fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

पीरो बा

माधव राठौड
इंसान समय के साथ खुद के बनते इतिहास के पन्नों को साक्षी बन देखता रहता है और परिस्थितियो उन पन्नों को फिर से बोचने के लिए वो किताब खोलती भी है, जिसमें हमारी जीवन यात्रा कच्चे संस्मरण झोकते नजर आते हैं।
इस महानगर की भागती और व्यस्त जिंदगी में गोव और उससे जुडी यादें काफी पीछे छूट गई है। कई बार गोव में बोले जाने वाले देशज शब्द सुनते हैं तो याद आता है कि समय के साथ हमारा कितना पीछे छूट जाता है शब्द, भाषा, बोली और खानपान... न जाने और भी क्या।
पीरो बा को जब से देख रहा ह तभी से वही शक्लो सूरत है, विशेष कोई फर्क नजर नहीं आया। मेरी ही नहीं पिताजी की स्मृतियों में भी पीरो बा वैसे ही उभरते हैं, जैसे आज है। सिर पर सफेद साफा, छितराई-सी मछे और हमेशा खिचडी मटमैली दाढी, पीले से दोत, चेहरे पर उनके जीवनानुभव की तरफ इशारा करती है। कहते हैं इस गोव में सबसे अट्टिाक दर्द झेला है और जिंदगी के कई उतार चढावों से कोई गुजरे हैं तो वो है, पीरो बा और जब वे प्यार से गालों को सहलाते थे तो उनकी फटी खुरदरी हथेलियों से पता लगा सकते कि कितना काम किया होगा इन हाथों से।
आप उनके स्थिर चेचक के दाग वाले चेहरे और उभरे हुए निशान देख उनके भीतरी दर्द की गहराइयों को समझ सकते हो। मगर जब वो मुस्कुराते हैं तो अपना ही नहीं, आपका दर्द भी भुला देते हैं।
पीरो बा की डत्र्ेस हमेशा एक सी रहती, सफेद कपडे और पिर रंगीन साफा, पैरों में फटी जूती। नहाने के नाम पर गोव के सार्वजनिक कुऐ पर खुला स्नान, जिसमें खारे पानी में न साबुन, न ही शेम्पू काम करता।
पीरो बा गोव के वो एकमात्र आदमी हैं, जिनसे पूरे गोव को लगाव है। कुछ स्वार्थवश, कुछ निस्वार्थ भाव से। बच्चे हो, बडे हो, स्त्री हो या पुरुष, हरेक को गाहे-बगाहे पीरो बा की जरूरत पड ही जाती है।
९० वर्ष के चैन जी को समाचार लेने हो या फिर किसका बेटा कब नौकरी गया, किसकी बीनणी कब आयी कब गयी, किसको कितना दहेज दिया, किसकी गाय कब ब्याही और गोव के अन्य ताजा समाचार चाहिए तो पीरो बा की शाम की बंतल में मिल जाते हैं।
युवा पीढी को अपने पिताजी से सिफारिश लगवानी होती है या किसी बात को मनवाना हो तो अजातशत्रु पीरो बा को ही सबसे आगे करते हैं। क्योंकि पीरो बा को पता है किस व्यक्ति को कैसे मनाया जा सकता है। इस कला में पारंगत पीरो बा के लिए कुछ मुश्किल नहीं, वे सीट्टाी बात नहीं करते, बल्कि बात की शुरुआत दादा की दुखती रग से करते और फिर सही समय पर सही सिफारिश कर देते, जिसे उस हालात में दादाजी का मना करना मुश्किल लगता।
गोव में किसी भी बेटी या बहू को लाना ले जाना हो तो पीरो बा का नाम हमेशा लिस्ट में रहता। क्योंकि पीरो बा का अनुभव सब जानते हैं कि सगे-सम्बन्ट्टिायों को अपनी हेसी-मजाक से खुश कर देंगे और वापिस आते वक्त पूरे सफर में सामान की जिम्मेदारी खुद ले लेंगे। होली हो या दीवाली, पीरो बा हमेशा एडवांस बुक मिलते, क्योंकि गोव में इन त्योहारों पर हलवा, लापसी और बेसन की चक्की बनानी हो तो एक ही नाम है - पीरो बा।
कहते हैं पीरो बा और दुःख का चोली दामन का साथ रहा। जन्म के पोच साल के बाद पिताजी का देहान्त हो गया था, इसलिए विट्टावा मो ने इकलौते बेटे को मेहनत मजदूरी करके पाला था। जवान हुए तो मो चल बसी, मगर गोव वालों ने शादी करवा दी और पीरो बा की घरवाली पूरे गोव की बडी मो बन गई। शायद इसलिए कि गोव में जितने जवान थे उनमें पीरो बा सबसे बडे थे।
कुछ सालों बाद बडी मो को बैल ने सींग से चीर लगा दी तो वह खोडकी मो बन गयी। पीरो बा ही नहीं, खोडकी मो भी सबकी जरूरत बन चुकी थी।
कहते हैं बडी मो के एक के बाद एक तीन लडके हुए, मगर बारह-छः महीने से ज्यादा नहीं जी पाए, अंत में उनके ट्टाापू पैदा हुई। एक पुत्र तो भयंकर अकाल में आक के फूल खाते वक्त आकडे का रस ओखों में चले जाने की वजह से अेट्टाा हो गया और कालान्तर में अकाल मृत्यु के भेंट चढ गया। भयंकर अकाल में पुत्र खोने के गम को बडी मो अक्सर बयां करती थी। ट्टाापू की शादी होने के बाद पीरो बा और बडी मो फिर अकेले पड गए। उनके पास १० बीघा जमीन थी, जिसे बारिश में जोतते थे, मगर रेगिस्तान में अक्सर अकाल डेरा डाले ही मिलता। इसलिए अट्टिाकांश लोग बारिश की खेती के बाद गुजरात, महाराष्टत्र् की तरफ चले जाते जो अगली बारिश पर लौटते। इस तरह अट्टिाकांश गोव खाली हो जाता, मगर पीरो बा और बडी मो कहीं नहीं जाते, क्योंकि न तो इनका बडा परिवार था और दूसरा कारण पूरे गोव में कोई न कोई काम मिल ही जाता तो दोनों व्यस्त और मस्त रहते। पीरो बा सुबह उठकर गोव का चक्कर लगाते, जहो दो-चार जने दिखते वहीं जम जाते, फिर शुरू होता हथाई का दौर। दूसरा हथाई केन्ध् था टेशन, जहो गोव का अखबार आता, फिर अखबार के समाचारों पर विशद चर्चा होती।
पिछले दस सालों से गोव खाली होने लगे हैं जो वृ= थे वो या तो एक के बाद एक चल बसे या फिर बुढापे में इस कदर जकड लिया कि शिकायतों और अकेलेपन के सिवाय उनके पास कुछ नहीं बचा।
पीरो बा जब भी रामसिंह के पास जाते तो यही बातें छिड जाती कि उनके बचपन का गोव खत्म हो गया। कभी उन्हें लगता है कि वे ज्यादा वृ= हो गये, इसलिए जिसकी वजह से बचपन में जो आनन्द आता था, उसमें अब रस नहीं रहा या फिर गोव बदल गया। मगर जब घंटों लम्बी चर्चा करते तो पाते कि दोनों स्थितियो ठीक है।
बचपन में बिना थके जून की ओट्टिायों और लू में गोव के तले ;सार्वजनिक कुऐद्ध पर या बस स्टेशन पर आवारागर्दी करना हो या खेजडी के खोखे खाने हो या बिना साट्टानों के भरपूर आनन्द देने वाले खेल हो, सब जगह दिमाग नहीं दिल का प्रयोग होता था। तब शायद उसमें ज्यादा आनन्द आता था, मगर अब दिमाग ही काम करता है। नहीं भी करे तो लोग याद दिला देते हैं कि इो बडे हो गए हो फिर भी....
दूसरी जो वजह नजर आती थी, वो थी, गोवों के स्वरूप बदल गए। पहले संयुक्त परिवार होते थे, होली दीवाली को पूरा गोव भरा हुआ लगता था, अब वो खाली हो गया। पहले बारिश होते ही लोग लौटते थे, मगर अब लोगों का खेती से मोहभंग हो गया। मजदूरी के लिए शहरों की तरफ पलायन कर चुके युवा अब होली-दीवाली को भी गोव आना नहीं चाहते। उन्हें लगता है, १००० या २००० खर्च कर गोव जाए भी तो कोई विशेष त्योहार का आकर्षण नजर नहीं आता।
अंतिम और महत्वपूर्ण कारण गोव को जो तत्व गोव बनाता था, वो खत्म हो गया। वो था, लोगों की सोच का दायरा। पहले लोग पूरे गोव के सदस्यों को अपना मान प्रेम करते थे, अपना मान गलती होने पर डराते- ट्टामकाते थे, मगर अब लोग अपने-अपने दडबों में सिकुड गये। आर्थिक और प्रतिस्पट्टाार् के युग के आने से प्रेम की जगह ईर्ष्या और जलन हावी हो गई। भाईचारा एक झूठ बन गया। आपस में किसी की नहीं बनती। बातें बडे आदर्श की करते हैं, मगर गाय, गोबर और बाड जैसी छोटी-छोटी बातों में गहरे मनमुटाव हो गए। थोडी बहुत उम्मीद युवाओं से थी, कि ये लम्बे फलक से सोचेंगे, मगर इन्होंने गहरा निराश किया है, वे ज्यादा संकीर्ण और ओछे निकले।
गोव का जो अपनत्व अपणायत थी, वो खत्म होती जा रही थी। इस बात को लेकर पीरो बा और चैन जी अक्सर चिंतित रहते और अपने पुराने दिनों के प्रेम और भाईचारे की मिसाल देकर निःश्वास रह जाते। पीरो बा को लगता था कि आज के युवाओं में ट्टाीरज की कमी है इसलिए छोटी-छोटी बात से मनमुटाव कर लेते हैं। पहले बुजुगोङ का जो मान-सम्मान था, वो खत्म हो गया। शादी-ब्याह में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई। घरों में से बाहर बने दालान में सिमट से गये।
पीरो बा ने साक्षी भाव से इतिहास को बनते हुए करीब से देखा था। कैसे आजादी आई, कैसे भारत-पाक पर बॉर्डर लाईन बनी। कैसे लोगों के घरों में अंग्रेजी चाय आई, क्योंकि पीरो बा के हमउम्र के अट्टिाकांश लोग चाय नहीं पीते थे। पीरो बा को आज भी याद है कि गोव में पक्के मकान के नाम पर केवल पंचायत थी और बाकी सभी के घर कच्चे थे, मगर पिछले २० बरसों में सभी के घर पक्के बन गये, सिवाय पीरो बा के। एक बार इंदिरा आवास के नाम से कमरा पास हुआ, मगर पीरो बा के सरपंच से बनी नहीं और कमरा कागजों में ही रह गया।
मेरे पिताजी रेलवे में नौकरी करते तो अक्सर बाहर ही रहते। मैं घर पर मो और बहन के साथ रहता और वहीं दसवी तक की पढाई की। पिताजी पर पीरो बा का विशेष स्नेह होने के कारण पीरो बा हमारे घर दिन में एक बार जरूर आते, मीठे पानी की पखाल डलवानी हो, गायों का चारा लाना हो या बाजार से सामान लाना हो। इन सबकी व्यवस्था पीरो बा ही करते। बडी मो का मुझ पर विशेष लगाव था। वो भी हमारे घर के सभी कार्य करवाती, जैसे खेत से ग्वारफली लाना, बोरडी के बोर लाने हो या गोबर थापना हो। उसका छोटा सा कद और सिर पर तगारी, जिसमें दिन में खेत में खाने के लिए कुछ जुगाड। साथ मुझे भी खेत ले जाती और फिर खेत में काम करती। ग्वारफली बीनती, काचरे मतीरे तगारी में भरती और मेरी स्कूल की खाकी पेंट के भुरंट निकालती हुई डांटने की कोशिश करती।
घर पर कुछ विशेष पकवान बनता तो मेरी मो बडी मो के लिए जरूर भेजती, जब मैं देने जाता तो बडी मो झोपडे के अंदर लकडी और चूल्हे से संघर्ष करती पाई जाती। ज्यादा उम्र होने की वजह से कभी तो रोटी मिड्डी वाले तवे पर नहीं तो बाहर। खुश होकर पूछती क्या भेजा है, तो मैं कहता आफ लिए नहीं, पीरो बा के लिए लाया ह। तो पोपले मह से नकली गुस्सा दिखाती। उन्हें पीरो बा से शिकायत करती कि मेरे नजर का चश्मा नहीं लगवाते।
मेरी मो जब भी पीरो बा से बडी मो की सेहत को लेकर शिकायत करती तो बाहर बैठकर हेसते रहते और राबडी से भीगी मछों को होठों बीच दबाते हुए बोलते, अब इसको कौनसा पढना है, जो चश्मा लगवाना है।
लोग कहते कि बडी मो ने जैसलमेर नहीं देखा, शहर के नाम पर नाचना या पोकरण जरूर गयी थी, वो भी किसी शादी में गयी तब।
गोव में कोई शादी हो या अन्य कोई प्रोग्राम हो, पीरो बा सलाहकार के रूप में नजर आते। कितना घी लाना है, क्या बनाना है, सब उनकी सलाह से ही तय हो पाता। गोव में कहीं भी जीमण हो, भोजन विभाग पीरो बा को संभालना होता। पीरो बा के बिना गोव का हर प्रोग्राम अट्टाूरा होता, क्योंकि पीरो बा जन्म, विवाह और मृत्यु हर जगह हाथ बेटाते खडे नजर आते।
एक दिन बडी मो बीमार पड गयी, मगर पीरो बा को गोव के कायोङ से फुर्सत ही नहीं मिली। फिर किसी शादी में व्यस्त हो गए। इट्टार बडी मो की तबीयत में कोई सुट्टाार नहीं और एक दिन बडी मो दुनिया छोड गई।
बडी मो की मौत के बाद कुछ दिन तक गोव वालों की भीड से पीरो बा को ज्यादा कमी नहीं खली, पर जैसे ही समय व्यतीत हुआ लोगों की भीड छंटने लगी और इट्टार पीरो बा अकेले पडने लगे। जब भी शाम को घर लौटते तो घर में बने दो झोपडे और एक नीम का पेड काटने को दौडता। रेगिस्तानी रात जैसे-जैसे ढलने लगती, पीरो बा के कलेजे में अजीब सी हूक उठने लगती। इंसान चाहे गोव का हो या शहर का, मगर उम्र के एक पडाव बाद हमसफर की जरूरत बनी रहती। पुरुष के जीवन के संट्टयाकाल में पत्नी की महती भूमिका रहती है। गोवों में इन चीजों को ज्यादा हल बल दिया जाता है कि बुढापे में कम से कम आदमी का रंडापा बिगडना नहीं चाहिए।
कभी-कभी मो कुछ देने को कहती तो मैं लेकर उनके घर जाता तो मुझे देखकर उनको घडी भर की खुशी मिल जाती, पढाई का पूछते।
वो हर बार मुझे एक ही बात समझाते कि आदमी को अपनी जडों को नहीं भूलना चाहिए। उनको गोव छोडकर शहर बसे युवाओं से घोर शिकायतें थीं। गोवों का इस तरह उजडना उन्हें कचोटता था, इसको लेकर वे खूब बताते और फिर गंभीर मौन में लीन हो जाते। मैं उस घर की डरावनी शांति से सिहर जाता, क्योंकि पीरो बा की पनियल ओखों और खुरदरे चेहरे में वो खुशी और मासूमियत गायब हो चली थी। भीतर से वे दुःखी थी, शायद पछता भी रहे थे कि वक्त रहते बडी मो का इलाज कराते तो शायद बच भी सकती थी। जीवनभर उन्होंने उसकी उपेक्षा की, न कभी ढंग का खाने को दिया, न पहनने को, क्योंकि खुद गोव में इतने व्यस्त रहते कि कभी भी घर की सुट्टा भी नहीं ली। गोव के सामूहिक सहभागी जीवन में वो इतने खोये रहे कि घडी भर याद नहीं रख पाए कि उनकी पत्नी के कुछ छोटे-छोटे अरमान भी हैं जैसे कभी शहर घुमा ले आये, बाबा रामदेव जी की यात्रा करवा लाये, बेटी ट्टाापू के मायरा भर ले, उनकी ओखों का चश्मा दिला दे। इंसान को अपनों की कध् और कीमत उनके चले जाने के बाद पता चलती है। पीरो बा को एक के बाद एक घटनाऐ याद आने लगीं कि किस तरह उन्होंने मिलकर अकाल झेले और पानी की समस्या देखी। खारे और मीठे पानी की मटकी अलग रख घर की इज्जत रखी। बडी मो काम करते-करते घिस गई थी, मगर जुबान पर कभी कोई शिकायत नहीं आने दी, मगर आज उसके जाने के बाद पीरो बा बार-बार अपराट्टा भाव से भर उठते। उनको रात में बडी मो दिखती, उनकी ओखों में शिकायत भाव और कातरता दिखती। पीरो बा रात को सो नहीं पाते, रात भर उठकर तारों को देखते कि रात कितनी ढल चुकी है। सुबह होते हुए भी वे गोव की ओर चल देते, मगर सोझ होते ही उनके कदम भारी पड जाते। वही दृश्य, वही बडी मो और वो ही अपराट्टा बोट्टा।
दसवीं पास करके मैं बीकानेर पढने चला गया। साल भर बाद गर्मियों की छुड्डियों में घर गया तो पता चला पीरो बा अंट्टो हो गए और कुछ महीनों बाद चल बसे। एकबारगी मैं अचम्भित रह गया, पीरो बा का सम्पूर्ण जीवनचर्‍ मेरे सामने चलने लगा। मुझे पीरो बा के अंट्टो होने की बात बार-बार कचोट रही थी कि वो अंट्टो कैसे हो सकते हैं। शायद वो अपराट्टा भाव से इतने भर गये हो या फिर... आकडे का रस... नहीं-नहीं, कम से कम ऐसा तो नहीं कर सकते पीरो बा।
हजार मह हजार बातें। कोई कहता भाइयों ने जमीन छीन ली, कोई कहता सेवा नहीं की।
मगर पीरो बा हालातों से हार गये, विस्थापन का दर्द जिंदगी भर सालता रहा, कभी अपनों का साथ नहीं रहा। भारत-पाक बनने पर मो-बाप का बिछुडना, फिर जवान बेटे की मौत होना, फिर पत्नी की।
मगर मुझे लगता है कि पीरो बा इनसे शायद ही हारे हो, उन्हें सदैव गोव के खाली होने के दर्द ने मारा, क्योंकि पीरो बा कोई व्यक्ति नहीं थे, एक गोव थे। पीरो बा... पीरो बा के साथ ही गोव की आत्मा चली गई।
सी-७३, हाईकोर्ट कॉलोनी, सेनापति भवन, रातानाडा, जोट्टापुर, मो. ९६०२२ २२४४४