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चन्दरी बुआ

महेन्द्र भानावत
साठ से भी अट्टिाक वर्ष हुए, अपने गोव कानोड की दास्तां आज भी चन्दरी बुआ की स्मृति से मुक्त नहीं करती। अब भी बुआ के जीवन को अपने में जीकर बुआ के दुःख का हिस्सा बनता ह। बुआ, जहो आज तेरापंथियों का नोहरा है, वहो रहती थी। अपनी जमीन नोहरा निर्माण के लिए देकर उसने अपनी दुःखी जिंदगी में सुख का छोटा-सा छींटा लिया था। फिर मेरे घर के ओवरे में वह रहने लगी। समाज उसका किराया दो रुपया माहवार भी बमुश्किल दे पाता था।
विट्टावाओं में दो मा - बेरा मा और हेंका मा। बेरा मा सफा बेहरे थे। दस वर्ष पति का सुख भोगा और रंडवा गये। हंका मा की कमर झुकी हुई और दोनों पोवों की छह-छह अंगुलियो। दो मासी में एक गब्बू मासी जब देखो तब ही घूंघट में मिलती। घर में अकेली होने पर भी कभी मह नहीं उघाडा। डेलू मासी का नानपणा ऐसा कि तीन बच्चों के लालन-पालन के लाले पड गये। जाडी मामी का मोटा डील और महा आलसी। पानी भी कोई लाकर पिलाए नहीं तो प्यासी मरे। बातों की लपारसी। खुद तो कुछ करे नहीं, दूसरों को भी बातों में लगा दे कि चूल्हे पर रखा दूट्टा ही नहीं, तपेली तक काली कलूटी हो जाय।
ट्टाापूडी के आकास्ये पर ऐसी एक दर्जन तपेलियो ट्टाूल खाती मिलीं। दो बुआ में भूरी बुआ की किस्मत देखो, बिचारी के तेरह टाबर हुए मगर एक भी नहीं बचा। समझे-बुझे ने बताया कि बुआ की पीठ के नीचे संपणी उभरी थी जिसने सब का भख ले लिया। चंदरी बुआ का भाग तो इन सबसे खोटा रहा जो चंवरी का ट्टाुओ भी नहीं ले पाई और विट्टावा हो गई।
डूंगाबा के लम्बी सफेद दाढी। उनके घर के ताणिये वाले किंवाड से भीतर का सब कुछ दिखाई देता। उनके एक अबलकी रंग का घोडा था जो जब तक रहा, फोडा देता रहा। एक बार एक वेरबला ;बिज्जुद्ध उनके परडे में जा घुसा जो बडी मशक्कत के बाद निकला। जीत्याबा छोटी थडी के सीट्टो-सादे मनख थे। न अरी में न बरी में। सिर पर बालों के तीन पट्टे रखने वाले वे बा बडे शकुनी थे। उनके शकुन लेने कोई न कोई आता रहता।
एक गागूबा थे जो मेरे घर के सामने वाली मेडी में रहते थे। उनकी एक ओख में फूला था। वे गेंडे के मूठ वाली करवरीदार लकडी के सहारे चलते थे। उनके चरकली नाम की एक लडकी थी जिसके डूंटी ;नाभिद्ध की जगह मोटा डूंटा था। वह भींत चाटती और कई बार मेडी की दीवाल के लेवडे ;मिड्डी की परतद्ध उतार खाती रहती।
सात विट्टावाऐ तो मेरी पिरोल में ही रहतीं। मेरे घर के सामने बेरा मा के साथ उनकी मोट्यार बहू रहती जो कम उम्र में विट्टावा हो गई थी। हम उन्हें काकी कहते। दोनों सास-बहू कातने-पीसने की मजूरी कर पेट पालती। उनके पास सोरमी जीजां की मो रहती। उन्हें हम मोटा काकी कहते। वह भी ओछी उम्र में विट्टावा हो गई थी। हमने काका को नहीं देखा। कोने पर मांगू की मोटी बाई रहती। वो कटोरी में पानी लेकर उसमें करवरी वींटी डूबो-डूबो ओख का ट्टाोखा निकालने में प्रवीण थी। डेलू मासी मेरी मो थी। सब छोटे-मोटे की जबान पर उसका डेलू मासी नाम सुन मुझे अच्छा लगता और कभी-कभाक मैं भी डेलू मासी कहकर खुश होता। कभी-कभी डूंगाबा की बहिन आ जाती। उसे हम चुन्नी बुआ कहते। पास के डूंगले में वह परणाई गई थी। एकबार तो मो वहो भी उनके घर मुझे मिलाने ले गई थी।
मो को हम ’बाई‘ कहते और बडी बहिन को ’जीजां‘। डूंगला हमारी मासी का घर था। उसका घर भरातरा। पोच तो एक-जैसे खाते-पीते, दिखते-दिखाते उनके जाये थे। सबके गांवडा, यानी पास के गोवों में वजण, लेन-देन। सबके पास ेट। खूब कमाते और एक से एक बढ-चढकर रंगदार रौबदार मस्ती भरे मन वाले। मछों पर ताव देते, अपनी मरोड के, मसखरी बिखेरते स्वभाव वाले।
हम मो के साथ वहो महीना-महीना रहते। खूब खाते-पीते। सब हमें अछन-अछन रखते। मेरे बडे भाई नरेन्ध् जिन्हें ’दादाभाई‘ कहते, के विवाह में पांचों भाई ने अपने ेटों के साथ विवाह का जो रंग जमाया और सजे-ट्टाजे रूप में वींद गोठ के बाद पूरे गोव में जो सवारी निकाली, वैसी आज तक नहीं देखी गई। सब कहने लग गये कि सगे भाइयों से भी वट्टाोतर, मासी-बेटे भाइयों ने मिलकर नानपणे के दुःख को हजार गुने सुख से रतन-जतन कर दिया।
कभी-कभी मो मुझे अपनी नानी के घर ले जाती। वह बारले सेर रहती थी। वह छोटी थडी की झुकी हुई कमर लिए टगर-टगर चाल चलती। उसके दो ओवरे थे। उनके बाहर का एक मोटा कोठा था जिसमें दूट्टा-दही-घी की जावणियो रहतीं। तीन गायें थीं। जब वे ब्याहतीं तब उस दूट्टा की जो बरी जमाती। दिनभर हम इसी का भोजन करते। मामी अेट्टाी थी। कहते हैं मामा कच्ची उम्र में ही चल बसे थे। चार सगी बुआ थी मेरे। तीन को मैं नहीं देख पाया। चौथी का नाम भूरी था। हम उन्हें भूरी बुआ कहते। जब भी मिलता, सोचना इनका रंग भूरा नहीं होने पर भी इन्हें भूरी क्यों कहते हैं। पूछने की किसी से हिम्मत नहीं हुई, पर जब मो मुझे पास के भूराबा की दुकान से सुई, ट्टाागा, चारोली, पूरबी दाणा, मीठा रंग, सिंदूर, सुपारी जैसी चीजें लाने को कहतीं, तब जाना कि भूरा-भूरी नाम होता है।
मुझे इन सबमें से चंदरी बुआ की स्मृति ही ताजगी दिए है। चंदरी बुआ का तन वैट्टाव्य के अभिशाप जैसा ही कालिमा लिए था। काला ओढना, काला घाघरा और लम्बी बाहों वाली काली कांचली। पति की मृत्यु का सदमा उसे सहा नहीं गया। हर पल उसने ओसू का ही जीवन जिया। इतने ओसू के कारण उसकी ओखें सूखकर अंट्टात्व को प्राप्त हो गई। उसकी पलकों के बीच नदी के दोनों किनारों की तरह मटे ट्टाागे जैसे जाले का जडाव इस कदर आवेष्ठित था जैसे जेल की शिकंजों में किसी शातिर कैदी को बंद कर रखा हो। वे पलकें कभी खुली नहीं। प्रकाश पर अंट्टोरे का ग्रहण तो मैंने अनेक बार देखा पर अंट्टोरे पर घने अंट्टोरे का घोर वैट्टाव्य का ग्रहण नहीं देखा।
चंदरी बुआ उस प्रोल में नीचे ओवरे में रहती। ओवरे में कोई रोशदान नहीं। कोई खिडकी नहीं। आस-औलाद, भाई-गरासिया, सगे-समट्टाी भी नहीं। हाव अकेली चंदरी बुआ उस ओवरे के मोटी लकडी के डामरपुते किंवाड की सांकल भी बंद किये रखतीं।
कई बार फका्र-फकी करने पर भी चूल्हा नहीं जलता। गीले कंडों को आग नहीं पकड पाती सो मसर-मसर ट्टाुओ निकलता। आखे ओवरे को ट्टाुंवास्या कर देता। चंदरी बुआ घबराती। दड-दड ओसुडे बहाती। अपने फूटे भाग्य को लेकर फफक पडती। वह दो चंदक्ये बनाती, छोटी कटोरीनुमा हथेली में आने जैसे। कभी वे हांव कच्चे रह जाते थे तो कभी अट्टिाक पकाई पाकर काले-पीले पड जाते।
वह प्रोल कभी पूरी गवाडी जैसे आबाद रही। बहीवाचक कभीकभार आता तो पीढयों की पोथी बोच उस असरदार आबाद रही प्रोल का जगमग बखान करता।
मरियल चूही सी चंदरी बुआ दिन को कभी-कभार बाहर निकलती और किंवाड के पास ही देहरी का टेका लेकर बैठ जाती। किंवाड को कट्ठा बंद कर नीचे वाले सांकल के ताला लगा देती। ताला कोई साट्टाारण नहीं, दरौली का बना दस्त का ताला था। पौन फीट के करीब लम्बी जो उसकी कूंची ही थी। वह बार-बार कभी हिलाकर तो कभी खींचकर उस ताले को देखती रहती कि कहीं खुला तो नहीं रह गया। अकेली रहती हुई भी बुआ कभी अकेली नहीं रहती। वह हर समय अपने से कुछ कहती, सुनाती, बतियाती रहती। लगता वह अपने साथ पिछले कई जन्मों का बोझ ढोये है।
एक दिन मैं चुपचाप उसके पास ऐसे जा पहचा जैसे हवा को भी पता न लगे पर बुआ भांप गई कि कोई आ बैठा है। बोली - ’कौन?‘‘ छोटे नारियल की काचली-सा उसका पोपलपापल मह देखकर मेरी हेसी फूट पडी। झेंप मिटाते बोला - ’बुआ, आपने कैसे जाना कि कोई बैठा है?‘ वह बोली - ’भीतर की ओखें बता देती हैं। सूरदास के अन्तर चक्षु खुले हुए थे सो उन्होंने जैसा जाना, कोई क्या जान पाएगा।‘
मैं यह सुन अवाक रह गया। पूछ बैठा - ’तो क्या आपको भी यह संसार दिखाई दे रहा है?‘ उसने बताया, ’यह तो नहीं पर पिछले जन्म को तो देख ही रही ह। जो कर्म किये थे उन्हीं का तो फल भोग रही ह।‘ ’सो कैसे?‘ मैं पूछ बैठा। बुआ ने कहना शुरू किया - ’मेरी एक पक्की सहेली थी, हमउम्र, हमशक्ल। हम साथ-साथ रहतीं। एक दिन एक अडभोपा आया। ट्टान्तूरे की ट्टाुन पर उसने एक भजन सुनाया - ’करम गत टारत नांही टरै।‘ हम उससे अपनी गत पूछती-पूछती आपस में उलझ पडीं। इस उलझन भरे रोष में सूरदास ने जैसे अपनी ओखें फोडी वैसे ही मैंने उसकी ओखें फोड डालीं। वह अच्छे संस्कार वाली थी सो उसने किसी तीसरे कान तक इस बात की भनक नहीं पडने दी। ’फिर क्या हुआ?‘ मैंने पूछा। बोली - ’अखन कुंवारी रह उसने अपना जीवन बडे दोरम में काटा।‘ ’फिर?‘ मैं आगे जानने को आतुर था। बुआ बोली, ’आगे क्या होना था। होना तो इस जनम में मेरा लिखा था सो चंवरी का कलंक लगा और सुख का तिनका भी नहीं देखा।‘
चंदरी बुआ के ओवरे में काले किंवाड का भंडारिया था। उसमें रखे भरतिये में चांदी के चिाौडी रुपये थे। बुआ उन्हें बार-बार गिना करती। गिनने की खनक कई बार मैंने भी सुनी। वे सिक्के ही उसकी मूल पजी थे।
अपने दुख, दोरम तथा वैट्टाव्य को काटने के लिए चंदरी बुआ के पास अंट्टोरा, ओसू एवं अकेलेपन के साथ वे ढेर सारी कहानियो, गीत तथा गालें थी, जो उसे पारम्परिक लोक से मिली थीं। ऐसी दशामाता की, काती नहाने की, थापानुष्ठानों की कहानियों का वह भंडार लिए थी। इन कथा-गीतों को वह बडी मट्टाुराई से गाती।
सोनाबाई रूपाबाई की गीत-कथा वाली कहानी सुनने तो प्रति रात्रि ही हम उसे घेरे रहते। वह लेरके दे-देकर गाती - ’उतरो-उतरो ऐ म्हारी सोन्याबाई बेन्या/रूपाबाई बेन्या/ढोल नगाडा वाजीरया/पनवा री वेरां टली रई।‘ कहानी है -
सोनाबाई-रूपाबाई दो बहिनें थीं। सोनाबाई के सोने और रूपाबाई के रूपे अर्थात् चांदी जैसे बाल थे। एक दिन दोनों नदी पर नहाने गई। दोनों के बालों के गुच्छे नदी की ट्टाारा के साथ बहते गये। आगे उनका भाई नहा रहा था। बालों के गुच्छे देख वह बडा चकित हुआ और मन ही मन कल्पना कर बैठा, ऐसे बालों वाली कन्या कितनी सुंदर और भाग्यवान होंगी। वह घर आया और अपनी मो से उन बालों वाली कन्या से विवाह करने की जिद्द कर बैठा। उसे ज्ञात नहीं था कि वैसे बालों वाली एक नहीं, दो कन्याऐ उसी की बहिनें हैं।
मो के लिए बडा संकट हो गया। बहिनों को जब इस बात का पता चला वे अपने ओगन में लगे चंदन के वृक्ष पर जा बैठीं और उससे कहने लगीं कि भाई जिद्द पर अडा हुआ है पर हमारे लिए यह असहनीय दुष्कृत्य है। अच्छा हो, कोई चमत्कार हो। तुम आकाश की ओर बढते जाओ और इट्टार ट्टारती फट पडे ताकि हम दोनों उसमें समा जायें।
इस सारी स्थिति से नितांत अनजान भाई को जब पता चला कि वे बालिकाऐ दो हैं और वृक्ष पर बैठी हुई हैं तो वह उनसे नीचे आने की अरदास करने लगा। भाई और बहिनों का संवाद जिन कारुणिक स्थितियों की अभिव्यक्ति देता है, उसे सुन भाई के अबोट्टापन किन्तु बहिनों की भली समझ पर कोई क्या समझेगा!
वृक्ष पर बैठी अपनी दोनों बहिनों से भाई कह रहा है - ’सोनाबाई बहन! रूपाबाई बहन! वृक्ष से नीचे उतरो। ढोल-नगाडे बज रहे हैं। विवाह का वक्त टला जा रहा है।‘ दोनों बहिनें जवाब देती हैं - ’आगे तो मां वीरा सा केती/अबे सायबजी कयोएनुं जाय/वट्टा-वट्टा रे चंदण रा रूंख/वट्टयांई जाय, ट्टारती फाटे तो म्हैं ट्टांसा।‘ अर्थात् अब तक हम जिसे वीरा अर्थात् भाई कहकर बुलाती थीं, अब उसे सायबजी अर्थात् पतिदेव नहीं कहा जाता। ए चंदन के वृक्ष! तुम पिर आकाश में बढो और बढते ही जाओ। यह ट्टारती फट जाय तो हम उसमें अपने प्राण न्यौछावर कर दें। इसी प्रकार मो को सास और बावल को श्वसुर कैसे कहें?‘‘
बुआ का ढका मह उसकी करुणाभरी गीतमय दास्तान से छलक मारता देख हम बच्चे भी अपने ओसू नहीं रोक पाते। हममें से कुछ तो अपनी सुबक में ट्टाारदार हो आस्तीनों से ओखें पौंछने लगते। बुआ यह सब भांप जाती तब अचानक वह अपनी सहज हेसी ऐसी बिखेरती जैसे किसी नवजात शिशु को कोई विट्टााता माता हेसा रही है।
मेरा वह गोव कानोड अभी भी है, मगर वैसा नहीं रहा। प्रोल भी वैसी नहीं रही। वे नाम और वे बा-बुआ भी नहीं रहे। तब भी उस खंडहर बनी पोल में अपनी याददाश्तों का अर्घ्य चढाने जाता ह। अपने गोव और उस पिरोल की ममत्व भरी महकदार माटी से अपने आत्म-चैतन्य को सुगंट्टाा बनाता ह। उस अतीत को वर्तमान में सरजीवित कराता ह। जननी और जन्मभूमि का कर्ज उतारता ह। तब के ओसुओं से अब के ओसुओं की मिलनी कराता ह। कितना ही समझ- समझाे, अपना मन और हिया तो ट्टाार-ट्टाार हुए बिना नहीं रहता, मगर लेखनी को किस विट्टा समझाे जो उस अतीत को याद करने की अरड पकडे उदास ट्टाुंट्टालके में खो जाना चाहती है।
३५२, श्रीकृष्णपुरा, सेंटपॉल स्कूल के पास, उदयपुर-३१३००१, मो. ९३५१६ ०९०४०