘
’’पक्षी ने कहा कि मैं तो एक तारे में रहता ह। वो तारा यहो से बहुत दू...र है।‘‘
’’कितनी दूर?‘‘
’’खूब दूर। मामा का घर है ना, उतनी दूर।‘‘
’’पक्षी रोने लगा?‘‘
’’ना, वो कहने लगा बेबी, मैं रास्ता भूल गया ह, मुझे बादल पर बैठने दोगी?‘‘ बेबी कहती है, ’’हो, जरूर बैठने दगी।‘‘ तब पक्षी बैठा और बादल आगे बहने लगा।
’’वो उड-उडकर थक गया था?‘‘
’’हो बेटा, खूब उड-उडकर वो थक गया था, इसलिये बादल पर बेबी के साथ बैठ गया।‘‘
’’फिर?‘‘
’’फिर चश्मेवाली बेबी ने हरे पक्षी से पूछा, ’पक्षी, तुझे गाना आता है‘?‘‘
पक्षी ने कहा, ’’मुझे तो गाना आता ही है न?‘‘
बेबी ने पूछा, ’’मुझे एक गीत सुनाओगे?‘‘
’’पक्षी को गीत गाना आता है, डैडी?‘‘
’’इस पक्षी को आता था बेटा, उसने गाया।‘‘
’’बेबी को मजा आया?‘‘
’’खूब मजा आया। बेबी बहुत खुश हो गई। खडी हुई। खूब नाची। वो नाची तो बादल हिला और बादल में से बरसात होने लगी।‘‘
’’आप किाी अच्छी कहानी सुनाते हो, डैडी?‘‘
’’तुझे अच्छी लगती है?‘‘
’’हो, मुझे बहोत अच्छी लगती है। फिर क्या हुआ?‘‘
’’खूब बारिश हुई। बादल खाली हो गया। बरसात नदी पर गिरी और पर्वतों पर गिरी। जमीन पर गिरी, पेडों पर गिरी, पाों पर गिरी।‘‘
’’पेड भी भीग गए?‘‘
’’हो। एक पेड था, उसके पो पीले पड गए थे। उसमें एक केसरी चींटी रहती थी।‘‘
’’वो भी भीग गई?‘‘
’’हो, केसरी चींटी पीले पो पर सो रही थी। हवा आई तो पीला पाा टूटने लगा, चींटी के पंख भीग गए, वो उड नहीं सकी। फिर वो रोने लगी।‘‘
’’चींटी क्यों रोने लगी?‘‘
’’उसके पंख भीग गए न बेटा, तो वो उड नहीं सकी। इसलिए रोने लगी।‘‘
’’डैडी, फेअरी पिंक के पंख भीग गए थे। वो भी रोती थी।‘‘
’’ये चींटी भी फेअरी पिंक की तरह रोने लगी। कहने लगी, मेरे पंख भीग गए, अब मैं नहीं उड सकती।‘‘
’’बेबी ने उसके पंख पोंछ दिये?‘‘
’’ना। वहो एक मोटा मेंढक बैठा था। उसका गला हिलता था और ओखें बाहर निकली हुई थी। चींटी के पंख भीग गए न, इसलिए वो हेसने लगा।‘‘
’’फिर?‘‘
’’फिर अचानक सूरज चमका, आकाश गरम हुआ, नदी गरम हुई, पर्वत गरम हुए। जमीन गरम हुई जिससे चींटी के पंख भी सूख गए।‘‘
’’चींटी उड गई?‘‘
’’ट्टाूप निकली इसलिए चींटी के पंख सूख गए और मेंढक की ओखें ट्टाूप में बंद हो गइङ। चींटी के पंख ट्टाूप में चमकने लगे। फिर केसरी चींटी उडने लगी। हरा पक्षी गाने लगा। चश्मे वाली बेबी नाचने लगी।‘‘
’’किाा अच्छा न, डैडी!‘‘
’’फिर सामने एक इन्ध्ट्टानुष खिल गया।‘‘
’’इन्ध्ट्टानुष याने?‘‘
’’बरसात हो और सूरज चमके तो आकाश में हल्के रंगों का एक पुल बन जाता है। चिडया घर में जापानी पुल है न, वैसा।‘‘
’’फिर?‘‘
’’वो केसरी चींटी इन्ध्ट्टानुष के रंगीन पुल पर जाकर खेलने लगी। पक्षी उस पुल के पिर उड गया। जहो वो रहता था, उस तारे की तरफ उड गया।‘‘
’’और बेबी, डैडी?‘‘
’’बेबी भी सो गई, बेटा। चल, अब तू भी सो जा।‘‘
’’बेबी कहो सो गई?‘‘
’’उसके डैडी के पास। कहानी पूरी हो गई।‘‘
’’चलो, अब सो जाते हैं - गुड नाइट!‘‘
’’गुड नाइट, डैडी!‘‘
रेशमी रिबन और हेअर पिन उसने बेबी की छोटी बैग में रखे। पेंसिल से किए गए होमवर्क वाली कॉपी रख दी। केसरी चींटी इन्ध्ट्टानुष पर खेल रही थी। हरा पक्षी उड चुका था, तारों के देश की ओर। चश्मेवाली बेबी चश्मा और रिबन और हेअर पिन निकाल, डैडी को गुड नाइट कहकर सो गई थी। कहानी पूरी हो गई थी।
बेबी को सुबह की य्लाइट से वापिस भेजना था। वह अकेली ही जाने वाली थी। नौ बजे बैठेगी यहो से। साढे बारह को मधस उतरेगी। मधस में उसकी मम्मी उसे लेने आने वलाी थी।
उसकी छुड्डियो भी पूरी होने को थीं।
...और उसके डैडी के साथ रहने की कोर्ट द्वारा दी गई अवट्टिा भी।
२०३, टावर-३, साईनाथ स्क्वेअर, मदर्स स्कूल के पीछे, जलाराम चौकडी, वडोदरा-३९००२१,
मो. ८१६०१ ४६१८४